Sunday, February 7, 2016

एक भजन - कान्हा फिर से आओ न !

कान्हा फिर से आओ न !
डॉ. मोनिका शर्मा जी

के ब्लॉग से एक भजन ...



इसे मैंने दिसंबर २०१० में रिकार्ड किया था -


बेबसी

बहुत फर्क हो गया दिनचर्या में
पर कोई फर्क नहीं पड़ा
उस दिन की
और आज की उदासी में

टूटा,गिरा,बिखरा,
दूर तक छिटक गया
दिल जो कांच का था
पत्थर का हो गया

चुभती है फांस-सी
कोई किरचन ,
बहता है लहू,,रिसता है घाव
बढ़ती है फिसलन

गिरने से बचने की कोशिश में
टकरा जाती हूँ
खाली पड़ी कुर्सी से
छलक जाती है चाय
यादें दस्तक देती है
उड़ जाता है अखबार
सोचती हूँ,चिढ़ती हूँ-
ये दिन क्यूँ निकल आता है यार!

-अर्चना

तुम हो मुझ में- निशा कुलश्रेष्ठ






http://yourlisten.com/Archana/nisha-kulshreshth-kavita



Tuesday, February 2, 2016

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन



5जनवरी २०१६ को स्कूल को अन्तत: विदा कर दिया ...वास्तव में इस सत्र के शुरू से ही घर में चर्चा चालू थी कि अब और काम न करो बेटे वत्सल को भी लगने लगा था कि अब तक हमने साथ समय ही नहीं बिताया ..मतलब वैसा समय जैसा बिताना चाहिए था .....
सात साल बहुत कम उम्र होती है बच्चे के बड़े हो जाने की ... और वो इतना शरारती था कि आज भी सब उसका बचपन याद करते हैं और जब भी मुझे कोई मिलता है यही पूछता रहा कि अब भी वैसा ही है या शान्त हो गया ....
उसका जन्म व्यतिपात में हुआ , ग्रह ,नक्षत्र तो कुछ समझती नहीं मैं लेकिन जन्म के समय शान्ति पूजा करवाई थी मां के यहाँ ....
जब छोटा था तो कभी गरम ओवन पर हाथ रख दिया तो कभी तेल का १५ लीटर का तेल उंडेल दिया , कभी पल्लवी के ऊपर कंबल डालकर उसकी कुटाई कर दी तो कभी स्केच पेन को पानी में घोल कर होली के रंग बना लिए .... 
लेकिन उसकी समझदारी वाली बातों पर कम ही नज़र पड़ी मेरी .... 
सुनिल के एक्सीडेन्ट के समय करीब चार महीने तक बच्चों की स्कूल छूट गई थी, तब बहुत समय अस्पताल में बीतता दोनों बच्चों का ... लगभग पूरा दिन..... 
एक दिन मैंने उसे छोटी बहन पल्लवी को कहते सुना कि -पता है अब शायद हम स्कूल नहीं जा पाएंगे , क्योंकि पापा की दवाई में बहुत बार मम्मी पैसे देती है .....रोज-रोज .... 
और उसके दूसरे ही दिन मैंने नागपूर में मार्डन स्कूल के प्रिंसिपल साहब जोशी जी से मिलकर बच्चों  को स्कूल भेजना शुरू कर दिया ,बिना किसी देरी के ..... 

याद आ रहा है रिक्शे वाले भैया का ये कहना कि- दीदी ये रिक्शे से उतर जाता है पीछे-पीछे दौड़ता है .... और पल्लवी का उसके बचाव में ये कहना कि- मम्मी भैया चढ़ाई पर ही उतरता है .......
अब तो बहुत बड़ा हो गया है ..:-)
अब वाकई लगने लगा कि हम साथ नहीं रहे ..समय नें हमें बतियाने का मौका ही नहीं दिया .... 
तो अबकि  अपनी दुनिया में लौट जाने का मन हो आया है ..... 
उससे उसके बचपन के किस्से कहने हैं ..... 

Thursday, January 21, 2016

बधाई हो

नेहा ,मेरी बहू मेरे घर की पहली सदस्य जो पी एच डी करके डॉक्टर बनी  है।
शादी अंतर्जातीय और अंतराज्यीय है , प्रेम होने पर ऑरेन्ज मैरिज !
जब 2012 में शादी करना तय हुआ तो उसे चिंता थी कि पढ़ाई करने देंगे या नहीं ससुराल से ,लेकिन मेरे परिवार में जब तक ,जिसे पढ़ना हो पढ़ते रह सकता है,ये पारिवारिक नियम है ।
शादी के दो माह पहले ही जॉब का ऑफर मिला बेटे को मैसूर से ,दोनों की दिशा एकदम विपरीत हो गई , एक जगह से दूसरी जगह रांची पहुँचना आसान नहीं,सफर समय लेने वाला और थका देने वाला खैर !समय पूरा हुआ और पढ़ाई भी ...
इस वर्ष डॉक्टर की डिग्री मिल जानी थी मगर तकनीकी खामियों के कारण कन्वोकेशन में नाम शामिल नहीं किया गया उसका नाम ...
खैर! जो होता है अच्छे के लिए होता है में मैं विश्वास करती हूँ ।
अब नेहा डॉक्टर है और हम सबको उस पर गर्व है ,आप सब भी आशीष दें कि आगे वो वही कर पाए जो उसका मन कहे ।
19 जनवरी को शादी की चौथी वर्षगाँठ मनाई ऑनलाइन !☺