Saturday, December 31, 2011

लेखा-जोखा ..मेरे किये का...

जब मुड़ के देखा .....ये मिला ..........लेखा-जोखा मेरे किये का ......
......जिसमें शामिल है मेरे साथ मेरा परिवार ......



...क्या किया मैनें?...........अच्छा -बुरा सब यहीं है...
.....ये मेरे साथ जायेगा ....या यहीं रहेगा....पता नहीं ...
......पर अब जो करना है .....इससे सीख लेकर करना है ....
.......कब तक ?...नहीं पता ....तो............अभी तो कर लूँ ..:-)
 
......सभी को नये साल की बधाई व शुभकामनाएं मेरी और मेरे परिवार की ओर से ---

जनवरी       --- http://archanachaoji.blogspot.com/2011_01_01_archive.html
 फ़रवरी        --- http://archanachaoji.blogspot.com/2011_02_01_archive.html
 मार्च           ---  http://archanachaoji.blogspot.com/2011_03_01_archive.html
 अप्रेल          --- http://archanachaoji.blogspot.com/2011_04_01_archive.html
मई             ---  http://archanachaoji.blogspot.com/2011_05_01_archive.html
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अक्टूबर     ---   http://archanachaoji.blogspot.com/2011_10_01_archive.html
नवम्बर     ---   http://archanachaoji.blogspot.com/2011_11_01_archive.html
दिसम्बर    ---   http://archanachaoji.blogspot.com/2011_12_01_archive.html

Tuesday, December 27, 2011

आओ जश्न का माहौल बनाएं


आओ कि  जश्न  का माहौल बनाएं ...
झूमें ,नाचें ,खुशियाँ मनाएं..

तो ......करिये उलटी गिनती शुरू.......देखिये एक विडियो कपिल श्रीवास्तव के सौंजन्य से ....
अच्छा न लगे तो बताईयेगा ....




Tuesday, December 20, 2011

खुद से मुलाकात..

कल मैं खुद ही खुद से मिली,
खुद को समझाया,
खुद को ही डाँटा,
खुद ही परेशान रही.
खुद से बातें की,
पर खुद को न बदल पाई,
कितनी मुश्किल है खुद से मुलाकात,
ये कल ही मैं जान पाई,
बहुत अच्छा लगा खुद से मिलकर,
लगा खुदा से मिल आई हूँ,
और अब मैं खुद ही खुद बने रहना चाहती हूँ ,
हे ईश्वर बस!..मुझे खुद ही बनकर जीने देना,
मैं खुद को नहीं बदल पाउँगी,
जब -जब मन करेगा तुझसे मिलने का
मैं खुद ही खुद में चली आउँगी......
तू मुझसे यूँ ही मिलते  रहना,
तभी खुद की तरह जीने के लिये..
तेरी बनाई दुनियाँ को मैं समझ पाउँगी...








Monday, December 19, 2011

मेरे दो अनमोल रतन ..

अरे कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला ......
 
देखो तो जरा ----वही हैं ये ..... 

Sunday, December 18, 2011

मौन का खाली घर देखा है ???

और जब सपने टूट जाते थे ,
और जरूरते रोती थी ,
तब सरकार सपनों की गिनती कर,
जरूरतों के हिसाब से कागज पर,
आंकडे भरती थी.......... मौन थी मै ओम जी की ये कविता पढकर........



 कई दिनों से लिखा नहीं क्यों ??आप भी मिस क़र रहें होंगे मेरी तरह...
 अब मौन न रहो...----ओम आर्य ...

 

Friday, December 16, 2011

प्रीत ....

तुम छलना नही छोड़ सकते
तो क्यों मैं छोड़ दूँ अपनी प्रीत  ....

तुम चाहे जग को जीत लो..
पर मैं जाउंगी तुमको जीत...

Tuesday, December 13, 2011

तू कितनी अच्छी है ...

माँ की सीख ---



आज कल माँ का साथ नसीब हो रहा है, अपने अनुभव से कुछ बाते बताती हैं वे --


---खुद कभी ऐसा कोई काम न करें जिससे किसी का भी दिल आहत हो ,या उसे अपनी बात बुरी लगे।


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय .....

--- इसलिये कभी भी किसी की बुराई मत करो या किसी की बुरी बातों का जिक्र मत करो।


साँई इतना दिजीए ,जामें कुटंब समाय ,
मैं भी भूखा ना रहूँ, पंथी न भूखा जाय ॥

--- इसलिये बहुत ज्यादा की चाह नहीं होनी चाहिये और हमेशा अपनी चादर के अन्दर ही अपने पैर रखना चाहिये ।

और भी बहुत ....


Saturday, December 10, 2011

अनलिखी ईबारत

ये कविता यूँ ही नहीं बनी ..... समीर लाल जी कि पोस्ट "जिंदा कविता" को पढ़ कर किसी अपने की कही बहुत सी बातें याद आ गई .....बहुत कुछ  याद आ गया ... लगा कोई मुझसे कह चुका है पहले ये सब....और अब मेरी बारी है कहने की ..तो "जिंदा कविता" पढ़कर अहसास हुआ अपने जिंदा होने का और  लिखी गई ये कविता ----


अपने जिंदा होने का अहसास कराती एक "जिंदा कविता"...
जिसकी खुशबू से महक उठता है एक मुरझाया गुलाब !
जिंदा कविता
जिसमें ईबारत नहीं होती... बस धड़कते हैं जज़बात,रंगीन खुशनुमा एहसास
देख लिया होगा कहीं छुपकर तुमने मुझे पढ़ते हुए ...
..................
तुम्हारे यहाँ न होने पर भी आती आहट तुम्हारे होने की,
सुन पाती हूँ वो धड़कन...
जानती हूँ अभी छुप गये होंगे कहीं...
और जो पलट कर न देखूंगी तो
बन्द कर दोगे आँखें मेरी पीछे से आकर
जब छुओगे नम पलकें मेरी तो खींच लोगे मुझे अपनी ओर..
और फ़िर शुरू होगा मौन
(अनकहा) वार्तालाप
कभी न खतम होने के लिए...
सिर्फ़ अहसास होंगे तुम्हारे और मेरे बीच
बिखेरते अपनी भीनी-भीनी खुशबू...
जिनसे महक उठता है एक मुरझाया गुलाब ..
 

और छा जायेगी फ़िर एक चुप्पी
 ..............

न कोई शिकवा न शिकायत...
और फ़िर वही दूरी.....
कुछ मेरी मजबूरी
और कुछ तुम्हारी मजबूरी ..










Wednesday, December 7, 2011

जीवन अकथ कहानी रे !!!

