Saturday, November 28, 2009

मुझे भी बहुत गुस्सा आता है उन पर .......................इसलिए.......क्या कोई मेरा सन्देश उन तक पहुँचायेगा ? ? ? ..

अरे कायर है ये आतंकी,
खुद तो जीते नही है,
दूसरो को भी नही जीने देते,

तभी तो हमेशा अकेले मरने से डरते है,
और मासूम लोगों का साथ चुनते हैं,
अगर हिम्मत है -तो जिन्दगी से लडकर दिखाएं,
फ़ाके मे अपने बच्चों को रोटी खिलाएं,
माँ -पिताजी को दवाई दिलवाएं,
और अपनी प्यारी बहना की शादी करवाएं,
इनके दिल में कोई प्यार नही होता,
इसलिए ये ममता,प्यार,मजहब को नही जानते,
अगर इनके दिल में प्यार होता,
तो ये औरों की नही,
अपने दिल की मानते,
और अपने अन्दर की आवाज को पहचानते ,

"अरे आतंकियों-- समय रहते सम्भल जाओ ,
अपने प्यार,ममता,और मजहब को पहचानो,
और अपनी जिन्दगी सफ़ल बनाओ !
तब देखना दुनिया तुम पर नाज करेगी,
और तुम्हारी मौत के बाद भी तुम्हे सुनेगी !!!
"

Wednesday, November 25, 2009

मुझे नही पता था.............क्या आप जानते हैं ? ? ?अगर हाँ तो क्या आपने किसी कॊ बताया ? ? ?

( मुझे मिला एक मेल जिसकी जानकारी मै आपसे बाँटना चाहती हूँ ) ------------------


Why One is 1 and Two is 2..???????-(Must See)








































Monday, November 16, 2009

बाल दिवस पर फ़िर याद आया .....मुझे अपना बचपन.........

बाल दिवस के सन्दर्भ मे अपनी एक कविता जो मैने पहले भी (गर्मी की छुट्टियों मे ) पोस्ट की थी एक बार फ़िर याद दिलाना चाहती हूँ------

एक था बचपन..........

"खो गया वो "बचपन" ,
जिसमें था "सचपन" ,
गुम हो गई "गलियां" ,
गुम हो गए "आंगन " ,
अब वो "पाँचे" ,
ना ही वो "कंचे" ,
रही वो "पाली" ,
ना "डंडा -गिल्ली" ,
वो "घर-घर का खेल" ,
शर्ट को पकड़कर बनती "रेल" ,
अब मुन्नी पहनती --वो "माँ की साड़ी" ,
ना मुन्नू दौडाता--"धागे की खाली रील की गाडी" ,
खो गए कही वो "छोटे -छोटे बर्तन खाली" ,
जिसमे झूठ - मूठ का खाना पकाती थी --मुन्नी ,लल्ली ,
थोडी देर के लिए पापा -मम्मी बन जाते थे रामू और डॉली ,
अब
आँगन में "फूलो की क्यारी" ,
उदास -सी बैठी है गुडिया प्यारी ,
खो गई अब वो गुडिया की सहेली "संझा",
और भाई का वो "पतंग और मांझा" ,
ना दिखती कही साईकिल पर "सब्जी की थैली" ,(सुबह )
सडssss की आवाज वो "चाय की प्याली" , (शाम )
"छुपा-छुपी" का वो खेल खो गया ,
खेलने का समय भी देखो--- अब कम हो गया !!!!!!

और अब इसके आगे-------


खेल ही जीवन है?,
या जीवन ही खेल है?
कभी इस पहेली में न खुद को डुबोना,
मेरी एक बात सदा याद रखना---
खेलों को जीवन से कभी न खोना,
क्योंकि --जब हम बच्चे होते हैं,
तो चाहते हैं--बडा होना , और
बडे हो जाने पर दिल चाहता है--
फ़िर से एक बार बच्चा होना ! ! !



Wednesday, November 11, 2009

हम कहाँ के हैं मम्मी -------?????

