न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
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Friday, September 30, 2016
Tuesday, March 31, 2015
अजीब दास्ताँ है ये .......................................कहाँ शुरू कहाँ ख़तम .........ये मंजिले है कौनसी .........न वो समझ सके न हम ...........
* नोट :- पोस्ट को पाँच साल हो जाएंगे ६ अप्रेल २०१५ को ... थोड़े परिवर्तन के साथ फिर से पोस्ट किया है ... ....
फ़्लैश बेक....
एक छोटी बच्ची ,करीब ४-५ साल उम्र की ........सुन्दर सा फ़्रॉक पह्ने हुए .......सुबह टिफिन लेकर ताँगे में बालमंदिर जाना......... साथियों के साथ खेलना , टिफिन खाना , नाचना ,कविता - कहानी सुनाना , शाम तक घर आना हाथ-मुहं धो कर माँ से चोटियाँ बनवाना --- रंग-बिरंगी रिबन लगवाना...... फिर खेलना ,.......वापस आकर दादा-दादी के साथ शाम के दिए लगाते समय प्रार्थना बोलना .......सब बड़ो कों प्रणाम करना फिर साथ में खाना खाना और सोते समय दादी से कहानी सुनने के बदले में उन्हें पहले पहाड़े और उलटी गिनती सुनाना .............यही दिनचर्या
फिर ........१०-१२ वर्ष की किशोरी .............स्कर्ट -ब्लाउज पहनावा हुआ ..................पढ़ने के अलावा स्कूल के अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेना ..................सहेलियो के साथ खेलते समय छोटे भाई-बहनों कों भी सँभालते रहना यही दिनचर्या ..........
अब थोड़ी बड़ी ......उम्र १४-१६ वर्ष .................पढाई में ज्यादा मन नहीं लगता .............खेलना ज्यादा पसंद खासकर लड़को वाले खेल .............और हम उम्र लड़को के साथ खेलना......माँ नाराज रहती .............घर के काम में ज्यादा मन नहीं लगता ..............स्कूल में किसी भी खेल में चयन हो जाने पर कहते ------सर ,हम नहीं खेल सकते आपको घर पर पूछने के लिए आना पड़ेगा ........और सर----- सच में आकर पिताजी से आज्ञा ले लेते पिताजी को तभी पता चलता कि मैं क्या -क्या और कैसे खेलती हूँ ...............वे आश्चर्य करते और खुश होकर प्रेक्टिस करने की अनुमति दे देते ..............लड़कों के साथ खेल का अभ्यास करते......... पर बातें सिर्फ काम की ..........दोस्ती अच्छी रहती ...............यही दिनचर्या .........
फिर ........१७-२२ वर्ष की उम्र ..............कॉलेज जाना ........यहाँ फिर पहनावा बदल गया था ,अब स्कर्ट छूट गया उनकी जगह लम्बे .............पैर ढंकने वाले कपड़ो ने ले ली .............सलवार -कमीज सिर्फ मुस्लिमों का पहनावा माना जाता था ...........परिवार थोडा फारवर्ड माना जाता था.........तब "बेलबोटम "चले थे उसे लम्बी कुर्ती के साथ पहनते थे ...........यहाँ खेलना करीब-करीब बंद हो गया .............पढाई करनी पडी ........मैदानी खेलो की जगह टेबल-टेनिस और बेडमिन्टन ने ले ली ..............सिर्फ परिचित लड़कों से ही बात करने की अनुमति ...........यानि जिनके परिवार को हमारा परिवार जानता हो ................अनजाने दोस्तों को दूर से ही नमस्कार और सिर्फ सहेलियों की दुनिया ................खुद तो किसी को पसंद कर ही नहीं सकते थे, सिर्फ दिल में ही रखना होता था, कोई अच्छा भी लगे तो जाहीर नहीं किया जा सकता था ......(खुद ही झिझक होती थी) ......और कोई अपने को पसंद करे तो दूर रहकर एक आह ...............की---- हाए! .........बात भी नहीं कर सकते ......(जाने किस डर के मारे!)..............पढाई के अलावा घरेलू कामकाज भी करना और लड़कियों के काम.................सिलाई-कढाई की क्लास लगाना .........एक नियमित दिनचर्या .............मन की पसंद पर लगाम ...............
२३ वर्ष होते-होते शादी ......अब जिंदगी का दूसरा पहलू ....
.............लड़की से महिला ..............पति-----परिवार की पसंद का , लेकिन खुद इसके लिए तैयार होने से -----पति की पसंद को अपनी पसंद बना लिया ..........दोनों ही को कोई परेशानी नहीं हुई ..........भाषा , विचार , रीती-रिवाज सबके ऊपर समझदारी हावी हो गई। .................सजना,संवरना , साड़ी , चुडीयाँ , बिंदी का साइज , सब -कुछ बदलते रहा .....कभी अपनी पसंद ----कभी उनकी ................दोनों की पसंद ............सब_कुछ रंग-बिरंगा ................लड़की की पसंद का भी ख्याल होने लगा ...........दिन बहुत खुबसूरत लगने लगे..........घर से दूर होकर भी घर ज्यादा याद नहीं आता ..............अगले ३-४ साल में दो प्यारे बच्चों के मम्मी -पापा हो गए .............अपनी परेशानियों ,गुस्से झगड़े के बीच,बच्चों की खुशियाँ , उनका प्यार हावी हो गया ..................उनकी देखरेख ----उनका ख़याल.................. , उनका स्कूल , कपड़े, खाने ..................पति की पसंद हटकर बच्चों पर आ गई ..............जीवन का सबसे सुखद समय बीत रहा था............व्यस्त दिनचर्या ................... , ......... .... ................. ........ ........... ............... ..............
..........७-८ साल तक बीता समय अब सपना -सा लगता है ..............फिर जिंदगी ने पलटा खाया .................पति का एक दुर्घटना में निधन हो गया .....................अब सबके होते हुए भी एकदम अकेली ................पहनावा एकबार फिर बदल गया ..............परम्परानुसार........... रंग जीवन के साथ ही कपड़ों से भी गायब हो गए बिंदी , चूड़ी ........सब गायब ...........यहाँ तक कि पूजा करते समय जब कंकू चढाते है, तो सर पर लगाने के लिए बरबस हाथ चला जाता ...............(आदत - सी पड़ गई थी )............... तो पूजा करने को मन ही नहीं करता ...........कहीं तो समय बिताना पड़ता तो नाम-स्मरण से ही ....................सबसे ज्यादा समस्या हुई दिनचर्या के बदल जाने की ................पति के साथ रहते हुए नाश्ता , खाना समय पर करना होता था .............................अब कभी भी बनाओ .................और शाम को ऑफिस से लौटने का समय तो काटे नहीं कटता था ................(खाना बनाने का तो आज भी मन नहीं करता ).........पहले पैसों के हिसाब-किताब कि कोई चिंता नहीं होती थी ...............सो मालूम भी नहीं था-----और आता भी नहीं था ..............सब धीरे-धीरे सीखना पड़ा ................जल्दी ही बच्चों के भविष्य कि चिंता हुई और कमाई की खातिर घर से पहली बार काम करने बाहर निकली ................बच्चों के लिए सब-कुछ भुला दिया ..........अब बच्चों का ग्रेजुएशन पूरा हो चुका है ....................आगे पढाई करना है ,पर दोनों समय और परिस्थितियों से जूझकर बड़े हुए हैं, इसलिए आगे पढ़ने का अभी टाल दिया है, (जानती है माँ ).............काम की तलाश में लगे रहते हैं ..............माँ की ज्यादा से ज्यादा मदद करना चाहते हैं, ...................माँ को उन पर गर्व होता है, अब बच्चों के खुश रहने से खुशी होती है ...
