Thursday, December 30, 2010

आभासी रिश्ते...आभासी नहीं हैं...

ब्लॉग जगत में आभासी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कहा गया ...मैने भी बनाए रिश्ते यहाँ...जो सहयोग मुझे मिला उसके लिए आभारी हूँ सभी की...मुझे लगता ही नहीं कि हम लोग मिले नहीं हैं..रिश्तों के बारे में बातें करते हुए .मैने लिखा कुछ इस तरह ----
चाचा,पिता,बेटे,बेटी और मित्र मिले है मुझको घर-घर
साहस मेरा और बढेगा नही रहूंगी अब मै डर-डर
सूख चुके है आंसू मेरे जो बह रहे थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका गम सारा बाहर भर चुके सारे नदिया निर्झर
मर चुके कभी अरमान मेरे जो जी उठेंगे अब वो जी भर
फ़ूल उगेंगे हर डाली पर हो चुकी सब डाली अब तर
छिन चुका था मेरा सबकुछ भटक रहे थे अब तक दर-दर
सुर सरिता की सहज धार मे अब पाया है स्नेह भर-भर
परबत -समतल एक हो गए मै जा पहूंची अभी समन्दर
चाह मुझे सच्चे मोती की लेना चाहूँ सब कुछ धर-धर ....
  गिरीश बिल्लोरे"मुकुल" जी ने सुधार करके मेरी भावनाओं को गीत के रूप में शब्द दिये  ......................और उसका नतीजा निकला ये गीत---

नित नाते संबल देते हैं
क्यों कर जियूं कहो मैं डर डर
सूख चुके है आंसू भी मेरे
जो बहते थे अब तक झर-झर
उफ़न चुका ग़म सारा बाहर
शुष्क नहीं नदिया या निर्झर
प्राण हीन अरमान मेरे प्रिय
जी लेंगे कल को अब जीभर
रिम झिम ऐसे बरसे बादल
हरियाये तुलसी वन हर घर
छिना हुआ सब मिला मुझे ही
दिया धैर्य ने खुद ही आकर
सुर सरिता की सहज धार ने
अब तो पाया है स्नेह मेह भर
परबत -समतल एक हो गए
जा पहुंचा मन तल के अंदर
चाह मुझे सच्चे मोती की
पाना चाहूं. सहज चीन्ह कर
  जिसे मैंने गाया कुछ इस तरह ---- 
शुक्रिया!!! 
साथ ही देखिए "कदम"पर नई पोस्ट

Wednesday, December 29, 2010

शुक्रिया....

आज सिर्फ़ शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ------
उन सभी साथियों का जिन्होनें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया इस ब्लॉग पर पोस्ट लगाने में ...
उनका... जिनके सहयोग से मैने बहुत कुछ सीखा...
उन साथियों का जिन्होनें अपनी रचनाओं का पॉडकास्ट बनाने की अनुमति दी...और उन श्रोताओं का जिन्होनें उन्हे सुना...
साथ ही
सभी साथियों को आगामी नववर्ष २०११ की अग्रिम बधाई व शुभकामनाएं

Wednesday, December 22, 2010

एक भावपूर्ण गीत..मन्नाडे दा का....

एक बहुत ही भावपूर्ण गीत-----बहुत कठिन लगा पर कहते है न-----कोशिश करने वालों की हार नहीं होती ...

Friday, December 17, 2010

एक नजर इधर भी ------

आज यहाँ  देखें ....थोडा सोचें....
क्या करना है ....
कैसे करना है .....
क्यॊ करना है .....
जानने के लिये देखते रहिये ...
कोई जल्द बाजी नहीं ........................ये काम का मामला है ....

Wednesday, December 15, 2010

>>>>>दीपक "मशाल"------पता नहीं क्या क्या

आज दीपक"मशाल"की एक गज़ल मेरी आवाज में----------उनके ब्लॉग की उदास फ़ोटो को समर्पित--

"मेरे घर की दीवालों ने बातें करना सीख लिया है ---यहाँ पूरी गज़ल पढ़ें

 

और ये कविता लिखी है चित्र देखने के बाद

शायद आप नहीं जानते वह गाते भी अच्छा है -----( गिफ़्ट दिया था मैनें --हा हा हा )-यहाँ पढे



एक गज़ल पहले भी सुन चुके हैं आप यहाँ
और हाँ पेंटींग भी करते है --देखियेगा उनके ब्लॉग मसि-कागद पर--सबसे  अंत में--

Tuesday, December 14, 2010

गीत फ़िरदौस का --स्वर मेरा--अर्चना चावजी

 एक गीत फ़िरदौस की डायरी से..



तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-फ़िरदौस ख़ान

Monday, December 13, 2010

एक जरूरी संदेश......जनहित में जारी





डॉ.टी.एस. दराल जी के ब्लॉग से --------------एक ई- मेल का हिन्दी अनुवाद
अगर आप इसे औरों तक पहुँचाना चाहें तो प्लेयर को डाउनलोड करके अपने ब्लॉग पर लगा सकते हैं...
स्मॄति शेष----- एक भजन रचना की आवाज में

Friday, December 10, 2010

Monday, December 6, 2010

इसमें बच्चे की क्या गलती ???



कल अचानक पहली कक्षा के बच्चों की क्लास लेने का मौका मिला। उनका एक टेस्ट लिया जाना था,चूंकि पेपर में प्रश्नों के सही उत्तर को, उनके जनरल नॉलेज के आधार पर भरना था मैने पेपर बच्चों को समझाना शुरू किया।प्रश्न स्वतंत्रता दिवस के बारे मे थे, और प्रश्न पढने के बाद जो उत्तर बच्चों ने दिये वो उनके जनरल नॉलेज के आधार पर सही थे।--


प्रश्न १-- भारत का नेशनल फ़ेस्टीवल (राष्ट्रीय त्यौहार) कब मनाते है ? (समझाया--जो सब लोग एक साथ मनाते है)
उत्तर मिला---भारत बंद......

