Saturday, August 19, 2017

विश्व फोटोग्राफी दिवस विशेष

पिछले दिनों इंदौर ने प्रथम स्थान हासिल किया स्वच्छ शहर प्रतियोगिता में ,हम गौरवान्वित हुए।अभी बहुत काम होना है,इसे बनाये रखना आसान नहीं ,लोगों में स्वच्छता की आदत लगाये रखना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण है सफाईकर्मियों का अपने कार्य के प्रति समर्पण...
ये तस्वीर आज सुबह करीब 7 बजे की है - विश्व फोटोग्राफी दिवस की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी ...आप भी देखिए-

Thursday, August 17, 2017

भला कर भले मानुष

आजकल जिस एप्प की चर्चा चल रही है, उसके बारे में एक ही विचार आया कि कोई किसी को पीठ पीछे गाली क्यों देना चाहता है ?
अगर व्यक्ति कोई गलत बात कह रहा है, तो उसे जब तक सामने नहीं बताया जाएगा उसमें सुधार संभव नहीं है, पीठ पीछे कही बात जब तक उस तक पहुंचती है तब तक या तो वो व्यक्ति कईयों को नुकसान पहुंचा चुका होता है,या खुद नुकसान उठा चुका होता है ...
ये जरूरी नहीं कि आपको जो बात गलत लगी वो उसके लिए भी गलत हो लेकिन आगाह करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए अगर हमें महसूस हो,एक विचार के हर नकारात्मक पक्ष को सामने लाये जाने पर ही उसकी सकारात्मकता को बढ़ाया जा सकता है ,ऐसा मैं सोचती हूँ।
अनजान बनकर दूसरों का भला करना सबके बस का नहीं 😊ये भी कटु सत्य है।
एक गीत याद आ रहा है ,मालूम नहीं किसका लिखा हुआ है -

भला किसी का कर न सको तो,बुरा किसी का मत करना
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम- काँटे बनकर मत रहना ....

Sunday, August 13, 2017

छेड़छाड़ का चरमानंद

छेड़छाड़ शब्द भ्रष्टाचार मोहल्ले की गड़बड़ की बिरादरी का है,मतलब इधर-उधर की गली में रहने वाला कह सकते हैं, प्रथमदृष्टया पढ़ने पर लड़के द्वारा लड़की को छेड़ना ही दिमाग में आता है क्योंकि सबसे ज्यादा प्रचलन यानि प्रचार इसी के द्वारा हुआ,परंतु परेशान करने से ज्यादा हेरफेर होती है क्या इस शब्द से... जाँच का विषय हो सकता है ...
हेरफेर को समझें जाँच से -यदि कोई व्यक्ति अपनी जाँच किसी पैथोलॉजी में करवाता है और उसके दिए नमूने से छेड़छाड़ हो गई तो समझो अच्छा खासा व्यक्ति भी केंसर का बीमार घोषित हो सकता है ये तो हुई सिर्फ डॉक्टरी पेशे की बात यदि वकालात का पेशा हो तो फाइलों के साथ छेड़छाड़ भले आदमी को सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है,यदि शिक्षा जगत की बात हो तो आप बिना पढ़े कई डिग्रियों के स्वामी बन सकते हैं सिर्फ छेड़छाड़ करवा के अपनी उत्तरपुस्तिकाओं में ....😊
आजकल और आगे बढ़ गया है साइंस -आप डी एन ए रिपोर्ट तक से छेड़छाड़ करवा कर किसी के पुत्र साबित हो सकते हैं या जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं ...
आजकल लेखन में छेड़छाड़ भी चरम पर देखने को मिलती है,किसी के लिखे की पंक्तियों में छेड़छाड़ कर खुद को लेखक साबित करने लगे हैं लोग और तो और अब हाथ का लिखा तो इतिहास की गर्त में समाने लगा है, कॉपी पेस्ट के जमाने में छेड़छाड़ को आसान राह मिल गई तो चरम के भी चरमानंद को प्राप्त करने की होड़ मची है ...

Friday, August 4, 2017

फेसबुक पर धतर-मतर कुछ भी पढ़-पढ़ कर भेजे का बना भुरता

कुछ भी लिख देने को कैसे मन हो जाता है,किसी का भी?
क्या ये वे लोग लिख देते हैं?-जिनके माता-पिता या दादा-दादी ने बचपन में पीछे से हाथ न धरा गोद में बिठाकर, सिर पर हाथ न फेरा,या बहन ने राखी न बाँधी, या भाई ने अपना हिस्सा नहीं बाँटा,या फिर शादी के बाद पत्नी ने ही साथ न निभाया या कि अपना पौरुष कहीं खो आये,या हो सकता है पौरुष खुद ही साथ छोड़ गया उनका ....
या बच्चों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया उम्र के ढलान पर, लुढ़का दिया बे-पेंदे के लोटे की तरह... या हो सकता है अपनी पहचान की तलाश में काँटों भरी गलत राह चुन ली...और दोस्त भी न बना कोई ...

