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Sunday, January 9, 2022

बचपन और बचपना

हम फिर से बच्चे बन जाएं
आंगन में खेलें गिल्ली -डंडा,
गोल गोल कांच की गोटियां
छुप जाएं कपास की थप्पी में,
खींच कर भागे एक दूसरे की चोटियां
जब खूब थक जाएं तो
बांट कर खा लें आधी आधी रोटियां...

ऐ दोस्त 
दो मिनट के लिए ही सही
पर जरूर मेरे घर आना 
और हां
अपना बचपन साथ लाना...
अर्चना

Tuesday, July 7, 2020

पिता की दृष्टि से दुनिया

पिछले दिनों हमारे ग्रुप "गाओ गुनगुनाओ शौक से"जो कि शौकिया गाने के लिए बनाया था ,पर पूजा अनिल ने एक टास्क में विषय दिया था ,जिस पर मैंने कोशिश की वो कहने की जैसा कि पिता ने जीवन में हर समस्या को जिस तरह सुलझाया ...

पिता की दृष्टि से दुनिया-

कठोर पर भुरभुरी
टिकी जिस पर धुरी
गीली पर बस नम
दलदल, पर बस भरम

भिन्न भिन्न फुलवारी
जैसे रंगों भरी क्यारी
कड़क और गरम
पर मखमल सी नरम

निर्भीक,निडर ,दुस्साहसी
पर कोमल,नाजुक और कसी
दबी हुई मुस्कुराहट और खिलखिलाहट चरम
पर साथ हीआँखों में झुकी शरम

नन्ही सी जान
स्व की पहचान
मन में निर्मलता और ईमान
मेहनत ही पूजा, कर्म ही धरम

सुख जैसे प्याज की दो फाँक
और ज्वार ,बाजरे की रोटी
दुःख बहती नदिया का पानी 
और अपना करम..
-अर्चना

Saturday, September 23, 2017

सुनो,समझो,करो!-एक संदेश बच्चों के लिए

जहाँ तक मैंने बालमन को समझा है,वो बड़ों को देखकर ज्यादा और जल्दी सीखता है,वही करने की कोशिश करता है,अगर अपने वाकये,कहानियां,किस्से बताएं जाएं तो वो खुद को उस जगह रखकर सोचने लगता है,उन्हें  ये कहने के बदले- कि ऐसा मत करो ,वैसा मत करो ,अगर कहें कि करके देखना पड़ेगा,नुकसान होगा कि फायदा तो वे अपने तर्क से समझने की कोशिश करेंगे ,तब बस उनके सवालों की बारिश झेलना पड़ेगी हमें 😊👍
आजकल के माहौल को देखते हुए ....
मेरी एक कविता सभी बच्चों के लिए-

मिला कदम से कदम ,
समय की पुकार सुन।
निडर रहकर सामना करने,
हिम्मत की तलवार चुन।
छल-कपट को छोड़कर,
बुद्धि को बना हथियार ।
स्वाभिमान से हो विजयी,
चाहे लक्ष्य हो कितना दुश्वार।

-अर्चना
(चित्र में अनूप शुक्ल जी की पुस्तक के साथ "मायरा")

Friday, July 14, 2017

चुपचाप रहने के दिन

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा  बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की

चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।
-अर्चना

Tuesday, July 11, 2017

मानसून


(काजल जी के nonsoon/मानसून लिखने पर ..चलती बस में लिखी थी 2014 में ...)---

माssssन सून....तेरी झड़ी में कई गुन
जल्दी से बरसने को तू अब मेरा शहर भी चुन....

काले-काले बादलों की एक सुन्दर चादर बुन
सूरज को तू ठंडा करके बना दे एक और मून...

सुनने को हम तरस रहे अब मेंढकी धुन
मंहगाई भी पोर-पोर से चूस रही है खून...

पसीने-पसीने बह गए सबके तेल -नून
आस है तेरे आने पे मिलेगी रोटी दो जून....
-अर्चना

हिमांशु कुमार पाण्डेय जी की कविता बादल तुम आना -



आज चलिए मेरे साथ हिमांशु कुमार पाण्डेय जी के ब्लॉग सच्चा शरणम् पर , सुनिए उनकी कविता -

बादल तुम आना -


Thursday, April 20, 2017

अंगूठा




कभी अंदर 
कभी बाहर 
अंगूठा होता है- हस्ताक्षर 

कभी दर्पण 
कभी अर्पण 
अंगूठे में होता है- समर्पण 

अंगूठा होता है- एकलव्य 
कभी श्रव्य 
कभी द्रव्य 
कभी भव्य 


अंगूठे से बनता है - कोई विशेष 
तो कोई 
रहता है शेष। .. 

अंगूठा करता है-
किसान ,लेखक के कर्म 
समझता है -उनका मर्म 


अंगूठा होता है-
उँगलियों की जान 
हाथों की शान 
कभी अपमान 
कभी सम्मान 

और अब अंगूठा ही है -
आपकी 
मेरी,
सबकी पहचान !