.............आगे पता नहीं जिंदगी कहाँ ले जाएगी ..................पर साथ में तीनों खुश है ...............माँ .चाहती है ---दोनों कों वो सब मिले जो वो चाहते हैं ................बस कभी-कभी डर लगता है कि हमेशा अकेले निर्णय लेना पड़ा......... (हालांकि परिवार ने हमेशा साथ दिया पर अंतिम निर्णय तो उसका ही रहता रहा ).............सलाह करने के लिए "वो" साथ नहीं है ...................ये भी लगते रहता है, कि वो होते तो शायद और बेहतर होता !...... .............. .............. ........ .......
Sunday, November 2, 2014
तुम्हारे ख़्वाब .....
रोज सुबह उठकर
तुम्हारे ख़्वाब चुनती हूँ
पूजा के फूलों के साथ
झटकती हूँ, सँवारती हूँ
गूँथ लेने को
और गूँथ कर उन्हें
सजा लेती हूँ
मेरे माथे पे
मेरी आँखों की चमक
बढ़ जाती है
और
निखर जाता है
रूप मेरा...
कुछ ख्वाबों के रंग
खिले -खिले से होते हैं
और ये ख्वाब
भीनी सी खुश्बू लिए होते हैं
मुरझाते नहीं
सूखने पर भी
इनकी खुशबू
महकाए रखती है फ़िजा को
जहाँ से गुजरती हूँ
मेरी मौजूदगी दर्ज हो जाती है
शाम होते -होते
आसमान तैयार होने लगता है
तारों की टिमटिमाहट लेकर
ख्वाबों के बहाने
चाँद मिलने आता है
चुपके से सूखे ख्वाबों को
चुरा ले जाता है..
मैं फ़िर
निकल पड़ती हूं
सुबह होते ही चुनने को
तुम्हारे ख़्वाब .....
तुम्हारे ख़्वाब चुनती हूँ
पूजा के फूलों के साथ
झटकती हूँ, सँवारती हूँ
गूँथ लेने को
और गूँथ कर उन्हें
सजा लेती हूँ
मेरे माथे पे
मेरी आँखों की चमक
बढ़ जाती है
और
निखर जाता है
रूप मेरा...
कुछ ख्वाबों के रंग
खिले -खिले से होते हैं
और ये ख्वाब
भीनी सी खुश्बू लिए होते हैं
मुरझाते नहीं
सूखने पर भी
इनकी खुशबू
महकाए रखती है फ़िजा को
जहाँ से गुजरती हूँ
मेरी मौजूदगी दर्ज हो जाती है
शाम होते -होते
आसमान तैयार होने लगता है
तारों की टिमटिमाहट लेकर
ख्वाबों के बहाने
चाँद मिलने आता है
चुपके से सूखे ख्वाबों को
चुरा ले जाता है..
मैं फ़िर
निकल पड़ती हूं
सुबह होते ही चुनने को
तुम्हारे ख़्वाब .....
Monday, November 25, 2013
शादी की सालगिरह ......
प्रिय सनी,
बहुत दिनों बाद आज तय किया कि आपको पत्र लिखूँ , मुझे पता है, आपको भी याद होगा कि आज हमारी शादी की उन्तीसवीं सालगिरह है , और ये भी पता है, कि अगर आप होते तो क्या गिफ़्ट देते .....
अपनी मुलाकात की एक लम्बी सी कहानी याद आ रही है, जिसकी शुरूआत उस दिन से होती है, जब मेरे घर एक पोस्टकार्ड आया था नागपूर से ... जिसमें लिखा था कि हमें आपकी लड़की पसन्द है, और हमलोग अगले हफ़्ते आकर बात पक्की करना चाहते हैं । पिताजी पत्र पढ़ते ही ऑफ़िस से उठकर अन्दर आ गए थे और पढ़कर सुनाया था दादी और माँ को ,सबके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई थी ,और सब खुश होते भी क्यों नहीं लगभग साल भर बाद ये जबाब आया था और इस बीच कई जगह रिश्ते के लिए लड़के देखने -दिखाने का अनिवार्य काम, माँ -पिताजी कर रहे थे, पर कहीं भी बात जमीं नहीं थी, मुझे भी माँ ने बताया था कि चलो अच्छा हुआ , उन्होंने हाँ कह दी , मुझे समझ ही नहीं आ रहा था किस लड़के के यहाँ से हाँ हुई है ... खूब याद कर रही थी, साल भर पहले की बात कि वो चेहरा सामने आए .... आया भी धुंधला सा ,लेकिन चेहरे से ज्यादा तो उस वक्त का घटनाक्रम याद आया जब पहली बार ट्रेन में इतनी दूर घर से बाहर माँ-पिताजी मुझे लेकर गए थे. वो भी इसलिये कि उनकी लड़की जो कुछ ज्यादा ही पढ़ ली थी और खेल-कूद में ज्यादा रूचि रखती थी...मोटरसाईकल चलाती थी, जिसे उस समय घरेलू लड़की नहीं कहा जा सकता था ....के लिए एक अच्छा सा वर तलाश पाएं।
खैर! याद आया कि किस तरह कहीं से जान-पहचान निकाल कर आपकी बुआ जी के यहाँ रूकना तय हुआ था ,और जब हम वहाँ पहुँचे तो पता चला कि उनकी तबियत ठीक नहीं है .... उनकी समझदार बेटी ने पहली बार दूर से आए अनजान मेहमानों का बहुत खयाल रखा और माँ का भी , उनसे ज्यादा बात नहीं हो पाई ,हम लोग जल्दी ही तैयार हो गए वहाँ से आपके घर जाने को ताकि उन्हें तकलीफ़ न हो , और जब आपके घर पहुँचे तो आपके पिताजी ने बड़े संकोच से बताया था कि आपकी छुट्टीयाँ मंजूर न हो पाने के कारण आप आए ही नहीं थे , एक संतोष की सांस ली थी मैंने, कि चलो देखने-दिखाने की रस्म से छुट्टी मिली .... आपकी मम्मी जी ने हम सबके लिए स्वादिष्ट खाना बनाया,जिसके लिए वे जानी जाती थी .... तो नया घर, नये लोग होने के बावजूद भी बिना हिचकिचाहट के उनकी रसोई में मदद कर दी थी ....(.बल्कि एक गुजराती लड़की ने महाराष्ट्रीयन खाना बनाने का आनन्द लिया था )क्योंकि आप नहीं थे पता चल गया था , बढ़िया खाना खिलाकर हमसे माफ़ी मांगते हुए आपके माताजी-पिताजी ने भारी मन से हमें विदा किया ... मेरे माता-पिता भी निराश ही थे ,मगर मुझे खुशी हो रही थी कि उस रस्म जिसमें लगता था, कि लड़की सब्जी-भाजी हो , से सामना नहीं हुआ था मेरा ....
