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Saturday, November 7, 2015

रिश्ते बनते हैं निभाने से

आज मन हुआ है उन मुलाकातों को अंकित करने का जो हुई अंतर्जाल की दोस्ती के बाद ...
जब ब्लॉग लिखना शुरू हुआ तो लोगों से परिचय बढ़ने लगा.....बातचीत होने लगी ...बहुत ब्लॉगरों से चैट पर समस्याएँ साझा की और हल निकाले .....पर मुलाक़ात शुरू हुई संजय कुमार चौरसिया जी से जिनकी एक ब्लॉगपोस्ट का पॉडकास्ट बनाया था ....और वे ग्वालियर से इंदौर किसी काम के सिलसिले में आए थे....
कुछ ही दिन बाद स्कूल की ओर से ग्वालियर जाना हुआ,वहाँ वे अपने घर ले गए....पत्नी गार्गी और बच्चों से मिलवाया ...गार्गी ने खूब खिलाया नाश्ता ....ये गार्गी दीपक मशाल की बहन है...

फिर एक दिन ब्लॉगर ताऊ जी के  बेटे ने शाम को दरवाजे पर दस्तक दी.....खुलने पर हाथों में फूलों का गुच्छा और मिठाई लिए संदेसा सुनाया - आपके मित्र समीर लाल जी ने भिजवाया है ....जन्मदिन था उस दिन मेरा......सालों बाद किसी ने फूल भिजवाकर बधाई पहुंचाई थी.....रचना के मार्फ़त जानता है पूरा परिवार मेरा समीर जी को 

ये भी पता चला की ताऊ जी ने इंदौरी स्वाद की खातिर केक न भिजवाकर काजू कतली भेजी थी.....हाँ तो मुलाकात तो भरत से हुई....




फिर एक दिन गिरीश बिल्लोरे जी सपरिवार पधारे.....और साथ आई थी उनकी बुआ जी (मासी जी,भूल रही हूँ) .. बड़ी खुश थी ये जानकर की कम्प्यूटर पर ऐसी दोस्ती भी होती है..उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि पहली बार मिल रहे हैं .


फिर रायपुर यात्रा हुई ....ललित शर्मा जी  के सौंजन्य से ......यहाँ मुलाकात हुई वीर जी ,संजीव जी,अवधिया जी,अशोक जी, स्वराज करूण जी,अनुज और राहुल सिंग जी से राहुल जी के घर बैठकी में......
.

रीवा जाना हुआ तो मिली सादी सी -सीमा सदा 

फिर पटना यात्रा में मिला अनुभवप्रिय 








 फिर आया दीपक मशाल...मेरे घर ....एक पूरा दिन



फिर लखनऊ ट्रिप पर मिले सपत्नीक रवि रतलामी जी....संजय भास्कर से बहुत पहले से बात होती रही थी यहां वो मिलने आया था.....



                                     

गिरिज पंकज जी और रूपचन्द्र शास्त्री जी ने देखते ही पहचान लिया था ... 

यहीं इस्मत जी सबसे घूम घूम मुलाक़ात कर रही थी वे मिली...

..शेफाली पांडे बगल में ही बैठी थी..... बाकि लोग बाद में दोस्त बने ...और फेसबुक पर दोस्ती हुई 
शिखा वार्श्णेय रूस की स्मृतियों में ले गई साथ .... 
वीर जी के साथ शिवम भी आकार मिले ... 

लेकिन उदयवीर जी ने पॉडकास्ट का जिक्र किया और उनकी आवाज में गीत भी सुनाया था ...

और रमा द्विवेदी जी भी मिली -

रविन्द्र प्रभात जी ने तो आयोजन ही रखा था.....गेस्ट हाउस में मिली थी सुनीता शानू जी खाने पर...अविनाश वाचस्पति और फोटोग्राफर की भूमिका में संतोष  त्रिवेदी जी ...

छोटा सा फुर्तीला गोरा चिट्टा लड़का नीरज जाट भी यहीं मिला और सपत्नीक मुकेश सिन्हा भी .... 








 गिरिश पंकज जी और शैलेन्द्र भारतवासी के साथ बाद में फोटो लिया ...

फिर अचानक से मुलाक़ात हुई शिक्षक दिवस के एक संगीत प्रोग्राम में कविता वर्मा जी से ...