 आज एक कविता पद्म सिंह जी के ब्लॉग "ढिबरी" से ...

बिधना बड़ी सयानी रे
जीवन अकथ कहानी रे


तृषा भटकती पर्वत पर्वत
समुंद समाया पानी रे

दिन निकला दोपहर चढी
फिर आयी शाम सुहानी रे
चौखट पर बैठा मैदेखूं
दुनिया आनी जानी रे

रूप नगर की गलियां छाने
यौवन की नादानी रे
अपना अंतस कभी न झांके
मरुथल ढूंढें पानी रे

जो डूबा वो पार हुआ
डूबा जो रहा किनारे पे
प्रीत प्यार की दुनिया की
ये कैसी अजब कहानी रे

मै सुख चाहूँ तुमसे प्रीतम
तुम सुख मुझसे
दोनों रीते दोनों प्यासे
आशा बड़ी दीवानी रे



तुम बदले संबोधन बदले
बदले रूप जवानी रे
मन में लेकिन प्यास वाही
नयनों में निर्झर पानी रे
..


इसे सुनना चाहें तो सुन सकते हैं यहाँ


Wednesday, November 30, 2011

मुझसे नहीं होगा....


सुबह उठते ही उंगलियों कि किट-किट..शुरू होती है तो देर रात तक चलती है..
अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता.....मेरा यहाँ से निकल जाना ही बेहतर है .....
सोच रही हूँ अभी............

देखूँ कितनी देर तक सोच पाती हूँ......................:-) :-)..

जाऊँगी नहीं पर .......ये तय है..............
हार नहीं मानने वाली मैं.....ऐसे ही ............... :-) :-)
 
रोज ही ऐसा सोच लेती हूँ........

Saturday, November 26, 2011

फ़ल और परिवार ...

आज कहीं पढ़ी एक बात याद आ रही है ...फ़लों को लेकर उदाहरण था, तुलना की गई थी परिवार की फ़लों की बनावट के साथ...ठीक से तो याद नहीं शायद पर कुछ नोट कर लिया था वही लिख रही हूँ ..
(शायद आपमें से कई लोगों ने भी पढ़ा हो, जिसे पता हो वे कॄपया "ओरिजनल" की जानकारी देवें)


पारिवारिक संगठन
सेवफ़ल -- एक सुगठित फ़ल, अन्दर की बात बाहर आ जाये तो बदरंग ....

मौसम्बी -- एक विभाजित फ़ल, पर आपसी जुड़ाव बहुत ..

संतरा -- एक विभाजित फ़ल, पर ढीला ..

अंगूर -- सब अलग , कोई फ़र्क नहीं दिखने और स्वाद में एक से..

जामुन -- अलग -अलग पर रंग ऐसा जैसे जलते हों एक-दूसरे से..

बेर -- अलग-अलग और दूर-दूर काँटों से घिरे ..एक को छूने जाओ तो दूसरा काँटा चुभता है ...

और अन्त में ....

सीताफ़ल -- बाहर से भी अलग ,अन्दर से भी अलग पर जुड़ाव -- एक को छेड़ने पर सब बिखरते हैं ..मानसिक और शारिरिक रूप से स्वस्थ..अन्दर से भी बाहर से भी ......

अब आप तय कीजिए .....किस तरह का हो पारिवारिक संगठन ...



Tuesday, November 15, 2011

स्नेह का रिश्ता..

अपनों से घिरे रहने की चाह ने मजबूर कर दिया था मुझे फ़ेसबुक पर अपना ग्रुप बनाने के लिए --स्कूल के पुराने बच्चों का एक ग्रुप बना लिया था मैनें..
एक दिन ऐसे ही चेक किया तो आठ-दस बच्चे ऑनलाईन थे,(आजकल जरूरत हो गई है ऑनलाईन रहना :-) )

मैनें सहज ही चेट बॉक्स में लिखा -"स्नेहाशीष"

तुरंत कई बच्चोंने रिप्लाय दिया---- किसी ने "नमस्ते",किसी ने "हेलो", तो कोई "हाय" पर भी आ गया था ।
अचानक मेसेज मिला अंकित का-- "चरण वंदना" , मुझे आप ज्यादा आशीष दें, क्योंकि जिस पर ज्यादा गुस्सा करते हैं उसी से ज्यादा प्यार भी करते हैं।
मैंने जबाब दिया-- मैनें सबको समान दिया है ,कोई भेदभाव नहीं।
बाकि बच्चों के भी उत्तर आने लगे --कोई कह रहा था मैं ज्यादा पुराना स्टूडेंट हूँ,इसलिए मुझे.....
कोई---आप मेरी टीचर नहीं "Mom" हो इसलिए मुझे .....वगैरह..वगैरह...

मैं सबको सिर्फ़ पढ़ रही थी ।
 अंकित का जबाब आया ---आपने दस साल पहले मुझे एक चाँटा मारा था,सारे दोस्तों के सामने ,वो आज भी याद है मुझे ..इसलिए मुझे ...

बहुत आश्चर्य हुआ मुझे इस बात का..मैं भी भूल नहीं पाई थी , न वो भूला था।
मैने कहा- अगर यहाँ लिख सको किस बात का तो....."नहींईईई ...बहुत गंदी बात थी वो.....नहीं लिख सकता ...
......और मुझे याद आ रहा था वो अंकित, जिसे उसके पापा और चाचा गाँव से शहर .बेहतर पढ़ाई की सुविधा के लिए होस्टल में लेकर आए थे,तब ५वीं-छठी में रहा होगा वो...

..होस्टल में आए आठ दिन हो चुके थे ,उसका मन नहीं लग रहा था, घर की याद सता रही थी, पेटदर्द का बहाना बनाया था उसने..और रो-रोकर बुरा हाल कर लिया था।
उसके पापा और चाचा को बुलाया गया था उससे मिलने,और उसने जिद्द पकड़ली कि वो यहाँ नहीं पढ़ेगा..किसान पिता समझाते रहे कि -"तुझे बड़ा आदमी बनना है",गाँव में कुछ नहीं है ,खेती में कुछ नहीं मिलेगा।..

एक ही बेटा था वो- तीन भाईयों के परिवार का...बहुत कड़ा मन करके दादा-दादी ने भेजा था उसे शहर ....

इसी बीच अंकित का  अगला मेसेज था ---

--" आप अब भी उसी स्कूल में काम कर रही हैं?? छोड़ दिजिए अब .....मैं कमाने लगा हूँ , मेरे साथ रहियेगा...."

Sunday, November 13, 2011

श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श.....साहब स्कूल जा रहे हैं......

                              













                                                           
























और स्कूल पहुँच कर .....चल पड़े काम पर ..

