न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे---,न ही किसी कविता के---,और न किसी कहानी या लेख को मै जानती---,बस जब भी और जो भी दिल मे आता है---,लिख देती हूँ "मेरे मन की"-----
Friday, May 18, 2012
आँखों की जबां...
ये सच है कि आँखें बोल देती हैं, गर इश्क की जबाँ न हुई तो क्या हुआ ...
मिले हैं राहों में दोस्त सुकूं के लिए गर जो हमारा कोई न हुआ तो क्या हुआ...
निभा तो जाएंगे रस्में सारी हम गर जमाने का दस्तूर न हुआ तो क्या हुआ....
7 comments:
बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।
बहुत खूब, अपनी शर्तों पर जीने की शर्त है बस..
वाह ...बहुत ही बढि़या ... आभार ।
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
खूबसूरत अहसास सुंदर शब्दों की माला सुंदर कविता
बहुत अच्छे!
बेहतरीन रचना
अरुन (arunsblog.in)
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