                                 

और फ्रेंडशिप डे के दिन उनके घर हो आई ... 



फिर वत्सल के यहां मैसूर गई थी .वहाँ से जाना था राँची.. अकेले.......
प्रवीण पाण्डेय जी और श्रद्धा जी ने जो आवभगत की बंगलौर में हमेशा याद रहेगी मुलाकात .रात रुकना था तो कराओके पर गाने भी गाए..... खूब हँसे.......पृथु और देवला के साथ ....





फिर शैलेश  भारतवासी और उनके दोस्तों क़े साथ रात  सराफा घूमना  ..वही मुहर्रम के दिन वे भी भूल न पाएंगे......और मैं भी.....
अगले ही दिन मुकेश तिवारी जी से मुलाकात हुई...जो इंदौर में ही रहते हैं पता  चला ,लखनऊ में वे भी थे...
फिर अनूप शुक्ल जी से मुलाक़ात हुई अचानक .......
और फिर एक मुलाक़ात हुई भिलाई में वीर जी से वे साथ लाए थे शरद कोकास जी को और संजीव तिवारी जी से भी दूसरी बार मिल रही थी ...और वीर जी से तीसरी बार 
फिर आई बंगलौर..... बॉटनिकल गार्डन में बुलाया शेखर सुमन को...वत्सल लेकर गया मुझे....दो चश्मिशों  के साथ खूब अच्छा लगा 
गिरिजा जी का फोन आया ....उनके घर जाकर मिली....मगर मन न भरा तो फिर एक दिन पूरा उनके साथ बिताया ....आलू की कचोरी खूब स्वादिष्ट बनाती हैं वे

                            

यहाँ से उड़कर गाँधीनगर में  सलिल भैया भाभी से मिल आई हूँ.....

                                       

 और आनन्द  गुणेश्वर से भी गांधीनगर में ही 


अब फिर बंगलौर में हूँ...
.आशीष श्रीवास्तव जी खाना बहुत अच्छा बनाते हैं प्रमाणित कर चुके हैं
रश्मि दी मुलाक़ात का सारांश बता ही चुकी हैं



विवेक रस्तोगी जी को हरी मिर्च की चटनी मैं खिला चुकी हूँ...
एक बात बताना भी जरूरी है यहां ....दिलीप तिवारी मैसूर में था ....तब मैंने उसके ब्लॉग से पॉडकास्ट बनाए थे ....उससे बातचीत में मैंने बताया था कि मेरी भतीजी वैदेही  का जन्मदिन है
और मेरा छोटा  भाई वहीं है.....भाई को नम्बर दिया,उन दोनों ने बात की,और अगले दिन दिलीप जन्मदिन की पार्टी  में परिवार से मिला......मैं नहीं मिली अभी ....
और कोई छूटा तो नहीं ...याद करके एडिट कर लूँगी....और हाँ सबकी लिंक भी तो लगानी  है

देखिए कहा था न किसी को भूली तो नहीं  ..और संध्या जी को ही भूल गई ...जबकि इनसे तो बात से भी पहले मुलाक़ात हुई थी.......और इन्होंने अपने घर ले जाकर खाना भी खिलाया था ......खुद बनाकर .......मेरे पोस्ट लिखने का उद्देश्य भी यही था कि मैं किसी को भूल न जाऊँ....संध्या जी से माफ़ी के साथ उनकी आभारी भी हूँ की उन्होंने याद दिलाया ...मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ....क्यों याद नहीं रहा......खाना खाकर भी भूल गई .....




तो  मान गए न ! अच्छे दिन आ गए मेरे........