तो करो सब -- सलाम साब .......और दिजीए बाल-दिवस पर शुभकामनाएँ...




चाहें तो यहाँ भी घूम सकते हैं-- बाल मेले में .....
१- http://archanachaoji.blogspot.com/2010/02/blog-post_26.html 
   २-- http://archanachaoji.blogspot.com/2010/07/happy-birth-day-vaidehee-sumi.html
   ३--http://archanachaoji.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html

Saturday, November 12, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

"मेरी जीवन गाथा" भाग ४
...अचानक मेरी नजरें अपनी बहन पर से हटकर उस व्यक्ति पर टिक गई जो मेरी बहन के पीछे-पीछे ही,
उसी कमरे से बाहर आ रहा था ।वह बहुत लम्बा,सांवला और मेरी नजरों मे आकर्षक युवक था ।उसने सूट पहन रखा था और टाई भी लगा रखी थी। मैं अपने -आपको उस व्यक्ति के आकर्षक व्यक्तित्व को निहारने से नहीं रोक पाई,तभी अचानक मेरी बहन ने मुझे आस्तीन खींचकर झंझोड दिया, और मैं उसके पीछे कॉलेज केंटीन की ओर चल पडी ।
.............उसे हमारे पीछे केंटीन में आता देख पता नहीं क्यूं मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था, और जब मैं अपनी बहन के साथ लंच कर रही थी, तब सबकी नजरें बचाकर मैं उसे बार-बार देख रही थी । लंच के बाद मैं  जल्दी से एक सेंडविच हाथों मे पकड़कर बेग में लगभग ढूंसते हुए तेजी से केंटीन से बाहर निकली। मुझे पहले ही देर हो चुकी थी,जब मैं सिनेमा हॉल पहुंची--मेरे दोस्त फ़िल्म देखने जाने के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे, हम तेजी से अंदर गए और सब फ़टाफ़ट अपनी -अपनी सीट पर बैठ गए। इंटरवल होने पर जब मैं अपने दोस्तों के साथ पॉपकार्न लेने के लिए बाहर निकली, मैनें उसे फ़िर देखा, वो सेंडविच खा रहा था---इस समय वो सादे कपडों में था, आश्चर्य !!! मैं सोचने लगी उसे कपडे बदलने का समय कब मिल गया ??? मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी कि वो सिनेमा हॉल के भीतर था.........मुझे थोडा- बहुत अंदाजा लगा कि उसने मेरी और मेरी बहन की बातें सुन ली होंगी और जान गया होगा कि मैं अपने दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने जाने वाली हूँ , फ़िर ड्रेस चेंज करके अभी इंटरवल के पहले ही यहाँ पहूंचा होगा।मुझे आश्चर्य मिश्रीत खुशी हो रही थी, जब मैंने उसे अपनी ओर आते देखा-----
---नमस्ते
---नमस्ते
---अच्छी फ़िल्म है न ??
---हाँ ,कह सकते हैं,कुछ अनमने मन से मैंने जबाब दिया था।.........उसने मुझसे बातचीत का सिलसिला कुछ ऐसे शुरू किया--जैसे हम एक-दूसरे को बहुत समय से जानते हों।
---"रोशन"उसने हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम बताया ..........................मैनें उससे मुस्कराते हुए हाथ मिलाया...सोच रही थी कि इसे अपना नाम बताउं या नहीं ?
----"आपसे मिलकर अच्छा लगा "काव्या"" ...............
मैं सोच ही रही थी कि इसे मेरा नाम कैसे पता चला कि उसने आगे कहा---मैंने आपकी बहन को आपका नाम लेकर पुकारते हुए सुना था जब आप केंटीन से बाहर जा रही थी।
"ओह".........वह मुझसे बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहता था पर आसपास के सारे लोग सिनेमा हॉल में जाना शुरू हो गए थे क्यों कि इंटरवल खतम होने आया था ।.....क्रमश:.......

भाग - १
भाग - २
भाग - ३

Thursday, November 10, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

"मेरी जीवन गाथा" भाग ३
मेरे जीवन में सिर्फ़ इस एक अनुत्तरित प्रश्न के अलावा एक बात तो साफ़ हो चुकी थी ---सात सालों से चली आ रही मेरी शादी तोडने का मेरा निर्णय सही था। एक ऐसा निर्णय जो मैं ले पाई सिर्फ़ शान्तनु के सहयोग से ही ......

           मेरी जीवन-यात्रा शुरू होती है--मेरे जन्म से ,परन्तु मेरी वास्तविक जीवन -यात्रा शुरू होती है ---उस दिन से जब मैंने अपनी बहन के इंजिनियरिंग कॉलेज की सीढी पर अपना पहला कदम रखा था---मेरा स्वयं का प्रवेश-पत्र जमा करने के लिए, और तब से लेकर अब तक जो कुछ भी हुआ या होता रहा ----मैं किसी पर भी नियंत्रण नहीं रख पाई। ये सब कुछ ऐसा था -जैसा कि मैंने पहले बताया कि --"मैं हर दिन को अपने तरीके से जीने में विश्वास रखती हूँ, और इसीलिए मैं जीवन-धारा की लहरों मे उछलती -बहती रही --जब तक कि मैंने अपना किनारा न पा लिया। कुछ लोगों ने कहा भी-कि मैं गलत किनारे पर जा लगी हूँ, पर मुझे विश्वास है कि मेरे जीवन में अनेकों तुफ़ानों के थपेड़े खाकर भी अन्त में मैं सही किनारे पर पहुँच ही गई।

                  रोशन उस टीम का सदस्य था, जिसे रामाराव आदिक टेक्नॉलॉजी इंस्टिट्यूट ने अपनी कंपनी के लिए नये और टेलेंटेड कम्प्यूटर इंजिनियर तलाशने के लिए भेजा था । वो मेरी बहन का साक्षात्कार ले रहा था और मैं अपनी बहन के कमरे से बाहर आने का इंतजार कर रही थी, ताकि हम साथ में लन्च कर सकें। मेरे साथ चंद मिनटों के बाद ही क्या कुछ घटित होने वाला है, मुझे इसका तिनके भर भी अंदाजा नहीं था। मुझे जोरों की भूख लगी थी और देर होने से बडा गुस्सा आ रहा था, क्योंकि इसके बाद दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने जाना था। मै तो उसे छोडकर ही जाना चाहती थी, मगर मेरी बहन ने मुझसे रूकने के लिए विनती की थी, सो मुझे रूकना पड़ा था ।
         थोडे इंतजार के बाद वो कमरे से बाहर आई, उसके चेहरे के हाव-भाव ही मुझे बता रहे थे कि उसका साक्षात्कार अच्छा नहीं हुआ था ।....क्रमश:........
 पहला भाग पढे़ यहाँ--१
 दूसरा भाग पढ़े यहाँ--२

