Sunday, November 25, 2012

हमारा हवामहल "इबादत"

आज आपके लिए मैं, नहीं हम, जी हाँ ये आभासी रिश्तों का एक सम्मिलित प्रयास है, और हम लेकर आए हैं, आपके लिए
..ओ’ हेनरी की कहानी AService Of Love ( अ सर्विस ऑफ़ लव) का नाट्य रूपान्तरण " इबादत".... इस कहानी को नाट्य में रूपांतरित किया है हमारे छोटू उस्ताद यानि अनुभव प्रिय ने जिससे आपका परिचय करवाते हुए कहा था मैंने .. कि ये तो अभी शुरुआत है देखिये आगे-आगे करते हैं क्या?......अपनी पढा़ई के बीच से समय चुराना कोई अनुभव से सीखे ...अनुभव बच्चों के लिये एक आदर्श है...
                   अभिनव के किरदार को आवाज दी है - अनुभव प्रिय ने


और इस नाटक का संपादन किया है मेरे सलिल भैया यानि (सलिल वर्मा ) ने जो लिखते हैं संवेदना के स्वर और  चलाबिहारी नामक ब्लॉग पर और बाँटते हैं जीवन के अनुभव, अपने संस्मरण अपनी भाषा में हम सबसे ...बिलकुल हल्के-फ़ुल्के तरीके से ... 
                                   मकान मालिक के रूप में - सलिल वर्मा
                                            
अब आता है नाटक को अन्तिम रूप से संगीत से सँजोने का कार्य..और ये कार्य  कई कठिनाईयों और  मुश्किलों का बड़ी बहादुरी से सामना करते हुए कर दिखाया है हमारे ठाकुर साहब यानि ठाकुर पद्मसिंह जी ने जो खुद फ़िलहाल नौसीखिया है ...और लिखते है पद्मावली , ढिबरी ,पद्मसिंह का चिट्ठा और सिंहनाद नामक ब्लॉग ...........................................
                                पार्श्व संगीत संयोजक - ठाकुर पद्मसिंह जी
                                                   
मैनें कुछ नहीं किया बस सिर्फ़ इन सबको एक जगह इकट्ठा करने की कोशिश की है ..... 
                         नलिनी की आवाज है मेरी यानि - अर्चना चावजी की....


आप बताईयेगा हमारा सम्मिलित प्रयास आपको कैसा लगा?....

इस नाटक को रिकार्ड करते हुए हमने हमारे परिवार के सदस्यों को बहुत परेशान रखा है जिसके लिये हम उन सभी से माफ़ी चाहते हैं ....लेकिन  भविष्य में सहयोग की अपेक्षा भी रखते हैं .." समझे कि नहीं " तो सुनिये  हमारा हवामहल के अन्तर्गत ओ’हेनरी की कहानी "अ सर्विस ऑफ़ लव" का नाट्य रूपान्तरण - इबादत .... 








Friday, November 23, 2012

फ़र्क

ये तस्वीर कुछ दिनों पूर्व स्कूल जाते हुए ली थी ,हुआ ये था कि मैं अपने घर से बस स्टॉप तक जाने के लिये निकली थी कि मेरे आगे -आगे ये नज़ारा देखा ...
बेटा बेफ़िक्री से जेब में हाथ डाले स्कूल की बस के स्टॉप तक चल रहा था ,और माँ ने उसका स्कूल बेग उठा रखा था,जबकि लग रहा था कि बेटी का हाथ पकड़ा हुआ है ।

माँ के पैरों की चाल देख कर ही अंदाजा लग रहा था (शायद आपको भी लगे)कि बहुत तनाव है -
-इसे छोड़ना है ...आकर छुटकी को तैयार करना है.....इसके पापा भी उठने वाले होंगे .....चाय बनाना है.... नाश्ता -टिफ़िन....वगैरह वगैरह....कामों का ढेर ...

और मैं छुटकी की चाल देख कर उसके मन के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी --
मम्मा भैया को अकेले जाने दो न! ..... मुझे इत्ती जल्दी क्यों उठा दिया....पापा नहीं छोड़ सकते भैया को.....कल से मैं नहीं आउंगी :-(  ...आप रोज -रोज ऐसे ही बोलती हो ....भैया बड़ा नहीं हुआ अभी ?....मैं कब बड़ी होउंगी....मुझे भी बड़े होकर जल्दी उठना पड़ेगा ?.....

और मुझे ये देखकर अपने बच्चों का छुटपन याद आ रहा था...बेटी तब भी जल्दी उठकर साथ चलती थी मेरे और बेटा देर से उठकर हमसे आगे निकल भागता था...



स्वभावगत ही होता है शायद ऐसा......

Tuesday, November 20, 2012

सुनो ! मत छेडो़...

आशीष राय जी के ब्लॉग युग दृष्टि से एक गीत ....