Thursday, February 28, 2013

आनन्द---1

आनन्द....
हाँ यही नाम है उसका..वो मिला मुझे नेट की दुनिया में कदम रखते ही...मई २००९ से भी पहले ...
हाँ जब से नेट के बारे में जाना पहले जी मेल ,फ़िर ब्लॉग,फ़िर ऑर्कुट और अब फ़ेसबुक ...सबके बारे में जाना और समझा...जी मेल और ब्लॉग तो बहुत काम में लेती हूँ खुद के लिए ..और फ़ेसबुक खबरों के लिए...
लेकिन जो छूट गया वो है ऑर्कुट ....आजकल नहीं के बराबर आना -जाना होता है वहाँ...
तो मैं बता रही थी आनन्द के बारे में ...२५-२८ साल का ऐसा लड़का जिसके बारे में पहले नहीं जानती थी...
ऑर्कुट पर एक सोशल ग्रुप देखा तो रहा नहीं गया मुझसे ...उसकी गतिविधियाँ देखने के लिए पढ़ती रहती थी उस पर आए मेसेज.....
और एक दिन आनन्द का एक मेसेज पढ़ा--- बंगलौर में एक नेत्रहीन छात्र पैसे के अभाव में फ़ीस जमा नहीं कर पा रहा है उसे मदद कीजिये ....नम्बर पर ...बात कर सकते हैं ...कुछ पैसे कम पड़ रहे हैं आपकी मदद समय पर मिल जाए तो वह इसी वर्ष परीक्षा दे सकेगा परीक्षा का .....वगैरह....
और मन किया कि बस कुछ करना है ....तभी छोटा भाई ट्रांस्फ़र होकर बॉम्बे से बंगलौर गया था ,तुरंत उसे फोन लगाया और सारी बात बताई...फोन नम्बर भी दे दिया, कहा- जो बन पड़े करना...
दूसरे दिन भाई का फोन आया कि उसने बात कर ली है और आज ऑफ़िस में उसे बुलाया है ,उसके साथी के साथ आएगा,मैं बात करके उसे दे दूंगा पैसे ....
बहुत खुश हो गई थी मैं ...सोचा एक तो नेक काम होगा शायद ....
खुशी-खुशी दूसरे दिन भाई से पूछा -पता लगा कि वो आया था , उसके साथ एक मित्र को लेकर,और भाई ने रूपये दे दिये ...ये कह कर कि और कोई मदद चाहिये हो तो बताना...वो खुशी-खुशी लौट गया था ।हमने भी सोच लिया था कि उसने फ़ार्म भर दिया होगा और हमने एक नेक काम कर लिया....
लेकिन कुछ दिन बाद ही एक और मेसेज देखा आनन्द का....इस बार सबसे क्षमा याचना करते हुए लिखा था कि- उससे भूल हुई, उसके  बताए हुए बच्चे को मदद नहीं पहुँची, उसके साथी ने उसे धोखा दिया और उस बच्चे के लिए इकट्ठे किये पैसे ले गया.....और जिन लोगों ने मेरे कहने पर, भरोसा करके उस बच्चे को मदद दी मैं उन सबसे क्षमा मांगता हूँ...
मैंने ये पढ़कर आनन्द को बताया कि उसे तो मेरे भाई ने भी मेरे कहने पर मदद की थी ...उसे बहुत बुरा लगा ये जानकर ,और आनन्द नें मुझसे माफ़ी मांगी ।
मैंने आनन्द को कहा कि कोई बात नहीं तुम क्यों माफ़ी मांगोगे ,तुम्हारी कोई गलती नहीं है ,तुमने अपना फ़र्ज निभाया ,अब अगर उसे मदद नहीं मिली तो इसमें हमारी कोई गलती नहीं है ,आनन्द का कहना था ऐसी ही बातों  के कारण कोई मदद करने को आगे नहीं आता और सारी कोशिश बेकार चली जाती है ,मैंने उसे समझाया कि इन बातों के होने से हम मदद करना तो नहीं छोड़ सकते! ये ही सोच लो कि जो पैसे ले गया वो उस नेत्रहीन बच्चे से भी ज्यादा जरूरतमंद होगा...हमारा दिया किसी तक तो पहुँचा ही है ।
बात खतम हो गई ये कह कर कि इस बारे में अब बात नहीं करेंगे...
लेकिन मुझे एक बेटा मिलना था सो मिल गया...:-)
कुछ दिनों बाद पता चला  कि मेरे सहकर्मी नवीन सर की तबियत खराब हो गई है, और वे किसी ऐसे हॉस्पीटल की तलाश कर रहे हैं, जहाँ उनका ईलाज हो सके ...गुजरात में है ...ये सुनकर मुझे आनन्द की याद आई मैंने चेट पर  ये सारी बात बताई और उसने कुछ अस्पतालों की जानकारी मुझे दी ये  कहा कि जाँच करवाने के लिए कुछ दिन रूकना होगा ,सुनकर उसने जो कहा वो मैं कभी नहीं भूल सकती - "ज्यादा कुछ तो कर नहीं पाउंगा लेकिन वे चाहें तो मेरे  घर रूक सकते हैं ,एक कमरे का घर है मेरा....मेरे साथ मेरा छोटा भाई रहता है बस हम दो ..."
और जिस हक से उसने कहा था वो मेरे मन को छू गया ..कोई किसी अनजान व्यक्ति के लिए इतने भरोसे से कह रहा है,जिसे वो जानता तक नहीं ,ये बात जीवन में मुझे औरों पर भरोसा करना सीखा गई ....
आज बस इतना ही ..जारी रहेगा संस्मरण जब तब ...आनन्द के साथ ...