Monday, November 7, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

 "मेरी जीवन गाथा"..भाग २
...कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी व्याख्या नहीं की जा सकती .............इसलिए नहीं की वे अजीब होते हैं,बल्कि इसलिए कि वे सामान्य रिश्तों से ऊपर होते हैं --जिनको परिभाषित नहीं किया जा सकता। कुछ लोग इस तरह के रिश्तों को दोस्ती का नाम दे देते है लेकिन अधिकतर ऐसे रिश्तों को शक की निगहों से ही देखते हैं ।...मेरे-शान्तनु के साथ लगाव से बने रिश्त्ते को भी कोई नाम नहीं दिया जा सकता या उसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता ।...........एक बेनामी समबन्ध !............हम प्रेमी -प्रेमिका नहीं थे,  फ़िर भी हम सिर्फ़ दोस्त भी नहीं थे ।हम दोनों के बीच में कुछ खास था जो हम एक -दूसरे से बांटते थे ...................भौतिक दुनिया से परे ....कुछ अलग ,कुछ खास ...जिसे कोई भी अब तक समझ नहीं सका है ।
               आज जब मैं अपने अतीत की गहराईयों में झांकती हूँ,तो मेरे सामने एक प्रश्न खडा हो उठता है---मैं अपने आप से पूछती हूँ--- क्या मुझे शान्तनु से शादी कर लेनी चाहिए ?,क्या एक मौका दिया जा सकता था ?और उत्तर भी जैसे तैयार रहता था ----"नहीं" । जबकि मैं उसकी बेटी की माँ हूँ--फ़िर भी शान्तनु वो व्याक्ति नहीं है,जिसे मैं अपने जीवन साथी के रूप में देखाना चाहती हूँ। मैं उसके साथ हमबिस्तर होने की कल्पना भी नहीं कर सकती ।उसका मेरी जिन्दगी में होना एक सुखद घटना थी --इस बारे में कोई शक नहीं है मुझे।हम दोनोंने जीवन-यात्रा में ऐसे सहयात्री बनकर यात्रा की --जो साथ चलते-चलते मिले और फ़िर अन्त में अपनी-अपनी राह चले गए।
                     शान्तनु अपने स्वर्गीक पडाव पर पहले ही पहुँच गया ,यहां तक कि मुझे उससे प्यार करने का मौका भी नहीं मिला।मैं बहुत आश्चर्यचकित होती कि मुझे उससे प्यार हुआ होता,यदि वो जिवीत होता ।
                           मैं इस प्रश्न का उत्तर भी नहीं दे सकती  ---क्योंकि इस बारे में मुझे खुद निश्चित तौर पर पता नहीं था ।आखिरकार मैनें भी तो जीवन --जीते-जीते ही सब-कुछ जाना था ।एक चीज अच्छी तरह से समझ गई थी कि "जीवन की धारा अपनी मर्जी से ही बहती है उसके रास्ते और पडावों के बारे में कोई भी अन्दाजा नहीं लगा सकता" ।.....क्रमश:
पहला भाग पढ़े यहाँ --१

Sunday, November 6, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

जीवन में जाने क्या- क्या करना बाकी रहता है ...जो चाहते हैं वो तो होता नहीं, और न चाहते हुए भी बहुत कु्छ हो जाता है ।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है ....एक किताब (जिसके कवर पॄष्ठ का डिजा़ईन वत्सल ने बनाया है, अंग्रेजी में है) देखने के लिए हाथ में आई ...


कुछ नया करनें की धुन और वत्सल की जिद्द के कारण..उसका अनुवाद अपने शब्दों में करना शुरू किया .....पता नहीं अनुवाद हुआ या नहीं ....पर एक नया काम तो जरूर हो गया ....:-)


आज ट्रायल के तौर पर पहला भाग छाप रही हूँ यहाँ .....अच्छा लगा (और मन हुआ तो).....आगे भी मिल सकेगा पढ़ने को .....
इस पुस्तक को अंग्रेजी में लिखा है--ARTI HONRAO ने..जिनके बारे में आप यहाँ जान सकते हैं --
१--Lafz 




"मेरी जीवन गाथा"..भाग १

मै हर दिन को अपने तरीके से जीने मे विश्वास रखती थी,जब तक कि मेरे रास्ते में ऐसी परिस्थियां पैदा न हो गई जिनमें मुझे ऐसे कठोर निर्णय लेना पडे।...कुछ निर्णय अपनी जीवन धारा को अलग ही राह पर ले जाते हैं..मैने जो निर्णय लिया उसने भी मेरे जीवन को एक नई दिशा दी......हालांकि मेरे जीवन में भी आम लोगों की तरह उतार -चढाव आते रहे फ़िर भी कह सकती हूँ.......उतार ही उतार ज्यादा आए ....मैने अपने जीवन में स्थिरता बहुत समय बाद पाई ..........या मै कह सकती हूँ कि देर से ही सही पर मेरे जीवन में भी स्थिरता आई तो सही ..........
मै अपनी जीवन धारा को  तब स्थिर कर पाई..जब शांतनु मेरे जीवन में आया ......शांतनु मेरे जीवन में बरखा की उस पहली बूँद की तरह आया जो सालों से बंजड पडी,फ़टी धरती पर कई दिनों के इंतजार के बाद गिरी हो ,और उस धरती की सौंधी महक --जो मेरे अंतर में समाई और जिसने मुझे अपने जिंदा होने का अहसास कराया । ..जैसे किसी प्यासे के कानों ने झरने की आवाज सुनी हो या ....लम्बे समय तक मीलों चलने के बाद या.....सालों अंधेरे में चलने के बाद ..........किसी को उजाले की एक किरण दिखाई दी हो..........दूसरे शब्दों में मै कह सकती हूँ---कि शांतनु ने मुझमें जीवीत रहने की आशा का संचार किया ..........
..........शांतनु मेरे पति का दोस्त था, मैं यहाँ बताना चाहती हूँ ---कि था शब्द का प्रयोग मैंने इसलिए किया क्यों कि शांतनु ने जो कुछ भी मेरे पति के साथ किया था ,,उसके बाद मेरे पति ने उसे अपना दोस्त मानने से इंकार कर दिया था .....उन्हें गलत फ़हमी थी कि जो कुछ भी हुआ वो सब शांतनु ने ही किया था .मेरे पति के अनुसार शांतनु ही हमारी शादी के टूटने का कारण था ......फ़िर भी यदि कोई मुझे से पूछे--तो मै कहना चाहूँगी कि रोशन अपने बचाव के लिए ये कारण बताता है, जबकि वो स्वयं अपनी पत्नी को सुखी नही रख पाया और उसके मनोभावों को समझ ही नही पाया .......क्रमश:

Monday, October 31, 2011

बस धन्यवाद कहना है ....