..हम लोग बस स्टैन्ड पहुँचकर बुआ के गाँव जाने वाली बस में सवार होने ही वाले थे कि आपके पिताजी हाँफ़ते-हाँफ़ते वहाँ पहुँचे थे,पसीने से तरबतर, करीब ८-१० किलोमीटर साईकल दौडा कर आए थे वे, हम तीनों किसी आशंका से घिर गए थे, लेकिन वे खुश होते हुए बोले थे कि लड़का आ गया .... बिना बताए वो चला आया है छुट्टी न मिलने पर ...आप लोग कॄपया वापस चलिए, और मेरा चेहरा देखने लायक था ...... उन्हें देखकर पहली बात याद आई कि ये जेलर थे ...... कहीं हम लौट न जाएं उनके पहुँचने के पहले इसलिये साईकिल बहुत तेज चलाकर आए थे (बाद में आपके इस सरप्राइज़ की वजह से आप पर गुस्सा तो जरूर उतारा होगा कि आपने बताया नहीं था उन्हें कि आ रहे हैं )...................... खैर हम वापस लौटे .......
लेकिन बहुत मजा आया , कोई तैयार-वैयार नही होना पड़ा और जैसे थे दिन भर के वैसे ही हम घर पहुँच गए थे , उस समय जब पहली बार हमने एक-दूसरे को देखा था, तो बस एक मुस्कान आई थी हम दोनों के चेहरे पर उस घटना के इस तरह घटने से ...आप तैयार होकर बैठे थे ,मेरे मन में चल रहा था कि मैं अपना चयन करने आई हूँ ....हम चुपचाप बैठे रहे कोई बात भी नही की और लौटते में सिर्फ़ एक बार हमारी नज़रे मिली थी बस ...बाय कहने को ...
...और उसके बाद ये पत्र.....करीब सालभर बाद हाँ के लिए आया था ............. .....
खैर ! आपके मम्मी-पापा आए और हमारी बात पक्की करके चले गए , आप नहीं आ पाए थे ...
मैं मन में वही साल भर पहले की छबि को खोजती और सोचती कि आपका भी वही हाल होगा .... फ़िर ४-६ माह बाद की ही शादी की तारीख तय हो गई - यही 25/11/84 ....
और फ़िर शुरू हुआ एक और यादगार आदान-प्रदान ...... आपका पहला पत्र आया .... पिताजी ने मेरा नाम देखा तो खुद आवाज लगाकर बुलाया और मेरी ओर पत्र बढ़ा दिया था , उससे पहले मेरे नाम से किसी का कोई पत्र तो आया नहीं था सो पिताजी से ही पूछा क्या है? .... वे हँस दिए थे ...:-) .....पत्र लेकर एक एकान्त कोना देखकर डरते-डरते खोला था , और आँखे खुली कि खुली रह गई जब हिन्दी के बदले अंग्रेजी में लिखावट को देखा .... होश उड़ गए थे ...... बहुत खौफ़ था मुझे अंग्रेजी का .....पढ़कर समझ तो लेती थी पर लिखना नहीं आता था ..... दिन-रात ,कई बार वो पत्र पढ़ती रही थी ... उसका जबाब नहीं दिया था .... जानती थी कि पंद्रह दिन में दूसरा पत्र आने वाला है ,जिसके बारे में आपने पहले पत्र में ही लिख दिया था ।........ वही हुआ दूसरा पत्र आया इस बार पिताजी से पहले पोस्टमेन से ही ले लिया ..... अब भी वही अंग्रेजी में ..... अब अगर जबाब न दूं तो क्या होगा और दूं तो कैसे दूं ? अंग्रेजी में दिया और गलत हुआ तो क्या होगा और हिन्दी में देने से आप मूर्ख तो नहीं समझेंगे /नाराज तो नहीं हो जाएंगे .......विचार उथल-पुथल मचाने लगे थे क्योंकि आपने बहुत से प्रश्न पूछे थे जिनका जबाब आप शादी से पहले जानना चाहते थे । ...... बड़ी मुश्किल से तय किया कि हिन्दी में ही लिखूँगी .... जो हो सो एक ही बार में हो ...... अगर अंग्रेजी में लिखा तो हमेशा अंग्रेजी में लिखना पडेगा .... :-) और आपके हर सवाल का जबाब आपको मिल गया था..... ... ... अलग भाषा ,अलग रीति-रिवाज,अलग खान-पान,अलग रहन-सहन और रूचियाँ भी बिलकुल अलग होते हुए भी सिर्फ़ मर्यादा,संस्कार और अपने बड़ों का सम्मान वाले समान गुणों के कारण हम आपसी समझदारी से अपने बीच होने वाली बहुत सी बहसों को सुलझाते हुए चल पडे़ थे ......और इस तरह शुरू हुआ था हमारा ये सफ़र ..... जीवन सफ़र .....
बच्चों के नाम तुमने ही चुन रखे थे - वत्सल और पल्लवी....
...................
....................
.................
और सब-कुछ ठीक और व्यवस्थित चलते-चलते अचानक हुए हादसे ने सबकुछ तहस-नहस कर दिया .... ...........
खैर ! इस बीच बहुत वक्त बीत गया , हर साल इस दिन की आमद पर ये मुलाकात याद आती और साथ आते आप भी ,हम साथ रहते और आने वाले साल की प्लानिंग करते फ़िर मुझे हौसला मिलता और फ़िर मैं अपनी जिम्मेदारी संभाल लेती कुछ उदासी के साथ ............................................................... लेकिन खुशी है कि सब कुछ हमारे बीच हुए वादे के अनुसार ही हो पाया /मैंने पूरा करने की कोशिश की ............
और आज यहाँ इस ब्लॉग पर ये पत्र भी आपसे किए वादे के कारण ही संभव हो पाया है, जानती हूँ , आप मुझे किस जगह देखना चाहते थे ..... तो इस बार आप जरूर खुश हो रहे होंगे कि मैंने डर को भगा दिया है , अपने से दूर ,बहुत दूर ............................