Sunday, September 2, 2012

रायपुर- एक संस्मरण

 रायपुर यात्रा-३० सितंबर- ४ अक्टूबर २०११
समय बीतते जा रहा है पर रायपुर की यादें ताजा है .....अक्टूबर माह में सी.बी.एस.ई. का खो-खो टुर्नामेंट इस बार रायपुर में हुआ था। हमेशा की तरह मुझे ही जाना था टींम को लेकर .....
जब से ब्लॉग लिखने लगी हूँ ....रिश्तेदारी बढ़ गई है ...
मैने दो साल पहले मिसफ़िट पर संजय चौरसिया जी की एक कविता पढ़ी थी...यूं ही  ..जैसे मैं सबकी पढ़ती हूँ...उसके कुछ दिनों बाद उनका इन्दौर आना हुआ तो..तो अपने दोस्त की मदद से मेरे घर तक मिलने आये ..ये अंतरजालीय संपर्क के बाद किसी ब्लॉगर से मेरी पहली मुलाकात थी। मुझे और उन्हें दोनों को लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे है बातों-बातों में पता चला कि वे "दीपक मशाल" के जीजाजी हैं।और संयोग देखिए उस वर्ष मुझे स्कूल टीम को लेकर शिवपुरी जाना था ,तो मौका नहीं चूके संजय जी, फोन पर पूछा- आप कब फ़्री होंगी ? बस थोड़ी देर के लिए ...मना करना तो मुश्किल था थोड़ा वक्त निकाला......... तो आ गए फ़टाक से बाईक लेकर............. अपने घर लेकर गए..श्रीमती जी और बच्चों से मिलवाया ,बहुत अच्छा लगा ...लेकर तो गए थे, एक घंटे का कहकर और दो घंटे बाद वापस आ पाए ..:-)दो प्यारे प्यारे बच्चों में समय कब बीता पता ही नहीं लगा।
उसके बाद इस वर्ष मुलाकात हुई "गिरीश बिल्लोरे जी" एवं परिवार से.......बिटिया को होस्टल में छोड़ने पूरा परिवार आया था ....इन्दौर में रहने वाली उनकी मौसीजी तो  विश्वास नहीं कर पा रही थी कि--- इस कंप्यूटर से बात करके भी कोई परिवार इतना जुड़ सकता है आपस में- कि अपना -सा लगे..........
और अब बारी आई थी रायपुर जाने की --  इस रूट पर  ब्लॉगरीय रिश्तेदार रहते हैं, जान चुकी थी।
गिरीश बिल्लोरे जी को बताया कि रायपुर जाना है तो ...किस ट्रेन से जा रही हूँ ये भी बताना पड़ा.....बस तारीख और समय पता कर लिया खुद उन्होंने ....कहा- खाना लेकर हम आयेंगे....ट्रेन ५ मिनट रूकती है ...आप मेनू बता दें .....और साथ ही बोगी नम्बर भी .......
फ़िर क्या था ..सब्जी -पूड़ी का आर्डर दे दिया ...और साथ ही ये भी  बता दिया कि मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे साथ २४ लोग और हैं... ठीक समय पर  गिरीश जी की ओर से खाना भिजवा दिया गया था, ट्रेन लेट थी तो थोड़ी परेशानी जरूर हुई होगी उन्हें ....पर कुछ किया नहीं जा सकता था ....बच्चों को गुलाबजामुन का गिफ़्ट भी मिला था साथ में ....गिरीश जी से मुलाकात तो नहीं हो पाई  बच्चों की, पर बच्चे ये जानकर खुश थे कि मैडम के फ़्रेंड की ओर से खाना आया है........