ये एक बहुत बडा प्रश्न है मेरे लिए। दरअसल मै जहाँ रह रही हूँ,वहाँ कभी रहूँगी ऐसा मैने सपने मे भी नही सोचा था,मै जहाँ रहती थी वो जगह मजबूरी में मुझे छोड देनी पडी,जहाँ मै रहना चाहती थी वो जगह मुझे नही मिली,अब मै कहाँ रहूँगी ये मुझे नही मालूम,मै एकदम सच कह रही हूँ---
कल भाषा को लेकर जो खबर सुनने में आई तो सब कुछ याद गया अपने बारें में-------
मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव खरगोन में हुआ,पढाई भी यहीं की। शादी हुई,---ससुराल नागपूर, (महाराष्ट्र) में है। हमारे पूर्वज गुजरात में रहते थे , कई पीढी पहले वे शायद रोजी रोटी की तलाश मे वहाँ से चले-------कुछ लोग मध्यप्रदेश मे, कुछ लोग महाराष्ट्र में जाकर बस गये-------जो लोग मालवा,निमाड, मे आकर बसे उनके रीती रिवाज,बोली, खान-पान,पहनावा, सबमें यहाँ के रहन-सहन बोली,खान-पान,पहनावा मिल गये ,जो लोग महाराष्ट्र की तरफ़ गये उन लोगो ने वहाँ का पहनावा, रहन-सहन खान-पान बोली सब अपना लिया हम लोगों का आपस में संपर्क भी बहुत कम रह गया।
मेरी शादी हमारे आपसी रिश्ते को मजबूती देने के उद्द्येश से की गयी थी। हमने एक-दूसरे कॊ बहुत समझा भाषा की परेशानी होते हुए भी आपसी सामंजस्य आजतक बरकरार रखा है ।जब मै पहली बार ससुराल गई तो शादी की पार्टी मे बधाई के साथ एक सवाल से मेरा सामना हुआ था-----तुम्हे मराठी नही आती ?अब भला मै क्या जबाब देती? मगर ये सवाल कुछ इस तरह पूछा गया कि मै आज तक भी मराठी नही बोल पाई , मेरी सासुजी मराठी मे कुछ पूछ्ती हैं तो मै हिन्दी मे जबाब देती हूँ और जब मै कुछ पूछ्ती हूँ तो वे मराठी में जबाब देती है हम दोनो को ही आजतक बात करने और समझने में कोइ परेशानी नही आई है|
जब शादी हुई थी पतिदेव आसनसोल( बंगाल ) में कार्यरत थे, तीन वर्ष बाद तबादला हुआ----हम राँची (बिहार) में गये। ओफ़िस के कार्य से पति गोहाटी( आसाम) गये थे, वहाँ से किसी कार्यवश शिलोंग (मेघालय ) जाना पडा-----रास्ते में एक्सीडेन्ट हॊ गया-------बहुत गम्भीर चोट आई-----फ़िर गोहाटी, आसाम के बहुत बडे न्यूरोलॊजी अस्पताल में दो महीने कोमा मे रहने के बाद(याददाश्त चली गई थी) चिकित्सकॊ के भरसक प्रयास के बाद, टूटे हाथ का ओपरेशन करवाने तब बाम्बे( महाराष्ट्र) वापस आये----दस बारह दिनॊं के बाद घर नागपूर(महाराष्ट्र) में होने के कारण नागपूर आना तय किया। दो - ढाई माह तक CIIMS (अस्पताल का नाम) में रखने के बाद चिकित्सको ने घर पर ही रखने की सलाह दी सो घर ले आये कुछ परिस्थितियाँ ऐसी बनी की वापस खरगोन लौटना पडा। अथक प्रयासों के बाद भी उन्हें बचाया जा सका ।आज इस बात को १४ वर्ष बीत चुके हैं।
ये हादसा हुआ तो जिन लोगो ने मेरी हमारे परिवार की मदद की वे भारत के हर प्रान्त के सदस्य थे मै उन सब की आभारी हूँ ,एक-दूसरे की भाषा जानने पर भी सहयोग भरपूर मिला, हम एक दूसरे की सारी बातें भी समझ गये।
मुझे आज भी याद है क्रष्ण्न साहब ने मुझे इस हादसे की खबर सुनाई थी ,सिंग जी के यहाँ मै दोनो बच्चो---५वर्षीय बेटी पल्लवी और ७वर्षीय बेटे वत्सल को अकेले छोड्कर शाशिदादा(मेरे कजिन जेठजी) के साथ पहली बार हवाई यात्रा कर कलकत्ता पहूँची थी ,वहाँ से दूसरे दिन ही उडान थी गौहाटी के लिये इसलिए दास साहब के घर मुझे रुकवाया गया था वहाँ मेरी दादी और नानी जैसी उनकी माँजी और बुआजी रात भर मेरे सिर पर हाथ फ़ेरते हुए मेरे सिरहाने जागते बैठी रही। सुबह इनके साहब रामचन्द्रन साहब भी हमारे साथ गौहाती के लिए रवाना हुए थे-----जब मै होस्पिटल मे पहूंची तो डाक्टर चक्रवर्ती सीढी पर ही अपने साथियो के साथ मेरी राह देख रहे थे ।रात गेस्ट हाऊस मे आने पर जब घबराकर मेरी रुलाई रोके नही रुक रही थी तक बजे रात में गेस्ट हाउस मे काम करने वाले पूर्वोत्तर के भाईयो ने मुझे चाय बनाकर पिलाई, वे भी मेरे साथ जागते रहे थेसुबह एक कार ओफ़िस की ओर से अस्पताल आने -जाने के लिए दवाई वगैरा की व्यवस्था के लिए दी गई उसके ड्राईवर विजय यादव कॊ मै मरते दम तक नही भूल सकती दिन रात जागकर विजय ने हमारे लिए जो कुछ भी किया उसके लिए मै उसे नमन करना चाहती हूँ विजय जब चौथी कक्षा में पढता था ,बिहार के एक गाँव से भागकर वहाँ पहूंचा था,उसने हमसे पारिवारिक रिश्ता~ कायम किया था | वहाँ जो दो बडे साहब मुझसे मिले वे चालना साहब पंजाब व वर्मा साहब उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे , दो माह तक इन दोनो परिवारों ने मेरा, मेरी माँ,भाई सास-ससु्र जी का अपने परिवार के सदस्यों की तरह ध्यान रखा । खैर !!!