खैर! वे जानें ,उन्हें बीमारी कौनसी है? 😊
लेकिन इलाज तो ये पता है कि -जब तक ऐसे लोग,जो कुछ भी लिख सकते हैं,स्त्री,महिला,नारी या मादा के लिए आदर और सम्मान के एक -दो शब्द न लिखेंगे,जिंदगी के मायने उनको नहीं आएंगे,जीना वे कभी सीख नहीं पाएंगे यहाँ तक कि मौत भी उनकी जल्दी नहीं आएगी ,यहीं पड़े वमन करते,सड़ते रहेंगे .....

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ये था काल्पनिक अध्याय 19 का भावानुवाद जो कृष्ण ने अपनी माताओं,सखियों और प्रेम की दिवानियों को स्वर्ग में चुपके से समझाया ,उनके प्रश्नों की जिज्ञासा में .....अपन भी वहीं थे तब 😊
और अब -
अपनी डॉक्टरी तो इत्ता जानती है,बस!...😊 
और ये डॉक्टरी ऐसी वैसी तैयारी से नहीं मिली,पूरी थीसिस समझी यहीं फेसबुक पर झख मारकर .....☺

Wednesday, August 2, 2017

जीवटता की मिसाल - आशालता जी

पिछले कई दिनों से ब्लॉग लेखिकाओं से मुलाकात के योग बनते रहे...
मैं टुकड़ा टुकड़ा बँटी रही इंदौर ,बंगलौर और खरगोन के बीच...
इससे पहले जब इंदौर में थी तब एक दिन अचानक आशालता जी का फोन आया कि मैं हॉस्पिटल में हूँ,पैर में रॉड लगी हैं, आपकी याद आई तो फोन मिला लिया, उन्हें ब्लॉगर के तौर पर जानती थी, फिर तभी तय किया कि हॉस्पिटल जाकर मिला जाए, संभव हुआ ,खोजते हुए पहुँच ही गई थी,बेटे और अपने श्रीमान जी के साथ परिचय करवाया,हालांकि उससे पहले भी एक बार उनके घर ऐसे ही न्यौता था उन्होंने और मैं पहुंच गई थी तब भी...
खैर जैसे ही मुझे देखा उनके चेहरे पर रौनक आ गई, जितना समय रुक सकती थी रुकी उनके पास वे बतियाते रही थीं - लेखन अपनी पढ़ाई अपने परिवार,माता,पिता सबके बारे में......

4-5 महीने पहले फिर एक दिन फोन आया कि मैं फिर हॉस्पिटल में हूँ,लेकिन तब चाहकर भी मिलना नहीं हो पाया था ..वे उज्जैन चली गई थीं,फिर एक दिन दामाद जी के साथ आधे रास्ते तक उज्जैन के लिए निकली भी लेकिन अचानक केंसल हुआ और हम रास्ते से ही वापस लौट आए ।
फिर मैं बंगलौर चली गई....इस बीच आशा जी का स्वास्थ्य और खराब हुआ, पेरेलिसिस अटैक आया ,मुझे बेहद अफसोस हुआ कि उनसे मिल न पाई, लेकिन इस बीच व्हाट्सअप ग्रुप बनाया " गाओ गुनगुनाओ शौक से"उसमें संगीता अस्थाना जी के आग्रह पर साधना वैद जी जुड़ी ..और मुझे पता चला कि वे आशा जी की सगी बहन हैं ।उनके हालचाल मिलते रहे । इस बार जब इंदौर आने का प्लान बना तो आशा जी से मिलना प्राथमिकता में था और आज वो संयोग बना.... आज मैं ,पल्लवी,मायरा और नीलेश - आशाजी से मिले उनके घर जाकर, वे इतनी खुश हुई कि मेरे पास बताने को शब्द नहीं,पहले की ही तरह हर विषय पर बात की,कैसे शादी के बाद पढ़ाई जारी रखी बिस्तर से उठ तो नहीं सकती थी,लेकिन मजबूत  ईच्छाशक्ति की मालकिन फिर उसी जोश से मिली ,मुझे उनकी प्रकाशित पुस्तक भेंट की, लेखन अब भी जारी है,मायरा ने भी भरपूर मनोरंजन किया उनका..कविताएं और श्लोक सुनाए डांस दिखाया,.....बहुत अच्छा लगा एक दिन ऐसे बीतना...👍ढाई साल से बिस्तर पर स्वास्थ्य से लड़ाई करती हुई आशालता जी के साथ थोड़ा सा वक्त बिताना.
ईश्वर से प्रार्थना है वे और जल्दी स्वस्थ हों और लेखन जारी रखें !

