सुनिए एक विरह गीत ...गिरिश बिल्लोरे "मुकुल" जी का लिखा हुआ,जिसे आप पढ़ सकते हैं- उनके ब्लॉग इश्क-प्रीत-लव पर
न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
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Tuesday, September 16, 2014
Tuesday, June 12, 2012
आभासी रिश्ते...आभासी नहीं हैं...१
(ये मैं पहले 30 दिसंबर 2010 को पोस्ट कर चुकी हूं आज नये सिरे से करना पड़ रहा है वहाँ प्लेअर नही चलने की वजह से )
ब्लॉग जगत में आभासी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कहा गया ...मैने भी बनाए रिश्ते यहाँ...जो सहयोग मुझे मिला उसके लिए आभारी हूँ सभी की...मुझे लगता ही नहीं कि हम लोग मिले नहीं हैं..रिश्तों के बारे में बातें करते हुए .मैने लिखा कुछ इस तरह ---
चाचा, पिता,बेटे -बेटी और मित्र मिले हैं मुझको घर -घर
साहस मेरा और बढ़ेगा,नहीं रहूँगी अब मैं डर -डर
सूख चुके हैं आँसू मेरे ,जो बह रहे थे अब तक झर -झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर,भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो,जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर, हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सब-कुछ,भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार में,अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत-समतल एक हो गए ,मैं जा पहूँची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की ,लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी नें सुधार करके मेरी भावनाओंको शब्द दिए और उसका नतीजा निकला ये गीत---
नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर-डर
सूख चुके हैं आँसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जी भर
रिमझिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत-समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं सहज चीन्ह कर
जिसे मैंने गाया कुछ इस तरह ----
Thursday, December 30, 2010
आभासी रिश्ते...आभासी नहीं हैं...
ब्लॉग जगत में आभासी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कहा गया ...मैने भी बनाए रिश्ते यहाँ...जो सहयोग मुझे मिला उसके लिए आभारी हूँ सभी की...मुझे लगता ही नहीं कि हम लोग मिले नहीं हैं..रिश्तों के बारे में बातें करते हुए .मैने लिखा कुछ इस तरह ----
चाचा,पिता,बेटे,बेटी और मित्र मिले है मुझको घर-घर
साहस मेरा और बढेगा नही रहूंगी अब मै डर-डर
सूख चुके है आंसू मेरे जो बह रहे थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सबकुछ भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार मे अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत -समतल एक हो गए मै जा पहूंची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर .... गिरीश बिल्लोरे"मुकुल" जी ने सुधार करके मेरी भावनाओं को गीत के रूप में शब्द दिये ......................और उसका नतीजा निकला ये गीत---
नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर डर
सूख चुके है आंसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका ग़म सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जीभर
रिम झिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत -समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अंदर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं. सहज चीन्ह कर जिसे मैंने गाया कुछ इस तरह ----
शुक्रिया!!!
साथ ही देखिए "कदम"पर नई पोस्ट
चाचा,पिता,बेटे,बेटी और मित्र मिले है मुझको घर-घर
साहस मेरा और बढेगा नही रहूंगी अब मै डर-डर
सूख चुके है आंसू मेरे जो बह रहे थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सबकुछ भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार मे अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत -समतल एक हो गए मै जा पहूंची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर .... गिरीश बिल्लोरे"मुकुल" जी ने सुधार करके मेरी भावनाओं को गीत के रूप में शब्द दिये ......................और उसका नतीजा निकला ये गीत---
नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर डर
सूख चुके है आंसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका ग़म सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जीभर
रिम झिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत -समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अंदर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं. सहज चीन्ह कर जिसे मैंने गाया कुछ इस तरह ----
शुक्रिया!!!
साथ ही देखिए "कदम"पर नई पोस्ट
Sunday, September 19, 2010
शाम अधूरी मीत याद बिन----एक गीत गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी का
बिना किसी भूमिका के सुनिए गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी का ये गीत-----
इनका ही एक और गीत सुन सकते हैं यहाँ
और एक चित्रों से सजा ब्लॉग देखिए यहाँ
इनका ही एक और गीत सुन सकते हैं यहाँ
और एक चित्रों से सजा ब्लॉग देखिए यहाँ
Monday, July 26, 2010
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