बात ये नही थी कि मेरे साथ क्या हुआ था बात ये है कि जब ये हादसा हुआ तो मेरे बच्चे बहुत छोटे थे ,वे आसनसोल में बंगाली भाषा समझते थे,फ़िर बिहारी भाषा का प्रभाव उन पर पडा।.( इस बीच करीब चार माह तक वे स्कूल नही जा पाये थे) परिस्थितिवश वे नागपूर में करीब डेढ साल तक रहे वहाँ मराठी से सामना हुआ फ़िर खरगोन यहाँ गुजराती -----जिसमे कि स्थानीय भाषा का प्रयोग ज्यादा किया जाता है, समझने की कोशीश करते रहे .............दोनो की पढाई अंग्रेजी माध्यम से हुई -------आज बेटा नोइडा में है उसका बोलने का लहजा वहीं के लोगॊ की तरह का है परन्तु सारी भाषाओ जिनसे उसका सामना हुआ समझता है , बेटी पूना में ग्रेजुएशन करने के बाद बंगलोर में है मराठी अच्छी तरह से बोल लेती है और आश्चर्य नही होगा कि थोडे दिनॊ में दक्षिण भारतीय भाषाओं कॊ थोडा समझने लगे

आज भी मुझसे जब ये प्रश्न पूछा जाता है कि आप कहाँ के है? तो मै खुद सोच में पड जाती हूँ कहती हूँ वैसे तो हम गुजराती ब्राह्नण हैं मगर ससुराल में मराठी रिति-रिवाज माने जाते हैं,पर मुझे वहाँ रहने का मौका नही मिला, मै बंगाल,बिहार मे महाराष्ट्र से ज्यादा रही, लेकिन अभी मध्यप्रदेश मे रहती हूँ ...........अगले २-३ सालो मे बच्चों की नौकरी जहाँ लगेगी वहाँ रहूँगी इसलिए मैं कहाँ की हूँ????पता नहीं ..................
और अब बच्चे बडे हो गये हैं ये सवाल उनके सामने भी आयेगा और वे फ़ोन पर मुझसे पूछेंगे हम कहाँ के हैं मम्मी ?????

