न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
Sunday, January 9, 2022
बचपन और बचपना
Tuesday, July 7, 2020
पिता की दृष्टि से दुनिया
Saturday, September 23, 2017
सुनो,समझो,करो!-एक संदेश बच्चों के लिए
जहाँ तक मैंने बालमन को समझा है,वो बड़ों को देखकर ज्यादा और जल्दी सीखता है,वही करने की कोशिश करता है,अगर अपने वाकये,कहानियां,किस्से बताएं जाएं तो वो खुद को उस जगह रखकर सोचने लगता है,उन्हें ये कहने के बदले- कि ऐसा मत करो ,वैसा मत करो ,अगर कहें कि करके देखना पड़ेगा,नुकसान होगा कि फायदा तो वे अपने तर्क से समझने की कोशिश करेंगे ,तब बस उनके सवालों की बारिश झेलना पड़ेगी हमें 😊👍
आजकल के माहौल को देखते हुए ....
मेरी एक कविता सभी बच्चों के लिए-
मिला कदम से कदम ,
समय की पुकार सुन।
निडर रहकर सामना करने,
हिम्मत की तलवार चुन।
छल-कपट को छोड़कर,
बुद्धि को बना हथियार ।
स्वाभिमान से हो विजयी,
चाहे लक्ष्य हो कितना दुश्वार।
-अर्चना
(चित्र में अनूप शुक्ल जी की पुस्तक के साथ "मायरा")
Friday, July 14, 2017
चुपचाप रहने के दिन
ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....
मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की
चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।
-अर्चना
Tuesday, July 11, 2017
मानसून
(काजल जी के nonsoon/मानसून लिखने पर ..चलती बस में लिखी थी 2014 में ...)---
माssssन सून....तेरी झड़ी में कई गुन
जल्दी से बरसने को तू अब मेरा शहर भी चुन....
काले-काले बादलों की एक सुन्दर चादर बुन
सूरज को तू ठंडा करके बना दे एक और मून...
सुनने को हम तरस रहे अब मेंढकी धुन
मंहगाई भी पोर-पोर से चूस रही है खून...
पसीने-पसीने बह गए सबके तेल -नून
आस है तेरे आने पे मिलेगी रोटी दो जून....
-अर्चना
हिमांशु कुमार पाण्डेय जी की कविता बादल तुम आना -
आज चलिए मेरे साथ हिमांशु कुमार पाण्डेय जी के ब्लॉग सच्चा शरणम् पर , सुनिए उनकी कविता -
बादल तुम आना -
Saturday, July 8, 2017
Thursday, April 20, 2017
अंगूठा
Thursday, November 10, 2016
अँधेरा और रोशनी
दीये देते हैं रोशनी जलाने के बाद
सुलगती है जिसके छोर पर बाती
पतंगा आकर मरता है लौ पर
जीवन का यही फ़लसफ़ा है यारा
मौत तो खुद ही अपने पास बुलाती!
जो खुद डरता है डगमगाती लौ से
और नींद से उठकर तो जरा देख
जीवन ही जीवन है सुनहरी पौ से !
-अर्चना
Friday, October 7, 2016
बस तुमसे ही है
Tuesday, October 4, 2016
Thursday, September 8, 2016
फर्क
तभी ये बनी थी -
सपने में देखा एक राजकुमार
मूँछें थी काली और घोड़े पे सवार
आंखों ही आँखों में उससे हो गया प्यार
फ़िर पहनाया उसने मुझको फूलों का हार...
देखी है अपनी मूँछ
मुझे तो लगती है
ये घोड़े की पूँछ
कह भी मत बैठना
"यू आर सो कूल"
सपने में भी लाया फूल
तो चाटेगा यहाँ धूल ...
-अर्चना
Sunday, February 7, 2016
Saturday, May 30, 2015
अमृत घट और ईश्वर की बंदर बाँट
तहस -नहस
करना चाहता है
हर कहीं बस
बरबाद करना या
हे ईश्वर !
