Monday, May 25, 2015

Sunday, May 24, 2015

लिखी जा रही अनवरत प्रवाहमान कहानी का एक टुकड़ा ...



बेसन -भात ... छुट्टी स्पेशल डिश ...तुम्हारी पसंद .....
सिर्फ इसलिए याद आई कि आज बनाया और आज छुट्टी है ...संडे ....संडे की तुम्हारी दिनचर्या याद आ गई .....
सुबह जल्दी उठना और घूमने जाना .... आज स्पेशल इसलिए कि आज बच्चों की छुट्टी रहती थी इसलिए मुझे भी साथ घूमने जाना होता /पड़ता था क्यों कि दोनों बच्चों से आपका वादा किया होता ...हालांकि मेरा मन होता कि घर सफाई और नाश्ता-वाशता निपटाने का समय मिल जाएगा अगर दोनों बच्चे आपके साथ ही घूम आएँ ....इस बहाने थोड़ा और सोने मिल जाता:-)
लेकिन कहाँ ... प्रामिस तो प्रामिस ...मम्मी को भी ले चलना है आपका बच्चों से किया वादा .... लेकिन वापस आकर ....सब्जी लेने जाना हफ्ते भर की ॥फिर फ्रिज मे जमाना भी ....
फिर नाश्ता तैयार होते तक सबके जूते रेक से निकाल पॉलिश कर जमा देना .... बच्चों का इस काम में तुम्हारा हाथ बँटाना .... इस जिज्ञासा से कि किसके जूते ज्यादा नए लगेंगे ....
साथ में टी वी पर कार्टून
चारों का साथ नाश्ता ...फिर खाना ... यही फटाफट बनाने वाला बेसन-भात ....रोटी की छुट्टी ...
मेरे कपड़े धोकर सुखाने तक दोनों बच्चों का स्नान पापा के साथ बच्चों की फव्वारा मस्ती ....
और खाना भी साथ ...उसके बाद टी.वी.के साथ हफ्ते भर के अखबार मे से पसंदीदा और चिन्हित कार्टून ,रसोई और आर्टिकल कि कटिंग और उन्हें क्रमवार /नंबर देकर /सलीके से चिपकाना
..
अभी तक संभाल कर रखे हैं कार्टून वत्सल के लिए और रसोई कि टिप्स पल्लवी के लिए .....
याद करते हैं बच्चे भी .... पर वे और मैं ... अब उतने नियमित नही ....
वैसे बेसन आज भी बहुत स्वादिष्ट बना था ..:-)

Monday, May 18, 2015

जाओ अरुणा सुख से रहो

ले दे कर एक ही स्टेटस ऊपर आ रहा है
मर गई वो
अस्पताल के पलंग पर ही
आखिर उठेंगे कब हम
वो तो उठ भी गई होगी
और मर तो हम भी जाएंगे
कहीं न कहीं
लेकिन अब जब
वो इतना ऊपर उठ गई
तो भूल भी तो जाओ
अब छूने के पार चली गई वो
सांस सांस जो मर रही थी
तुम्हारी सड़ांध से
तुम ॥अपनी सोचो
जो गर्त मे गड गए हो
जाओगे पाताल मे
और तब स्टेटस भी ऊपर न आएगा ....
-अर्चना

Friday, May 15, 2015

तप रहे सूरज से -एक विनती ..

आज सुबह ६ बजे से ही तप रहे सूरज से एक विनती ..

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तप रही धरती बहुत 
ऐ! सूर्य क्यों इतना ताकते 
बादलों की खिड़कियों से 
थोडा छुप के क्यों न झांकते 
नन्हे पौधे कुम्हला रहे 
तुम्हारी किरणों के ताप में 
ओस की बुँदे बदल जाती 
सुबह ही भाप में 
इस धरा की ओर तुम 
देखो ज़रा सा प्यार से 
पंछियों को बख्श दो 
अपनी नज़रों के वार से 
चाँद से ही मांग लो 
थोड़ी शीतलता तुम उधार 
देखो फिर तुमसे भी 
हर कोई करेगा प्यार .......
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कुछ ही समय बाद -

सूरज ने विनती सुन ली !
 पानी का हल्का छिड़काव करा दिया है,
 बादलों से कहकर 
और धरा ने भी सौंधी खुशबू से महका लिया है
 आँगन अपना ......
आखिर दिल से निकली विनती की 
अनदेखी नहीं की जा सकती .....
और प्रेम के बस में कौन नहीं ?
-अर्चना