बाद में इन बचे पैसों से  बच्चों का जन्मदिन मना लिया खेल के मैदान में  :-) -----
सफ़र बढ़िया रहा ..जैसे ही रायपुर स्टेशन पर ट्रेन रूकी ..मोबाईल  की घंटी शुरू हो गई .. मैं सामान और बच्चों को इकठ्ठा कर रही थी ....घंटी बन्द होने का नाम नहीं ले रही थी आखिर फोन उठा ही लिया ...
आवाज आई --- जी पहुँच गये आप ???
कानों के साथ.. आँखे भी फ़टी रह गई !!! खोजेने लगी चारों ओर ऐसा लगा कोई प्लेटफ़ार्म पर दूर से देखकर ही फोन पर बात कर रहा है ....
जबाब दिया -- हाँ ..बस अभी उतरे ही हैं ....
जबाब मिला --- ललित बोल रहा हूँ.......
ओह !! समझी......ये ललित शर्मा जी थे .....समय के पाबन्द ....!!
संदेश दे रहे थे कि - कब मिलने आ सकते हैं वे, उस समय की सूचना दे  दिजीयेगा......ठीक है ,कह कर बात खतम की।
दूसरे दिन  ललित जी आये स्कूल में मिलने...(बहुत दूर से ) पहचानने में कोई दिक्कत तो थी ही नहीं ..उनकी बेटी की  उसी दिन राज्यस्तरीय निशानेबाजी प्रतियोगिता चल रही थी  ......बहुत खुश थे वे ..
अपने मोबाईल में सहेजे कुछ खास फोटो दिखाये (अब ये मोबाईल खो चुका है).....मुझे याद आ रहा है एक किसी डस्टबिन का भी फोटो था उसके शेप के बारे में ....
.खेल का मैदान तैयार किया जा रहा था...



आमतौर पर मैदान एक दिन पहले तैयार हो जाता है पर पता नही किस परेशानी के चलते यहाँ नजारा दूसरा था,सारे मैदान तैयार किये जाना बाकि थे, ललित जी भी शायद चौंके होंगे ये नजारा देखकर ..खिलाड़ियों व उनके कोच ,जो कि दूर-दूर से आए थे ,के धैर्य की तारीफ़ करनी होगी उन्हें .....


हम इन्तजार  कर रहे थे .................गर्मी बढ़ रही थी.....स्कूल के केंटिन से कोल्ड ड्रिंक लिया और स्कूल बस की छाया में खड़े हो कर ...घर परिवार की बहुत सी बातें हुई....बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि आप कल का समय दीजिये एक घंटा ...........राहुल सिंह जी ,पाबला जी,अवधिया जी,संजीव जी सब इकट्ठा हो रहे हैं, मैं आपको लेने आ जाउंगा ...
समय तय हुआ एक दिन बाद यानि३ तारीख को ...कोल्ड ड्रिंक खत्म होते ही वे विदा हुए
और हम तैयार मार्चपास्ट के लिए----
किसी तरह मैच शुरू हुए और निर्धारित समय पर खतम करने की मजबूरी के कारण देर रात को कृत्रिम रोशनी मे खेले  गए.... 
 
                                     

                                                                                     
और खिलाड़ियोंका उत्साह भी देखने योग्य अनुकरणीय...






और ये वो बच्चे है जिनकी मेहनत ने रंग दिखाया और सारा कार्यक्रम निर्धारित समय पर सम्पन्न हुआ बिना अवरोध के ...इन्होने आतिथ्य सत्कार में रात-दिन एक कर दिया सारे 11वीं और 12 वीं के छात्र थे और अब सब नयी मंजिल की तलाश में निकल पड़े हैं, नई ऊँचाईयों को छूने ....मेरा शुभाशीष और शुभकामनाएँ इन सबको ....मैंने इनके काम को सराहा था और ये फोटो लिया था तब वादा भी किया था कि मैं इनके लिए लिखूंगी,मैं तो भूल चुकी थी लेकिन इन्होंने मुझे खोज निकाला फ़ेसबुक पर और अब सब मेरे फ़्रेंड हैं....:-)

इस बीच तीन तारीख भी आ गई ,और निर्धारित समय पर ललित जी पहुँच गए ...
वे बहुत दूर से लेने आए थे .....एक कार्यक्रम से होकर ...बताया कार लेकर आने वाले थे मगर अब 20-25 किलोमीटर जाना पड़ता वापस तो सोचा कि बाईक से ही ले लेता हूँ....वैसे भी कल मिल चुका था तो अन्दाजा आ गया था कि परेशानी नहीं होगी....:-) पूरे गर्व के साथ बेटी का पदक दिखाया गोल्ड मेडल ...

