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Tuesday, November 15, 2016

कुछ गीत मन बहलाने को


कुछ नहीं तो सिर्फ "सा रे ग म प ध नि सा" ही सही 

रेडियों पर गीत सुनने का शौक आज यहां तक  लाया --

कुछ गीत रिकार्ड किये 

 जब तब अकेले में गीत गुनगुनाने से मन बहल जाता है, कोई भी चिंता -परेशानी हो- तो बस गीतों के खजाने से एक गीत चुनों और सुनो।

 साथ तो आप स्वत: ही  गुनगुनाने लगेंगे पता भी नहीं चलेगा। .. 

चाहें तो आप भी सुन सकते हैं। ....अपना अनुभव बताईयेगा । 


Wednesday, January 21, 2015

नाजुक चंचल है- गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी का गीत





आदरणीय गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी को कौन नहीं जानता ...बच्चों से बेहद प्यार करने वाली दी ने आप सबकी चहेती लाड़ो "मायरा"के लिए एक गीत भेजा है ,जो उन्होंने कभी अपनी पोती के लिए लिखा था .....
सुनिए / डाउनलोड करिये यहाँ से  -



या यहाँ से -

Music File Hosting - Download Audio - Balgeet - Girija di

.....इसे आप मायरा के ब्लॉग "नानी की बेटी" पर भी पढ़ सकते हैं.

Saturday, December 6, 2014

विरह ...

सावन आँगन बरसे बूँदे,पलकन बोझा ढोय
सरर सरर मोरी चुनरी सरके सिहरन देह मा होय...

चाँद बिछावै तारा रंगोली जब चाँदनी आँगन धोय
सरस सुगंध मदन मन मोहे, सजन बुला दे कोय...

कजरा गजरा महावर रूठे, रोम-रोम हुलसाय
सखी सुन,मोरो चैन भी खोयो,विरह मोहे तड़पाय .....

-अर्चना
और इसे मैंने गाने की कोशिश भी की.... 
सुनना चाहें अगर ....

Friday, December 5, 2014

अमॄत बूँद




एक पल कोई साथ चले तो,बनता एक अफसाना है,
कल फिर लौट के जाना है ,अपना जहाँ ठिकाना है। 

पथ के कांटे चुनते - बीनते हमको मंजिल पाना  है,
मिल जाए जो  दीन -दुखी तो अपना हाथ बढ़ाना है।

चलते-चलते मिल जाते साथी,बस बतियाते जाना है,
मंजिल की तुम राह न ताको मिलकर चलते जाना है।

"बूँद"-"बूँद" से भरेगी गागर,बस हमको छलकाना है,
हर एक जगह पर कुंभ लगेगा,अमॄत बूँद गिराना है ..... 
-अर्चना

Thursday, October 30, 2014

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना -गोपालदास "नीरज" जी का एक गीत




जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। 

- गोपालदास "नीरज"

Tuesday, September 16, 2014

पोर-पोर पीर बोई ...

सुनिए एक विरह गीत ...गिरिश बिल्लोरे "मुकुल" जी का लिखा हुआ,जिसे आप पढ़ सकते हैं- उनके ब्लॉग इश्क-प्रीत-लव  पर

Saturday, August 30, 2014

गीत जो गुनगुनाने का हुआ मन


1)
जिन्दगी ऐ जिन्दगी तेरे हैं दो रूप.....




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२)
करना फकीरी फ़िर क्या दिलगिरी सदा मगन मैं रहना जी ....

Wednesday, February 19, 2014

मेरे मन की (१) - "जिन्दगी"

नमस्कार, कोशिश की है- कुछ नया करने और जीवन में मधुरता घोलने की..... 
सुनियेगा और कैसा लगा बताईयेगा...
 

