कुछ नहीं तो सिर्फ "सा रे ग म प ध नि सा" ही सही रेडियों पर गीत सुनने का शौक आज यहां तक लाया --
कुछ गीत रिकार्ड किये जब तब अकेले में गीत गुनगुनाने से मन बहल जाता है, कोई भी चिंता -परेशानी हो- तो बस गीतों के खजाने से एक गीत चुनों और सुनो। साथ तो आप स्वत: ही गुनगुनाने लगेंगे पता भी नहीं चलेगा। .. चाहें तो आप भी सुन सकते हैं। ....अपना अनुभव बताईयेगा ।
आदरणीय गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी को कौन नहीं जानता ...बच्चों से बेहद प्यार करने वाली दी ने आप सबकी चहेती लाड़ो "मायरा"के लिए एक गीत भेजा है ,जो उन्होंने कभी अपनी पोती के लिए लिखा था .....
सुनिए / डाउनलोड करिये यहाँ से -
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
नमस्कार, कोशिश की है- कुछ नया करने और जीवन में मधुरता घोलने की..... सुनियेगा और कैसा लगा बताईयेगा...
1) ज़िन्दगी एक सहेली जो कभी कभी पहेली बन जाती है/ सताती है..
जीना दूभर कर देती है फिर भी भाती है/
हर पल जीने का नित नया पाठ पढ़ाती है/
ज़िन्दगी के पीछे मैं और मेरे पीछे मौत भागती है/
-मीनाक्षी गीत- ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय ... फ़िल्म: आनन्द/ आवाज- मन्नाडे /संगीत:सलिल चौधरी
2) चलो, कुछ दूर साथ चलें, बैठें, बतियायें, हँसें और जी लें....
जिन्दगी नाम फक’त चंद सांसों का आना जाना तो नहीं...
-समीर लाल ’समीर’ गीत- जिन्दगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सूर्ख फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें ..
मौत का अब डर भी यारों हो गया काफूर है
ज़िंदगी की बात ही क्या ज़िंदगी जाने के बाद -अनुराग. गीत का मुखडा:
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें (फिल्म: उमराव जान - संगीत खय्याम) ४) "जिन्दगी" भर हमें बस रुलाते रहे
वो न आये कभी हम बुलाते रहे.
आँसुओं से लिखी है मेरी दास्ताँ
लोग सुनते रहे हम सुनाते रहे. -गिरीश पंकज मेरी पसंद की लाइन है... ''मै ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया''
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं -जैसे सागर नाहर जी हैं ... मैंने जब से इन्हें जाना है ,मेरे घर के सदस्य ही लगते हैं मुझे ये ... मेरा मझले भाई राजेन्द्र जैसा स्वभाव लगता है मुझे बातचीत में ...
विनम्र, शान्त स्वभाव वाले अद्भुत प्रतिभा के धनी .... और गीतों के शौकीन ....
कई दिनों से किया वादा आज पूरा किया है उन्होंने .... मेरा दीपावली गिफ़्ट है ये ...जो मैं आप सबसे बाँट रही हूँ ...
खुद को बेसुरा कह रहे थे ,मुझसे बेसुरे तो हो ही नहीं सकते , जरा आप फ़ैसला करें ...
मुझे ये भी जानना है कि मेरा ब्लॉग छोड़कर भागने वाले कौन-कौन हैं ?....जो भविष्य में हमारी जुगलबन्दी सुनने से वन्चित होना चाहता है ... :-)
पहली बार साउंड क्लाउड की लिंक पर भी सुन सकते हैं आप --(ये भी उन्होंने ही सिखाया है )
तो इस बार दो- दो प्लेअर जैसा कियूनुस भाई कहते हैं -"ताकि सनद रहे "
माँ भगवान के बनाए हर अस्तित्व से ऊपर ...
जिसका मोह खुद भगवान भी न छोड़ पाए...
कोमलता की मिसाल-माँ
कठोरता की मिसाल - माँ
घबराहट की मिसाल -माँ
हौसले की मिसाल -माँ
गुस्से की मिसाल -माँ
प्यार की मिसाल -माँ
अपनत्व की मिसाल -माँ
ममता की मिसाल -माँ
पूरी दुनिया है -माँ
देवेन्द्र की आवाज में एक विशेष गीत माँ के लिए हम सबकी ओर से ...
एक रूप ये भी
मौसियों के साथ डांस करते हुए
और माँ के कहने पर, माँ को सुनवाने के लिए खोज कर रखा, माँ की पसन्द का ये गीत --सबकी माँ के लिए ये प्रार्थना करते हुए कि माँ हमेशा रहे सबके साथ ...
------------------------------------------------------------------------------------------------------------ आज ही उर्मिला भाभी का भी जन्मदिन है... बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ उन्हें भी हम सबकी ओर से....
(केक खाना पसन्द नहीं इन्हें भी )
ये गाती भी हैं
और भाभी के लिए एक गीत हम सबकी ओर से -- तुम से ही घर घर कहलाया
(ये मैं पहले 30 दिसंबर 2010 को पोस्ट कर चुकी हूं आज नये सिरे से करना पड़ रहा है वहाँ प्लेअर नही चलने की वजह से )
ब्लॉग जगत में आभासी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कहा गया ...मैने भी बनाए
रिश्ते यहाँ...जो सहयोग मुझे मिला उसके लिए आभारी हूँ सभी की...मुझे लगता
ही नहीं कि हम लोग मिले नहीं हैं..रिश्तों के बारे में बातें करते हुए
.मैने लिखा कुछ इस तरह ---
चाचा, पिता,बेटे -बेटी और मित्र मिले हैं मुझको घर -घर
साहस मेरा और बढ़ेगा,नहीं रहूँगी अब मैं डर -डर
सूख चुके हैं आँसू मेरे ,जो बह रहे थे अब तक झर -झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर,भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो,जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर, हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सब-कुछ,भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार में,अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत-समतल एक हो गए ,मैं जा पहूँची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की ,लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी नें सुधार करके मेरी भावनाओंको शब्द दिए और उसका नतीजा निकला ये गीत---
नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर-डर
सूख चुके हैं आँसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जी भर
रिमझिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत-समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं सहज चीन्ह कर