पिछले दिनों जन्मदिन पर  इतनी बधाईयाँ और प्यार मिला जिसे भूला नहीं पाउंगी कभी..और ये सिलसिला अब तक नहीं रूका है ...

मेरे बच्चो, भाईयों और परिवार ने चकित कर दिया पूरे २४ घंटों तक ...
जैसा उधर पा रही थी वैसा ही इस ब्लॉग परिवार में भी  ..

 इस स्नेह की शुरूआत हुई थी गत दिनों मेरी रायपुर ट्रिप के साथ ....... 
(रायपुर ट्रिप पर लिखना बाकी है इन रिश्तों की अगली कड़ी में.).....

कहा था मैनें पहले भी कि--------- आभासी रिश्ते आभासी नहीं होते 

सब कुछ तो लिख नहीं पा रही अभी न  फोटो ही हैं मेरे पास..........

..फ़िर कभी सही पर क्या कहूँ आभार व्यक्त करने को शब्द नहीं हैं मेरे पास ...बहुत देर हो गई है ............पर बस धन्यवाद कहना है सबको....
और ये तरीका ही नज़र आ रहा है.........




Sunday, October 23, 2011

शुभ-दीपावली

दीपावली के पर्व पर आप सभी को बधाई व शुभकामनाएं....

















वैदेही-संदीप की बनाई रंगोली पर दीपक सजा रही है...


देवेन्द्र द्वारा लक्ष्मी पूजा ...

हमारा घर - खरगोन



और अब ये जिम्मेदारी मुझ पर...
 गुलाबजामुन तैयार...!!!...आईये आप भी...खाईये
 वत्सल भाई साहब ,बहनों के साथ (पल्लवी,प्रान्जली,निशी और सुहानी)


 और फ़िर आतिशबाज़ी का मजा सबके साथ ......फ़ुलझड़ी....
 नहीं.....फ़ुलझड़ियाँ..................
 मन्जू भाभी,माँ और बड़ी बुआ(ताई) भी...
-- बुआ के साथ उर्वशी भाभी....
 ..........................अनार ..............
............... चकरी.....................
 ...........अहा ! ! ! ...............



 और अन्त में एक ग्रुप फोटो...
(वत्सल फोटोग्राफ़र हो तो मिस नहीं करता) ........










 सभी फोटो २०१० की दीपावली के ...

Saturday, October 15, 2011

इश्क़ --- मौन की भाषा

आज एक ऐसी रचना जो गहरे तक असर कर गई पहली ही बार पढ़ने में ..शायद आप भी ऐसा ही महसूस करें

पंजाबी नहीं जानती तो उच्चारण गलत हो सकते हैं बल्कि हैं भी......... पर भाव भाषा के ऊपर सवार हों जाएं तो क्या किया जा सकता है ......और फ़िर कह्ते हैं न कि मौन की भी अपनी भाषा होती है ....



इसे ...यहाँ ...........और इस जैसी  कई रचनाएं पढ़ सकते हैं आप यहाँ --

Wednesday, October 12, 2011

याद न जाए....बीते दिनों की..


जब देखो तब मास्टरनी..मास्टरनी.....ऐसा मैनें क्या सीखा दिया? ..जरा बताना तो.!!...मैनें उसे डाँटते हुए कहा।

सॉरी ..मास्टरनी......फ़िर एक बार कह दिया उसने ....

सुनते ही अपने चेहरे की मुस्कुराहट को नहीं रोक पाई थी मैं...और वो नहीं देख पाया था ----मेरी आँखों को मुस्कुराते हुए---- जिसे मैं दिखाना चाहती थी.... मेरा (एक्स) बेस्ट फ़्रेंड...


जब देखो तब मास्टरनी..मास्टरनी.....ऐसा मैनें क्या सीखा दिया? ..जरा बताना तो.!!...मैनें उसे डाँटते हुए कहा।

सॉरी ..मास्टरनी......फ़िर एक बार कह दिया उसने ....

सुनते ही अपने चेहरे की मुस्कुराहट को नहीं रोक पाई थी मैं....और उसने देख लिया था मेरी आँखों की मुस्कुराहट के पीछे छुपे दर्द को---- जिसे मैं छुपाना चाहती थी.... मेरा बेस्ट फ़्रेंड....

लम्हे गुजरे....वक्त बीता.....आज हर कोई पुकारता है --मास्टरनी... मास्टरनी....हालांकि चेहेरे पर मुस्कुराहट तो आज भी आ जाती है पर पत्थर हो चुकी आँखों के पीछे छुपा दर्द कोई देख नहीं पाता...पानी बन बह जाता है

.....याद आता है बहुत .....मेरा बेस्ट फ़्रेंड .....


Sunday, October 9, 2011

आखिर क्यों?..

आखिर क्यों

क्यों....
आखिर क्यों ?........

सवाल इतने सारे 
कौन सा पूछूँ पहले  
इसी सोच में हूँ ....

क्यों होता है ऐसा?
क्यों नहीं होता वैसा?
क्यों करते हैं ऐसा?
क्यों नहीं करते वैसा?
ऐसा करने से क्या होगा?
वैसा कर लिया तो क्या हो जाएगा?
नहीं आ पाता है समझ कुछ?
क्या मिलेगा उसे ऐसा करने से?
मैं क्या करूँ?
क्यों करूँ?
....
ये वो सवाल हैं,
जो दिन भर मथते हैं मुझे,
और
अनायास ही ऊँगली चली जाती है

होंठों पर..

कह उठती हूँ मैं...
चुप!!!!!

आखिर क्यों?

--अर्चना

Wednesday, October 5, 2011

Tuesday, September 20, 2011

मन की उड़ान....


मन के उन कटे पंखों से
जिन्हें कतर दिया था मैने कभी
मैं उड़ना चाहती हूँ आज,
उँचे आकाश में,दूर तक 
जुड़ना चाहती हूँ,मेरे अपनों से 
इस धरा को छोड़... 
तुम साथ दो मेरा 
ठीक वैसे -जैसे
लटका दे कोई रत्नावली अपनी चुटिया

तुलसी के लिए
और खींच ले अपनी ओर 

ताकि मुक्त हो जाऊँ 
पृथ्वी के बंधन से
खुल जाये जकड़न 

मर्यादाओं की जंग लगी जंजीरों की

 न जाने क्यूँ??