छत्तीसगढ रायफ़ल एसोशिएशन के तत्वाधान में आयोजित राज्यस्तरीय रायफ़ल शुटिंग प्रतियोगिता 2011 में इवेंट 10 मीटर एयर रायफ़ल (जूनियर) में स्वर्ण पदक विजेता....श्रेयांशि शर्मा ....
बधाई हमारी भी बेटी को..फ़िर चल पड़े बाकी साथियों से मिलने ...
पूरे रास्ते रायपुर की खूबियाँ गिनाते रहे ललित जी ...कभी बाँए तो कभी दाएँ देखने को कहते हुए ...मुझे हँसी भी आ रही थी कि लाख नाम बता दें पर मुझे कहाँ याद रहने वाला है कि किस तरफ़ क्या देखा...ये कॉलेज ये फ़लाँ दफ़्तर ,ये फ़लाँ बिल्डिंग वगैरह.....और तो और चौराहों के भी नाम ....भला आप ही बताईये याद रहते क्या और एक जगह तो हद ही कर दी जब गाड़ी से उतार कर बोले इस  भवन का फोटो ले लीजिए याद रहेगी रायपुर की ....सफ़ेद सी बहुत बड़ी बिल्डिंग थी "व्हाईट हाऊस नगर निगम" मगर लाईट ठीक न होने से ठीक से आ नहीं पाई ...:-)आपको गूगल के सौंजन्य से ही दिखा पा रही हूँ ---
तो करीब ५ किलोमीटर का सफ़र तय करने के बाद पहुँचे राहुल सिंह जी के ऑफ़िस "महंत घासीदास संग्रहालय संस्कृति विभाग" में जहाँ पाबला जी और संजीव जी से मुलाकात हुई थोड़ी ही देर में राहुल जी भा आ गए काम निपटाकर ..यहाँ से राहुल सिंह जी के घर जाना था ,दस मिनट के रास्ते में जब बातचीत के बीच राहुल जी ने याद दिलाया कि उन्हें  एक पॉडकास्ट याद है जो होली के समय किया था ..अच्छा लगा सुनकर राजीव तनेजा जी की पोस्ट थी मिसफ़िट पर जो कहीं बचपन में ले गई थी मुझे ...
सब लोग घर पहुँचे जहाँ श्रीमती नम्रता जी ने जो आदर दिया भुलाए नहीं भूलेगा ...

















इसी बीच अन्य लोग भी पधार चुके थे - अवधिया जी ,अनुज (छत्तीसगढ़ के गायक /अभिनेता),अशोक बजाज जी, स्वराज्य करूण जी,पाबला जी,संजीव तिवारी जी,और ललित जी, राहुल सिंह जी,श्रीमती नम्रता  जी के साथ बहुत ही शालीनता के साथ विमोचन हुआ रामनामी सीडी का...और फ़िर चाय-नाश्ता..





 बाद में राहुल सिंह जी की फ़रमाईश पर एक गीत भी सुनाना पड़ा ..
वे तो युगल सुनना चाहते थे, पर मुझे पता हैं, मैं नहीं गा सकती थी ,तो फ़टाफ़ट अकेले ही सुना दिया बाद मे अनुज ने बढ़िया गीत सुनाए...लोकगीत की










.मिठास में सब खो गए ...
समय होने पर अनुज ने जिस आत्मीयता के साथ मुझे वापस स्कूल छोड़ा वो भी मुझे हमेशा याद रहेगा ।शुक्रिया अनुज...







ऐसी मुलाकातें भविष्य में भी होती रहेगीं और इतनी ही आत्मीयता से इसी आशा से विदा ली रायपुर से ....