Monday, January 15, 2018

शरद कोकास जी की लंबी कविता और उसका सस्वर वाचन स्वयं शरद जी द्वारा

नमस्कार साथियों
आप सबके लिए एक श्रृंखला प्रकाशित करने जा रही हूँ ,ऑडियो के साथ
शरद कोकास जी की लंबी कविता "देह" और उसका सस्वर वाचन स्वयं शरद जी द्वारा -
शरद कोकास का परिचय


                                                                     
श्री शरद कोकास नवें दशक के समकालीन कवि और एक महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास बोध पर लिखी चर्चित लम्बी कविता 'पुरातत्ववेत्ता' के लिए पूरे देश मंं प्रसिद्ध कवि शरद कोकास का जन्म बैतूल मध्यप्रदेश में हुआ । उनकी प्रारंभिक शिक्षा भंडारा तथा नागपुर महाराष्ट्र में हुई और उन्होंने क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय भोपाल से स्नातक तथा विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व में गोल्ड मैडल के साथ परास्नातक की उपाधि प्राप्त की ।
उनके तीन कविता संग्रह अब तक आ चुके हैं लम्बी कविता पुस्तिका “ पुरातत्ववेत्ता“ का प्रकाशन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका पहल  द्वारा, 2005 में किया गया, इससे पूर्व उनका कविता संग्रह 'गुनगुनी धूप में बैठकर' 1994 में प्रकाशित हुआ तथा 'हमसे तो बेहतर हैं रंग'  2014 में  दखल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ ।
सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविता,कहानी ,समीक्षा और कालम के प्रकाशन के अतिरिक्त नवसाक्षरों हेतु तीन कहानी पुस्तिकायें ,चिठ्ठियों की एक किताब 'कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ' भी उनकी प्रकाशित है ।
हिंदी ब्लोगिंग के प्रारम्भिक दिनों से ही शरद कोकास एक महत्वपूर्ण ब्लॉगर रहे हैं उनके पांच ब्लॉग हैं 'शको कोश ' , 'पुरातत्ववेत्ता' , 'पास पड़ोस' , 'ना जादू ना टोना' और 'आलोचक' ।
एक्टिविस्ट के रूप में अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति नागपुर, साक्षरता समिति दुर्ग आदि अनेक संस्थाओं में कार्य करते हुए “ मस्तिष्क की सत्ता “ विषय पर शरद कोकास विभिन्न  शहरों और संस्थाओं में उनके व्याख्यान भी देते हैं । उनकी व्हाट्स एप विचार श्रंखला 'मस्तिष्क की सत्ता' तथा हिन्दी के ब्लॉग इंटरनेट पर काफ़ी पसंद किये जाते हैं। इसी शीर्षक से उनकी एक पुस्तक भी आ रही  है।
शरद कोकास इस समय गूगल पर सर्च किये जाने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से हैं
शरद कोकास की एक महत्वपूर्ण लम्बी कविता ' देह ' विगत दिनों पहल पत्रिका में प्रकाशित हुई है । इस कविता को पंद्रह भागों में विभक्त कर उसके पंद्रह ऑडियो भी उन्होंने बनाये हैं ।

प्रस्तावना -


अपने ब्लॉग के पाठकों के लिए मैं उनकी लम्बी कविता ' देह ' के यह पंद्रह ऑडियो और उनके साथ कविता की स्क्रिप्ट प्रस्तुत कर रही हूँ । आज प्रस्तुत है प्रथम भाग और उसका ऑडियो । आप कविता पढ़ने के साथ साथ उसे सुनने का आनंद भी ले सकते हैं । ऑडियो में शरद कोकास की आवाज़ है और पार्श्व में है पियानो का संगीत ।

*शरद कोकास की लम्बी कविता* 

_ *देह* _

_ *भाग 1* _

*दिन* जैसा दिन नहीं था न रात जैसी थी रात 
धरती की तरह धरती नहीं थी वह 
न आसमान की तरह दिखाई देता था आसमान 
बृह्मांड में गूँज रही थी 
कुछ बच्चों के रोने की आवाज 
सूर्य की देह से गल कर गिर रही थी आग 
और नए ग्रहों की देह जन्म ले रही थी 