प्रश्न२---कौनसे  दिन मनाते हैं?
उत्तर मिला---१३ अगस्त......(१५ को छुट्टी होने से १३ अगस्त को ही मना लिया गया था)

प्रश्न३---झंडा कहाँ फ़हराते हैं?
उत्तर मिला---स्टेज पर.....(फ़हराना का मतलब Hoist बताना पड़ा)

प्रश्न---कौन फ़हराता है ?
उत्तर मिला---प्रिंसीपल मेम...

प्रश्न---कितने रंग होते हैं?
उत्तर मिला---चार...केसरिया,सफ़ेद,सफ़ेद के बीच में नीला और हरा..........(हालांकि बच्चों को पता थाकि हमारे  झंडे को तिरंगा कहते है)...

Sunday, December 5, 2010

देखते ही देखते बदल जाते है-------

देखते ही देखते बदल जाते है-------
सड़क,शहर और लोग...
चीजें,जरूरते और भोग...
पैसा, ख्वाहिशे और अरमान...
घटना,गवाह और फ़रमान...
संबंध,नाते और रिश्ते...
इंसान,हैवान और फ़रिश्ते...

Saturday, December 4, 2010

Sunday, November 28, 2010

रिश्तो में दरार---एक कडवा सच !!

अतुल को उदास देखकर सहज ही पूछा था क्या हुआ ?
----- कुछ नहीं , यूँ ही , कहकर उसने टाला था ।
-----फ़िर भी ?--- उदास लग रहे हो ?
 ----- नहीं तो, क्या करूँगा उदास होकर ?
------ क्या घर की याद आ रही है ?
------नहीँ , क्या करेंगे याद करके ?
------अरे , ये भी कोई बात हुई ? घर की याद तो आती ही है ।
----- कैसा घर ?, किसका घर ?
-----क्यूँ ? मैने पूछा।
------- केजी टू से तो यहीं हूँ , अब यही मेरा घर है ।
----- फ़िर भी घर पर कौन -कौन है ?
------- सब हैं 
----- फ़ोन कर लिया करो ।
------ क्या करेंगे फ़ोन करके ?
-----पूछ लिया करो सब कैसे हैं ?
-----क्या पूछेंगे ? हमेशा रटारटाया जबाब होता है---सब अच्छे हैं ,और जब हमसे पूछेंगे तो हम भी वही कहेंगे---अच्छे हैं ।
----- अरे , तो कौन -कौन हैं घर में, सबका नाम लेकर पूछ्ना --- वो क्या कर रहे हैं ?
--------- सब हैं--- मम्मी-पापादीदी , दादादादी , अंकल - आंटी , सबके बारे में पता है- दो लोग टी वी देख रहे होंगे ,तीन खाना खा रहे होंगे और दो बतिया रहे होंगे इस समय , यही उनका रूटीन है 

------मैं अवाक थी , १० वीं में पढने वाले बच्चे अतुल का ऐसा व्यवहार अपनों के प्रति देखकर, फ़िर भी पूछा---छुट्टियों में घर जाओगे ?
-----हाँ , जायेंगे---अनमने मन से जबाब दिया 
-----क्या करते हो वहाँ अपने गाँव में जाकर ?
-----कुछ नहीं , मैं तो घर से ही नही निकलता , अगर अपने गाँव में घूमने भी निकलूँ तो गलियों में ही गुम जाऊँगा ,वापस घर तक भी नही पहुँच पाऊँगा ।
----- अरे ,ऐसा क्यों ?-----क्या तुम्हारा गाँव बहुत बडा है ?
-----नहीं बरसों से बाहर हूँ , अपने ही गाँव में अनजान हूँ , वहाँ कोई मुझे नही पहचानता , जब जाता हूँ तो सब ऐसे देखते हैं---जैसे जंगल से कोई जानवर घुस आया हो ।
-----ऐसा नही कहते बेटा ।( मैनें समझाते हुए कहा )
-----ऐसा ही है ,वो तो हमारी किराना दुकान है, तो मैं वहीं बैठा रहता हूँ दिनभर लोग आते -जाते रहते हैं , तो थोडा मन लगा रहता है ।
-----अच्छा बताओ , आप के लिए सब खुश तो होते होंगे कि ये शहर में पढता है ।
------हें हें हें----क्या खुश होते होंगे (हँस पडा अतुल)-----पडोसी को ही मैं और मुझे पडोसी नहीं जानता ।
-----चलो छोडो , ये बताओ ---आपके वहाँ से कौनसा शहर पास पडता है ?
----- इलाहाबाद ।
-----वाह ,तो वहाँ के बहुत से बच्चे इलाहाबाद में भी पढते होंगे ?
-----हाँ ।
-----जब आप जाते हैं तो वे भी मिलते होंगे ? तब आपस में एक- दूसरी जगहों के बारे में तो बातें होती होंगी ?
-----हाँ , आते तो वे भी हैं मगर हमारी छुट्टियों का समय अलग-अलग होने से आपस में मिल नहीं पाते हैं और वैसे भी एक-दूसरे को जानते कहाँ है ? जो पूछें ?
-----तो आप इतनी दूर यहाँ क्यों आये पढने ?, अपने पास के शहर क्यों नहीं गये ?
-----पता नहीं ,बस पापा ने यहाँ भेज दिया --- कहते हैं पास में तो रखना ही नहीं है, ठीक है ---मैने भी सोच लिया--- अब वो चाहेंगे तो भी मैं पास में कभी नही रहूँगा ।--- जॊब भी दूर ही ढूंढूगा ।-------

---------मैं चुप , निरुत्तर हो गई , ऐसा कडवा सच जानकर जिसे झुठ्लाया नही जा सकता ।

Thursday, November 25, 2010

यादें बस यादें रह जाती है ...

