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Tuesday, July 24, 2018

बीते हुए लम्हे


आज २४ जुलाई फिर से सामने आ खड़ी हुई है -कुछ याद चित्रों के सहारे 

















Sunday, October 1, 2017

पुरानी टी शर्ट


याद आई बात कोई अपने दरमियानी मुझे
मुस्कुराते लब हैं तो,आँखों में पानी किसलिए।

जल रही है आग बरसों से मिलन की आस में
फिर भला सावन में,इसको बुझानी किसलिए।

Wednesday, July 12, 2017

छठी इंद्री

जब भी जुलाई का महीना आता है तारीखें सामने आती है और उनसे जुडी घटनाएं भी ..सबसे पहले सुनिल का जन्मदिन 13 को फिर 20 को पल्लवी का ....कितना सुखद संयोग बेटी और पिता का जन्मदिन जुलाई में और माँ और बेटे का अक्तूबर में.......
खुशी के साथ ही ये महीना दुःख भी ले आता है .....सब कुछ आँखों के सामने आ जाता है बिलकुल किसी फ़िल्म की कहानी की तरह ......
बाकि सब तो समय के साथ स्वीकार कर लिया ....लेकिन एक बात मुझे आज भी अचंभित करती है.....ये तब की बात है 1993 के जुलाई माह से कुछ पहले की शायद 1 महीने पहले से कई बार एक सपना आता जिसमें मुझे लगता की मैं नीचे की और सीढियाँ उतर रही हूँ..सीढ़ियों पर पानी बहते  जा रहा है,फिसलन है,बहुत भीड़ है बहुत लोग धक्का देते हुए उतर रहे हैं....मेरे साथ बच्चे हैं मैं उनको सम्भालते हुए उतरती  जा रही हूँ ..और बहुत  नीचे एक मंदिर है जहाँ दर्शन होते है ...सुनिल  पर गुस्सा भी करती जाती हूँ कि आप तो नीचे नहीं उतरे ऊपर से हाथ जोड़ दिए मुझे दोनों बच्चों को लेकर उतरना कितना कठिन हो रहा है ......भगवान कौनसे हैं ये दिखने से पहले सपना टूट जाता और मैं याद करती तो लगता बड़वानी के गणेश मंदिर जैसा जो कुँए के पास था....और आधे कुँए में उतरकर दर्शन करते थे ....सोचती ये तो वही मंदिर है जो भाभी के घर वाला है ...ननिहाल जाने पर बचपन से देखते रही हूँ...
लगता देखा हुआ है इसलिए सपने में दिखता होगा ...लेकिन जब सुनील के शिलाँग के पास  24 जुलाई को हुए  एक्सीडेंट की खबर 25 जुलाई को रांची में  मिली और बच्चों को छोड़  गौहाटी जाना पड़ा ....तब सुनिल 2 महीने कोमा में थे ...कोई चारा नहीं था सिवा प्रार्थना के ...वहाँ किसी ने बताया  कामाख्या मंदिर में जाओ.....तो मैं पहली बार गई उनके  लिए प्रार्थना करने ..जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया ....हूबहू सपने वाली जगह लगी...और जब माताजी का दर्शन किया तो लगा  मुझे सपने में यही बहता पानी ....दिखता था .....2 महीने में बहुत बार गई....हर बार सपना सच्चा ही साबित हुआ ...बिलकुल वही मंदिर .....और एक बात कि उसके बाद कभी वो सपना नहीं देखा ....उनको  तो बचाकर लौटा नहीं पाई मैं ...लेकिन उसी शक्ति ने ...साहस भरा यहाँ तक आने का ....
हर जुलाई में ये घटना ताज़ी होकर याद आ जाती है ...क्या ये पूर्वाभास था ?छठी इंद्रीय द्वारा ......

Thursday, November 24, 2016

अपने का सपना


वो २५ नवंबर १९८४ का दिन था , और आज थोड़ी देर में २५ नवंबर २०१६ हो जाएगा। ....

हैप्पी एनिवर्सरी। .......

.(कोई दूसरी फोटो नहीं मिल रही यहां लगाने को :-(  )-

. तारीख वही रहती है बस साल बदलते-बदलते बहुत लंबा रास्ता तय कर लिया है अब तक ,करीब ३२ साल। ......
इन बत्तीस सालों में हमारा साथ रहा सिर्फ ९ सालों का। ....और २३ साल गुजारे तुम्हारे बिना। .. 




याद आ रहा है जब हमारी शादी हुई थी तो मेरी आयु २३ वर्ष थी ,और जब तुम गुजरे तब मेरी आयु थी ३२ वर्ष। .....


ये आंकड़ों का खेल भी बहुत निराला होता है न! 

अब जीवन में उस मुकाम तक आ पहुंची हूँ जहां से आगे का रास्ता सीधा है। ..... चलना तो अकेले ही है। ... कोई आगे निकल गए कोई पीछे  छूट जाएंगे। ...

खुद को व्यस्त रखती हूँ। ...ताकि खुद मुझे मुझसे कोई शिकायत न रहे। ... मेरे मन ने कुछ लिखा है पढ़ो --



किसी अपने का सपना हो तो अच्छा लगता है

कोई सपने वाला अपना हो तो भी अच्छा लगता है 

किसी सपने का अपना हो जाना जिंदगी बना देता है 

और किसी अपने का सपना हो जाना जिन्दगी मिटा देता है ....



गीत याद आ रहे हैं। ...  ...










Wednesday, December 2, 2015

अन्तिम दिन और एक गीत

2/12/1996........2/12/2015
19 साल...
पर उस दिन को ,उस पल को
भूलना आसान नही,
भुलाना भी क्यों?
और कैसे?
जबकि अंतिम सांस की आहट
और खड़खड़ाहट
गूंजती है अब भी
कानों में
और ये आँखे बंद
होकर भी नहीं होती
महसूसती हूँ
आज भी
अंतिम स्पर्श
...................
और
सुनाई देती है चीख
अंतिम मौन की....
......................
रात भर का साथ
और निर्जीव देह
एक नहीं दो ....

बस!
दिखाई देता है
जीवन यात्रा का
पूर्णविराम
.... जहाँ लिखा था-
ॐ नमो नारायणाय......
.........
वक्त के साथ
सफर जारी है मेरा
ॐ शांति शांति शांति...... -अर्चना वो भूली दासतां लो फिर याद आ गई ---

Wednesday, November 25, 2015

टू, भगवान जी

कुछ लिखते नही बन  रहा ...
..ये चिट्ठी हाथ में आई एक पुराने पर्स को फेंकने के लिए खाली करते समय....सुनिल के एक्सीडेन्ट के बाद की चिट्ठी है बेटि ने लिखी है ..........तब मेरे बच्चों के मन में क्या चल रहा था ....इस चिट्ठी ने सब कुछ सहेज लिया......तब पल्लवी पहली और वत्सल चौथी कक्षा में होगा.....
सुनिल अन्कॉन्शस रहे करीब साढे तीन साल ... उस समय मेरे पास समय नहीं रहता था बच्चों के साथ बिताने के लिए ...
भगवान जी पर भरोसा !...
अब भी है ,मुझे भी ...










आज शादी की ३१ वीं सालगिरह पर ये उपहार आपके लिए .....