Friday, May 18, 2012

आँखों की जबां...

ये सच है कि आँखें बोल देती हैं,
गर इश्क की जबाँ न हुई तो क्या हुआ ...

मिले हैं राहों में दोस्त सुकूं के लिए
गर जो हमारा कोई  न हुआ तो क्या हुआ...

निभा तो जाएंगे रस्में सारी हम
गर जमाने का दस्तूर न हुआ तो क्या हुआ....

7 comments:

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब, अपनी शर्तों पर जीने की शर्त है बस..

सदा said...

वाह ...बहुत ही बढि़या ... आभार ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

संजय भास्कर said...

खूबसूरत अहसास सुंदर शब्दों की माला सुंदर कविता

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बहुत अच्छे!

अरुन शर्मा said...

बेहतरीन रचना
अरुन (arunsblog.in)