Thursday, April 8, 2010

उसका खजाना ....



इसे आप संस्मरण कह लीजिए या कोई कहानी पर है ये आपबीती ................मेरे लिए इस घटना के मायने अलग है ..........ये वो घटना है ,जिससे मेरे सोचने का तरीका बदला है ...............
बात उन दिनों की है जब मै और मेरी बेटी नागपूर गए थे ..............और ट्रेन में हबीबगंज के पास हमारा एक बेग चोरी हो गया था ...................बहुत घबरा गई थी मै ................ऐसा पहली बार हुआ था ,हमारे साथ परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं था | बेग के साथ ही, मेरे पास जो थोड़े बहुत सोने के आभूषण थे, सब चोरी चले गए थे |दिमाग में
अजीब -अजीब से विचार आ रहे थे एक क्षण में ही सारी बुरी घटनाए जो अब तक घटी थी ,एक-एक कर याद आ गई थी , आंसू निकल पड़े थे मेरे............ ................बहुत समय लगा था इससे उबरने में ...................









जब इन्दोर वापस आए तो एक दिन स्कूल जाते समय बस की खिड़की से बाहर देख रही थी ............रास्ता तो वही रोज का रहता था ,..............पर एक आदत -सी पड़ चुकी थी कि--------जहां -जहां मंदिर ,मस्जिद, गिरजाघर पड़ते है वहाँ सर झुका देना ..................जो परिचित दिखाई पड़ जाए तो मुसकराकर नमस्ते करना ............... हर चौराहों पर सफाई करने वाले द्वारा बनाई रंगोली देखना .........और ......ये तुलना भी करना कि बस जल्दी आई है या काम जल्दी ख़तम कर दिया है ..................सड़क के किनारों पर रोज सोने वालो कों देखना कि वे उठे या नहीं,( मन में तो ये रहता है कि वे सकुशल है या नहीं ,दिखाई नहीं पड़े तो चिंता हो जाती है कि कहा रह गए होंगे......मन कों समझाना पड़ता है कि शायद जगह बदल ली होगी ).................रास्ते में पन्नी बीनने वाले बच्चों और औरतो के जत्थे भी दिखाई देते है ...............
.......और उस दिन भी ..........गुजरते हुए कूड़े के ढेर पर एक पन्नी बीनने वाली महिला कों बैठे देखा ,......उसकी गोदी में २-३ माह का एक बच्चा था ................ वो महिला अपने बच्चे कों दूध पिलाने के लिए कूड़े के ढेर पर ही बैठ गई थी .............और बच्चा भी सबसे बेखबर हो ममत्व का आनंद ले रहा था .........पर जिस दृष्य ने मुझे झिंझोरा था-------- वो ये कि उस महिला ने एक हाथ से अपना पन्नी भरा बोरा कसकर पकड़ा था , साथ के बाकी लोग पन्नी बीन रहे थे ,शायद उसे लग रहा था कि बच्चे कों दूध पिलाने के चक्कर में कोई उसके पन्नी के बोरे से पन्नी चुरा लेगा और उसके चहरे पर इतनी देर पन्नी न बीन पाने का तनाव भी साफ़ दिखाई दे रहा था ..................और मै ................मेरे दिमाग में से वो सूटकेस चोरी वाली बात जा ही नहीं रही थी ......................मै उसका शोक मना रही थी ....................तभी एक विचार आया -----------मेरे पास वो सूटकेस था और इसके पास , ...............इसके पास शायद ये पन्नी का बोरा ...................मुझे उसके चले जाने का दुःख है और इसे इसके चले जाने का वही डर है उसकी परिस्थिति में उसके पास पन्नी का बोरा ही उसका सोना था, ................बस सोने कि तुलना का ख्याल आते ही मेरे होठो पर मुस्कराहट छा गई ..............सोचा मै उस खजाने के लिए रो रही हू और ये इसके लिए खजाने के बराबर है ..................मुझसे कई गुना बड़ा है इसका खजाना ............................... .........
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(सभी चित्र गूगल से साभार )

4 comments:

परमजीत बाली said...

एक संवेदनशील चिंतन।

Manish Kumar said...

hmmm ek baat aur bhi hai jiske paas kuch nahin hota uske liye har din ek zaddozahad hoti hai par sath hi kuch khone ka tanav bhi nahin rahta ..

दिलीप said...

bahu hi marmsparshi bhaavnayein...sundar...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

सबके अपने आसमान.....


हर एक के लिए उसका खजाना ही बेश्कीमती है.