सुनो ! मत छेड़ो सुख तान
मधुर सौख्य के विशद भवन में
छिपा हुआ अवसान

निर्झर के स्वच्छंद गान में,
छिपी हुई वह साध
जिसे व्यक्त करते ही उसको,
लग जाता अपराध
इस से ही वह अविकल प्रतिपल
गाता दुःख के गान ! सुनो मत छेड़ो सुख तान

महा सिन्धु के तुमुल नाद में,
है भीषण उन्माद
जिसकी लहरों के कम्पन में,
है अतीत की याद
तड़प तड़प इससे रह जाते
उसके कोमल प्रान! सुनो मत छेड़ो सुख तान

कोकिल के गानों पर ,
बंधन के है पहरेदार
कूक कूक कर केवल बसंत में ,
रह जाती मन मार
अपने गीत -कोष से
जग को देती दुःख का दान ! सुनो मत छेड़ो सुख तान

हम पर भी बंधन का पहरा
रहता है दिन रात
अभी ना आया है जीवन का
सुखमय स्वर्ण प्रभात
इसीलिए अपने गीतों में
रहता दुःख का भान! सुनो मत छेड़ो सुख तान
-- आशीष राय 

Sunday, November 11, 2012

कान्हा...


 ये पेंटिंग बनाई है श्रीमती विजयश्री मिश्रा जी ने जो आकाश मिश्रा  की माताजी हैं....इस पर आकाश ने कविता भी लिखी है जिसे आप उसके ब्लॉग -आकाश के पार पर पढ़ सकते हैं । और आकाश की कविता को सुन सकते हैं यहाँ --

और अब इस पेंटिंग और पॉडकास्ट के साथ सुनिये ये भजन ...जिसे उपलब्ध करवाया  है एक बेहद साधारण पाठक ने ---

Saturday, November 10, 2012

वो शाम ...


ठंडी पड़ती धूप

उस पर सिंदूरी सा रूप
हल्की-हल्की बहती हवा
गम दूर करने की जैसे दवा
महक जिसमें होती खास
जगती तुझसे मिलने की आस
इन्तजार का होता खात्मा
और जी उठती मेरी आत्मा
न होता कोई और काम
बस आराम ही आराम
बीतती ऐसी मेरी हर शाम
काश! बस तेरे ही नाम...
-अर्चना

Wednesday, November 7, 2012

सितारे की चमक ...

वैसे तो सूरज को दीपक दिखाने वाली बात है पर एक प्रयास किया है पढ़ने का--

आज सुनिये एक ऐसे सितारे की लिखी कहानियाँ जिसकी चमक बढ़ती जा रही है ....



(बिना सुने पोस्ट करने की अनुमति देने के लिए आभार!)





और  पढ़ने को यहाँ है  ...कहानियाँ


यहाँ आप इनकी किताब  "चौराहे पर सीढ़ियाँ "लेने के लिये  क्लिक कर सकते हैं

तस्वीर...




1-
तस्वीर से टकराकर लौटती है
झरोंखे से पड़ती धूप
चौंधियाकर-
आँखों के बन्द होते ही
तुमसे बिछड़ना
याद आ जाता है ....

2-
तुम्हारा बिछड़ना,
और बिछड़कर

तस्वीर बन जाना,
धूप से नफ़रत है -
तब से ....

3-
भोर से ही बैठे थे 
तस्वीर सजाने को
धूप चढ़ी तो रंग निखरा

अब शाम ढलने को है
कहीं रात के अँधेरे में 
बिछड़ न जाना तुम.....

४-

बिछुड़ना उदासी फ़ैला रहा है
हम सबके बीच
कोई हँसाओ तो जरा सबको.....

५-
हँसती हुई तस्वीर देखो
ज़रा तुम भी
कैसे रंग भरती है जीवन में
और ये देखो
इंद्रधनुषी रंग
जाने का मन नहीं करता मेरा...

-अर्चना













Saturday, November 3, 2012

शुभ - दीपावली



 ..
.रीवा से वापस लौटते समय किसी स्टेशन के आऊटर पर रूकी ट्रेन ...और  दिवाली के स्वागत में सजा ये घर देखा.....बच्चे अपनी पूरी मस्ती में ....एक ओर जहाँ बाजू के घर में भैया मोबाईल में व्यस्त हैं,वहीं पडोस की आँटी जी शाम का खाना बनाने  की तैयारी में व्यस्त ...हर कोई अपना-अपना काम कर रहा है ...(मैं भी ...)....और जब ट्रेन चल पड़ी तो ..टाटा करना नहीं भूली छुटकी गुड़िया.....

Friday, November 2, 2012

घर से बाहर निकलो ...


तुम्हारा बाहर निकलना जरूरी है
इस घर के बाहर के लोगों के लिए
उन लोगों को देखने के लिए
जिनके पास घर नहीं है
न थकन मिटाने के लिए
न घर के बाहर खड़े हो कर पुकारने के लिए
सूरज का उजाला हमेशा उनके सर पर होता है
और वो भूले से भी नहीं लौट पाते अपने घर
एक बार ही सही..
उनसे मिलने के लिए
घर से बाहर निकलो.....
- अर्चना