एक बात और बता दूँ - ये बच्चे हैं न पूरे आपके जैसे ही हैं, जब पता चल जाता है कि मम्मी को इस काम से डर लगता है तो करवा के ही दम लेते हैं ... और ये हिम्मत आज कर पाई कि आपको पत्र लिखूँ... खुला पत्र ...
दोनों बच्चे अब समझदार हो गए हैं, और जिम्मेदारी से सारे काम करने लगे हैं.....बहू नेहा और दामाद निलेश भी बिलकुल वैसे ही हैं, जैसे हमने सोचा था।.........
.
.......आज आपकी बहुत याद आ रही है ...आपके आने से पहले पत्र लिख कर रख लिया .... जानती हूँ ...आप जहाँ भी होंगे देखकर खुश हो रहे होंगे और अपने बच्चों पर गर्व भी हो रहा होगा .... बाकि बातें आपके साथ .... .......
लेकिन एक तोहफ़ा जो इस ब्लॉग जगत के भैया (सलिल भैया) ने मुझे दिया था ,पिछली सालगिरह पर जब मैंने उन्हें ये तारीख बताई थी .......
आज आपको याद दिला रही हूँ-----
याद है तुमको!
तुमको कैसे याद रहेगा
याद दिलाना काम है मेरा
बच्चों की और हम दोनों की सालगिरह
और बढकर उससे
सालगिरह शादी की अपनी
याद दिलाना काम है मेरा.
ऑफिस जाने के पहले
हज्जार दफा तो कहती थी मैं
आ जाना तुम शाम को जल्दी
लोग आयेंगे
माना तुमको काम बड़े हैं अफसर हो
पर याद दिलाना काम है मेरा
आज पचीस नवंबर है
कम-से-कम आज तो याद रखो
कुछ फ़र्ज़ तुम्हारा मेरे साथ भी है
मैं सबकुछ छोडके पीछे आज के दिन ही
आई थी आँगन में तुम्हारे
बरसों पहले याद नहीं
पर याद दिलाना काम है मेरा.
जब से मुझको छोड़ गए तुम
मैं रहती हूँ व्यस्त भूलकर सारी बातें
तुमको याद दिलाना
और लोगों का आना
बिजली गुल – कैंडल ही जला दो
भूल गए सब लगता है
पर याद दिलाना काम है मेरा.
कैंडल के जलते ही
एक हवा का झोंका
फूंक मारकर बुझा गया वो जलता कैंडल
कानों में धीरे से मेरे बोल गया वो
भूल गयी २५ नवंबर
हैप्पी एनिवर्सरी मनाओ मेरे संग तुम
याद दिलाना काम है मेरा!
शादी की सालगिरह मुबारक हो !!!
आपकी
आर्ची.....

याद होगा सनी और आर्ची......कैसे नाम रख लिये थे एक-दूसरे के .... हा हा हा !!!
बन्द करती हूँ .... बाकि फ़िर ......
Sunday, November 13, 2011
श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श.....साहब स्कूल जा रहे हैं......



और स्कूल पहुँच कर .....चल पड़े काम पर ..

तो करो सब -- सलाम साब .......और दिजीए बाल-दिवस पर शुभकामनाएँ...

चाहें तो यहाँ भी घूम सकते हैं-- बाल मेले में .....
१- http://archanachaoji.blogspot.com/2010/02/blog-post_26.html
२-- http://archanachaoji.blogspot.com/2010/07/happy-birth-day-vaidehee-sumi.html
३--http://archanachaoji.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html
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२-- http://archanachaoji.blogspot.com/2010/07/happy-birth-day-vaidehee-sumi.html
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Saturday, June 11, 2011
कुछ नया नहीं तो पुराना ही सही ....
15/01/2009 को पोस्ट किया था आज फिर वही
एक दिन अचानक पता चला की मै लिखने लगी
थोड़ा-बहुत नही ढेर सारा उगलने लगी ,कहाँ से मुझको लिखना आया ?,
साहित्य का ज्ञान कहाँ से पाया ?,
बहुत सोचा मगर समझ में नही आया !
फिर लगा साहित्य है?,या कुछ और ?
पर कुछ और होगा तो क्या ?????????????????
फिर भी कुछ हाथ नही लगा ,
बहुत सर खपाया ,
और इसी उधेड़बुन में अपना पेन उठाया ,कागज पर रखा
अरे ये क्या ?वो चलने लगा ,
पता नही कैसे ?
रुकने का नाम ही नही ले रहा था ,
और तभी दिमाग की घंटी बजी !!!!!!!!!!
ऐसा ही कुछ हुआ होगा ,
दिमाग में ही कोई कीडा कुलबुलाया होगा ,
जाने कब से दबा हुआ था पेन ,
कागज देखते ही बाहर निकलने को छटपटाया होगा ,
पेन कागज पर गिरा होगा ,
और कागज स्याही से भर गया होगा ,
पढ़े -लिखे लोगो ने समझा होगा ,
और समझदारों ने ही कहा होगा --------------
मै लिखने लगी ,थोड़ा बहुत नही ढेर सारा उगलने लगी !!!!!!!!!!!!!!
Thursday, May 26, 2011
हाथों की चंद लकीरें ........
अपने महबूब का हर लफ्ज़ याद आता है ,
याद आता है- हर पल, हर लम्हा ,
हर लम्हा वो,जो बिताया था साथ,याद आता है- हर पल, हर लम्हा ,
सिर्फ साथ ही नहीं ,थामे हाथ में हाथ,
हाथों में अब फिर से नजरें थमी हैं,लगता है इनमें लकीरों की कमी है ...
Tuesday, May 24, 2011
एहसास...
पहले नजरे भी मुझे चुभा करती थी ,
अब चेहरा ही ऐसा नहीं की देखे कोई,
कीलो के भी चुभने का एहसास नहीं होता,
अब चाहे जितनी नजरे गड़ा ले कोई ||
अब चेहरा ही ऐसा नहीं की देखे कोई,
कीलो के भी चुभने का एहसास नहीं होता,
अब चाहे जितनी नजरे गड़ा ले कोई ||
Monday, May 23, 2011
मुझे नहीं लगता ..
किसी के लिखे को बुरा कहने का दुस्साहस नहीं क़र पाती मै ,
क्योकि खुद मुझे नहीं पता कि कितना बुरा लिखती हूँ मै,
समझ नहीं आता मेरे लिखे को अच्छा कैसे कहता होगा कोई ,
क्या मुझसे भी बुरा लिखता होगा कही कोई ....
क्योकि खुद मुझे नहीं पता कि कितना बुरा लिखती हूँ मै,
समझ नहीं आता मेरे लिखे को अच्छा कैसे कहता होगा कोई ,
क्या मुझसे भी बुरा लिखता होगा कही कोई ....
Sunday, May 22, 2011
किसी को पता है ?