आज मैं तुलसी हो जाना चाहती हूँ...!!!

Wednesday, September 14, 2011

यही है जिंदगी..


गम को पीना हमको भाया
अब यही हमारा काम
आओ मिलकर इसे बाँट लें
जीना इसी का नाम ..

Saturday, September 10, 2011

इंस्पीरेशन..यानि प्रेरणा...


मुझे ऐसा लगता है कि हम अपनी हर बात किसी से प्रेरित होकर ही कहते हैं,या तो वो कोई घटना होती है, या अनुभव ।
अब मुझे ही लीजिए- मैनें पिछली पोस्ट लिखी एक ब्लॉग पर आई टिप्पणी से प्रेरित होकर ..पर सिर्फ़ उस ब्लॉग के लिए नहीं --सबके लिए और जिस ब्लॉगपोस्ट से प्रेरणा मिली,वो कहीं और से प्रेरित होकर लिखी गई थी ।
यही नहीं मेरी बोरियत से प्रेरित होकर बेटे वत्सल ने अपना ब्लॉग मुझे दिखाया था ,और मेरा ब्लॉग बना दिया था ,मैने छोटी बहन रचना जो बहुत पहले से लिखती थी, से प्रेरित होकर चार -छ:लाईन लिखकर शुरुआत की लिखने की.. 

इस तरह सीखते-पढ़ते आज एक पोस्ट का  पॉडकास्ट बनाया है ..अब ये नया इसलिए है कि मैं आमतौर पर ऐसे पॉडकास्ट नहीं बनाती ....( नशे/वशे  या नेता/वेता के नाम वाले)......पर ये सामयिक लगा और फ़िर ...कहीं पढ़ी  एक लाईन - "देखी जाएगी" से प्रेरणा लेकर पोस्ट कर ही दिया है आज ....सुनिए दीपक बाबा की बकबक नामक ब्लॉग से एक पोस्ट ---

नशा बुरी बात .......नहीं तो सब कुछ उल्टा-पुल्टा .



Wednesday, September 7, 2011

अनोखा अनुभव

कल एक अनोखा अनुभव हुआ,(अब ब्लॉग की खबर हो तो अनोखी तो होगी ही),मुझे भूत चढ़ा है पॉडकास्ट बनाने और फ़िर उसे लोगों को सुनवाने का....इस सिलसिले में मुझे कई लोगों के ब्लॉग पर चक्कर लगाते रहना पड़ता है, क्योंकि ये भूत रोज़ कुछ नया और बढ़िया लिखा पसन्द करता है ...

अब होता ये है कि इस चक्कर में जहाँ पहुँचती हूँ वहाँ एक पोस्ट नहीं, सारी देखनी पड़ती है आगे-पीछे...क्योंकि जब पहुँच ही गए हों अच्छी जगह तो लगता है कि दो-चार दिनों का कोटा मिले तो ये भूत बैठे वरना फ़िर सिर चढ़कर नाचने लगेगा....(अब तो परिवार वाले भी तंग आ गए हैं इस भूत से ..पता नहीं किसी दिन मुझे मेरे भूत के साथ जंगल में ही छोड़ आएं)...

हाँ तो जब मैं ऐसे ही खोजते-खोजेते एक ब्लॉग पर पहूँची तो एक मजेदार पोस्ट मिली ...आगे -पीछे भी कुछ चल जाने जैसा ही था..(अब शक हो गया है )...   

फ़िर अपनी आदत से लाचार होकर उस पोस्ट पर एक संकेत छोड़ दिया - जिससे वो समझ सकें कि अब भूत कभी भी आ सकता है और मेरे लिये ये सम्मन भेजने जैसा हो जाता है- कि कम से कम बिना बताये तो नहीं लिया पोस्ट को ...


कई बार होता ये हैं कि मैं पहले पोस्ट खोजकर उसका पॉडकास्ट बना लेती हूँ फ़िर लोगों को सुनवाने से पहले उसके मालिक को सुनवा देती हूँ ताकि भूत भी खुश और पोस्ट का मालिक भी खुश (हाँ कहे तभी औरों को सुनवाती हूँ वरना आप तो जानते ही हैं कि ये ब्लॉगजगत है मेरी तो शामत ही आ जाये एक ओर से ये भूत दूसरी तरफ़ वो पोस्ट का मालिक )जीना मुश्किल (हराम नहीं)....



हाँ तो आगे --हुआ ये कि- पोस्ट तय करने के बाद जब रिकार्ड करने के लिए दुबारा वहाँ पहुँची तो चौंक गई ...एक अन्य सज्जन चुपके से उस पोस्ट मालिक को याद दिला गए थे कि ये पोस्ट उन्होंने कहीं और पढ़ी है ऐसा महसूस हो रहा है ...पोस्ट मालिक भी जल्दी से समझ गया था (चुपचाप)..ये जानकर मैं तो बाल-बाल बची कि ये पोस्ट का मालिक असली नहीं है वो तो कोई और हैं और तब पता चला कि भूत सिर्फ़ मेरे सिर पर ही नहीं चढ़ा है ऐसे और भी लोग हैं जिनके सिर पर इस भूत के परिवार वाले सवार है ...


अब मुझे इस भूत का ख्याल रखने में विशेष सावधानी रखनी होगी (पॉडकास्ट बनाने से पहले भी अनुमति लेना होगी) वर्ना मरने के बाद भी सिर चढ़कर बोलता रहेगा और मैं भूत और मालिक की लड़ाई में बेवजह पिसी जाउंगी और बेकार में ही पाप सिर चढ़ जाएगा..क्या पता अगले जन्म में उसका फ़ल मिलने लगे ...... 


अब खास बात ये कि अगर मुझे सही मालिक का पता न हो और गलती से नकली मालिक से अनुमति ले लूँ तो माफ़ी माँगकर पल्ला झाड़ सकती हूँ न ...

आपकी क्या राय है ???अच्छी पोस्ट जहाँ से पहले मिले वहाँ से चुन लूँ या नहीं ???


Monday, August 29, 2011

चल पड़े जिधर दो डग

चल पड़े जिधर दो डग
-प्रस्तुत है सोहनलाल द्विवेदी जी द्वारा रचित ’युगावतार गाँधी’ का एक अंश  


चल पड़े जिधर दो डग मग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दॄष्टि,
मुड़ गये कोटि दॄग उसी ओर,
जिसके सिर पर निज धरा हाथ,
उसके सिर रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया,
झुक गए उसी पर कोटि माथ,
हे कोटिचरण ! हे कोटिबाहु !
हे कोटिरूप ! हे कोटिनाम !
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि,
हे कोटिमूर्ति  तुमको प्रणाम,
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भॄकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की,
खींचते काल पर अमिट रेख,
तुम बोल उठे युग बोल उठा,
तुम मौन बने युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हें संचित करके,
युग-धर्म जगा,युग-धर्म तना,
युग परिवर्तक ! युग-संस्थापक !
युग संचालक ! हे युगाधार !
युग निर्माता ! युग-मूर्ति ! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार !
                              -सोहनलाल द्विवेदी  

Sunday, August 28, 2011

रोक सको तो रोक लो...

