Friday, March 20, 2020

आओ लड़े "कोरोना" से

हम खिलाड़ी हारते हुए साथी का हौसला /मनोबल बढ़ाने के लिए ताली बजाते हैं,शोर मचाते हैं और हारता साथी हमारी ओर न देख खेलपर ध्यान रख अपने कानों में पड़ते शोर से अंतिम उम्मीद पा अंतिम साँस तक जीतने की कोशिश में हमारी ऊर्जा भी पा जाता है और सफल होता है ।
आज हर कोई खिलाड़ी के रूप में खड़ा है जीवन की इस दौड़ में ....तो मिलकर एक साथ एक समय पर भरें हौसला उन सब साथियों में , मदद को दौड़ें या दूर खड़े रह मददगारों के लिए बजाएं ताली या पीटें थाली पर बने रहें खिलाड़ी इस जीवन की दौड़ के ...

मैं मोदी नहीं ,न ही प्रधानमंत्री....
पर हूँ आपकी साथी, 
अपने बच्चों की माँ 
नाती,पोती की नानी-दादी
किसी की बहन
किसी की बेटी
नहीं चाहती उम्र और जीवन के
इस दौर में अकेली पड़ी रहूं
बिस्तर पर लेटी
दूर हो जाऊं अपनों से या
अपने बच्चों के सपनो से
सुन लेना तुम मेरी बात
एक दिन इस पड़े रहने के अनुभव को जीकर
देना अपने साथियों का साथ
रुक गए तो चलेगा फिर जीवन
अपने परिवार में भर पाओगे उमंग
शायद नहीं कर पायेगा "कोरोना" इतना तंग....
मिलकर बैठो बजाओ ताली
करो प्रार्थना पीटो थाली
शोधार्थियों का मनोबल बढ़ाओ
संक्रमण से लड़ने तैयार हो जाओ.....
-अर्चना

Sunday, February 2, 2020

लोरी


सोई सोई करती मेरी रानी बेटी
नाम उसका यज्ञा, नाम उसका यशी...

लम्बी -सी एक ,जब आई उबासी
साथ ही वो लाई पलकों की दासी

आँखों में आई हल्के-हल्के झपकी
दादी गोद ले देने लगी उसे थपकी

ठंडी हवा का मीठा सा झोंका जो आया
काँधे पर बिटिया ने सर को टिकाया

ठहर गया उस पल को जग सारा 
जब बिटिया ने किया बंद हुंकारा ....

सोई सोई करती मेरी रानी बेटी
नाम उसका यज्ञा, नाम उसका यशी...
-अर्चना (दादी)

Saturday, January 25, 2020

स्नेहल लक्ष्मी


लक्ष्मी क्या हुआ?चार दिन छुट्टी कर ली? कितनी परेशानी होती है ,देखो घर कितना गंदा हो गया है!फोन भी नहीं उठाती कितनी बार किया....
एक ही सांस में बोली चली जा रही थी स्नेहा...
लक्ष्मी पूरे धैर्य से सुनने के बाद धीरे से बोली-दीदी तबियत ठीक नहीं थी...
अरे!क्या हुआ फिर से? 
दीदी पीरियड नहीं आया था 2 महीने हो गए ,डॉक्टर को दिखाया उसने गोली दी ...बाद में जांच करवाई तो 2 महीने चढ़ गए थे ..
अरे!!तुम्हारी तो बेटियाँ कितनी बड़ी हैं।
जी वही तो...आदमी कहता है रख लेते हैं,लेकिन दीदी दो को पालना कठिन हो रहा है 6 घर काम करती हूँ..अब नहीं कर सकती।
हाँ ठीक है उसे लगता होगा लड़का हो जाये अगर...
हाँ दीदी लगने से क्या,खिलाना पढ़ाना कहाँ से करेंगे ,थोड़ा गुस्सा हुआ पर मैंने तो दवाई खा ली ....
अरे तो फिर रेस्ट कर लेती,जितना काम हो उतना ही करना ...
दीदी घर भी कितना बैठूँ ....मन नहीं लगता ....
लक्ष्मी सचमुच लक्ष्मी नाम सार्थक कर रही हो
दीदी आप भी तो स्नेहा हो .
...और दोनों हँस पड़ी .....

