यूं तो अपने होठों पर ऊँगली रखकर चुप बैठना मुझे पसन्द है,पर मुझे शिकायत है "उससे"-"वो" एक बार,दो बार नहीं हर बार ऐसा क्यों करता है? "वो" मुझे जो भी काम देता है मैं मन लगाकर,न आता हो, तो सीखकर उसे पूरा करती हूँ,पर हर बार जब काम पूरा होकर परिणाम देने वाला होता है,"वो" उस काम से मुझे दूर कर देता है,ये बात तो ठीक नहीं?-----बुरा लगता है मुझे भी ..पर ठीक है,हर बार सोच लेती हूँ-"वो" सब जानता है तो कुछ अच्छा सोचकर ही ऐसा करता होगा।
सबसे पहली बार मुझे याद है तब मुझे व्यक्तिगत खेलों की चेम्पियनशीप मिलने वाली थी,हम सब सहेलियों को साथ जाना था पुरस्कार वितरण समारोह में,साथ जाने के लिए मेरा छोटा भाई भी था,और भी सहेलियाँ अपने भाई बहनों को ले जा रही थी । हमें करीब एक -डेढ़ किलोमीटर चल कर जाना था,जब हम आधे रास्ते पहुँचे तो मेरी बुआ का लड़्का अपने दोस्तों के साथ ८-९ ट्राफ़ियाँ हाथों मे दबाए भीड़ के साथ मिला,बोला-जल्दी नहीं आ सकती थी?,हर बार नाम पुकार रहे थे अर्चना और मुझे जाना पड़ रहा था,मेरे दोस्त हँस रहे थे,और हम वहाँ से ट्राफ़ियाँ पकड़ कर वापस लौट लिए। मैं अपने भाई को धीरे चलने के लिए कुछ नहीं कहूँगी,क्योंकि वो तो बहुत छोटा था,और फ़िर पैदल दूर तक चलना,वो भी क्या करता बेचारा? रास्ते में कीचड़ की नाली पार करवाने में उसकी चप्पल नाली में गिर पडी थी,उसे निकालने में हमें समय लग गया और फ़िर गंदी कैसे पहनता वो?..............पर "उसने" तो सोचना था,"उसे"तो सब पता होता है न?
फ़िर जब पढ़ाई करने की समझ आने लगी और पढाई पूरी होते ही पिताजी के साथ ऑफ़िस में वकालात सीखने के सपने आना शुरू ही हुए थे कि शादी करवा दी "उसकी" पसंद के लडके से ..नौकरी/कामकाज के चक्कर से दूर कर दिया ,मुझे वहाँ से हटा दिया।किसी तरह एक-दूसरे को समझकर भाषा,व्यवहार में तालमेल बिठाया और दो बच्चों के साथ गाडी पटरी पर चलने की राह पर आई ही थी कि "उन्हें" ही हटा दिया,जबकि पसंद "उसकी" ही थी ।मुझे पता था कि उस समय मेरी दादी ही मुझे सीखा सकती थी कि अब अकेले बच्चों को कैसे बड़ा करना तो दादी को भी दूर कर दिया..खैर!
बाद में फ़िर पिता-भाईयों के सहारे जीवन शुरू करने ही वाली थी कि मेरी मेरे बच्चों के साथ होस्टल मे रहने की व्यवस्था करके पिता के साथ से वंचित कर दिया---तो बुरा नहीं लगेगा क्या मुझे?---फ़िर भी मैने अपने होठों से ऊंगली नहीं हटाई...........खैर किसी तरह बच्चों को बड़ा किया और बेटा पढ़ाई पूरी करने ही वाला था कि एक रोड़ा अटका दिया..........उसको पार किया और अब सब ठीक होने वाला था कि फ़िर .....
दुख नहीं होता...पर बुरा लगता है मुझे भी "उसने" कुछ तो सोचना चाहिए.........सब कुछ तो उसके हाथ में होता है न ?---------------
अब सुनिये एक बहुत ही साधारण सी भारतीय लड़की कंचन सिंह चौहान जी का ये गीत----------
इसे आप उनके ब्लॉग ह्रदय गवाक्ष पर पढ़ सकते हैं
सबसे पहली बार मुझे याद है तब मुझे व्यक्तिगत खेलों की चेम्पियनशीप मिलने वाली थी,हम सब सहेलियों को साथ जाना था पुरस्कार वितरण समारोह में,साथ जाने के लिए मेरा छोटा भाई भी था,और भी सहेलियाँ अपने भाई बहनों को ले जा रही थी । हमें करीब एक -डेढ़ किलोमीटर चल कर जाना था,जब हम आधे रास्ते पहुँचे तो मेरी बुआ का लड़्का अपने दोस्तों के साथ ८-९ ट्राफ़ियाँ हाथों मे दबाए भीड़ के साथ मिला,बोला-जल्दी नहीं आ सकती थी?,हर बार नाम पुकार रहे थे अर्चना और मुझे जाना पड़ रहा था,मेरे दोस्त हँस रहे थे,और हम वहाँ से ट्राफ़ियाँ पकड़ कर वापस लौट लिए। मैं अपने भाई को धीरे चलने के लिए कुछ नहीं कहूँगी,क्योंकि वो तो बहुत छोटा था,और फ़िर पैदल दूर तक चलना,वो भी क्या करता बेचारा? रास्ते में कीचड़ की नाली पार करवाने में उसकी चप्पल नाली में गिर पडी थी,उसे निकालने में हमें समय लग गया और फ़िर गंदी कैसे पहनता वो?..............पर "उसने" तो सोचना था,"उसे"तो सब पता होता है न?
फ़िर जब पढ़ाई करने की समझ आने लगी और पढाई पूरी होते ही पिताजी के साथ ऑफ़िस में वकालात सीखने के सपने आना शुरू ही हुए थे कि शादी करवा दी "उसकी" पसंद के लडके से ..नौकरी/कामकाज के चक्कर से दूर कर दिया ,मुझे वहाँ से हटा दिया।किसी तरह एक-दूसरे को समझकर भाषा,व्यवहार में तालमेल बिठाया और दो बच्चों के साथ गाडी पटरी पर चलने की राह पर आई ही थी कि "उन्हें" ही हटा दिया,जबकि पसंद "उसकी" ही थी ।मुझे पता था कि उस समय मेरी दादी ही मुझे सीखा सकती थी कि अब अकेले बच्चों को कैसे बड़ा करना तो दादी को भी दूर कर दिया..खैर!
बाद में फ़िर पिता-भाईयों के सहारे जीवन शुरू करने ही वाली थी कि मेरी मेरे बच्चों के साथ होस्टल मे रहने की व्यवस्था करके पिता के साथ से वंचित कर दिया---तो बुरा नहीं लगेगा क्या मुझे?---फ़िर भी मैने अपने होठों से ऊंगली नहीं हटाई...........खैर किसी तरह बच्चों को बड़ा किया और बेटा पढ़ाई पूरी करने ही वाला था कि एक रोड़ा अटका दिया..........उसको पार किया और अब सब ठीक होने वाला था कि फ़िर .....
दुख नहीं होता...पर बुरा लगता है मुझे भी "उसने" कुछ तो सोचना चाहिए.........सब कुछ तो उसके हाथ में होता है न ?---------------
अब सुनिये एक बहुत ही साधारण सी भारतीय लड़की कंचन सिंह चौहान जी का ये गीत----------
इसे आप उनके ब्लॉग ह्रदय गवाक्ष पर पढ़ सकते हैं