किसी से सुना है एहसानों के बोझ तले दब जाता है आदमी,
पर पता नहीं एहसानों को उठाने कब जाता है आदमी..........Friday, May 20, 2011
बस कहे देती हूँ ...
मेरा लिखा मत पढ़ना तुम,
मै तो बस लिख देती हूँ "मेरे मन की",
मुझे ये भी पता है ,तुम न मानोगे,पढोगे,फिर कुछ कहोगे,
मै तो बस लिख देती हूँ "मेरे मन की",
मुझे ये भी पता है ,तुम न मानोगे,पढोगे,फिर कुछ कहोगे,
और फिर यही वजह होगी अपनी अनबन की........
Tuesday, September 21, 2010
मै कौन हूँ ?
मुझे पता है- मैं कौन हूँ?
मैं हर समय रहने वाली आत्मा हूँ,
जो न कभी मरूँगी,न मिटूंगी,
बस---रहूँगी और डटूंगी,
हर उस जगह पर
जो मेरे लिए बनाई गई है।
मुझे पता है-मेरी जगह निश्चित नहीं है,
इसलिए मैं घूमती हूँ यहाँ-वहाँ,
अन्य लोगों से मिलने के लिए,
जिनसे मेरा मिलना जरूरी है,
हर उस जगह पर,
जहाँ वे मेरा इंतजार कर रहे हैं।
मुझे पता है- मुझे हर वो काम करने हैं,
जो मुझे दिए गए हैं,
मै सिखती हूँ उन्हें ,मेहनत से,
करती हूँ उन्हें, मनोयोग से,
पर हो जाते हैं कुछ गलत,
और इसी कारण से शायद,
मै आत्मा हूँ,मेरी जगह निश्चित नहीं है,
और मेरे काम बाकी रह जाते है हमेशा ...
और यहाँ सुनिए फ़िरदौस की गज़ल
मैं हर समय रहने वाली आत्मा हूँ,
जो न कभी मरूँगी,न मिटूंगी,
बस---रहूँगी और डटूंगी,
हर उस जगह पर
जो मेरे लिए बनाई गई है।
मुझे पता है-मेरी जगह निश्चित नहीं है,
इसलिए मैं घूमती हूँ यहाँ-वहाँ,
अन्य लोगों से मिलने के लिए,
जिनसे मेरा मिलना जरूरी है,
हर उस जगह पर,
जहाँ वे मेरा इंतजार कर रहे हैं।
मुझे पता है- मुझे हर वो काम करने हैं,
जो मुझे दिए गए हैं,
मै सिखती हूँ उन्हें ,मेहनत से,
करती हूँ उन्हें, मनोयोग से,
पर हो जाते हैं कुछ गलत,
और इसी कारण से शायद,
मै आत्मा हूँ,मेरी जगह निश्चित नहीं है,
और मेरे काम बाकी रह जाते है हमेशा ...
और यहाँ सुनिए फ़िरदौस की गज़ल
Thursday, September 9, 2010
टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी..............
टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी जीती रही मै
कतरा कतरा गम पीती रही मै
जख्मो पर लगे कच्चे टाँके
बार-बार रह रह कर सीती रही मै ...
कतरा कतरा गम पीती रही मै
जख्मो पर लगे कच्चे टाँके
बार-बार रह रह कर सीती रही मै ...
Friday, July 30, 2010
हिन्दी----------------या मराठी------------------------------या फ़िर गुजराती-----------क्या सुनेंगे आप----???
सीखने को नहीं मिला --------------पर गाने का जूनून हमें यहाँ तक ले आया---------------------
१---हिन्दी -----देवेन्द्र पाठक(भाई)
मराठी--- रचना बजाज (बहन)
गुजराती--- अर्चना चावजी (मैं)
विशेष:-- ये गीत सागर नाहर जी के ब्लॉग पर सुना था मैने उनका आभार !!!
१---हिन्दी -----देवेन्द्र पाठक(भाई)
मराठी--- रचना बजाज (बहन)
गुजराती--- अर्चना चावजी (मैं)
विशेष:-- ये गीत सागर नाहर जी के ब्लॉग पर सुना था मैने उनका आभार !!!
Thursday, July 22, 2010
मै चुप रहूंगी ......................................................न जाओ सैंया.....................
|
आज ...........कुछ न कह पाउंगी................बस सुनिए......................
Tuesday, July 13, 2010
Sunday, July 11, 2010
एक उम्मीद..............................एक आस................................एक सच्चाई......................
सुर इस गाँव में नई-नई आई थी। यहाँ आने से पहले उसने संगीत के बारे में सुन रखा था, पर जान-पहचान नहीं थी। एक दिन अचानक एक परेशानी में पडने पर संगीत ने सुर की मदद कर दी, और बस तभी से संगीत और सुर की दोस्ती बढने लगी। धीरे-धीरे वे आपस की बातें करते,हँसी मजाक करते-करते घुल-मिल गए। इसी बीच जब-जब सुर को कोई परेशानी होती संगीत चुटकियों मे उसका हल निकाल देता, और सुर खुश होकर उसका धन्यवाद अदा कर देती।
कुछ दिनों बाद अचानक एक दिन सुर को पता चला-- गीत के बारे में...............कहीं गीत ने सुर की तारीफ़ की थी, और ये बात सुर के कानों में पडते ही उसे आश्चर्य हुआ...........खुशी भी हुई कि बिना जान-पहचान के ही गीत उसके बारे में इतना कुछ कह गया। अब शुरुआत हुई गीत और सुर की दोस्ती की। पहले वे सिर्फ़ नमस्ते तक सीमित रहते थे ,पर गीत कुछ और ही चाहता था,वो चाहता था कि सुर अपने तक ही सीमित न रहे,सारे संसार के लोगों को उसकी खूबियों का पता चले। दोस्ती बढने लगी,दोनों एक-दूसरे से सुख-दुख की बातें बाँटने लगे । सुर को अब दो मित्र मिल गए थे । संगीत और गीत दोनों से मिलकर सुर बहुत खुश थी, पर ये खुशी थोडे समय की थी। एक दिन सुर को पता चला कि संगीत और गीत की आपस में कोई अनबन है वे दोनों एक-दूसरे से मिल नहीं सकते हैं।
सुर अब उदास रहने लगी,हरदम सोचती रहती कैसे उन दोनों की दोस्ती कराए?, कैसे दोनों को मिलाए?उसे ये जानकारी भी नहीं थी कि उन दोनों की अनबन का कारण क्या था, पर बस वो चाहती थी कि वे तीनों मित्र बने रहें।
एक दिन सुर ने बहुत हिम्मत करके उन दोनों को मिलवाने की कोशिश में दोनों को एक-दूसरे से अनजान रखते हुए,एक-दूसरे के सामने ला खडा किया। अचानक हुई इस घटना ने दोनों को चौंका दिया,दोनों को सुर से ये उम्मीद नहीं थी दोनों सुर को दोषी समझने लगे ,सुर ने अपना पक्ष रखने की बहुतेरी कोशीश की , वह सिर्फ़ दोनों को बताना चाहती थी कि आपसी मतभेद भुलाकर आने वाली पीढी के लिए एक मिसाल कायम की जा सकती है पर दोनों ने नहीं सुनी और दोनों ने सुर को ही दोषी माना।
अब सुर फ़िर अकेली है पर उसे अपनी दोस्ती पर अब भी विश्वास है वह इंतजार कर रही है ........जब संगीत और गीत वापस लौटेंगे ....सच्चाई जानेंगे कि सुर के दिल में क्या था?...........