*अपने* भाईयों के बीच अकेली बहन थी पृथ्वी 
जिसकी उर्वरा कोख में भविष्य के बीज थे 
और चांद उसका इकलौता बेटा 
जन्म से ही अपना घर अलग बसाने की तैयारी में था
  
*इधर* आसमान की आँखों में अपार विस्मय 
कि सद्यप्रसूता पृथ्वी की देह 
अपने मूल आकार में वापस आने के प्रयत्न में
निरंतर नदी पहाड़ समंदर और चटटानों में तब्दील हो रही है 
रसायनों से लबालब भर चुकी है उसकी छाती 
और मीथेन,नाइट्रोजन,ओषजन युक्त हवाओं में सांस ले रही है वो
*यह* वह समय था देह के लिए 
जब देह जैसा कोई शब्द नहीं था
अमीबा की शक्ल में पल रहा था देह का विचार 
अपने ही ईश्वरत्व में अपना देहकर्ता था वह 
जिसने हर देह में जीन्स पैदा किए 
डी ऑक्सी राइबो न्यूक्लिइक एसिड*1  अपनी सघनता में 
रचते गए पाँव के नाखून से बालों तक हर अंग
जो हर सजीव में एक जैसे होते हुए भी कभी एक जैसे नहीं हुए 
जो ठीक पिता की तरह उसकी संतानों में नहीं आए 
और न संतानों से कभी उनकी संतानों में 

*शिशिर* की सर्द रातों में हमारी देह में सिहरन पैदा करती 
शीतल हवाएँ कल कहाँ थी 
कल यही मिटटी नहीं थी नहीं था यही आकाश 
आज नदी में बहता हुआ जल कल नहीं था 
उस तरह देह में भी नहीं था वह अपने वर्तमान में 
कहीं कुछ तय नहीं था कि उसका कौन सा अंश 
किस देह में किस रुप में समाएगा 
कौन सा अंश रक्त की बूंद बनेगा कौन सा माँस 
पृथ्वी की प्रयोगशाला में 
किस कोशिका के लिए कौन सा रसायन 
उत्तरदायी होगा कुछ तय नहीं था
*पंछियों* की चहचहाहट और मछलियों की गुड़गुड़ाहट  में 
देह के लिए जीवन की वह पहली पुकार थी 
कभी अंतरिक्ष से आती सुनाई देती जो 
कभी समुद्रतलों के छिछले पानी से 
आग्रह था जिसमें भविष्य की यात्राओं के लिए साथ का ।

*शरद कोकास*

******************
सुनिए यहाँ पर - 

अक्षरबद्ध कविताएं -क्षणिक सी

"भ्रमिका"
भ्रम हुआ मुझे
मिल गई जिंदगी!
काश!तुम होते....

"व्यामोह"
व्याधियों से मुक्त हों
मोह बंधन से छूटे
हम सब !

"भंवरजाल"
भंग हुई शांति
वतन की मेरे...
रक्त बहा तुम्हारा
जान गई मेरी ...
लग गई नज़र जाने किसकी?

"भूलभूलैया"
भूल न पाई मैं तुझको
लगा लिया ये कैसा रोग
भुलना होता अगर आसान
लैला-मजनूँ ,हीर-राँझा की
यारियों के किस्से न कहे जाते....
-अर्चना

Sunday, January 7, 2018

सीमा प्रहरी

उन्हें बर्फ़ीली पहाड़ियों में भी गर्मी लगती है
और रेगिस्तान की गर्म हवाएं ठंडक पहुँचाती है
बरसाती बादल उन पर बिजली नहीं गिरा पाते
और उनके त्यौहार हमसे अलग होते हैं ....