Sunday, November 8, 2009

मेरी पहली ( पोडकास्ट) कविता .............

पिछले दिनों मेरे स्कूल में एक नवम्बर से चार नवम्बर तक सीबीएसनॅशनल " Taekwondo "चेम्पियनशिप आयोजित की गई थी |पहली बार इतने बड़े स्तर पर कोई आयोजन किया गया था| इस आयोजन को लेकर हम सब बहुत उत्साहित थे | ईस्ट, वेस्ट, नार्थ वन, नार्थ टू साऊथ झोन के करीब चार सौ बच्चों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया| तीस अक्टोबर से ही टीमो का आना शुरू हो गया था, इकतीस तारीख़ की शाम को सभी प्रशिक्षको की मीटिंग रखी गई थी,चूँकि बहती गंगा में सभी हाथ धोना चाहते है, इसीलिए हमने भी इसी कार्यक्रम के साथ हमारा वार्षिकोत्सव का कार्यक्रम निपटाना उचित समझा |एक तारीख़ की सुबह औपचारिक कार्यक्रम के पश्चात प्रतियोगिता का शुभारम्भ हुआ ,सभी प्रतियोगियों ने खेल भावना के साथ खेलने की शपथ ली और उसका पालन भी किया |शाम को वार्षिकोत्सव के अर्न्तगत सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया था ,सभी आयु वर्ग के बच्चों ने शानदार प्रस्तुति दी ,खासकर ड्रम व बासुरी की जुगलबंदी तथा सभी प्रान्तों के डांस को मिलाकर बने फ्यूजन डांस की प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया |विजेताओ को पुरस्कार वितरित किए गए |
दूसरे व तीसरे दिन सभी मुकाबले समयानुसार दो सत्रों में सम्पन्न हुए रात्रि को सबकी थकान दूर करने के लिए हल्का फुल्का मनोरंजन कार्यक्रम किया गया जिसमे प्रतियोगी बच्चों ने भी गानों व न्रत्यो की अनुपम प्रस्तुति दी |इन कार्यक्रमों में हम सब शिक्षको ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया और इन बच्चों के साथ गाना गाकर व नृत्य करके अपना बचपन जिया, दूसरे दिन मैंने भी एक गाना बच्चों की पसंद का गाया.........................
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


चूँकि कार्यक्रम में १९ वर्ष आयुवर्ग के बच्चे भी थे इसलिए मैंने तीसरे दिन अपनी कविता "खेल-खेल में "सुनाई ,कविता बहुत पसंद की गई और कई लोगो ने उसकी फोटोप्रति लेने की इच्छा जताई, मुझे बहुत खुशी हुई और उन सबसे वादा किया की अपने ब्लॉग पर मै इसे पोडकास्ट करुँगी और इसीलिए ये मेरी कविता पोडकास्ट के रूप में ...........................
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

चौथे व अन्तिम दिन चार नवम्बर को सभी के सहयोग से कार्यक्रम का सफलता पूर्वक समापन हुआ| सभी विजेताओ को मेरी ओर से बधाई ..........

Wednesday, October 14, 2009

भजन....

जीवन की एक कडवी सचाई.................
Get this widget | Track details | eSnips Social DNA


मीराबाई का एक भजन...............