"आपसी मतभेद और वैमनस्य भुलाकर ही (भले ही उसके लिए कडवे घूंट ही क्यों न पीना पडे)इस दुनियां में भाईचारे व सद्भाव की मिसाल कायम की जा सकती है " जिसकी कि हम आने वाली पीढी से अपेक्षा रखते हैं ----
पर डर है कहीं बहुत देर न हो जाए ....................कहीं सुर फ़िर अपनी एकाकी दुनियां मे न खो जाए..............
कुछ दिनों बाद अचानक एक दिन सुर को पता चला-- गीत के बारे में...............कहीं गीत ने सुर की तारीफ़ की थी, और ये बात सुर के कानों में पडते ही उसे आश्चर्य हुआ...........खुशी भी हुई कि बिना जान-पहचान के ही गीत उसके बारे में इतना कुछ कह गया। अब शुरुआत हुई गीत और सुर की दोस्ती की। पहले वे सिर्फ़ नमस्ते तक सीमित रहते थे ,पर गीत कुछ और ही चाहता था,वो चाहता था कि सुर अपने तक ही सीमित न रहे,सारे संसार के लोगों को उसकी खूबियों का पता चले। दोस्ती बढने लगी,दोनों एक-दूसरे से सुख-दुख की बातें बाँटने लगे । सुर को अब दो मित्र मिल गए थे । संगीत और गीत दोनों से मिलकर सुर बहुत खुश थी, पर ये खुशी थोडे समय की थी। एक दिन सुर को पता चला कि संगीत और गीत की आपस में कोई अनबन है वे दोनों एक-दूसरे से मिल नहीं सकते हैं।
सुर अब उदास रहने लगी,हरदम सोचती रहती कैसे उन दोनों की दोस्ती कराए?, कैसे दोनों को मिलाए?उसे ये जानकारी भी नहीं थी कि उन दोनों की अनबन का कारण क्या था, पर बस वो चाहती थी कि वे तीनों मित्र बने रहें।
एक दिन सुर ने बहुत हिम्मत करके उन दोनों को मिलवाने की कोशिश में दोनों को एक-दूसरे से अनजान रखते हुए,एक-दूसरे के सामने ला खडा किया। अचानक हुई इस घटना ने दोनों को चौंका दिया,दोनों को सुर से ये उम्मीद नहीं थी दोनों सुर को दोषी समझने लगे ,सुर ने अपना पक्ष रखने की बहुतेरी कोशीश की , वह सिर्फ़ दोनों को बताना चाहती थी कि आपसी मतभेद भुलाकर आने वाली पीढी के लिए एक मिसाल कायम की जा सकती है पर दोनों ने नहीं सुनी और दोनों ने सुर को ही दोषी माना।
अब सुर फ़िर अकेली है पर उसे अपनी दोस्ती पर अब भी विश्वास है वह इंतजार कर रही है ........जब संगीत और गीत वापस लौटेंगे ....सच्चाई जानेंगे कि सुर के दिल में क्या था?...........
"आपसी मतभेद और वैमनस्य भुलाकर ही (भले ही उसके लिए कडवे घूंट ही क्यों न पीना पडे)इस दुनियां में भाईचारे व सद्भाव की मिसाल कायम की जा सकती है " जिसकी कि हम आने वाली पीढी से अपेक्षा रखते हैं ----
पर डर है कहीं बहुत देर न हो जाए ....................कहीं सुर फ़िर अपनी एकाकी दुनियां मे न खो जाए..............
Tuesday, June 29, 2010
मित्र के साथ मुकदमा............................... जीत गई मै !!...............................(पक्का पता नही है )..........
माननीय जज साहब ,
मुझ पर एक मित्र ----"ब्लॉग लिखने का "ज्ञान" उन्होंने ही दिया है," और फ़िर हमारा तो स्वभाव ही ऐसा है कि किसी का आभार व्यक्त करना हो तो ऐसे करें कि अगला किसी का भला करे तो सोच समझ करे ना कि मन किया और कर दिया किसी को भी प्रेरित ।" (हर बार एक नया सम्बोधन देते हैं मुझे ---हिन्दी कमजोर है ---उनकी )--------का आरोप है कि मैं दूसरों की पोस्ट का पॉडकास्ट करती हूँ....................अब मैं ये तो पहले ही बता चुकी हूँ कि -----"न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे .....न ही किसी कविता के .....और न किसी कहानी या लेख को मैं जानती ....बस जब भी और जो भी दिल में आता है .......लिख देती हूँ "मेरे मन की" -----"
भला अब आप ही बताएं-- मुझे तो ज्ञान आप-पास से ही ढूँढ्ना पडेगा न !......और मैं समझदार हूँ ( गवाह है मेरे पास )................
मैं इस आरोप से इंकार करती हूँ..............मैं सिर्फ़ उसी पोस्ट का पॉड्कास्ट बनाती हूँ....जो अच्छी हो या जिसे लोगों को जानना /सुनना/या पढना चाहिए ....(मेरी समझ से).............चाहे वो मेरी हो या दूसरों की ..............( गानों की बात नहीं कर रही ....वो तो झेलना ही पडेंगे आखिर मूड भी तो कोई चीज है ? बनाना तो पडता ही है न !)...........
मैंने अब तक जो पॉड्कास्ट किए है ..उसमे से कुछ सबूत प्रस्तुत है ......
सखिया आवा उडि़ चलीं..’
एक लघुकथा........
....एक गीत
कुछ कहने से बेहतर होगा.................सुनना..........
रक्तदान, देहदान महादान ...
बाल-उद्यान
आवाज
भोपाल त्रासदी
इनको सबने अच्छा ही बताया है ...........
आगे मैं यह कहना चाहती हूँ कि ------"क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कहाँ ,किसने ,क्या कहा के बजाय ये बताएं कि आज कहाँ,किसने क्या अच्छा कहा !!!.."................................मैं पूछती हूँ कि लोग बुरी बातों का जिक्र
करते ही क्यूं है ?......................करेंगे ही नहीं तो वो फ़ैलेगी ही नहीं....................
