Sunday, July 11, 2021

जग घूमिया थारे जैसा न कोई

 
बचपन से घर में सब काम किए तो कभी कोई काम करने से परहेज नहीं रहा। 
चाहे गाय - भैंस दुहना हो या उनका गोबर हटाना हो,उपले थापना हो या संजा बनाना हो।
राजदूत चलाकर पिता के साथ खेत जाना हो या भाई के साथ गाड़ी रिपेयरिंग के लिए झुकानी हो। 
पापड़ के गोले के लिए घन चलाना हो या छत पर दौड़ दौड़ कर आलू चिप्स फैलाना हो।
खेलने के लिए सुबह जल्दी उठकर मैदान जाना हो या गुनगुनी दोपहर सिलाई बुनाई करनी हो गप्पे लगाते हुए।

शायद इसलिए मुसीबत आने पर हर पल डटी रही।

ये घमंड वाली बात नहीं, पर मैने समय आने पर हॉस्टल में झाड़ू पोछा भी किया और बच्चों के कपड़े भी धोए,उनके लिए रोटियां भी बेली और उनको नहलाकर तैयार भी किया,उनके साथ खेली भी और उनके हाथपैर दर्द होने और चोट लगने पर पट्टी पानी भी की।


जब मैंने वार्डन का जॉब छोड़ा तो प्रिंसिपल मैडम ने कहा था कि तुम्हारे जैसी कोई और लाकर दे दो ,
मैं यही कह पाई थी कि मेरे जैसी तो कोई न मिलेगी।

कुछ का कुछ ,जो मेरे साथ होना है

मैं करना चाहती हूं कुछ और हो जाता है कुछ,
ये आज की नहीं बरसों पुरानी बात है
चली आ रही है,
घटित हो रही है
बरसों से मेरे साथ
शायद मेरे ही साथ...

जैसे कि जब मैं खेलना चाहती थी
काम करती थी,
जब मैं पढ़ना चाहती थी, झाड़ू लगाती थी
जब मैं खाना चाहती थी
उपवास करती थी
जब कुछ कहना चाहती थी
चुप रहती थी
सिर्फ खुली आंखों से सपने देखती थी
जब मैं सोना चाहती थी।

आज भी कुछ बदला नहीं मेरे साथ

घूमना चाहती हूं पहिए की तरह 
पर लट्टू बन गई हूं
या कि बना दी गई हूं।

लिखना चाहती हूं
पर कलम घिसने की बजाय
उंगलियां ठोक रही हूं
जैसे कि सितार बजा रही हूं।

गाना चाहती हूं,नाचना चाहती हूं
पर उड़ने लगी हूं 
वो भी आंखें मूंदकर।

जवान रहना चाहती हूं
मगर बूढ़ी हो गई हूं,
या कि कर दी गई हूं।

कौन है? जो ये कर रहा है 
मेरे साथ ,
मुझसे मिलकर
या मुझमें मिलकर

लगता हैं हंसना चाहूंगी तो
अबकि रो पडूंगी
अट्टहास करना चाहूंगी तब
खिलखिलाऊंगी ,
और जब जीना चाहूंगी
मर जाऊंगी।
-
अर्चना 


Saturday, May 29, 2021

शतायु की कामना

ये मेरे छोटे फूफाजी हैं।बुआ और फूफाजी की जब शादी हुई तो रितिरिवाज और रहनसहन ,भाषा सब कुछ अलग था दोनों काा

, फूफाजी महाराष्ट्र केऔर बुआ मध्यप्रदेश की ।
उस समय में जब लड़कियां बहुत कम पढ़ती थी हमारे समाज में ,बुआ ने एमएससी किया था।
शादी के बाद वे पूरी तरह से महाराष्ट्रीयन लगती थीं। भाषा भी मराठी ,और चंद्रपूर में भुसारी मैडम (टीचर)के नाम से उन्होंने अपनी पहचान बनाई।
समय बीता और दो बेटियों को इंजिनियर बनाया।
वही उनके बेटे भी हैं।
बुआ रिटायर हुई ,और डायबिटीज की गिरफ्त में आने पर हम उनके सानिध्य से वंचित हो गए।
बुआ की बड़ी बेटी को करीब 11 वर्ष पहले किडनी डोनेट की फूफाजी ने।
 आज वे और फूफाजी दोनों स्वस्थ हैं और फूफाजी अपना 80वा जन्मदिन मना रहे हैं।
यही बड़ी बेटी भावना है 


ईश्वर उन्हें शतायु करे।

Tuesday, May 25, 2021

अपनों के लिए



बिछुड़ना उदासी फ़ैला रहा है 
हम सबके बीच..
कोई हँसाओ तो ज़रा सबको ..

हँसती हुई तस्वीर देखो ..
ज़रा तुम भी ...
कैसे रंग भरती है जीवन में 

और ये देखो !!
इंद्र धनुषी रंग............
जाने का मन नहीं करता मेरा...

Wednesday, May 19, 2021

अनमना मन


अनमनी सी बैठी हूं,
चाहती हूं खूब खिलखिलाकर हंसना
कोशिश भी करती हूं हंसने की
पर आंखें बंद होने पर  वो चेहरे दिखते हैं
जिन्हें मेरे साथ खिलखिलाना चाहिए था
अपनी राह में साथ छोड़ बहुत आगे निकल गए वे
और मैं चाहकर भी हंस नहीं पा रही

चाहती हूं इस बारिश के बाद 
इंद्रधनुष को देखूं
पर आसमान में काले बादल ही छंट नहीं रहे
सातों रंग अलग न होकर सफेद ही सफेद शेष है
हर तरफ गड़गड़ाहट के बीच चीत्कार गूंजती है
बाहर से न भीग कर भी अंदर तक भीगा है मन
और मैं ताक रही अनमनी सी...

Wednesday, April 14, 2021

मेरा बच्चा और उसके बच्चे

यही पल ऐसे हैं जो लाते हैं चेहरे पर मुस्कान।