Monday, May 27, 2013

मेरे कमेंट्स -एक ड्राफ्ट



माँ-----
कब याद नहीं आती ?.....
हर पल,हर दिन .....
मेरे साथ रहती है .....
मुझसे बातें करती है ....
मुझे छोड कर कहीं नहीं जाती है .....
आज भी आयेगी .....और
मेरे साथ केक खाएगी................Samir Lal


कही "ये" से "वो" बन कर नींद ढो रहे हैं .....
तो कहीं "वो" बनने के बाद अपना "ये" खो रहे हैं..adaa 

इसे कहते हैं ------बढिया,खूबसूरत,और मनमोहक प्रस्तुती----पढने ,सुनने ,देखने -----की तीनों विधाओं का भरपूर प्रयोग.......सहेजने योग्य--
एक यादगार पोस्ट-----मनोज

साँप और सीढ़ी
खेली मेरे साथ जिंदगी
निन्यानवे अब तक पार नहीं हुआ
कई बार चढ़ी
खेल अब भी शुरू है
जीतूंगी भी, मै ही
चाहे खेलना पड़े
पीढ़ी दर पीढ़ी.....गीत मेरी अनुभूतियाँ

बिछड़े सभी बारी बारी है....
याद आती बाते सारी है....
चाहे भोला हो या हो फत्तू....................मो सम कौन


जिस घर मेरा बचपन बीता वो घर भूल न पाती हूं....
बाट जोहता है भैया मेरा-ये मैं जान जाती हूँ....
इसीलिए माँ -हर सावन में राखी के बहाने आती हूँ....
झूला देख मुझको--माँ पापा की बांहें याद आती है ...
इसीलिए शायद सावन में मेरी आँखें भर आती .........................मेरे गीत 


हर जगह बिखरा पडा था ,
मै था एक माटी का लौंदा,
ले न पाता रूप कोई,
मुझको था धर्म,जाति,क्षेत्रियता ने रौंदा,
मिले कुम्हार जीवन में मुझको,
देख जिन्हें मेरा मन कौंधा,
श्रद्धानवत हूँ उनके आगे,
बना जिनसे मेरा घरौंदा.........मेरे कुम्हार



मन नहीं मानता,
अब भी तुम कितना याद आते हो
सुबह जल्दी आँख का खुल जाना
ये तुम्हारी आदत थी,उस समय
आज भी नींद जल्दी खुल जाती है
हाथ आज भी सिरहाने
उन बालों को टटोलता है
जो कभी मेरी उंगलियों से
फ़िसल जाया करते थे
उठ कर चुप बैठ जाती हूँ
सुबह का इंतजार करते हुए
बच्चे बडे हो गए तो
न स्कूल,न टिफ़ीन
और तुम भी नहीं
तो नाश्ते का भी कोई समय नहीं
वैसे भी गले नहीं उतरता
दिल में छेद हो गया है
बहुत दर्द होता है
हूक सी उठती है
पर किसी से कुछ कह भी नहीं पाती
और कहूँ भी तो किससे?
सुनने वाला कौन है यहाँ
उफ़.....तुम भी न...-----स्वप्न मेरे 



 पता नहीं कब तक
वही आंसू
......
फिर वही शांती
फिर वही पैग
फिर वही पिता
फिर वही कुपुत्र
और अनंत तक चलने वाली
शान्ति की खोज ....---बाबा के बारे में


दो भागों मे बँट जाना होता है ...
फ़िर भी खून के रिश्ते ही निभाना होता है...-- पर क्यों??? ना जाने कोई.



...और जब कुछ लिखने का मन होता है
बन्द करता हूँ आँखों को
पलकों की कोर से भी
कुछ नहीं देखता
तुम हर ओर नजर आती हो
कलम अनायास ही चल पड़ती है
कागज पर उकेरने शब्द
एक लम्बी आह लेकर
और उभर आता है तुम्हारा अक्स
लोग उसे भी कविता कहते हैं.....समीरलाल



....मैने कहा-आँखों से
तुमने सुना मुस्कानों से,
आओ मिल-बैठ कुछ बतिया लें
कुछ धीमे से-कुछ दुबके से...

अब भी तुम न मौन रहो
कुछ तो कह दो चुपके से ...कडुआ सच

Saturday, May 25, 2013

तोहफे में मिला आख़िरी हर्फ़

आज आपकी मुलाक़ात एक नए ब्लॉग से --
पोस्ट यहाँ पढ़ सकते है आप - पहला साल 
सुन  है सकते है यहाँ --

Wednesday, May 22, 2013

कालजयी कविता की खोज ...