इसे उदाहरण से समझ लें----------जब कोई एक बच्चा मेरे पास शिकायत करता है कि -फ़लां बच्चे ने मुझे गाली दी, अब सब गालीयां सबने सुनी थोडी रहती है ...पहले तो डिसाइड करना पडता है कि गाली है कि नहीं?.........इसमें बहुत समय खराब हो जाता है ...................इसलिए मैं तो शिकायत करने वाले बच्चे को ही एक चांटा डांटती हूँ (हाँ अब लगा नहीं सकते ..)कि -तुमने सुना ही क्यों?......और सुना तो तुम लिख कर दे दो ----क्या बोला ............मैं देखती हूँ क्या कर सकती हूँ.................अगर गाली हुई तो उसे बुलाएंगे ..........वरना ...............
गानों के लिए भी सबूत हैं मेरे पास --- क्यों गाती हूँ इस बात के भी सबूत हैं मेरे पास (सबूतों को बेह्तर करने केलिए गवाहों को वक्त दिया है ---....उचित समय पर उनकी अनुमति लेकर प्रस्तुत किया जा सकेगा ) ..........
वैसे तो कई तारीखों पर बहस करके समझौता कर लिया है मैने...........अब वे मेरे मित्र ही हैं . (पता बता पाने मे मैं असमर्थ हूँ------क्योंकि उनका कहना है कि एक बार किसी ने उनका पता दिया था तो सही पता होने के बाद भी गलत लोग आ पहूँचे थे .)....... ..........
फ़िर भी आप चाहें तो ---------------भविष्य में ऐसे सबूत भी दे पाने की कोशीश करूंगी कि हमारा समझौता हो चुका है........समझौता होने की खुशी मे मित्र को एक गीत भेंट देना चाहती हूँ . ..................
और एक संदेश भी :----
...बस अब और मुझे कुछ नहीं कहना .!!!................
मुझ पर एक मित्र ----"ब्लॉग लिखने का "ज्ञान" उन्होंने ही दिया है," और फ़िर हमारा तो स्वभाव ही ऐसा है कि किसी का आभार व्यक्त करना हो तो ऐसे करें कि अगला किसी का भला करे तो सोच समझ करे ना कि मन किया और कर दिया किसी को भी प्रेरित ।" (हर बार एक नया सम्बोधन देते हैं मुझे ---हिन्दी कमजोर है ---उनकी )--------का आरोप है कि मैं दूसरों की पोस्ट का पॉडकास्ट करती हूँ....................अब मैं ये तो पहले ही बता चुकी हूँ कि -----"न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे .....न ही किसी कविता के .....और न किसी कहानी या लेख को मैं जानती ....बस जब भी और जो भी दिल में आता है .......लिख देती हूँ "मेरे मन की" -----"
भला अब आप ही बताएं-- मुझे तो ज्ञान आप-पास से ही ढूँढ्ना पडेगा न !......और मैं समझदार हूँ ( गवाह है मेरे पास )................
मैं इस आरोप से इंकार करती हूँ..............मैं सिर्फ़ उसी पोस्ट का पॉड्कास्ट बनाती हूँ....जो अच्छी हो या जिसे लोगों को जानना /सुनना/या पढना चाहिए ....(मेरी समझ से).............चाहे वो मेरी हो या दूसरों की ..............( गानों की बात नहीं कर रही ....वो तो झेलना ही पडेंगे आखिर मूड भी तो कोई चीज है ? बनाना तो पडता ही है न !)...........
मैंने अब तक जो पॉड्कास्ट किए है ..उसमे से कुछ सबूत प्रस्तुत है ......
सखिया आवा उडि़ चलीं..’
एक लघुकथा........
....एक गीत
कुछ कहने से बेहतर होगा.................सुनना..........
रक्तदान, देहदान महादान ...
बाल-उद्यान
आवाज
भोपाल त्रासदी
इनको सबने अच्छा ही बताया है ...........
आगे मैं यह कहना चाहती हूँ कि ------"क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कहाँ ,किसने ,क्या कहा के बजाय ये बताएं कि आज कहाँ,किसने क्या अच्छा कहा !!!.."................................मैं पूछती हूँ कि लोग बुरी बातों का जिक्र
करते ही क्यूं है ?......................करेंगे ही नहीं तो वो फ़ैलेगी ही नहीं....................
इसे उदाहरण से समझ लें----------जब कोई एक बच्चा मेरे पास शिकायत करता है कि -फ़लां बच्चे ने मुझे गाली दी, अब सब गालीयां सबने सुनी थोडी रहती है ...पहले तो डिसाइड करना पडता है कि गाली है कि नहीं?.........इसमें बहुत समय खराब हो जाता है ...................इसलिए मैं तो शिकायत करने वाले बच्चे को ही एक चांटा डांटती हूँ (हाँ अब लगा नहीं सकते ..)कि -तुमने सुना ही क्यों?......और सुना तो तुम लिख कर दे दो ----क्या बोला ............मैं देखती हूँ क्या कर सकती हूँ.................अगर गाली हुई तो उसे बुलाएंगे ..........वरना ...............
गानों के लिए भी सबूत हैं मेरे पास --- क्यों गाती हूँ इस बात के भी सबूत हैं मेरे पास (सबूतों को बेह्तर करने केलिए गवाहों को वक्त दिया है ---....उचित समय पर उनकी अनुमति लेकर प्रस्तुत किया जा सकेगा ) ..........
वैसे तो कई तारीखों पर बहस करके समझौता कर लिया है मैने...........अब वे मेरे मित्र ही हैं . (पता बता पाने मे मैं असमर्थ हूँ------क्योंकि उनका कहना है कि एक बार किसी ने उनका पता दिया था तो सही पता होने के बाद भी गलत लोग आ पहूँचे थे .)....... ..........
फ़िर भी आप चाहें तो ---------------भविष्य में ऐसे सबूत भी दे पाने की कोशीश करूंगी कि हमारा समझौता हो चुका है........समझौता होने की खुशी मे मित्र को एक गीत भेंट देना चाहती हूँ . ..................
और एक संदेश भी :----
...बस अब और मुझे कुछ नहीं कहना .!!!................
Friday, June 25, 2010
क्योंकि ------ प्यार करने वाले -
नींद टूट चुकी थी मेरी
अब तक इतनी बैचैनी -कभी नहीं हुई
अब लगता है
मेरा दिल भर गया है
उफ़न-उफ़न कर बाहर
गिर रहे हैं शब्द
मैं समेटना चाहती हूँ
अतीत को यादों में
लिखना चाहती हूँ
कोई किताब
बाँटना चाहती हुँ अनुभव
सुधारना चाहती हूँ सोच
और, बताना चाहती हूँ उपाय
कई सवालों के ...
"जबाब" मुझसे नही जाने तो,
ढूँढते रह जाओगे....
आओ-- मदद करो
हाथ बढाओ
समेंटो शब्दों को
और लिखो
कहानी मेरी
बहुत पुरानी
बडी लम्बी
मोटी बनेगी मेरी किताब
करेगी बहुत हिसाब
और फ़िर
हम जियेंगे शान से ...
