Friday, September 17, 2010

बता सकते हो?

कांटो में फंस चुकी हूँ ,हंसने को कहते हो क्यों
न  ठौर न ठिकाना,बसने को कहते हो क्यों
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों...

19 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है

    एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
    यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..

    क्या बात है...

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  2. एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
    यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों..
    ...vaah laajavaab.

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  3. सब कुछ तो कह दिया यहाँ ....

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  4. वाह क्या बात है! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

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  5. सुन्दर रचना! "सच में" पर आने और सुन्दर विचार व्यक्त करने के लिये धन्यवाद!

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  6. काफी अच्छी बन पड़ी है ये क्षणिका..

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  7. किरण को अपना काम करना चाहिए !

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  8. क्योंकि इसी में जीवन है...संघर्ष से जूझकर प्राप्त जीवन!!

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  9. बहुत ही व्यग्रता समेटे पंक्तियाँ।

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  10. यह कविता ही है न।

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  11. उन्मुक्त जी को बतायेंगी तो हम भी सुन लेंगे जबाब...


    वैसे है अच्छी. :)

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  12. भावनाओं का सुनामी
    इतने कम शब्दों में ??

    कमाल है .. वाह .. वाह

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  13. बहुत बढिया क्षणिका ।

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