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Wednesday, April 26, 2017

लालबत्ती - अनूप शुक्ला जी का व्यंग्य

आज एक  पॉडकास्ट अनूप शुक्ला जी का- 

लालबत्ती  





Tuesday, December 9, 2014

चाय की चुस्की विथ सूरज भाई व्हाया अनूप शुक्ल



" पुलिया पर दुनिया " के लेखक ,ब्लॉगर और फेसबुकिया साथी अनूप शुक्ल जी का एक स्टेटस सुनिए यहाँ - 



और पढ़िए यहाँ-

लो आ गयी उनकी याद
पर वो नहीं आये।
गाना धीमे बज रहा है। पूछा तो चाय वाले ने बताया-'मौसम की गड़बड़ी है।रेडियो स्टेशन से ही धीमे बज रहा है।'
आसमान में सूरज भाई ऐसे दिख रहे हैं मानो अपने चारो तरफ रुई लपेटे अधलेटे हैं।लगता है उनके यहाँ कोई दर्जी नहीं है।होता तो रुई समेट के ठीक ठाक रजाई सिल देता।
सूरज भाई बादलों की रुई के बाहर मुंह निकाले किरणों को ड्यूटी बजाने का निर्देश दे रहे थे।किरणों ने जब देखा कि सूरज खुद अलसाये हुए हैं तो वे भी आराम-आराम से अपना काम अंजाम दे रही हैं। कोहरा, जो कल किरणों को देखते ही फूट लिया था, आज बेशर्मीं से टिका हुआ था।कहीं कहीं तो किरणों को छेड़ भी दे रहा था। किरणें भी बचबच कर टहल रहीं थीं। झाड़ी, घने पेड़ के नीचे जाने की बजाय खुल्ले में कई किरणों के साथ सावधानी से टहल रहीं थीं।
धरती के कुछ हिस्से सूरज की इस किरण और ऊष्मा सप्लाई से नाराज होकर सूरज की तरफ मुट्ठी उठाकर शेर पढ़ रहे थे:
वो माये काबा से जाकर कर दो
कि अपनी किरणों को चुन के रख लें
मैं अपने पहलू के जर्रे जरे को
खुद चमकना सिखा रहा हूँ।
सूरज भाई इस शेर को सुनकर बमक गए और बादलों का सुरक्षा कवच तोड़ कर बाहर निकल आये।चेहरा तमतमाया हुआ था।इधर उधर माइक की तलाश की लेकिन शुक्र है कि मिला नहीं होगा वर्ना चमकना छोडकर भाइयों बहनों करने लगते। सूरज अरबों बरसों से अपना काम करता आ रहा है इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वहाँ लफ़्फ़ाजी के लिए माइक और रेडियो नहीं है।
गाना बजने लगा:
'तुमने क्या समझा हमने क्या गाया
जिंदगी धूप तुम घना साया।'
जाड़े के मौसम में यह गाना बेमेल है।जाड़े में घूप की जरुरत होती है साये की नहीं।लेकिन जैसा हो रहा है वैसा की गाना भी बजेगा। चोरों से निजात दिलाने के लिए गुंडे सर्मथन मांग रहे हैं।
तू न मिली हम जोगी बन जायेंगे
तू न मिली तो।
गाना लगता है किसी बूढ़े राजनेता का बयान है।वह सत्ता से कह रहा है अगर मुलाक़ात नहीं हुई तो समझ लो। जोगी ही बनकर बदला लेंगे। तुझे अपने इशारे पर नचाएंगे।सत्ता हलकान है-'इधर सठियाया राजनेता उधर ढोंगी जोगी।वह जाए तो जाए कहाँ।'
'ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा
तेरा गम कब तलक मुझे तोड़ेगा।'
इस सवाल का जबाब भला मिला है किसी को।हमने सूरज भाई से चाय की चुस्की लेते हुए पूछा।
अरे छोड़ो यार लाल, हरा,केसरिया सब झांसा देने के तरीके हैं। अपना काम करो मस्त रहो। अभी तो एक चाय और पिलाओ। जाड़ा जबर है।
हम सूरज भाई को चाय पीते हुए देख रहे हैं।बीच बीच में मुंह से भाप टाइप निकालते हुए वे जताते जा रहे थे कि जाडा पड़ने लगा।
सुबह हो गयी। सुहानी भी है।


Thursday, January 10, 2013

जाड़ा और धूप ...



















(चित्र गूगल से साभार)

आज प्रस्तुत है अनूप शुक्ला जी के ब्लॉग "फ़ुरसतिया" से कुछ क्षणिकाएँ-


धूप खिली उजाले के साथ


प्रस्तावना सलिल भैया  की मदद से तैयार हुई ....आभार नहीं कर सकती .... :-)

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Sunday, September 16, 2012

ओ माय गॉड... केंगलौर

आज सुनिए अनूप शुक्ला जी के ब्लॉग "फ़ुरसतिया" से एक पोस्ट
अभी  फ़ेसबुकियाने गई तो पता चला "सुकुलवा जी" का आज जन्मदिन है.....बधाई व शुभकामनाएँ देने के साथ ही लगे हाथ तोहफ़ा भी जन्मदिन का ...

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पहला प्लेअर चल नहीं  रहा -

Saturday, March 26, 2011

बड़ी फ़ुरसत से पढ़ी फ़ुरसतिया जी की पोस्ट --------फ़ुरसत निकाल कर ही सुनें...

 आज पढ़ ही ली फ़ुरसत निकाल कर फ़ुरसतिया जी की ये पोस्ट
एक बानगी----
"इस बीच तमाम अक्षर आते जा रहे हैं! छोटी ई और बड़ी ई मिलकर या अकेले जैसी मांग हो उसके अनुसार उनकी सेवा करती जा रही हैं। सेवाकार्य पूरा करते ही फ़िर लड़ने लगती- जैसे कि क्रिकेट खिलाड़ी गेंद फ़ील्ड करके च्युंगम चबाने लगाते हैं।"

"कोई शब्द बन-ठन के आया था छोटी ई और बड़ी ई की सेवायें पाने के लिये। बना-ठना तो था ही। जित्ता बना-ठना था उससे ज्यादा अकड़ रहा था। ऐसे जैसे कहीं से फ़्री का कलफ़ लगवा के आया हो!"

"क्या पता खूब सारे स्त्रीलिंग शब्द रहे हों लेकिन उनको उसी तरह मिटा दिया गया हो जिस तरह आज लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है। क्या पता शायद वर्णमाला का निर्धारण किसी मर्दानी सोच वाले ने लिया और स्त्रीलिंग ध्वनियों को अनारकली की तरह इतिहास में दफ़न हो कर दिया हो।"

 सुनें यहाँ ---


और पढें यहाँ।