-अर्चना 


Thursday, November 10, 2016

अँधेरा और रोशनी



दीये देते हैं रोशनी जलाने के बाद 
सुलगती है जिसके छोर पर बाती 
और फिर भी रह जाता है अंधकार 
उसके ही तले में रोशनी नहीं जाती! 

पतंगा आकर मरता है लौ पर
शायद लौ की चमक उसे है लुभाती 
जीवन का यही फ़लसफ़ा है यारा
मौत तो खुद ही अपने पास बुलाती!

क्या डरना ऐसे अंधेरे से 
जो खुद डरता है डगमगाती लौ से 
और नींद से उठकर तो जरा देख 
जीवन ही जीवन है सुनहरी पौ से !

-अर्चना

Friday, October 7, 2016

बस तुमसे ही है

अगर मैं दिखाई न दूँ , तो समझ लेना नहीं हूँ
वरना तो अपने होने से भला कौन इन्कार करता है ....
मेरा होना न होना एक सा ही है
हवा में महक तो बस तुमसे ही है...........
धूप में बन्द हो जाती है आँखे मेरी
और ये चाँद है कि आँख खोलने नहीं देता ......
चाँदनी को भी अब मतलब बस तुमसे ही है........
सुना है कोई सितारा चाँद के पास आया है
इन दिनों शाम से ही चमकता है,
और शायद ये चमक तुमसे ही है.....
अर्चना

Tuesday, October 4, 2016

बिना बिन्दी की रंगोली....

कविता-- 
सुखे मुंह मे शक्कर गोली,
पूरण-पोळी,या 
गटागट की गोली ...

कविता--एकाकी की हमजोली,
मन की होली,
बिना बिन्दी की रंगोली.... 


Thursday, September 8, 2016

फर्क

करीब दो साल पहले फेसबुक के एक ग्रुप में एक वीकेंड टास्क दिया गया था - चार शब्दों - सपने, मूँछ, घोड़ा,और फूल को शामिल करते हुए एक हास्य कविता लिखना था। ...
तभी ये बनी थी -


फर्क - हास्य कविता 
तब
सपने में देखा एक राजकुमार
मूँछें थी काली और घोड़े पे सवार
आंखों ही आँखों में उससे हो गया प्यार
फ़िर पहनाया उसने मुझको फूलों का हार...
और अब
अबे! ओ मूँछों वाले
देखी है अपनी मूँछ
मुझे तो लगती है
ये घोड़े की पूँछ
कह भी मत बैठना
"यू आर सो कूल"
सपने में भी लाया फूल
तो चाटेगा यहाँ धूल ...
-अर्चना

Sunday, February 7, 2016

तुम हो मुझ में- निशा कुलश्रेष्ठ






http://yourlisten.com/Archana/nisha-kulshreshth-kavita



Saturday, May 30, 2015

अमृत घट और ईश्वर की बंदर बाँट

हर कोई यहाँ बस ...

तहस -नहस 

करना चाहता है 
,हर कोई हर किसी से 

हर कहीं बस 
,बहस करना चाहता है,
 कहीं कोई किसी से
 बिछड़ा तो 

बरबाद करना या
 बरबाद होना जानता है,

हे ईश्वर !

क्या ये तेरे ही बनाए इन्सान हैं,

जिन्होंने  सति से 

तेरा विछोह

और दक्ष से 

तेरा विद्रोह और 

नग्न द्रौपदी को 

ही याद रखा...

कहाँ गया 

इनका धैर्य?

.....राम की

चौदह साला तपस्या 

क्यूँ याद नहीं इनको?

या फिर देवकी के धैर्य से 

क्यूँ नहीं कुछ सीखा?

...या 

फिर रचने वाला है तू

कोई नई लीला ....

लेने वाला है कोई अवतार 

करने को संहार
 अपनी ही दुष्ट संतानों का
 और देने वाला है फिर कोई सबक

लिखवाने वाला है
 फिर कोई 

कलयुग पुराण .....

अगर हाँ 

तो देर क्यूँ
 क्या अब
 दामिनी कि पुकार सुनाई नहीं दे रही
 या कि बिना सोचे दे चुका है 

इंसाफ की देवी को अमृत घट ...


-अर्चना (26/05/2015)

Friday, May 15, 2015

तप रहे सूरज से -एक विनती ..

आज सुबह ६ बजे से ही तप रहे सूरज से एक विनती ..