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

Thursday, October 1, 2009

उलझे रिश्ते --------------

आज समीर जी की पोस्ट तारो का मकड़जाल पढ़ कर एक घटना याद गई --------
पिछले माह नर्सरी क्लास की क्लास टीचर एक बच्चे को छुट्टी के समय गेट पर लेकर खड़ी थी ,उसकी माँ केआने का इंतजार करते हुए ,बहुत समय बीतने के बाद उस बच्चे को लेने उसकी माँ आई -------आते ही सॉरीबोला ----मेडम,माफ़ कीजियेगा आज फ़िर देर हो गई .........फ़िर कुछ सोचकर बोली------- मेडम आपके स्कूल की बस बच्चे को घर पर छोड़ती है? ,
टीचर ने कहा --हां , आप कहा रहते है ?
..............यही पास में कोलोनी में , दस मिनट का रास्ता है |
फ़िर ? ----टीचर ने आश्चर्य से पूछा? और कहा ---बस कि फीस साढ़े चार सौ रुपये माह रहेगी |
हां ,कोई बात नही ,.............वो क्या है , मै रोज इसको लेने आना भूल जाती हू , बस रहेगी तो आराम रहेगा ?
आप सर्विस करती है ?----टीचर का अगला सवाल था |
नही ...............
टीचर चुप-चाप बच्चे को माँ को सौप कर लौट आई ----------मगर उसे बहुत बुरा लगा , इतने पास रहते हुएभी बच्चे को बस लगवाना उसे बहुत अटपटा लगा ------ नजदीक ही मै खड़ी थी उसने ये बात मुझे बताई |मै अब तक उस घटना को भुला नही पाई |
वाकई शर्मनाक घटना है , मेरे मुह से अचानक निकला था ------गनीमत है उन्हें इतना याद है की अपना कोई बच्चा भी है .........
...............इसके आगे की कल्पना करना तो और भी भयावह है ----------या ये की जब माँ का ये हाल है तो पिता क्या करेगे ???-------इसके आगे शायद पिता अपने बच्चे को देखकर कहे कि------तुम्हे कही देखा हुआ लग रहा है ----बेटा कहा रहते हो ??..............और जबाब मिले हां , देखा होगा , मै आपके कमरे के बगल वाले कमरे में रहता हू ----- आपकी पत्नी के साथ ------तो किसी को आश्चर्य नही होना चाहिए !!!!!!!!!!!!!!!!!!

Tuesday, September 29, 2009

इनकी ईद ........उनका दशहरा

शिरीन आंटी ,मेरे घर के सामने रहती है ,उम्र होगी कोई अस्सी साल के लगभग ,बहुत सी भाषाए जानती है कभी स्कूल नही गई घर पर ही टीचर पढाने आते थे खाना बहुत शौक से बनाती है ..............अकेले रहती है अविवाहित है , कुछ दिन पहले अचानक घर में सुबह फिसलकर गिर पड़ी ........सुबह-सुबह दरवाजा ठकठकाने की आवाज से मेरी नीद खुली ,खोला तो देखा उनके सर में से खून बह रहा था ..........दर्द के मारे वे चीख रही थी एक हाथ में बहुत दर्द था .........मैंने जल्दी से उन्हें पलंग पर लिटाया देखा....... लगा हाथ में फ्रेक्चर है मुझे स्कूल जाने में देर हो रही थी .....उनकी पास में रहने वाली बहन को संदेश भिजवाया .........और मै स्कूल चली गई .....
शाम को लौटी तो उनके घर में ताला लगा था ...पता चला कंधे में क्रेक लाइन है हाथ को सपोर्ट देकर बेल्ट लगा दिया है ...
दो दिन तक घर बंद रहा .......तीसरे दिन वे गई ......मैंने पूछा गए आंटी कुछ दिन और वही आराम कर लेते ------उनका जबाब था ----अपने घर में ही अच्छा लगता है ........मैंने कहा ----फ़िर भी थोडी देख-भाल हो जाती ,-------उसके लिए तुम हो ........तुम्हे भगवान ने मेरे लिए भेजा है ....मेरे घर के सामने ...........और मै उनका मुझ पर विश्वास देखकर दंग रह गई ..........(बाद में पता चला बहन के बेटी- दामाद आने वाले थे इसलिए वे उन्हें वापस छोड़ गई थी )
अब वो कभी भी अपना बेल्ट टाइट या ढीला करवाने आती रहती है ......
ईद के दिन सुबह-सुबह फ़िर मुझे जगाया ------आओ गले मिल लो आज मेरी ईद है ----( सुबह से तैयार होकर बैठी आंटी से शाम तक उनका कोई रिश्तेदार मिलने नही आया ........)