तारीखें हमेशा दर्ज हो जाती है...जेहन में...
फ़िर उठती है सिहरन...... मन में.....
काँपती है रूह अब भी......तन में.....
फ़िर बितेगी रात बस.....चिंतन में......




 






सुबह की शुरूआत -माँ शारदे की वन्दना से



सुनिये गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी की एक रचना (इसे इस ब्लॉग से पढ़ा)

 

Sunday, November 21, 2010

आओ लिखो--- बढ़िया...लाजवाब....खूबसूरत ....पंक्तियाँ....(हा हा हा..)

पैसा कमाएं और खूब कमाएं............

ये आपकी जरूरत और हक है,

मगर ...कभी भी कमाया पैसा --व्यर्थ न गंवाएं.....


राह दिखाएं और खूब दिखाएं...........

ये आपकी जिम्मेदारी और कर्तव्य है ,

पर कभी भी किसी को --गुमराह न करें......


हाथ थामें और साथ चलें..........

ये आपका फैसला और शौक है ,

पर कभी भी किसी को --मझधार मे  न छोड़े..........

Thursday, November 18, 2010

जाने कब??

एक पुरानी कविता (?) आज फ़िर से ----

यहाँ हर एक की अपनी कहानी होती है ,
कभी खुद तो कभी दूसरो की जबानी होती है।
हमे अपने बारे मे सब पता होता है ,
क्या अच्छा होता है?,क्या बुरा होता है।
अपने फ़ायदे की हर बात, हम मानते है,
और स्वार्थपूर्ती के लिये हर जगह की खाक छानते है।
जिससे हो हमे नुकसान ,ऐसी हर बात टालते है,
और जरा-सी बात पर ही ,दूसरो को मार डालते है।
कुछ लोग जब यहाँ अपनी लाइफ़-स्टोरी गढते है,
तभी कुछ लोग, औरों की लाइफ़-स्टॊरी पढते है।
यहाँ लोग अपने पापो का घडा दूसरो के सर फ़ोडते है,
और दूसरो की चादर खींचकर मुंह तक ओढते है।
जो कुछ हम करते है,या करने वाले होते है ,सsssब जानते है,
फ़िर भी अपने आप को क्यो??? नही पहचानते है ।
जाने कब??? वो दिन आयेंगे ,
जब हम अपने आप को बदल पायेंगे!!!!!!!!!!

Sunday, November 14, 2010

उफ़्फ़... ये पिद्दे और इनकी अदाएं......बाल दिवस पर विशेष

 आज मन था मेरे गाये बच्चों के गीत सुनवाने का ,पर किसी कारण से अभी नहीं सुनवा पा रही हूँ ,शायद शाम तक .....तब तक रविवार बिताइये इनके साथ----

 बच्चे मन के सच्चे----

 रेलगाड़ी रेलगाड़ी---

 मुन्ना बड़ा प्यारा----

 चुन-चुन करती--
 

लकड़ी की काठी--


 म्याँऊ-म्याँऊ------


 नानी तेरी मोरनी(नया)---



ईचक दाना----


काबुली वाला आया---

चंदामामा दूर के ---


मैने कहा फ़ूलों से ---


रे मामा रे मामा रे-----

चंदा है तू----


है ना बोलो बोलो----


 बोल मेरे मुन्ने----


कुछ और याद आ रहे थे --अभी नही मिल पाये ---
तीतर के दो आगे तीतर .....
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे....
और-और-और-------

Thursday, November 11, 2010

माँ कैसी होती है ???



पहले सुबह उठकर
सपने बुनती थी
अब सपने सोचकर ही
रोज सोती है
माँ ऐसी ही होती है।
पहले खोई रहती थी
सपनों में
अब सपनों के
खोने से डरती है
माँ ऐसी ही होती है  ....   



Tuesday, November 9, 2010

आत्मग्लानि........क्षमा याचना...

बहुत कोशिश करती हूँ पर हर दिवाली मे उसका चेहरा जैसे आँखो के सामने से हटने का नाम नहीं लेता....बात करीब १९/२०  साल पहले की है ...राँची में रहते थे हम....काली पूजा देखने गई थी ये पहला मौका था ,पति और दोनों बच्चे साथ थे , बेटे का हाथ पिता ने थाम रखा था, और मेरी बेटी गोदी में थी मेरे । हम बड़ी उत्सुकता से एक के बाद एक पंडाल देखते  जा रहे थे ।बहुत भीड़ थी, पास से एक ट्रक गुजर रहा था ड्राइवर और क्लीनर के बीच में बैठे देखा था उसे ....७-८ साल, करीब मेरे बेटे की उम्र का बच्चा था...बदन पर सिर्फ़ एक नेकर...और जो कुछ मैने देखा उसे आज तक किसी को बता नहीं पाई थी सिर्फ़ इसलिये कि मेरे बच्चे इस घटना को जानकर डर न जायें.(एक बार जिक्र भी किया है--कुछ अधूरा -सा ---- संजय अनेजा जी की पोस्ट को पढ़कर उनके ब्लॉग पर  )(आभार संजय जी का इसे पढ़ते ही याद दिलाया उन्होने ) .किसी फ़िल्म के दॄश्य जैसा था वो दॄश्य...(अमिताभ जी की कोई फ़िल्म थी )...बच्चे के दोनों हाथ बंधे हुए थे और उसके मुंह और सिर पर बारी-बारी शराब उंडेल रहे थे वे दोनों.और बच्चा पता नहीं कबसे उनके चंगुल में था..शराब मुंह मे न जा पाने के कारण बैचैन था..बार -बार खड़ा होता फ़िर वहीं सिट पर गिरता और वे दोनों हँसते ....अब भी याद आती है उसकी ,सोचती हूँ पता नहीं किसका बच्चा होगा वो........अब कहाँ होगा?...होगा भी या नहीं ?.....और होगा तो किस हाल में?....और मैं उस समय मूक क्यों बनी रही ???ये सवाल मुझे सोने नहीं देते .....हर साल वो याद आता है और मैं अपने -आपको कटघरे में पाती हूँ....काश मैं उसके लिए कुछ कर पाती ...