क्योंकि ------
प्यार करने वाले -
जीते हैं --शान से
मरते है ---शान से ...................
अब दिन भर के लिए ये गीत ...............
अब तक इतनी बैचैनी -कभी नहीं हुई
अब लगता है
मेरा दिल भर गया है
उफ़न-उफ़न कर बाहर
गिर रहे हैं शब्द
मैं समेटना चाहती हूँ
अतीत को यादों में
लिखना चाहती हूँ
कोई किताब
बाँटना चाहती हुँ अनुभव
सुधारना चाहती हूँ सोच
और, बताना चाहती हूँ उपाय
कई सवालों के ...
"जबाब" मुझसे नही जाने तो,
ढूँढते रह जाओगे....
आओ-- मदद करो
हाथ बढाओ
समेंटो शब्दों को
और लिखो
कहानी मेरी
बहुत पुरानी
बडी लम्बी
मोटी बनेगी मेरी किताब
करेगी बहुत हिसाब
और फ़िर
हम जियेंगे शान से ...
क्योंकि ------
प्यार करने वाले -
जीते हैं --शान से
मरते है ---शान से ...................
अब दिन भर के लिए ये गीत ...............
Wednesday, June 23, 2010
तनाव ..............कारण..... ............और.................... निवारण
इन दिनों शिक्षकों को शिक्षा देने के उद्देश्य से स्कूल में सेमिनार चल रहे हैं।कल तनाव मुक्त कैसे किया जाए? ये बताने /समझाने वाले आए थे सभी शिक्षकों को इकठ्ठा कर लिया गया था...............
सबसे पहले बताया गया ------धर्म से न जोडें.......इस बात को ......पूरी तरह अध्यात्मिक है.........
कुछ देर बाद लक्ष्मी जी का उदाहरण देते हुए पूछा गया --वे किस मुद्रा मे रहती हैं चित्रो मे?
तुरन्त जबाब मिला ---हाथ से पैसे नीचे गिराते हुए......
समझाया -----हाँ,इसका मतलब "Don;t hold money " .......वो उपर से आता है और नीचे चला जाता है ....
...अगर होल्ड कर लेंगे तो बहाव रुक जायेगा .......................................
अब मेरा दिमाग दौडने लग गया था (स्पोर्ट्स मे होने से जल्दी वार्मअप हो जाता है ) ..........वहाँ बैठे सारे शिक्षकों पर नजर सरपट दौड रही थी हर चेहरे से नजर मिलते ही मुस्कराहट का आदान-प्रदान भी हो रहा था..............और मेरे दिमाग का घोडा ये तय करते जा रहा था कि .........करीब हर धर्म को मानने वाले सभ्रान्त लोग वहाँ बैठे थे ............अब वो बात जिसके लिए भूमिका बनानी पडी ...........
....................................टेस्ट पेपर ....१................................
नोट :----तीसरा प्रश्न अनिवार्य है ।प्रत्येक प्रश्न के नम्बर निर्धारित है ।प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट व अलग -अलग लिखे जाएं ।
जिन विद्यार्थियों को विषय की जानकारी न हों वे परीक्षा में न बैठें।
प्रश्न १:- लक्ष्मी जी का उदाहरण मुझे तो समझ मे आ गया ( बचपन से मंदिर के अलावा कहीं तो भेजा नहीं गया था )मै कभी मस्जिद/गिरजाघर/गुरूद्वारा नहीं गई पर जानना चाहती हूँ वहाँ अन्दर क्या होता है ? मै सोच रही थी जो शिक्षक मुस्लिम/सिख/ईसाइ धर्म के हैं वे इसे किस तरह से समझ रहे होंगे ?
प्रश्न २:-मेरे स्कूल में हर धर्म को मानने वाले बच्चे पढते हैं मैं चूंकि स्पोर्ट्स टीचर हूँ पूरे स्कूल्के हर बच्चे के साथ मेरा दिल का रिश्ता बन जाता है ,अब मै सोच रही हूँ-- राहुल/मयूरी को तो मै समझा सकती हूँ ,पर अरबाज़/मनप्रीत या लिलियन को कैसे समझाउं और किससे रिलेट करके ?
प्रश्न३:-इससे तनाव बढा या कम हुआ ?
सबसे पहले बताया गया ------धर्म से न जोडें.......इस बात को ......पूरी तरह अध्यात्मिक है.........
कुछ देर बाद लक्ष्मी जी का उदाहरण देते हुए पूछा गया --वे किस मुद्रा मे रहती हैं चित्रो मे?
तुरन्त जबाब मिला ---हाथ से पैसे नीचे गिराते हुए......
समझाया -----हाँ,इसका मतलब "Don;t hold money " .......वो उपर से आता है और नीचे चला जाता है ....
...अगर होल्ड कर लेंगे तो बहाव रुक जायेगा .......................................
अब मेरा दिमाग दौडने लग गया था (स्पोर्ट्स मे होने से जल्दी वार्मअप हो जाता है ) ..........वहाँ बैठे सारे शिक्षकों पर नजर सरपट दौड रही थी हर चेहरे से नजर मिलते ही मुस्कराहट का आदान-प्रदान भी हो रहा था..............और मेरे दिमाग का घोडा ये तय करते जा रहा था कि .........करीब हर धर्म को मानने वाले सभ्रान्त लोग वहाँ बैठे थे ............अब वो बात जिसके लिए भूमिका बनानी पडी ...........
....................................टेस्ट पेपर ....१................................
नोट :----तीसरा प्रश्न अनिवार्य है ।प्रत्येक प्रश्न के नम्बर निर्धारित है ।प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट व अलग -अलग लिखे जाएं ।
जिन विद्यार्थियों को विषय की जानकारी न हों वे परीक्षा में न बैठें।
प्रश्न १:- लक्ष्मी जी का उदाहरण मुझे तो समझ मे आ गया ( बचपन से मंदिर के अलावा कहीं तो भेजा नहीं गया था )मै कभी मस्जिद/गिरजाघर/गुरूद्वारा नहीं गई पर जानना चाहती हूँ वहाँ अन्दर क्या होता है ? मै सोच रही थी जो शिक्षक मुस्लिम/सिख/ईसाइ धर्म के हैं वे इसे किस तरह से समझ रहे होंगे ?
प्रश्न २:-मेरे स्कूल में हर धर्म को मानने वाले बच्चे पढते हैं मैं चूंकि स्पोर्ट्स टीचर हूँ पूरे स्कूल्के हर बच्चे के साथ मेरा दिल का रिश्ता बन जाता है ,अब मै सोच रही हूँ-- राहुल/मयूरी को तो मै समझा सकती हूँ ,पर अरबाज़/मनप्रीत या लिलियन को कैसे समझाउं और किससे रिलेट करके ?
प्रश्न३:-इससे तनाव बढा या कम हुआ ?
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