परिवार उनका भी होता है पर हम -सा कमजोर नहीं
और ईमानदार मेहनती हैं वे,कामचोर नहीं
तुम्हारा बस नहीं कि तुम उन्हें पहचान भी पाओ
तुम तो बस- "बंदे में था दम" यही गीत गाओ!!!

-अर्चना

Monday, January 1, 2018

1 जनवरी 2018

१ जनवरी,2018

आओ,आओ,आओ,
यहाँ रखी हैं शुभकामनाएं सबके लिए,
ढेरों आशीष,
और अनंत स्नेह...
उठा लो अपने हिस्से का सब आकर ..
हो भी क्यो न !😊
आखिर सेल लगी है
मेरी खुले दिल की ...
और फ्री गिफ्ट के लिए कल फिर आना
मिक्स हो गए हैं,
छँटवा नहीं सकती
कल खोलूंगी उन्हें
पहले आओ-पहले पाओ!
की तर्ज पर...👍

जितनी खुशियां बिखरी हैं
उन्हें भी समेट लेना
अंतिम समय नजदीक है
फिर न कहना
बताया नहीं!
बुलाया नहीं!
और हाँ
ये किसी एप्प से ऑटोजनरेट नहीं
जो सबको एक सा माल मिले!!!

जिसको,जिसकी,जितनी
जरूरत है,सब मिलेगा
बस!अपनी ईमानदारी
का बैंक खाता
मुझसे रिश्ते की सच्चाई
से लिंक करवा लेना पहले😊😊😊

2018 तो क्या आने वाले
हर नए साल में खुश और
सुखी रहेंगे आप
और आपका पूरा परिवार!!!
-अर्चना(01.01.2018)11 बजकर 25 मिनट पर....😊

Saturday, December 23, 2017

ग्रुप रिपोर्ट -गाओ गुनगुनाओ शौक से

रिपोर्ट - पूजा जी द्वारा लिया गया शोभना जी का इंटरव्यू ग्रुप गाओ गुनगुनाओ शौक से में-
शोभना जी का इंटरव्यू कल 5 मिनिट सुनकर बंद कर दिया था ,पांच मिनिट में ही लगा हड़बड़ी में सुनने का नहीं है,आज सुबह उठकर सीधे उसे प्रार्थना की तरह शुरू कर लिया ,अभी 25 मिनिट सुनकर ही लगा लिखती चलूँ...
शुरुआत पूजा की मीठी आवाज से मिश्री सी घुली लगी...फिर शोभना जी की दिनचर्या,खुद को समयानुसार ढाल लेने की कला,समाज को दिया समर्पण और विरोध के बावजूद अकेले चल पड़ने की कहानी प्रेरणास्पद लगी...
फिर अध्यात्म की ओर मुड़ जाना भी सुना,और जिस स्थिरता से वे सारे जबाब देती हैं लगा आध्यात्म ने उनमें गहरे  पैर जमा लिए हैं,इतनी स्थिरता पाना एक योग ही है ...
समय की पाबंदी रहे तो कई चीजें साथ देती है,अपने पक्ष में हो जाती है,एक बड़ी सीख शोभना जी के जीवन से मिली ।
रश्मिप्रभा जी की मुलाकात की साक्षी रही 👍
दिल में उतरने का राज उगलवा लिया रागिनी ने😊
संध्या ने उनके पथप्रदर्शक पता कर लिए,जीजाजी के अलावा रिश्तेदार और माँ को याद किया शोभना जी ने,और माँ को याद करते उनकी आवाज का भारीपन मेरी आँखें नम कर गया।
उत्साह,उमंग और उद्देश्य .....👌तीन उ सीखें सब
बच्चे ,बहू और बेटे ....तीन ब ने जीवन में आनंद भर दिया है।
उषा जी की एनर्जी पूरे ग्रुप में ईंधन देने का काम करती हैं।
मुझे आदर्श कहकर सातवें आसमान में पहुंचा दिया !उफ्फ!!!
चुलबुली शीतलने बिल्कुल सही सवाल देकर उगलवाया उनके प्रेरको को ... पन्ना धाय को इसी बहाने बरसों बाद याद किया ,नमन!
और शीतल के दूसरे सवाल से उनकी मुस्कान को महसूस किया मैंने😊👌हा हा
पूजा ने उषाजी का पेटेंट सवाल किया 😊
साहब का सवाल ...बड़ी एडमिन 😂😂😂 अहा कितने उपनाम मेरे...
मेरे सवाल का जबाब-मोह और जिम्मेदारी में ही बेटी से दादी नानी का सफर तय होता है .... सबसे बड़ी बात👌
कविता -मौत की दस्तक है तो जिंदगी की तलब है,सत्य वचन 👏👏👏👏
ओह गुरुदेव !आह!गुरुदेव!वाह गुरुदेव!!!😊 ग्रुप की ओर से शोभना जी के गायन को सुनने का मौका मिला इसके लिए गुरुदेव भी सहायक हैं ,प्रणाम उन्हें 👍
शोभना जी के भजन का कोई तोड़ नहीं वे सुप्रभाती हैं हमारे ग्रुप की....
स्वांतःसुखाय 👍के लिए बधाई हम सबकी ओर से...और संग्रह आते रहें ...शुभकामनाएं
आपकी कविता -
"अनमोल रिश्ते"
"मैं हारी नहीं
बस थोड़ी थकी हूँ
......
......
.....
....
कपड़ों की इज्जत करोगी
वे तुम्हारी इज्जत करेंगे ....
.....
...
ब्लॉग-अभिव्यक्ति पर आप सब भी पढ़िए उन्हें ...
साधना जी ने हॉबी पूछी और ऋता के सवाल जिंदगी में  सबसे ज्यादा कौन प्यारा का जबाब मिला "रिश्ते"!!!

