न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे---,न ही किसी कविता के---,और न किसी कहानी या लेख को मै जानती---,बस जब भी और जो भी दिल मे आता है---,लिख देती हूँ "मेरे मन की"-----
कहानी का शीर्षक अपनापन कुछ हद तक दुख दे गया ..हम रिश्तों को जियें .न की रिसतों को जियें . कहानी अपनों की लेकिन सही के अपनों से अलग कहानी कहती .. जितना सुन्दर मेरी बहन गातीं हैं उससे भी सुन्दर मेरी बहन कहानी सुना जाती हैं ...
8 comments:
कहानी का शीर्षक अपनापन कुछ हद तक दुख दे गया ..हम रिश्तों को जियें .न की रिसतों को जियें .
कहानी अपनों की लेकिन सही के अपनों से अलग कहानी कहती ..
जितना सुन्दर मेरी बहन गातीं हैं उससे भी सुन्दर मेरी बहन कहानी सुना जाती हैं ...
बड़ी ही मार्मिक कहानी, अपनापन खून से भी अधिक दिल से होता है..
पढ़ी थी यह कहानी...आज सुन कर फिर आँख भर आई...
मार्मिक कहानी....
बेहद मार्मिक
आपका प्रस्तुतिकरण नि:सन्देह अनुपम है भावमय करती प्रस्तुति ..आभार
badi hi marmik kahani magar yahi aaj ka sach hai. apne pan ke rishte hamesha khoon ke rishton se badhkar hi hote hain.
फिर फिर सुनना अच्छा लगा, शुभकामनायें!
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