अभी दशहरे पर अपने भाई के घर गई थी ...........वहां सुबह-सुबह फोन की घंटी से नीद खुली ..........पता चला कायरे मामी (हम सब उन्हें इसी नाम से जानते है ) का फोन था .............मेरी कामवाली बाई नही आई है आज...........
कायरे मामी की उम्र भी अस्सी साल के लगभग होगी , इस उम्र में भी क्रोशिये से बुनाई करती है , और सबको सीखाती भी है ,अकेले रहती है ............वे अपने पति की दूसरी पत्नी है ,पति अपने ज़माने के बहुत बड़े वकील थे .......पहली पत्नी से कोई बच्चा नही हुआ था तो दूसरी शादी कर ली , इनसे भी कोई बच्चा नही हुआ.........वकील साहब ने अपनी बहन की बेटी को गोद ले लिया , दामाद को घरजमाई बना लिया .......मेरे पिताजी ने उनसे वकालत सीखी थी .........वकील साहब के देहांत के बाद घरवालो ने साथ नही दिया .......वे भी यहाँ से चली गई बहुत सालो बाद फ़िर लौटी ........ पैसा बहुत था , दान भी किया ,एक मकान उनके नाम था, उसी में रहती है............मेरे पिताजी के देहांत के बाद उनकी जिम्मेदारी मेरा भाई , और मेरी मौसी के बेटे उठाते है (उनका दूर का कोई रिश्ता है )
वे भी दशहरे पर अपनो की राह देख रही थी ............


Monday, September 7, 2009

भगवान के घर देर है .............नही है..............

आज मन बहुत व्यथित है ,समझ में नही रहा है ऐसा कैसे हो सकता है......आप भी सोचेगे अगर भगवान है तो कहाँ ????
नवीन को तो आप अब जानने लगे होंगे .........कुछ दिन पहले ही मैंने बताया था कि उनका किडनी प्रत्यारोपण काऑपरेशन हुआ , उनके बड़े भाई संजय रावत ने अपनी किडनी दी ........अब आगे....आज उनके छोटे भाई शैलेन्द्र रावत जो ऑपरेशन के दो दिन पहले से ही अहमदाबाद गए हुए थे , ने बताया ----ऑपरेशन अच्छे से हो गया ऐसा बताया गया .........फ़िर अचानक एक दिन में ही क्या हुआ कि एक के बाद एक - बार ऑपरेशन किया गया -----बताया गया कि इन्टरनल ब्लीडिंग हो रही है --------पता नही लग पा रहा है कि प्रोब्लम कहाँ पर है ........फ़िर आख़िरकार उस नई लगाई गई किडनी को वापस निकल दिया गया ........बताया गया कि वो ऑपरेशन के समय कही कट लगाने से डेमेज हो गई है ........निकालना जरुरी हो गया था .............?????(बहुत ब्लड भी लग रहा है )(शैलेन्द्र कल फ़िर से अहमदाबाद जा रहे है क्योकि वहां पिता के पास दौड़ -भाग कराने वाला कोई नही है)
अब आज जब मैंने उनके पिता से फोन पर बात की और पूछा-----सर कैसे है? जबाब मिला ---ठीक ,अभी सो रहा है , और भइया ?---हाँ वो भी ठीक है ,अभी खाना खाने गया है (किराये पर घर लेकर, नवीन के माता- पिता,संजय ,संजय की पत्नी ,संजय का बेटा ,नवीन की पत्नी, नवीन का बेटा वही रह रहे है )बहुत हिम्मत करके मैंने पूछा आप कैसे है? ----मै? मै तो बिल्कुल ठीक हू | मैंने कहा -----अपना ध्यान रखियेगा ,.........हां पूरा रखता हू समय पर खाता -पीता हूँ अपना ध्यान खूब रखता हूँ ...................और मै........चुप----- और कुछ भी कह - सुन नही पाई............. अब क्या होगा ये सोच -सोच के दिल घबरा रहा है हे भगवान् इतनी कठिन परीक्षा ...........
.......

Saturday, August 29, 2009

क्या खूब गीत है.....

क्या खूब गीत है.....(जी मैने ही गाया है...)




Get this widget | Track details | eSnips Social DNA
Related Posts with Thumbnails