दिल से जो निकला वही कहा इसने ..--
1-सुनने लायक तो नहीं है लेकिन डांट न पड़े इसलिए बताया ..
2-वो तो ऐसे ही कई दिन से आपकी आज्ञा पेंडिंग थी तो...
3-और उपर से अभिषेक (ओझा) जी ने बार-बार अल्टीमेटम दे दिया तो ...
4-और पुराना हेडफोन टूट गया तो नया हेडफोन लिया जिसमे माईक था तो...
5- खैर!! मैं तो ये बताने आया था कि बच्चे पर से कोप हटा लिजिए .....
विश्वास ही नहीं हो रहा ...............हा हा हा ............लेकिन मुझे विश्वास था कि- ये जरूर कर सकता है ,
और इसनेकर दिखाया ....
और एक नजर---इस आत्मीय वार्तालाप पर भी --कुछ अंश बातचीत के---- मेरे लिए यादगार पत्राचार..... एक टिप्पणी छोड़ी थी अविनाश के ब्लॉग पर---
------बहुत दिनों से पढ रही हूँ आपको...समझने की कोशिश करती रहती हूँ...आज डरते-डरते पॉडकास्ट बनाने की हिम्मत जुटा पाई हूँ,(गलतियाँ हो सकती है) कॉपी राईट है आपका ...आपको सुनवाना चाहती हूँ(उच्चारण भी सुधारना है)...पर कैसे ? कोई उपाय?..
अविनाश----
आदरणीय अर्चना जी,
सुनता रहा हूँ आपके पॉडकास्ट।
यह मेरी उपलब्धि, मेरा सौभाग्य है जो आपने मेरी किसी रचना को आवाज देने योग्य समझा है।
बहुत छोटा हूँ मैं, समझ में, आयु में, गुणों में, सभी में।
मुझे 'तुम' ही रहने दें, आशीष का वरदहस्त रखें, वही उचित भी है, मेरे लिए सुखकारी भी।
कमी मुझमे ही रही होगी जो आपको समय-समय पर पढने/समझने में असुविधा हुई हो। आप कभी भी मुझे टोक सकती हैं, डांट सकती हैं। मेरा कर्त्तव्य है अपना लिखा हुआ स्पष्ट करना।
ये मेरा ईमेल आईडी है, आप संपर्क कर सकती हैं।
एक बार फिर से, आभार।
सादर,
अविनाश
मै---
स्नेहाशीष,
जानती हूँ छोटे हो...मगर सिर्फ़ आयु में...तुम्हें सुख देना मेरा कर्तव्य है।कमी मुझमें ही है क्यों कि मेरी कभी पढ़ने में रूचि नहीं रही। टोकने और डाँटने की जरूरत नहीं पड़ेगी विश्वास है। मैने जो किया है उसमें कई गलतियाँ हुई है...पर मैं हमेशा सीधे ही रिकार्ड करती हूँ बिना पहले लिखे..जो दिल में आता है वही बोलती चली जाती हूँ तुम्हारे बारे में भी जो कहा- दिल से कहा है कुछ भी बनावटी नहीं ....तुम मेरे बेटे की तरह हो (वत्सल २५ साल का है )गलतियाँ ठीक करवाना। एक तो तुम्हारा नाम ही--चन्द्रा या चन्द्र...फ़िर ब्लॉग का नाम-मेरी कलम से..से कहना था मुझे और फ़िर कविता के कई शब्द....कोशिश की है ---मेरा सुनो....और बताओ ...गलतियाँ सुधारकर फ़िर करूंगी ......पर क्या तुम अपनी आवाज में उन्हें पढ़कर भेज सकते हो?
स्नेह...
अविनाश----
आदरणीय अर्चना जी,
इतना गुणी नहीं हूँ जितना आपने मान दिया है। अपनी आवाज में भेज तो सकता हूँ, लेकिन आपकी आवाज में सुनना अधिक मोहक है और प्रिय भी। इतना अच्छा तो मैं लिख-लिख रट-रट के भी संभवतः नहीं पढ़ सकता।
२-३ चीजें जो छूट गयी हैं, वो बता रहा हूँ:
१) नाम अविनाश चन्द्र है।
२) पहली कविता की दूसरी पंक्ति में "उमग" है। "उमंग" नहीं, जैसा कि आपने पढ़ा है। बिंदु नहीं रहेगा।
३) पहली कविता के दूसरे अनुच्छेद में "अजस्र" है, आपने शायद "अजस" पढ़ा है। उच्चारण ठीक वही है जैसा कि आपने अनवरत के शब्दों को पढ़ते समय "अजस्र" का किया है।
४) पहली कविता, पाँचवे छंद में "विजन को" है, लेकिन पढ़ते समय संभवतः "विज़न जो" हो गया है।
५) दूसरी कविता में "प्रांतर" है, "प्रांत" की जगह।
कठिन शब्द रहे होंगे, लेकिन आपने बहुत ही सही उच्चारण किया है, गलतियाँ कोई भी नहीं हैं।
यहाँ तक कि आपने "हर्म्य" का उच्चारण भी पहली बार में ही सही किया है।
फिर भी इस वात्सल्य के लिए धन्यवाद नहीं कहूँगा, आशीष है, रख लूँगा।
प्रणाम।
मैं---
स्नेहाशीष,
मुझे तो सुनते रहे हो हमेशा... मै हमेशा सुनाती भी रहूंगी। एक बार अपनी आवाज में भेज दोगे तो मुझे भी अच्छा लगेगा।-- इतना अच्छा तो मैं लिख-लिख रट-रट के भी संभवतः नहीं पढ़ सकता। ----इस बात से सहमत नहीं हूँ।
जो गलतियाँ बताई हैं उन्हें सुधार लिया है पर एडिट करके ही क्योंकि जिस भाव से पढा उसकी नकल नहीं हो सकती ...Edit करना भी पहली बार ही सीखा है , वत्सल से...इसलिये अब सुनो फ़िर से ---और इसे पोस्ट करने की अनुमति भी चाहूँगी मेरे ब्लॉग पर ..
मना नहीं करोगे।
स्नेह....
अविनाश----
आपकी आज्ञा है सो अपनी आवाज में भेज रहा हूँ, लेकिन मुझे आपकी आवाज में सुनना ही अधिक प्रिय है।
आपने पहली बार एडिट किया है? और इतना अच्छा?
पोस्ट करने के लिए अनुमति की तो आवश्यकता नहीं ही है। आपको बस आज्ञा करनी है। मुझे हर्ष ही होगा।
मना करने जैसा कोई प्रश्न ही नहीं।
प्रणाम
अविनाश
और अब सही उच्चारण के साथ फ़िर से----
शुक्रिया अविनाश को उसकी आवाज में ---मुझे सुनाने के लिए--( भविष्य मे आपको भी ).....