Friday, November 5, 2010

शुभ-दीपावली

हर नए दिन में एक नई आस हो ,हर आशीर्वाद का साया आपके साथ हो
कोई दुःख आपको छू न सके ,बस मुस्कुराहट ही मुस्कुराहट आपके पास हो ...
दीपावली की शुभकामनाए ..









Tuesday, November 2, 2010

हाड़ी रानी --रचना की आवाज में

आज सुनिए रचना की आवाज में मन्नाडे द्वारा फ़िल्म "नई उमर की नई फ़सल " के लिए गाई गई एक कविता जिसे हमने पहली बार सुना और देखा ज्ञान दर्पण  पर जिसे रतनसिंह शेखावत जी ने प्रस्तुत किया था। विस्तॄत रूप से कविता पढिये व विडियो देखिये ब्लॉग  ज्ञान दर्पण पर..




 हम सहॄदय आभारी है शेखावत जी के ---इस रचना से रूबरू करवाने के लिए..

Sunday, October 31, 2010

एक गज़ल ---समीर जी की...



समीर जी के बारे मे ज्यादा जानना चाहें तो फ़िलहाल यहाँ पढ़िये---

 और दिव्यांशी बिटीया को अब तक जिसने जन्मदिन की बधाई न दी हो वे बधाई दे राजेन्द्र जी के ब्लॉग पर ...सुने उनकी एक रचना बेटी....

(अगर प्लेयर न चले तो शिर्षक पर एक बार क्लिक करें)

Saturday, October 30, 2010

शुक्रिया....

समयाभाव के कारण सबका अलग-अलग शुक्रिया अदा नहीं कर पा रहीं हूँ इसलिए  मेरे जन्मदिन पर मुझे शुभकामनाएं प्रेषित करने वाले सभी शुभचिंतकों का शुक्रिया अदा करती हूँ-----
आज ये दो गीत मेरी पसंद के --
न तुम हमें जानो...



जीवन के दिन...

Sunday, October 24, 2010

ये.....गोल्ड मेडल होता कैसा है?

Gourav Agrawal ने कहा…
@ अर्चना जी आपकी टिप्पणी जैसे गोल्ड मेडल :) आभार :)

मेरी द्वारा की गई टिप्पणी पर इस जबाब ने मुझे मुड़कर देखने को मजबूर कर दिया.........और जब पलट कर (अभी जितना देख पाई) देखा तो जो पाया आप भी देख सकते हैं -----   .ये गोल्ड मेडल होता कैसा है?..


इसे कहते हैं ------बढिया,खूबसूरत,और मनमोहक प्रस्तुती----
पढने ,सुनने ,देखने -----की तीनों विधाओं का भरपूर प्रयोग.......
सहेजने योग्य-- एक यादगार पोस्ट-----मनोज


कही "ये" से "वो" बन कर नींद ढो रहे हैं .....
तो कहीं "वो" बनने के बाद अपना "ये" खो रहे हैं..adaa 


साँप और सीढ़ी
खेली मेरे साथ जिंदगी
निन्यानवे अब तक
पार नहीं हुआ
कई बार चढ़ी
खेल अब भी शुरू है
जीतूंगी भी, मै ही
चाहे खेलना पड़े
 पीढ़ी दर पीढ़ी.....गीत मेरी अनुभूतियाँ


बिछड़े सभी बारी बारी है....
याद आती बाते सारी है....
चाहे भोला हो या हो फत्तू....................मो सम कौन


जिस घर मेरा बचपन बीता वो घर भूल न पाती हूं....
बाट जोहता है भैया मेरा-ये मैं जान जाती हूँ....
इसीलिए माँ -हर सावन में राखी के बहाने आती हूँ....
झूला देख मुझको--माँ पापा की बांहें याद आती है ...
इसीलिए शायद सावन में मेरी आँखें भर आती .........................मेरे गीत 


हर जगह बिखरा पडा था ,
मै था एक माटी का लौंदा,
ले न पाता रूप कोई, मुझको था
धर्म,जाति,क्षेत्रियता ने रौंदा,
मिले कुम्हार जीवन में मुझको,
देख जिन्हें मेरा मन कौंधा,
श्रद्धानवत हूँ उनके आगे,
 बना जिनसे मेरा घरौंदा.........मेरे कुम्हार


पता नहीं कब तक
वही आंसू
फिर वही शांती
फिर वही पैग
फिर वही पिता
फिर वही कुपुत्र
और अनंत तक चलने वाली शान्ति की खोज ....---बाबा के बारे में


...और जब कुछ लिखने का मन होता है
बन्द करता हूँ आँखों को
पलकों की कोर से भी
कुछ नहीं देखता
तुम हर ओर नजर आती हो
कलम अनायास ही चल पड़ती है
कागज पर उकेरने शब्द
एक लम्बी आह लेकर
और उभर आता है तुम्हारा अक्स
लोग उसे भी कविता कहते हैं.....समीरलाल


....मैने कहा-आँखों से
तुमने सुना मुस्कानों से,
आओ मिल-बैठ कुछ बतिया लें
कुछ धीमे से-कुछ दुबके से...
अब भी तुम न मौन रहो
कुछ तो कह दो चुपके से ...कडुआ सच


और जब सपने टूट जाते थे ,
और जरूरते रोती थी ,
तब सरकार सपनों की गिनती कर,
जरूरतों के हिसाब से कागज पर,
आंकडे भरती थी.......... मौन थी मै ओम जी की ये कविता पढकर.....