सीख मिली-
नफरत न करें ,लड़ाई झगड़े से दूर रहें ,सबसे प्यार करें,और समाजसेवा में भी समय दें ।

ईमानदार और सच्ची शोभना जी का आभार ,साथ ही शीतल और पूजा के भी आभारी हैं,हम ग्रुप के सदस्य।

पूरा इंटरव्यू यहाँ सुन सकते हैं -

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Monday, December 4, 2017

यात्रा में क्षणिकाएं

1-

थक चुकी हूँ अब ...
फिर भी मुस्कुराती हूँ,
कि तुम सदा  मुस्कुराओ!
मौन होकर भी
बहुत कुछ कहती हूँ
कि बस! तुम समझ जाओ!
सुनाई नहीं देती
अब कोई भी आहट
किसी हादसे की,कि
चाहे किसी भी धुन में गाओ!
सफर पर हूँ,अकेली,निडर
और अनजान डगर में
एक आस लिए कि
मंजिल पर लेने तुम आओ!
-अर्चना

2-

उम्मीद नहीं थी कि
आँसू बरसकर
कागज पर उकेरे
अक्षरों को बादल में बदल देंगे
अचरज से आँखे फटी रह गई
जब अचानक से अनहोनी घटी!
-अर्चना

3-

कविताएं जन्म लेती है
भावनाओ से
भावनाएं बहती है
मौन के चिंतन से
चिंतन शुरू होता है
एकांत के मिलने से
और एकांत जाने कब
किस कोने में दुबका मिल जाये
नहीं जानता कोई
और अप्रत्याशित रूप से
जन्म ले लेती है
काव्यमय कविता ...👌
-अर्चना

Friday, November 3, 2017

कुछ है,कुछ नहीं

जिंदगी से सवाल कुछ किये, कुछ नहीं
सवालों के जबाब कुछ मिले, कुछ नहीं

मैंने तुमसे कुछ कहा, कुछ नहीं
तुमने मुझे कुछ समझा, कुछ नहीं

दिल का दिल से रिश्ता कुछ है, कुछ नहीं
तुम्हारा मुझसे वास्ता कुछ है, कुछ नहीं

-