Sunday, October 19, 2014

मनवा न लागत तुम बिन

सुनिए - आदरणीय कैलाश शर्मा जी की एक रचना - उनके ब्लॉग आध्यात्मिक यात्रा से

कार्तिक की एक सुबह

23-
- आज जाना नहीं है?
-नहीं ..
-क्यों ?
- मन नहीं है ...
-हम्म!... पर मुझे तो जाना है न!,
-जानता हूँ... तुम्हारा जाना जरूरी है ...
-फिर ?...जाओ ..तुम...
-सुनो ...
-क्या ?
-तुम्हारे आने तक यहीं रूक नहीं सकता ?
-मगर क्यों ?
-तपना है मुझे भी ..... तुम्हारी तरह ,
झुलसना है धूप से ...तुम्हारी तरह ...
इस सूरज के आगे अड़े रहना चाहता हूँ
तुम्हारे लौटने तक खड़े रहना चाहता हूँ ......
- जाओ भी !!! ...सुबह होने को आई है ....
- ह्म्म! जाता हूँ ,जाता हूँ ...पर एक बार ...
- ह ह ह ह ....... :-)

अनवरत प्रवाहमान कहानी का एक टुकड़ा
-अर्चना

Monday, October 13, 2014

जीवन मैग -वेब पत्रिका से एक कहानी - दाह संस्कार

जीवन मैग साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में रुचि रखने वाले छात्रों का एक समूह है जिस पर से मैंने पढ़ी कहानी "दाह संस्कार " लिखा है अक्षय आकाश ने ....

फेसबुक पर आकाश कुमार ( इस कहानी के लेखक नहीं )का निमंत्रण मिला पत्रिका को पढ़ने का और जाना आकाश के बारे में .....
आप जानिये आकाश के बारे में पत्रिका पर
फिलहाल अक्षय आकाश की कहानी सुनिए -  

दाह संस्कार

अनवरत प्रवाहमान कहानी का एक टुकड़ा

22

...ये जल्दी उठने की आदत तुम्हारी थी ,मुझे लग गई ...
-तो ?अच्छी आदत है ,उठा करो ...
-हुंह !उठा करो  :P  .....बोल तो ऐसे रहे हो कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं
- ओह! हुआ क्या ? बताओ भी ...... :)
- न ,नहीं बताना ...
- प्लीज ....  बता भी दो ....रूको !रूको चाय लेकर आता हूँ फिर बताना
-चाय ?,बन भी गई ?
-हम्म !!!...
-कब ?
- न!...... ,पहले तुम बताओगी फिर मैं  .....
-अरे !!! ..... मैं तो ऐसे ही ......
- नहीं ...बताना पड़ेगा ....छुपाने का कोई प्रॉमिस नहीं हुआ था
-ओके !ओके! ... मैंने इसलिए कहा कि --जल्दी सोने की भी तो आदत थी नहीं तुम्हारी ..........और दिन में सोना मुझसे होता नहीं ........ अब उठकर अँधेरे में अकेले घूमने भी तो जाने का मन नहीं होता ...
-ओह!.... सुबह -सुबह उदासी !!! नो! ......खुश हो जाओ यार ! चलो मैं बताता हूँ -चाय कब बनाई ...
- हम्म! .....बताओ  कब ?.....बताओ जल्दी ......
.
.
.

- जब तुम सुबह का सपना देख रही थी .......
......
....
अनवरत प्रवाहमान कहानी का एक टुकड़ा ........
-अर्चना

Thursday, October 9, 2014

इक जरा इन्तजार



सब कुछ सत्य है !

मैंने देखा है मॄत्यु को
वो आई, पर
मुझे साथ न ले गई
वो फिर आयेगी,

जानती हूँ
और इस बार कोई बहाना
न कर पायेगी
इस बार तैयार हूँ मैं
उससे भी पहले से ....
-अर्चना