"कॄष्ण" तुम हो नही ..मुझे लगते हो "राम" से ,
माता से दूर वनवास.. गए हो अपने काम से ...... दिलीप


ये दुख तो बस तब कम हॊ
जब किसी को न कोई  गम  हो
बाँट चुके हम सारी खुशियाँ
इस दुख के बदले में कि
कम से कम मेरे आस-पास
किसी की आँख नम न हो.............
जिनको भी दुख हो वे
आए और ले जाएं कि
मेरी खुशियाँ.. कभी खतम न हो............मौन हूँ मै 


अच्छाई में पाप नहीं,तुम अच्छाई से नहीं डरो.......
बस!! भला सभी का हो जिससे,सदा काम तुम वही करो.....दिलीप 



"तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते ,
भला क्यों न हो....."आदत जो होती है उन्हे मुसकुराने की "......तकदीर


वो भी एक घर था
ये भी एक घर है ,
वो घर याद आता है मुझे ,
 ये घर याद करेगा मुझे .....बैचैन आत्मा


..और जब हम फ़ैले
तो सब कुछ समेट लाएं
अपने अन्दर बन कर समंदर... ...मौन की चाह..


आओ मुझसे मिलो
बिना झिझके
गले भी लगो
मैने बना लिया है
मौन का एक खाली घर
जहाँ मैं हूँ और मेरे कंधे
रो कर थके हुओं को
सोने के लिए
एक जादू की झप्पी के बाद
रोने की नहीं होती कोई वजह
और इसीलिए
मेरे घर में हमेशा बची रहती है जगह...       मौन के घर में--


तुम छलना नही छोड़ सकते
तो क्यों मैं छोड़ दूँ अपनी प्रीत ! ....
तुम चाहे जग को जीत लो..
पर मैं जाउंगी तुमको जीत......सुनो उधो



ये अहम ही तो है जो बादल लेह में फटे ,
जहाँ कहा जाता है,वो बरसते भी नहीं ...
फटने न् देना कभी मन में छाए घने बादलों को,
वरना सबके साथ अपना वजूद भी नजर नहीं आएगा ...
तबाही फैलाने को नहीं है ये मन तुम्हारा,
उम्मीद रखो रिश्ते का रेगिस्तान भी हरा नजर आएगा ........कुछ मेरी कलम से .


मैं आदमी अंधेरे का बिखेरता प्रकाश रहूं
टुकड़े टुकड़े होकर बस रुप बदलता रहूं
खुदा ने चाहा तो फिर मिलेंगे...
उम्मीद की एक किरण- चमक बाकी हैं कहीं...----अंधेरे का आदमी 


हाँ---- दुख और आँसू.........
हाँ दुख सचमुच ही लहू को ठंडा कर देता है ,
तभी तो आँखें भर आती हैं ,
ओस की तरह ,
और ठंडा लहू जब रगों में दौडता है ,
आँसू जम जाते हैं आँखों में........मौन के खाली घर में ......


मेरे डसने के बाद आदमी जिन्दा नही बचता,
मगर तुम्हारे डसने के बाद तो,
जीते-जी ही- मरते रहता है ......एक साँप धीरे से जा बैठा ----

एक चमकीली... काली-काली कविता.........छोटी-छोटी बातें ...पर मैने पा ली कविता......... एक था काला......


हाए!!! मौला !!!
होश गँवाकर
ये क्या-
कर गया ???
इन्सान तो रस्ते पर आया नहीं
और
शैतान गुजर गया..... देखो न !!!!!!!! कब तक वो देखता ??


तडप-तडप के जी रहा अब,कि उसका अक्स भी बदल गया,
जला था सिर्फ़ वो,पर उसका सब कुछ झुलस गया........शबनमीं लू में................



आशा करती हू ------
हंसों के वे जोडे वापस आएंगे
रिश्तों के टूटे मोती भी साथ लाएंगे
गूंथेंगे माला
पहनाएंगे दादी को
सुनाएंगे कहानी
और याद करेंगे नानी को
खेलेंगे खेल और
सूने घर में भर देंगे शोर
निराश न हों
होगी एक दिन फ़िर वही सुहानी भोर......जुडेगी फ़िर रिश्तों की डोर


मुझे याद करते ही हाजिर रहूंगी...
माँ हूँ तेरी---मुँह से कुछ न कहूंगी.....


और अगर फ़िर भी बच जाए ,
तो बारिश मे भी लाएं,
हम जैसे नन्हे मुन्नों को,
इंद्रधनुष दिखलाएं..............सूरज से विवेक पूर्ण रिक्वेस्ट .............


जरूरतें होने लगती हैं
सपनों पर हावी
पर विश्वास
जिन्दा रखता है
सपनों को भावी....."
या
जरूरतें होने लगती है
हावी--- सपनो पर ...
और विश्वास जिन्दा रहता है
भावी सपनों पर .....विश्वास और सपने ---


माँ-----
कब याद नहीं आती ?.....
हर पल,हर दिन .....
मेरे साथ रहती है .....
मुझसे बातें करती है ....
मुझे छोड कर कहीं नहीं जाती है .....
आज भी आयेगी .....और
मेरे साथ केक खाएगी................Samir Lal


वाह दीपक उस्ताद जी को भी झिलवा ही दिया ...हा हा हा...एक मेल और करो..थोड़ी और व्याख्या.....

Thursday, October 21, 2010

महकता गुलाब...जो कहीं खो गया...

अतीत का वो सुनहरा पन्ना
उड़ गया है मेरी डायरी से
जिस पर रखा था मैंने
खुशबू बिखेरता एक गुलाब
पता नहीं वो आँधी थी,
या कोई तूफ़ान
जिसमें बिखरा
मेरा सब सामान
दूर-दूर उड़कर अब
हुआ आँखों से ओझल
समेटते-समेटते अब तो
मेरा दिल भी हो चुका बोझल
सोचती हूँ अब खुद भी बिखर जाऊँ
उसी हवा संग उड़ जाऊँ
जिसने मेरा पन्ना उड़ाया
और खूशबू बिखेरता मेरा गुलाब चुराया......