-अर्चना

Friday, December 13, 2019

अदरक ,तुलसी वाली चाय

बहुत दिनों बाद भोर में 
इस प्रहर नींद खुली 
कारण सिर्फ इतना कि-
दिसंबर कि सर्द-सर्द 
मीठी सी रात का आखरी प्रहर ...
लिहाफ भी ठंडा 
सर्द और कुडकुडा हो चुका है 
प्रेम कविता ऐसे ही प्रहर जन्म लेती है 
सूरज का इंतज़ार-
कुहासे  की चादर में 
पंछियों का कलरव 
ओस के बगीचे में
देखने का मन ,
सुनने का मन -
रोशनदान से कि
चाँद -चांदनी में 
जाने क्या गपशप हुई
और ...
एक अदद चाय कि दरकार ....
बेड-टी ...
....
बालकनी कि दूसरी कुर्सी 
झूल कर- कर रही है आवाज 
कि जैसे कोई उठकर गया है अभी ....
पलकें खोलूं या न खोलूं 
सच है या सपना
सपना हो -तो सच हो...
सच होता है - 
भोर का सपना ...
ठण्ड बढ़ी है...
एक और कड़क चाय कि दरकार है ..
अदरक वाली ...

Monday, November 4, 2019

वो छोटा लड़का

मुझे उसका नाम याद नहीं आ रहा पर उसकी याद बहुत आ रही है ........जब शादी होकर गई तो वो दौड़कर घर की चाबी लेकर आया था कोई 14-15 साल का लड़का था ..

.लालमाटिया कोयला केम्प में चार बजे पत्थर कोयले की सिगड़ी जलने रखता और आधे घंटे बाद लाईन से एक-एक के घर में पहुंचाता ......

एक ही सिगड़ी पर 5-6घर का शाम का खाना बारी बारी सब बना लेते .....सभी वर्ग के घर थे .....साहब-मजदूर..... अमीर-गरीब,          शाकाहारी -मांसाहारी .......

हाँ लेकिन पहले शाकाहारियों के घर सिगड़ी जाती,फिर मांसाहारियों के घर......

और इसके बदले वो किसी एक घर में खाना खाता............

मुझे पत्थर कोयला जलाना नहीं आता सुनकर बहुत हँसा था......

अनवरत कहानी का एक टुकड़ा ....

Wednesday, October 30, 2019

सुबह 6 बजे की चाय

सुबह ....जब घड़ी पर नज़र पड़ी 6 बज रहे थे .....


5 बजे निकल जाते थे घूमने कांके डेम के किनारे-किनारे ...बेटा छोटा था तो जाने का मन होते हुए भी न जा सकती थी या फिर ऐसे कहूँ कि बेटा सुबह उठ जाता तो आपकी नींद खुल जाती दुबारा सोना मुश्किल होता तो आप घूमने निकल जाते ....कांके डेम के किनारे-किनारे ...
कभी-कभी तो वो जागते रहता कभी फिर सो जाता और मैं भी सो जाती फिर कई बार आपकी वापसी की कॉलबेल से आँख खुलती और आपके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती .....तब मैं चाय बनाती ,हम साथ चाय पीते 6 बजे ...
बाद में मैंने भी जल्दी उठना सीख  लिया हम साथ दोनों बच्चों को लेकर घूमते फिर आकर चाय साथ पीते....कभी कभी नहीं जाती तो आपके लौटने तक चाय तैयार मिलती साथ -साथ  पीते ... हमेशा दिनभर के काम की प्लानिंग वहीं होती ...
......
आपके हॉस्पिटल इन रहते सुबह की चाय 6 बजे बाहर गुमटी पर पी लेती क्यों कि फिर गुमटी वाले का दूध खत्म हो जाता वो लौट जाता ...दिन भर आईं सी यू के बाहर बैठकर आने जाने वालों को ताकते रहते ....रिसेप्शनिस्ट चाय पूछती पर बाद में पीने का मन ही नहीं रहता 2 महीने ऐसे ही बीत गए थे .....

अब हम घर में थे पर चाय भी समय पर बनती पर साथ पी नहीं सकते थे , आपको चम्मच चम्मच देने के बाद मैं पीती......
समय कहाँ और कैसे उड़ा पता नहीं ....
चाय उसी समय बनती रही....स्कूल बस पकड़ने और बच्चों को तैयार करने की भागमभाग में कई बार चाय ज्यादा गरम ज्यादा ठंडी होती...कभी गटकते कभी छोड़ते पीती.....
...
अब भी सुबह तलब लगती है ......उठने पर ....
कुछ आदतें चाहने पर भी डेरा नहीं छोड़ती ....
सोचती हूँ अब चाय ही छोड़ दूँ....लेकिन समय को कौन रोक सकता है .....सुबह के 6 तो बजेंगे ही...चिड़ियाएं चहकेंगी ही ...और सूरज उजाला लाते रहेगा ....दिनभर की कोई प्लानिंग भी नहीं करनी अब तो ....
आराम आराम से कट रही जिंदगी....दिन गिनते हुए ....
"वो सुबह कभी न आएगी"....
"वो सुबह कभी तो आएगी".......
(अनवरत लिखी जा रही कहानी का एक पन्ना )