.
तप रही धरती बहुत 
ऐ! सूर्य क्यों इतना ताकते 
बादलों की खिड़कियों से 
थोडा छुप के क्यों न झांकते 
नन्हे पौधे कुम्हला रहे 
तुम्हारी किरणों के ताप में 
ओस की बुँदे बदल जाती 
सुबह ही भाप में 
इस धरा की ओर तुम 
देखो ज़रा सा प्यार से 
पंछियों को बख्श दो 
अपनी नज़रों के वार से 
चाँद से ही मांग लो 
थोड़ी शीतलता तुम उधार 
देखो फिर तुमसे भी 
हर कोई करेगा प्यार .......
.............................
.................................
.................................
.................................
कुछ ही समय बाद -

सूरज ने विनती सुन ली !
 पानी का हल्का छिड़काव करा दिया है,
 बादलों से कहकर 
और धरा ने भी सौंधी खुशबू से महका लिया है
 आँगन अपना ......
आखिर दिल से निकली विनती की 
अनदेखी नहीं की जा सकती .....
और प्रेम के बस में कौन नहीं ?
-अर्चना

Sunday, May 10, 2015

उड़ती चिड़िया और मैं

उड़ती चिड़िया को ओझल होते देखा...
पलक झपकने का मौका नहीं देती
और जा पहुँचती है शून्य में
शून्य छोड़कर
....
उदास मन लेकर
अनंत में ताकती रह गई मैं ....
एक आस लिए कि ..
वापस लौटेगी

और वो
वापस लौटी
फुदकते हुए
चहकते हुए
जैसे
ले आई हो
अनंत से ऊर्जा
समेट कर
मेरे  लिए ....

मन कहता है उससे
साथ ले चलना मुझे
भी एक दिन ..
हंसती है वो
कहती है -
वापस  न आ पाओगी
और अबकी
मैं हँस पड़ती हूँ......

कहती हूँ-
तैयार हूँ...
जबाब मिला
जब मेरा मन होगा!!!!
...
और फुर्र....
-अर्चना

Tuesday, April 28, 2015

नन्हे-नन्हे मोती यूँ न खो




हर हाल में हम सुखों को बाँटें,
करें दुखों का मिलकर दमन।
जीवन जिसने दिया है हमको,
उस विधाता को हमारा नमन।


सुखों का मौसम,दुखों का मौसम,
आए, आकर जाए।
हर एक के, मन के आँगन में,
सपनों को बिखराए।


सुख आते तो, खिलती पाँखें,
खुशी-खुशी सब मुस्काते।
चेहरे सबके खिले-खिले से,
मिलजुलकर सब हँसते-गाते।


दुख आते तो सब घबराते,
सही काम न एक, कर पाते।
गीली होती, सबकी आँखें,
डर कर सब रोते-चिल्लाते।


होना है जो, होकर रहता,
नहीं किसी के टाले टलता।
हिम्मत से जो दुख: से लड़ते
जीत उसी की,सभी ये कहते।


हर हाल में हम सुखों को बाँटें,
करें दुखों का मिलकर दमन।
जीवन जिसने दिया है हमको,
उस विधाता को हमारा नमन।
-अर्चना

Thursday, January 15, 2015

उत्तरायण

उत्तरायण...

आज की सुबह जल्दी हो गई....
संक्रांति का असर है शायद......
ऐसा ही रहा तो दान-पुण्य भी हो लेंगे......
करने का क्या है?
होना तो तय है......
बस! देखना है सूर्य जो उगने वाला है
कितना तपेगा और तपायेगा.....
धरा, जो जागने वाली है
कितनी जागृत रह पाएगी
जीव-जन्तु
पंछी,जो जाग कर हमें जगाएंगे
कितना गान कर पाएंगे
कब दाने की तलाश में निकलेंगे
कब लौटेंगे
रंभाएंगी गाएं
और सूर्यास्त होगा...
मेरा......
सबको शुभ हो
आज की सुबह
पहला दान
हुआ मेरा
...
सुप्रभात....

Monday, September 15, 2014

सुप्रभात







सितारों की दुनिया से
हमको लौटा लाया सूरज
अंधेरी सुनसान रात को
फ़िर भगा आया सूरज

देखो किरन कैसे 
जगमगाई है
नन्ही सी चिरैया भी 
चह्चहाई है
ओस का बोझ 
नन्ही दूब ढो नहीं पा रही
और कीचड़ से सने अपने पैर 
धो नहीं पा रही


कहीं-कहीं बादल 
अब भी कड़क रहे हैं
सूरज के डर से 
दूर ही बरस रहे हैं....
अपनी- अपनी रोटी तलाशने को
फ़िर भी मजदूरों को जगा आया सूरज
सपनों की दुनिया से 
हमको लौटा लाया सूरज !

Tuesday, July 8, 2014

पहली बारिश

अब लिखेंगे खूब बरस कर
हम बारिश पर कविताएँ
कहीं भरेंगे नाले,पोखर,
और कहीं पर सरिताएँ...

कहीं करेंगे मेंढक टर्र -टर्र
कहीं बजेगा झिंगुरी गान
बूंदों की टिप-टिप के संग में
पकौड़े होंगे ख़ास पकवान...

हल्की -हल्की बौछारों से
जब भीगेगा आँचल -तन
चुपके-चुपके भीग जाएगा
नयनों की बारिश में मन ...

झुके-झुके से पेड़ लटक कर
नन्हीं बूंदों को सहलाते हैं
उनको देख-देखकर मुझको
मेरे साजन याद आते हैं .....

ओ बरखा!तुम रोज़ ही आना
ले जाने को मेरा संदेसा
साजन को गीली पतिया से
शायद पीड़ा का हो अंदेसा !!!......

-अर्चना