Tuesday, October 19, 2010

बोलो ठीक है न......एक पुरानी पोस्ट.............................

जो कुछ चाहो , वो मिल ही जाए ,
ऐसा कभी नही होता है ।
इसलिए जो कुछ मिले ,
उसे " चाह " लेना ही ठीक है ।

जो कुछ सीखो , सब आ जाए,
ऐसा कभी नही होता है ।
इसलिए जो कुछ आ जाए ,
उससे ही " सीख " लेना ठीक है ।

जो कुछ लिखा है , वो सब पढ लिया हो ,
ऐसा कभी नही होता है ।
इसलिए जो कुछ पढ लिया हो ,
उसे ही " याद रख लेना " ठीक है ।

जो कुछ सुना , सब समझ लिया ,
ऐसा कभी नही होता है ।
इसलिए जो कुछ " समझा " ,
उसे ही " कर " लेना ठीक है।

जो कुछ बोला , सब काम का हो ,
जरूरी नही होता है ,
लेकिन बडों की कही हर बात को ,
शान्ति से " सुन " लेना ठीक है ।

जो कुछ खो गया , वो फ़िर से मिल जाए ,
ऐसा हमेशा नही होता है ,
इसलिए जो मिल गया ,
उसे ही " सहेज " लेना ठीक है ।

खुशी और गम , किसी के पास ज्यादा होते है ,
किसी के पास कम ,
इनको समान करने के लिए ,
आपस मे " बांट " देना ही ठीक है ।

किसी भी उम्र में कोई भी व्यक्ति ,
कभी परिपूर्ण नही होता है ,
इसलिए हर छोटे- बडे की कही बात पर ,
" ध्यान " देना ही ठीक है ।

कोई भी संस्कृति या धर्म ,
किसी को बुराई नही सिखाता ,
इसलिए हर धर्म और संस्कृति को ,
हमेशा " मान " देना ही ठीक है ।

Saturday, October 16, 2010

जय -जय माँ दुर्गा काली ......जय माता दी....................

लाल्लालाला ssssssssssssआ...लालालालाआssssssssssss ज़ूज़ूज़ूज़ूऊऊऊऊऊज़ूज़ूज़ूज़ूज़ूज़ू--हा हा हा हा

करना तो था श्री महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत्र...................पर माईक काम नहीं कर रहा ......पहले रिकार्ड कर चुकी कोई प्रार्थना ढूंढी....................नहीं मिली.................मिला तो ये गीत.........उतना बुरा भी नहीं पर तब भी कोई मेहमान के आ जाने से बीच में रोकना पड़ा था...........पर ये तो अपना स्टाईल है .......यही सही......एक नया प्रयास..............हा हा हा......पर माईक ठीक होते ही पहले स्त्रोत्र......(या कहीं से जुगाड़ के (रचना या देवेन्द्र जिन्दाबाद) )..पक्का........
सारे ब्लॉगर साथियों और उनके परिवार को नवरात्री पर्व और दशहरे की शुभकामनाएं.............मेरी और मेरे परिवार की ओर से........ईश्वर सबको हमेशा खुश रखे इसी कामना के साथ ......सुनिये ये गीत (जैसा भी है ...)

 

Friday, October 8, 2010

चित्र वत्सल का.....गीत ललित शर्मा जी का और स्वर मेरा (अर्चना चावजी)

 ये गीत ललित शर्मा जी के ब्लॉग "शिल्पकार के मुख से" पर आप पढ़ सकते हैं।-(  इस ब्लॉग के सारे लेखों पर अधिकार सुरक्षित हैं इस ब्लॉग की सामग्री की किसी भी अन्य ब्लॉग, समाचार पत्र, वेबसाईट पर प्रकाशित एवं प्रचारित करते वक्त लेखक का नाम एवं लिंक देना जरुरी हैं.)
 




 ललित जी का एक और गीत यहाँ सुन सकते हैं आप


Tuesday, October 5, 2010

मै , जब छोटी हो गई थी......आज फ़िर हो गई हूँ।

"अब तक अपने बच्चों को उंगली पकड़ कर यहाँ तक लाई हूँ,अब उन्होंने मेरी उंगली पकड़ ली है। पढ़ने के लिए दोनों बच्चे घर से दूर चले गए है, फ़ोन पर बातें होती रहती है, मगर जब बेटे से कहा कि जब तुम लोग यहाँ छुट्टियों में आते हो तो ऐसा लगता है कि  अब बहुत हो गया, मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना रहता है, मगर ज़रूरी बातों के अलावा कुछ कह ही नही पाती और तुम्हारे जाने का समय हो जाता है, तो उसने सुझाया- आप जो कहना चाहते हो उसे लिख दो।
मगर कैसे ? पूछने पर उसने ये ब्लॉग बना दिया |जब भी फ़ोन लगाती--पूछता लिखा की नही?  
मेरा जबाब होता-- लिखूंगी।
यहाँ तक कि फ़ोन लगाने के पहले ही डर लगने लगा कि फ़िर पूछेगा तो???? 