क्या ये तेरे ही बनाए इन्सान हैं,
जिन्होंने सति से
तेरा विछोह
और दक्ष से
तेरा विद्रोह और
नग्न द्रौपदी को
ही याद रखा...
कहाँ गया
इनका धैर्य?
.....राम की
क्यूँ याद नहीं इनको?
या फिर देवकी के धैर्य से
क्यूँ नहीं कुछ सीखा?
...या
फिर रचने वाला है तू
कोई नई लीला ....
लेने वाला है कोई अवतार
करने को संहार
लिखवाने वाला है
कलयुग पुराण .....
अगर हाँ
तो देर क्यूँ
इंसाफ की देवी को अमृत घट ...
-अर्चना (26/05/2015)
Friday, May 15, 2015
तप रहे सूरज से -एक विनती ..
Sunday, May 10, 2015
उड़ती चिड़िया और मैं
उड़ती चिड़िया को ओझल होते देखा...
पलक झपकने का मौका नहीं देती
और जा पहुँचती है शून्य में
शून्य छोड़कर
....
उदास मन लेकर
अनंत में ताकती रह गई मैं ....
एक आस लिए कि ..
वापस लौटेगी
और वो
वापस लौटी
फुदकते हुए
चहकते हुए
जैसे
ले आई हो
अनंत से ऊर्जा
समेट कर
मेरे लिए ....
मन कहता है उससे
साथ ले चलना मुझे
भी एक दिन ..
हंसती है वो
कहती है -
वापस न आ पाओगी
और अबकी
मैं हँस पड़ती हूँ......
कहती हूँ-
तैयार हूँ...
जबाब मिला
जब मेरा मन होगा!!!!
...
और फुर्र....
-अर्चना
Tuesday, April 28, 2015
नन्हे-नन्हे मोती यूँ न खो
Thursday, January 15, 2015
उत्तरायण
उत्तरायण...
आज की सुबह जल्दी हो गई....
संक्रांति का असर है शायद......
ऐसा ही रहा तो दान-पुण्य भी हो लेंगे......
करने का क्या है?
होना तो तय है......
बस! देखना है सूर्य जो उगने वाला है
कितना तपेगा और तपायेगा.....
धरा, जो जागने वाली है
कितनी जागृत रह पाएगी
जीव-जन्तु
पंछी,जो जाग कर हमें जगाएंगे
कितना गान कर पाएंगे
कब दाने की तलाश में निकलेंगे
कब लौटेंगे
रंभाएंगी गाएं
और सूर्यास्त होगा...
मेरा......
सबको शुभ हो
आज की सुबह
पहला दान
हुआ मेरा
...
सुप्रभात....
Monday, September 15, 2014
सुप्रभात
नन्ही सी चिरैया भी
ओस का बोझ
और कीचड़ से सने अपने पैर
कहीं-कहीं बादल
सूरज के डर से
अपनी- अपनी रोटी तलाशने को
फ़िर भी मजदूरों को जगा आया सूरज
सपनों की दुनिया से
Tuesday, July 8, 2014
पहली बारिश
अब लिखेंगे खूब बरस कर
हम बारिश पर कविताएँ
कहीं भरेंगे नाले,पोखर,
और कहीं पर सरिताएँ...
कहीं करेंगे मेंढक टर्र -टर्र
कहीं बजेगा झिंगुरी गान
बूंदों की टिप-टिप के संग में
पकौड़े होंगे ख़ास पकवान...
हल्की -हल्की बौछारों से
जब भीगेगा आँचल -तन
चुपके-चुपके भीग जाएगा
नयनों की बारिश में मन ...
झुके-झुके से पेड़ लटक कर
नन्हीं बूंदों को सहलाते हैं
उनको देख-देखकर मुझको
मेरे साजन याद आते हैं .....
ओ बरखा!तुम रोज़ ही आना
ले जाने को मेरा संदेसा
साजन को गीली पतिया से
शायद पीड़ा का हो अंदेसा !!!......
-अर्चना