शब्दों की तलाश में मेरी कविता 
निकल पडी है दूर तलक 
कालजयी होना है, 
कहा था उसने मुझसे 

समझी नहीं -
मेरे समझाने पर भी 
बहुत रोका मैंने 
ये कहकर 
की कालजयी कविताएँ 
जा चुकी है 
काल के ही साथ . . . 
और ले गई है साथ अपने 
गूढ़ अर्थों वाले 
आलंकारिक शब्दों को भी 
जिन्होंने पकड़ रखा था 
हाथ समासों का 
जो घिसटते चले गए 
उसी के साथ ...

सुना है काल के साथ ही 
स्वाहा हो गए थे अरण्य भी ...
नतीजतन अब 
मेरी कविता भटक रही होगी 
सादे सपाट मैदान में ही कहीं 
आशंकित हूँ ,
लौटेगी या नहीं 
मेरे एकाकी जीवन में ........
कही बचे -खुचे 
शब्द भी फुर्र न हों जाएं 
उसके लौटने से पहले ....

Thursday, May 16, 2013

लहरें


प्रवीण पाण्डेय जी का नाम खुद अपने आप में परिचय है उनका ---
और उसी तरह उनके ब्लॉग का नाम- न दैन्यं न पलायनम भी ....
प्रस्तुत है उनकी एक रचना लहरें -

Friday, May 10, 2013

दास्तान - ए - आशू दा ....

प्रकाश गोविन्द जी को तो आप सब जानते ही हैं ,परिचय देने की जरूरत नहीं है ...पहेलियों को हल करने की विशेष योग्यता रखते हैं .... गाते भी बहुत बढ़िया हैं.....
एक बार इनसे बात हो रही थी मुझे अचानक  बैंक के काम से जाना पड़ा , मैंने मेसेज लिखा-
बैंक होकर आती हूं ...
जबाब आया -
वाह! आनन्द आ गया !...किजीए जमा ,जोड़ते रहिए पैसा ...
वापस आने पर मैंने पढ़ा मेसेज फ़िर पूछा-
किसने कहा ,पैसे जमा करती हूं,जोड़ती हूं पैसा ?
जबाब लिखते हैं-
आपकी मस्तिष्क रेखाओं ने... मैंने साफ़ पढ़ा..... :-)

तो इसका  मतलब है ये अन्तर्जाल पर मस्तिष्क रेखाएं भी देख सकते हैं ..... :-)

खैर ! ये तो थी मजाक की बातें ---
बहुत कोमल दिल वाले इन्सान हैं ,फ़िल्मों में विदाई के दॄष्य देखकर छुपकर रोने लगते हैं ---
आज एक मार्मिक कहानी इनकी कलम से - इनके ब्लॉग आवाज से -

Thursday, May 9, 2013

अन्तिम ईच्छा

लघुकथा-

 
टेक्नोलॉजी के युग में भगवान ने टेब ऑन किया , मेरा मुस्कुराता चेहरा प्रोफ़ाईल में देखकर खुश हो गए ...



मेरी वॉल पर स्टेटस लिखा- वरदान माँग...


मैंने मौके की नज़ाकत को समझा और वरदान में अन्तिम ईच्छा लिख दी - मेरी मौत की खबर या फोटो फ़ेसबुक पर शेअर न की जाए.... अगर कहीं गलती से किसी स्टेटस पर आ भी जाए तो वो आपका स्टेटस हो ... और उसे सिर्फ़ लाईक करने का ऑप्शन खुला हो ...



मेरी वॉल पर अगला स्टेटस था --- तथास्तु...


Tuesday, May 7, 2013

जिन्दगी ---

जिन्दगी ---
जिन्दगी एक पड़ाव - न शहर न कोई गाँव...
जिन्दगी एक बहाव -जिसमें डगमगाती नाव...
जिन्दगी एक बिछाव -जिसपे लगता हर दाँव...
जिन्दगी एक झुकाव -संभलकर रखो अपने पाँव...
जिन्दगी है तो अनमोल -पर हर वक्त बे-भाव...
जिन्दगी एक दरख़्त - ढूँढता हर कोई यहाँ ठांव...
-अर्चना

Saturday, May 4, 2013

रे मन!...

तन की तल्लिनता को तौल कर मत निहार
मन की मलिनता को मौन हो मत स्वीकार

घन की घनिष्ठता का सुन तू घोर घर्षण
छन-छन छनकती पायल का मत रख आकर्षण

धन की धौंस से न धर धीमे से गतिरोध
जन की जड़ता का कर पुरजोर विरोध....