बेटी कहती हमें तो कुछ करने के लिये कैसे कहते हो अब आप करो तो !!!!|आखीर एक दिन तय कर ही लिया की आज तो कुछ न कुछ लिख ही दूंगी चाहे पसंद आए या न आए,पर अब जबसे कमेंट्स आने लगे (कभी कभी ) तो डर लगता है कि वे सब आगे भी पढ़ने की उम्मीद से कमेंट्स करते हैं। कल ही बेटे से कहा है -तूने मुझे मुसीबत में डाल दिया है तो हँसने लगा। .......तब तो उससे बोल दिया कि हंस ले, हंस ले मगर अब समझ में आ रहा है की बच्चे, माँ की उंगली छुडा कर क्यों भागते है!!!!!!!!!! (जबरदस्ती करवाती है न सब )"

पहले लिखी थी ४फ़रवरी२००९ को  ये पोस्ट कुछ इस तरह


आज वत्सल का जन्मदिन है, (समय हो गया ये लिखे उसे ) तो याद आई---(फ़िर से देखा और सुधारा बहुत गलतियाँ थी मेरी --हा हा हा )
और उसने भी तो नया किया है इसलिए


जन्मदिन की बधाई व शुभकामनाएं--ईश्वर तुम्हे वह सब दे जिसके तुम हकदार हो...आशीष

Monday, October 4, 2010

आज सिर्फ़ महफ़ूज़ के लिए------

अभी पाबला जी के ब्लॉग पर ये दुखद समाचार पढा---हम फ़िर साथ खेलेंगे ..
और याद आया ये गीत ....(और कुछ लिखने के लिए शब्द नही है आज )

Sunday, October 3, 2010

सही है

कागज बनता है बांस से ,
पानी का मोल है प्यास से,
चुभन होती है -फांस से,
उम्मीद बंधती है -आस से,
जीवन चलता है- साँस से,
जीवन में रस घुलता है -हास से,
कुछ रिश्ते होते है -ख़ास से,
खुशी होती है- अपनों के पास से,
और सम्बन्ध कायम रहते है
-- विश्वास से ।




अगर सुनना चाहे कुछ तो यहाँ सुने कुछ ----

१ ----न् दैन्यं न् पलायनम 

२ ---मिसफिट :सीधीबात 

३ ---आँख का पानी 

४ ---हिन्दी,मराठी,या गुजराती 

५ ---तिरंगा 

६---जगराता 

Monday, September 27, 2010

खेल-खेल में मेरी एक कविता बच्चों को समर्पित...

आज किसी की नहीं मेरी एक कविता मेरे स्वर में सारे बच्चों को समर्पित--




एक प्रेरणादायक प्रसंग यहाँ भी 

Sunday, September 26, 2010

प्रिय बेटी,समर्पित ये दिन तुझको



१,२-मै और बेटी,३-माँ के आस-पास दोनो बेटीयाँ (भाभीयाँ)४-निशी-पापा के साथ५-मेरे साथ प्रान्जली(देवेन्द्र) व सुहानी(राजेन्द्र)६-जीतेन्द्र के साथ वैदेही(वैदेही से मिलिये यहाँ )
और बेटीयों को समर्पित ये कविता--(मोबाईल पर मेसेज मिला था)

ओस की बूँद सी होती है बेटियाँ
स्पर्श खुरदरा हो तो रोती है बेटियाँ
रोशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को
दो-दो कुलों की लाज होती है बेटियाँ
कोई नहीं एक-दूसरे से कम
हीरा है अगर बेटा
तो सच्चा मोती होती है बेटियाँ
काँटों की राह पर ये खुद ही चलती रहेंगी
औरों के लिए फ़ूल बोती है बेटियाँ
विधी का विधान है
यही दुनियाँ की रस्म है
मुट्ठी भर नीर सी होती है बेटियाँ...

Saturday, September 25, 2010

जस्ट फ़ॉर चेंज......

देवेन्द्र का गाया एक गीत-- पल-पल दिल के पास ...


मैं-- अफ़साना लिख रही हूँ...


मैं-- न जाने क्यों ...


मैं-- हा हा हा हा 


बस एक झलक ...

ना मालूम उसका
मेरी गली में फिर आना हो ना हो
या मेरा ही कभी 
उसके घर जाना हो ना हो
मिल लूँ बस एक झलक 
पलक झपकते ही उसे
शायद फिर कभी 
पलक झपकने का बहाना हो ना हो ...

Thursday, September 23, 2010

ये आंखों की नमी भी न

मेरी आँखों में रह-रह कर कुछ भर जाता है ,
छूने से गीला लगता है,
पर पानी नहीं है वो,
क्योंकि पानी की तो कमी हो गई है,
अरे हाँ, खारा- सा लगता है-
कहीं समंदर तो नहीं?
पर नहीं समंदर हो नहीं सकता,
क्योंकि हर समय नहीं रहता-
भरा आँखों में कुछ,
और वापस नहीं जाता,
आँखों से बह जाता है,
हाँ,याद आया-शायद आंसू,
माँ कहती थी-आंसू खारे लगते हैं।
पर आंसू क्यों होंगे?
वो भी तो कब के सूख चुके,
फ़िर भला ऐसा क्या है?जो-
गीला है,पानी जैसा है,खारा है,
और मेरी आँखों को भर देता है,
और जब देखो तब मेरी आंखों को,
नम  कर देता है |

Wednesday, September 22, 2010

जी करता है जी लूं--

मेरे नसीब में नहीं है, जीना प्यार की जिंदगी
दिल करता है ले लू, जो मिले उधार की जिंदगी
सुन -सुन कर किस्से, खुशियों भरे गुलशन के
जी करता है जी लू, थोड़ी सी बहार की जिंदगी ....

Tuesday, September 21, 2010

मै कौन हूँ ?

मुझे पता है- मैं कौन हूँ?
मैं हर समय रहने वाली आत्मा हूँ,
जो न कभी मरूँगी,न मिटूंगी,
बस---रहूँगी और डटूंगी,
हर उस जगह पर
जो मेरे लिए बनाई गई है।
मुझे पता है-मेरी जगह निश्चित नहीं है,
इसलिए मैं घूमती हूँ यहाँ-वहाँ,
अन्य लोगों से मिलने के लिए,
जिनसे मेरा मिलना जरूरी है,
हर उस जगह पर,
जहाँ वे मेरा इंतजार कर रहे हैं।
मुझे पता है- मुझे हर वो काम करने हैं,
जो मुझे दिए गए हैं,
मै सिखती हूँ उन्हें ,मेहनत से,
करती हूँ उन्हें, मनोयोग से,
पर हो जाते हैं कुछ गलत,
और इसी कारण से शायद,
मै आत्मा हूँ,मेरी जगह निश्चित नहीं है,
और मेरे काम बाकी रह जाते है हमेशा ...