इन्तजार,इन्तजार है
उसमें जितना गुस्सा
उतना ही प्यार है..
रोक नहीं सकता
कोई किसी को
इन्तजार करने से
क्योंकि ये हर किसी का
अपने महबूब से
प्यार का इज़हार है ....



Wednesday, August 24, 2011

अब बस एक याद शेष....

  वाह क्या अदा है! ! ! ...

 कुछ कदम ही साथ चलने का मौका मिला ..पर हौसला और हिम्मत बहुत मिली --
 डा. अमर कुमार said...
धन्यवाद अर्चना जी, मुझे यह विचार इतना पसँद आया कि मन श्रद्धा से भर आया । इससे रोज दान देने की भावना बलवती ही होगी, और इसे एक मिशन के रूप में चलाया जा सकता है । हम दम्पत्ति ने कल 20 तारीख वृहस्पतिवार से ही इसे आरँभ करने का निर्णय लिया है । शुभम भ्रूयात January 19, 2011 12:49 AM
एक गज़ल पंकज सुबीर जी की बिना अनुमति के लगा रही हूँ ..
(कुछ ऐसा ही महसूस किया था तब भी) ---

Thursday, August 18, 2011

बिखरते सपने -टूटती आस



"एक दिन सुबह स्कूल जा रही थी, स्कूल के सामने ही प्रिंसीपल साहब नजर आ गये,रोज की तरह ही नमस्ते किया, तो वह पास आ गये. थोड़ा आश्चर्य तो हुआ मगर मैं रुक गई. उन्होंने कहा कि- क्या आप शाम को लौटते समय ५ मिनट के लिए स्कूल आ सकती है?... न करने का सवाल नहीं था तो मैं सहमति जताती हुई स्कूल के लिए निकल पड़ी. सारा दिन रह-रह क़र यह विचार आता रहा कि आखिर क्या जरुरत आ गई हैं प्रिंसपल साहब को जो उन्होंने मुझे बुलाया है|   ----------एक अंश - बिखरते सपने- टूटती आस से

पढ़िये "हिन्दी गौरव" पत्रिका (जू्न-जुलाई अंक)में प्रकाशित ये रचना--- पेज -47


Saturday, August 6, 2011

हमारा हवामहल -- "इंतजार" आभासी रिश्तों का सम्मिलित प्रयास

कई साल बीत गए जब सुना करती थी विविध भारती पर "हवामहल".....बस उसका संगीत ऐसा रचा-बसा कि अब तक याद है वो नाम ....
बस कुछ नया करने को मन किया और भा गई संजय अनेजा जी की कहानी "इंतजार".....
"साथी हाथ बढ़ाना " गीत की तर्ज पर  .......याद आये सलिल भैया और उन्होंने बदला कहानी को नाटक में ....(मुझे पता नहीं था कि वे ये काम कर सकते हैं मैनें तो बस ये बताया था कि कहानी रिकार्ड करनी है,और दूसरी आवाज भी चाहिए)...
अब करना था रिकार्ड तो दूसरी आवाज के लिए भी मना लिया भैया को .......(बहुत कुछ सीखना भी तो था) .....
काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी ...कभी मैं बिमार तो कभी भैया ....हाय-तौबा करके एक दिन तय कर ही लिया ..वॉईस चेट का इस्तेमाल करना था ..झूमा और भाभी को डिस्टर्ब किए बिना(टी.वी. दखने से) ....
बहुत आवाज आ रही थी सिरियल की ....बेचारे भैया ....लेपटोप लेकर कमरा बदलते रहे ...आखिर दोनों के सोने के बाद शुरूआत हुई.....रिकार्ड किया (एक ही बार मे).......ताम-झाम करके .....
हुआ तो ठीक अब संगीत की कमी खल रही थी .......ये काम सौंपा--पदमसिंग जी को ....वे माहिर हैं इसमें(शायद किसी को पता न हो )....और घर से घूम के आने पर किया वादा पूरा उन्होंने भी ....
इस तरह कई परेशानियों के बाद भी पूरा हुआ "हमारा -हवामहल" ......आभासी रिश्तों का एक और सम्मिलित प्रयास...
चाहा तो था कि इसी ब्लॉग पर पोस्ट करूं ....पर "हिन्दयुग्म" टीम की मेहनत को देखकर इसे वहाँ पोस्ट करना उचित समझा....(अनुराग शर्मा जी का सहयोग भी तो लेना था )
अभी तक किसी से मुलाकात तो नहीं हुई है पर..कार्य आपके सामने है .....
मै अपने  सभी सहयोगियों की आभारी हूँ (बहुत परेशान किया है सबको)......आशा है आप सबको हमारा ये सम्मिलित प्रयास पसन्द आयेगा ...सुनिये यहाँ -----
"हमारा -हवामहल" ..