1)
ज़िन्दगी एक सहेली जो कभी कभी पहेली बन जाती है/ सताती है.. 
जीना दूभर कर देती है फिर भी भाती है/
हर पल जीने का नित नया पाठ पढ़ाती है/ 
ज़िन्दगी के पीछे मैं और मेरे पीछे मौत भागती है/ 
 -मीनाक्षी
गीत- ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय ...
फ़िल्म: आनन्द/ आवाज- मन्नाडे /संगीत:सलिल चौधरी


2)
चलो, कुछ दूर साथ चलें, बैठें, बतियायें, हँसें और जी लें....
जिन्दगी नाम फक’त चंद सांसों का आना जाना तो नहीं...
-समीर लाल ’समीर’
गीत- जिन्दगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सूर्ख फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें ..  
फ़िल्म:उमराव जान/गीतकार:शहरयार/आवाज:तलत अजीज/ संगीत: खय्याम
३)
बच रहा था आप सबसे कल तलक सहमा हुआ
अब बड़ा महफूज़ हूँ मैं कब्र में आने के बाद

मौत का अब डर भी यारों हो गया काफूर है
ज़िंदगी की बात ही क्या ज़िंदगी जाने के बाद
-अनुराग.
गीत का मुखडा:
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें
(फिल्म: उमराव जान - संगीत खय्याम)

                                                        
४)
"जिन्दगी" भर हमें बस रुलाते  रहे
वो न आये कभी हम बुलाते रहे.
आँसुओं से लिखी है मेरी दास्ताँ
लोग सुनते रहे हम सुनाते रहे.

-गिरीश पंकज 
मेरी पसंद की  लाइन है... ''मै ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया''

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अगले प्रोग्राम के लिए शब्द है - "पल"
कमेंट में अपनी पंक्तियाँ (सिर्फ़ दो या चार) लिखें व साथ ही लिखें अपनी पसन्द के गीत का मुखड़ा और फ़िल्म का नाम...

Wednesday, November 13, 2013

मेरी पसन्द के गीत के लिए .... दिल है कि मानता नहीं...

फूलों के रंग से दिल की कलम से...
 

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है.....


 कांटो से खींच के ये आँचल...




ये जीवन है इस जीवन का ...

Monday, November 11, 2013

एक शर्मीले गायक का सुरीला गायन .....

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं -जैसे सागर नाहर जी हैं ... मैंने जब से इन्हें जाना है ,मेरे घर के सदस्य ही लगते हैं मुझे ये ... मेरा मझले भाई राजेन्द्र  जैसा स्वभाव लगता है मुझे बातचीत में ...
विनम्र, शान्त स्वभाव वाले अद्भुत प्रतिभा के धनी .... और गीतों के शौकीन ....
कई दिनों से किया वादा आज पूरा किया है उन्होंने .... मेरा दीपावली गिफ़्ट है ये ...जो मैं आप सबसे बाँट रही हूँ ...
 खुद को बेसुरा कह रहे थे ,मुझसे बेसुरे तो हो ही नहीं सकते , जरा आप फ़ैसला करें ...
मुझे ये भी जानना है कि मेरा ब्लॉग छोड़कर भागने वाले कौन-कौन हैं ?....जो भविष्य में हमारी जुगलबन्दी सुनने से वन्चित होना चाहता है ... :-)
पहली बार साउंड क्लाउड की लिंक पर भी सुन सकते हैं आप --(ये भी उन्होंने ही सिखाया है )
तो इस बार दो- दो प्लेअर जैसा कि यूनुस भाई कहते हैं -"ताकि सनद रहे "






Friday, August 23, 2013

आज फिर गाने लगा है गीत कोई...

"आज फिर गाने लगा है गीत कोई..." राकेश खंडेलवाल जी के ब्लॉग "गीत कलश" से एक गीत --

आभारी हूँ राकेश जी की गीत रिकार्ड करने की अनुमति सदा के लिए दे रखी है उन्होंने .... :-)

Tuesday, March 12, 2013

जन्मदिन की शुभकामनाएँ

        

माँ-----
कब याद नहीं आती ?.....
हर पल,हर दिन .....
मेरे साथ रहती है .....
मुझसे बातें करती है ....
मुझे छोड कर कहीं नहीं जाती है .....
आज भी आयेगी .....और
मेरे साथ केक खाएगी....
                                                    माँ को ७५ वें जन्मदिन की शुभकामनाएँ
                                                          ( केक खाना पसन्द नहीं करती)              
                                           
माँ भगवान के बनाए हर अस्तित्व से ऊपर ...
जिसका मोह खुद भगवान भी न छोड़ पाए...