Tuesday, August 1, 2017

ब्लॉगर-ब्लॉगर मौसेरे भाई

हम  .... जो लोग ब्लॉग पर लिखने की वजह से एक-दूसरे को जानने लगे। ..एक -दूसरे पर ज्यादा विश्वास/भरोसा कर लेते हैं/करते हैं/,बनिस्बत फेसबुक की वजह से जानने वालों के। ....
हैं तो दोनों आभासी संसार .... पर कभी जात न पूछी साधू की। .. :-)

कितनी भी खींचतान हो आपस में पर मुझे विश्वास है कि मदद के लिए पुकारा तो सब ओर से हाथ उठेंगे ....

पुरानी पंक्तियाँ याद आ गई -

बहुत किए थे वादे
थे भी नेक इरादे
पर टूट गए सारे
वक्त ने वक्त ही नहीं दिया
सारे वादों को ही बेखौफ़ तोड़ दिया
वो शायद डर जाता है नेक इरादों से
घबराता है प्यार के प्यादों से
पर नहीं जानता शायद
प्यार करने वाले
प्यार करते हैं शान से
जीते हैं शान से
मरते हैं शान से....

देखो ! देर हो सकती है पर अंधेर नहीं.....
और अंत में एक श्लोक-

अक्रोधेन जयेत् क्रोधम् , असाधुं साधुनां जयेत् ।
जयेत् कदर्यं दानेन् , जयेत सत्येन चान्रतम् ॥

अर्थ-
क्रोध को ,क्रोध न करके जीतना चाहिये , दुष्ट को साधुभाव  द्वारा जीतना चाहिये , कंजूस को दान द्वारा जीतना चाहियेऔर झूठ को सत्य द्वारा  जीतना चाहिये।

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Monday, July 31, 2017

शान्ति की खोज #हिन्दी_ब्लॉगिंग

पिछले दिनों फेसबुक पर किसी की शेअर की हुई कहानी पढ़ी,मालूम नहीं सच थी या कहानी थी,उसमें बताया था कि एक स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद अपने छोटे से बेटे को कई मुश्किलों का सामना कर के बड़ा करती है,उसकी हर सुविधा का ध्यान रख कर उसे उच्च शिक्षा दिलवाती है बच्चा आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाता है ,वहीं शादी कर लेता है, माँ उसके आने की राह देखती रहती है,लेकिन वो नहीं लौटता,स्त्री के अड़ोसी-पड़ोसी इस बीच उसका खयाल रखते हैं, उसको अपने परिवार का सदस्य मानकर सम्मान देते हैं ,और आखिर में वो बीमार हो जाती है ,बेटे को बीमारी की खबर भी कर दी जाती है, और उसके आने का इंतजार करते हुए स्त्री अपनी अंतिम साँसे गिनती है,पर चल बसती है उसकी ईच्छा बेटे से मिलने की पूरी नहीं हो पाती...
उसी बेटे के व्यवहार से अड़ोसी-पड़ोसी दुखी होकर भी  अब उसकी माँ की ईच्छा और सम्मान की खातिर उसके घर की चाबी उसके सुपुर्द करने का इंतजार कर रहे हैं, कि अब शायद वो आए.....

मुझे अपनी दादी की कही एक कहावत याद आई -

पूत सपूत तो क्यों धन संचय
और पूत कपूत तो क्यों धन संचय....

सही है-
बेटा हो या बेटी,अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के साथ जिम्मेदार बनाना भी उतना ही जरूरी है .....धन का संचय जरूरत से ज्यादा करना व्यर्थ है,बच्चों को मितव्ययिता के साथ संयम सिखाना भी बहुत जरूरी है..और ये पाठ पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलेंगे .... अगर बच्चे खुद सपूत यानि काबिल हुए तो कभी आप पर निर्भर होना नहीं चाहेंगे, खुद कमा लेंगें,आप चिंता न करें,और अगर कपूत हुए तो सदा आप पर निर्भर राह आपका संचित धन उजाड़ देंगे,,तब संचित धन व्यर्थ गलत उपयोग होकर नष्ट हो जाना है .....
उन्हें आप पर निर्भर नहीं रखना चाहिए ...

लेकिन "ममता","समाज",और "लोग क्या कहेंगे"जैसी बातों के चलते सदा समाज में ऐसी कहानियाँ दोहराई जाती रही हैं/रहेंगी.....

पता नहीं कब तक
वही आंसू
......
फिर वही शांती
फिर वही पैग
फिर वही पिता
फिर वही माता
फिर वही कुपुत्र
और ...
अनंत तक चलने वाली

शान्ति की खोज ....