Monday, August 1, 2011

इस बार "यूनिवर्सल मदर" गर्भनाल पत्रिका में ...जुलाई 2011 -अंक- 56 ,पेज -12

इसे यहाँ भी पढ़ सकते है ---(इसके साथ और भी)
गर्भनाल पत्रिका जुलाई अंक


युनिवर्सल मदर ... 
आज पूजा  बहुत उदास थी । "पूजा"मेरी हमउम्र सहेली एवं स्कूल में मेरी सहकर्मी। हम करीब -करीब सभी बातें एक दूसरे से बांटते हैं,और उम्र के इस पडाव पर आकर इतना अनुभव तो हो ही चुका है कि किसी को उदास या दुखी  देखकर उसके  चेहरे के हावभाव  और बोलचाल से पहचान लूँ कि कोई परेशानी है और बस चल पडती हूँ उसकी मदद करनेपर इस बार पूजा ने जो बताया उसने मुझे भी दुखी कर दिया. मैं सोचने को विवश हो गई कि आज बच्चों को हम स्कूल, परिवार और समाज में किस तरह विकसित कर रहे हैं? क्या यही देश के भावी कर्णधार है. आखिर ऐसी मानसिकता बच्चों में कहाँ से विकसित हो रही है और इसका असली जिम्मेदार कौन है?
मुलतः बच्चे तो वो कोमल पौधा हैं कि उन्हें जैसा विकसित करेंगे, वो वैसे ही बढ़ चलेंगे. तब उनके इस तरह के विकास का जिम्मेदार कौन है? कौन उनकी मनसिकता को रुग्ण किये दे रहा है?
खैर!!! मुझे यह सब सोचने के लिए विवश करने के पीछे और आज पूजा  के चेहरे पर छाई उदासी की असल वजह वो कहानी है, जो पूजा ने अपनी आपबीती मुझे सुनाई. 
पूजा बताने लगी - इस बार जब मैं मम्मी के यहाँ गई तो बेटा साथ नहीं था, अकेले जाना पडा था मुझे,रात भर का सफ़र था,थोडा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। बेटा बस पर छोड़्ने आया था तो सहयात्री से कह गया ----माँ अकेले जा रही है ---ख्याल रखना ।
......पूजा इतने सालों से स्कूल और घर दोनों ही जगह बच्चों के साथ काम कर रही है कि बस माँ के दायरे में ही बंध गई है, उसके सहकर्मी उसके मित्र बन गए हैं,किसी भी उम्र के हों , वो ये दो रिश्तों से कभी बाहर निकल नहीं पाई उसे अपने बारे में भी  कुछ सोचने का वक्त ही नहीं मिला या शायद उसने अपने आपको इसी दायरे में बन्द कर लिया था। फ़िर भी मै जानती हूँ कि वो इन दो रिश्तों में ही बहुत खुश है ।
हाँ तो उसने जो बताया --------साथ में जो सहयात्री मिला वो उसके बेटे की उम्र का एक बच्चा था ।चूंकि पूजा ने हमेशा ही माँ का किरदार ओढा तो हर बच्चा उसे अपना लगता है यहाँ तक कि स्कूल से बाहर जाने के बाद बच्चे उसे मेडम के बजाय मम्मी कहना ज्यादा पसंद करते हैं,वो है भी ऐसी कि  बच्चों के साथ बच्चों की उम्र की हो जाती है । नर्सरी से लेकेर बारहवीं के बच्चों के बीच पिछले बारह वर्षो से घिरी है वो और स्वभाव भी ऐसा कि किसी अजनबी पर भीजरूरत से ज्यादा ही विश्वास कर लेती है। मैं उसे रोकती हूँ पर जाने किस मिट्टी की बनी है वो------------बस एक यही काम नहीं होता उससे जहाँ दुख देखा नहीं कि लगी उसे पकडने-------सारे दुख दुसरों से छीन कर अपने पास ही रखना चाहती है ।
उस सहयात्री बच्चे से बातचीत शुरू हुई................ आपसी परिचय,घर-बारनौकरीकैरियर में आगे की योजना  ............आम बच्चों से जैसे बात की जाती है उस तरह सारी बातें कर ली उसने और बच्चा भी बेटा बनकर सब कुछ बताता रहा-------गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते ढेर सारा प्यार न्यौछावर कर दिया अपने इस नए बेटे पर ..
फिर कुछ दिनों बाद एक मेल मिला उसे --हेलो कैसी है आप ?देखिये मैंने आपको ढूंढ लिया ,पहचानामै आपको बस में मिला था ...उस दिन आपका नंबर लेना भूल गया था,प्लीज आपका फोन नम्बर मुझे मेल क़र दीजियेगा और हाँ सच्चे दोस्त कभी नहीं बिछड़ते ..आप मेरी दोस्त बनेंगी ?
पूजा ने पढ़कर जबाब दे दिया था --हां ,क्यों नहीं ,मै ठीक हूँ ,और मै आपकी दोस्त ही हूँ |
फिर कुछ दिन बाद अगले मेल  में   -- हाय, कैसी है आप आपने अपना नंबर नहीं दिया,मैंने दो बार माँगा |
पूजा के ये पूछने पर कि फ़ोन पर बात क्यों करना चाहते होक्या कोई परेशानी है ? उसका जबाब मिला कि मै आपसे बात करके आपके गम दूर करना चाहता हूँ |और हंसी आ गयी पूजा कोउसने बच्चे को बताया कि उसे खुद को व्यस्त रखना आता है और वो कभी दुखी नहीं रहती
आज उसे फिर एक मेल मिला था --मै तो बात करके तुम्हारे अन्दर की औरत को जगाने का प्रयास क़रना चाह  रहा था ,जो कि कही गुम हो गई है पूजा, आई लव यू!!
पूजा ने पढ़ा तो सन्न रह गई और बस यही पूजा कि उदासी का कारण बन गया था कि कहाँ तो वो युनिवर्सल मदर का ख़िताब पा चुकी थी और कहाँ ये बच्चा......
और मै निशब्द हो उसे सुन रही थी ---------
कौन जिम्मेदार है बच्चो की ऐसी रुग्ण मानसिकता का .....
उनके माता-पिता या संस्कार या फिर यह समाज या कुछ और........ 
 

Thursday, July 28, 2011

"माँ ने कहा था " पुस्तक के अंश ...

 आज प्रस्तुत है अरविन्द झा जी की पुस्तक "माँ ने कहा था" से कुछ अंश ....इनके ब्लॉग का नाम है "क्रांतिदूत "...
(अगर आपको पसंद आया तो आगे के भाग भी किये जा सकते है )

Sunday, July 24, 2011

एक गज़ल आयरलैण्ड से ....

 सुनिए दीपक’मशाल’ की एक गज़ल --



साथ ही दिजीए दीपक-मार्शलीन को विवाह की बधाई और शुभकामनाएं--- ये मेरा बड़ा बेटा है ---




Saturday, July 23, 2011

बारिशों के मौसम में...

(चित्र गूगल से साभार)
(दोनों में से  एक  चुनें व फ़िर पढ़ें कविता)



सावन का महीना
झमाझम बारिश
मूँदी आँखों मे
ढेरों ख्वाहिश
खोल दूं जो आँखें तो
टूटते सपनें हैं
बारिश और सपनों की
कैसी है ये साजिश.....







Wednesday, July 20, 2011

बार -बार दिन ये आये.....Happy b' day to you.........








मेरी दादी की गोदी मे  पल्लवी
अपनी नानी की गोदी में ..
                                                               



 





अमेय खुरासिया के साथ ...

चेतन भगत के साथ पूना में....

स्नेहाशीष....और भी आगे जाना है ....

Saturday, July 16, 2011

याद

मैं तुम्हें भूल चुकी हूँ
मगर नहीं जानती हर बार
तुम्हारी याद क्यों आती है?
वर्षों बीत गए तुम्हें भुलाए हुए
मगर अनजानों के बीच भी
तुम्हारी बात क्यों आती है?