कोमलता की मिसाल-माँ
कठोरता की मिसाल - माँ
घबराहट की मिसाल -माँ
हौसले की मिसाल -माँ
गुस्से की मिसाल -माँ
प्यार की मिसाल -माँ
अपनत्व की मिसाल -माँ
ममता की मिसाल -माँ
पूरी दुनिया है -माँ

देवेन्द्र की आवाज में एक विशेष गीत  माँ के लिए हम सबकी ओर से ...



                                                                    एक रूप ये भी                     

                                                         मौसियों के साथ डांस करते हुए  
 और माँ के कहने पर, माँ को सुनवाने के लिए खोज कर रखा,  माँ की पसन्द का ये गीत --सबकी माँ के लिए ये प्रार्थना करते हुए कि माँ हमेशा रहे सबके साथ ...




माँ के बारे में यहाँ भी ...

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आज ही उर्मिला भाभी का भी जन्मदिन है... 
बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ उन्हें भी हम सबकी ओर से....
                                                         (केक खाना पसन्द नहीं इन्हें भी )               

                                   
                                          ये  गाती भी हैं
                                            
                      और भाभी के लिए एक गीत हम सबकी  ओर से -- तुम से ही घर घर कहलाया

                                     
                                                हमेशा ऐसी ही मुस्कुराती रहें,यही कामना....


और भाभी के लिए देवेन्द्र का गीत --- ओ साथी रे ..






Saturday, October 6, 2012

शाश्वत प्रेम...

हर तरफ़ बस तुम ही तुम ....ये ऐसा भाव है जो सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है .... आप भी महसूस कीजिए --
सलिल वर्मा जी की एक लघुकथा में --- मैं हूँ ना!



और अब एक गीत मेरे मन से ---तुम्हीं मेरे मन्दिर तुम्हीं मेरी पूजा
 


Saturday, August 25, 2012

तिनका-तिनका...है रोशनी से जैसे भरा...

 एक गीत यूं ही गुनगुना लिया....तिनका तिनका...
अच्छा तो नहीं है ...चल जाएगा...:-)

Saturday, August 18, 2012

दो गीत - मेरी पसंद

१- सैंया दिल में आना रे...



२- सुहानी रात ढल चुकी....

Wednesday, August 15, 2012

Tuesday, June 12, 2012

आभासी रिश्ते...आभासी नहीं हैं...१


(ये मैं पहले 30 दिसंबर 2010 को पोस्ट कर चुकी हूं आज नये सिरे से करना पड़ रहा है वहाँ प्लेअर नही चलने की वजह से )

ब्लॉग जगत में आभासी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कहा गया ...मैने भी बनाए रिश्ते यहाँ...जो सहयोग मुझे मिला उसके लिए आभारी हूँ सभी की...मुझे लगता ही नहीं कि हम लोग मिले नहीं हैं..रिश्तों के बारे में बातें करते हुए .मैने लिखा कुछ इस तरह ---
चाचा, पिता,बेटे -बेटी और मित्र मिले हैं मुझको घर -घर
साहस मेरा और बढ़ेगा,नहीं रहूँगी अब मैं डर -डर
 सूख चुके हैं आँसू मेरे ,जो बह रहे थे अब तक झर -झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर,भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो,जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर, हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सब-कुछ,भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार में,अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत-समतल एक हो गए ,मैं जा पहूँची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की ,लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी नें सुधार करके मेरी भावनाओंको शब्द दिए और उसका नतीजा निकला ये गीत---

नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर-डर
सूख चुके हैं आँसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जी भर
रिमझिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत-समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं सहज चीन्ह कर

जिसे मैंने गाया कुछ इस तरह ----