और यहाँ सुनिए फ़िरदौस की गज़ल

Sunday, September 19, 2010

शाम अधूरी मीत याद बिन----एक गीत गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी का

बिना किसी भूमिका के सुनिए गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" जी का ये गीत-----



इनका ही एक और गीत सुन सकते हैं यहाँ 

और एक चित्रों से सजा ब्लॉग देखिए यहाँ

Friday, September 17, 2010

बता सकते हो?

कांटो में फंस चुकी हूँ ,हंसने को कहते हो क्यों
न  ठौर न ठिकाना,बसने को कहते हो क्यों
एक भी सुराख ना मिला अब तक मुझे
यूं किरण बनकर चमकने को कहते हो क्यों...

Wednesday, September 15, 2010

दुख नहीं होता पर बुरा लगता है मुझे भी ...कंचन की तरह ...

यूं तो अपने होठों पर ऊँगली रखकर चुप बैठना मुझे पसन्द है,पर मुझे शिकायत है "उससे"-"वो" एक बार,दो बार नहीं हर बार ऐसा क्यों करता है? "वो" मुझे जो भी काम देता है मैं मन लगाकर,न आता हो, तो सीखकर उसे पूरा करती हूँ,पर हर बार जब काम पूरा होकर परिणाम देने वाला होता है,"वो" उस काम से मुझे दूर कर देता है,ये बात तो ठीक नहीं?-----बुरा लगता है मुझे भी ..पर ठीक है,हर बार सोच लेती हूँ-"वो" सब जानता है तो कुछ अच्छा सोचकर ही ऐसा करता होगा।


सबसे पहली बार मुझे याद है तब मुझे व्यक्तिगत खेलों की चेम्पियनशीप मिलने वाली थी,हम सब सहेलियों को साथ जाना था पुरस्कार वितरण समारोह में,साथ जाने के लिए मेरा छोटा भाई भी था,और भी सहेलियाँ अपने भाई बहनों को ले जा रही थी । हमें करीब एक -डेढ़ किलोमीटर चल कर जाना था,जब हम आधे रास्ते पहुँचे तो मेरी बुआ का लड़्का अपने दोस्तों के साथ ८-९ ट्राफ़ियाँ हाथों मे दबाए भीड़ के साथ मिला,बोला-जल्दी नहीं आ सकती थी?,हर बार नाम पुकार रहे थे अर्चना और मुझे जाना पड़ रहा था,मेरे दोस्त हँस रहे थे,और हम वहाँ से ट्राफ़ियाँ पकड़ कर वापस लौट लिए। मैं अपने भाई को धीरे चलने के लिए कुछ नहीं कहूँगी,क्योंकि वो तो बहुत छोटा था,और फ़िर पैदल दूर तक चलना,वो भी क्या करता बेचारा? रास्ते में कीचड़ की नाली  पार करवाने में उसकी चप्पल नाली में गिर पडी थी,उसे निकालने में हमें समय लग गया और फ़िर गंदी कैसे पहनता वो?..............पर "उसने" तो सोचना था,"उसे"तो सब पता होता है न?


फ़िर  जब पढ़ाई करने की समझ आने लगी और पढाई पूरी होते ही पिताजी के साथ ऑफ़िस में वकालात सीखने के सपने आना शुरू ही हुए थे कि शादी करवा दी "उसकी" पसंद के लडके से ..नौकरी/कामकाज के चक्कर से दूर कर दिया ,मुझे वहाँ से हटा दिया।किसी तरह एक-दूसरे को समझकर भाषा,व्यवहार में तालमेल बिठाया और दो बच्चों के साथ गाडी पटरी पर चलने की राह पर आई ही थी कि "उन्हें" ही हटा दिया,जबकि पसंद "उसकी" ही थी ।मुझे पता था कि उस समय मेरी दादी ही मुझे सीखा सकती थी कि अब अकेले बच्चों को कैसे बड़ा करना तो दादी को भी दूर कर दिया..खैर!


बाद में फ़िर पिता-भाईयों के सहारे जीवन शुरू करने ही वाली थी कि मेरी मेरे बच्चों के साथ होस्टल मे रहने की व्यवस्था करके पिता के साथ से वंचित कर दिया---तो बुरा नहीं लगेगा क्या मुझे?---फ़िर भी मैने अपने होठों से ऊंगली नहीं हटाई...........खैर किसी तरह बच्चों को बड़ा किया और बेटा पढ़ाई पूरी करने ही वाला था कि एक रोड़ा अटका दिया..........उसको पार किया और अब सब ठीक होने वाला था कि फ़िर .....


दुख नहीं होता...पर बुरा लगता है मुझे भी "उसने" कुछ तो सोचना चाहिए.........सब कुछ तो उसके हाथ में होता है न ?---------------


अब सुनिये एक बहुत ही साधारण सी भारतीय लड़की कंचन सिंह चौहान जी का ये गीत----------



इसे आप उनके ब्लॉग ह्रदय गवाक्ष  पर पढ़ सकते हैं






Sunday, September 12, 2010

क्या बात ...क्या बात...क्या बात ...

शब्द ने कहा भावों से
आया हूँ उबड़ खाबड़ राहों से
कहीं भाव बिखरे पड़े हैं
तो कहीं शब्द छिटके पड़े हैं
हम बनेंगे नहीं मीत
तो बताओ बनेंगे कैसे गीत
होता है जब माहौल रूहानी
तभी तो बनती है कोई कहानी
मैं अकेला कुछ नहीं कर पाउंगा
तुम साथ नहीं दोगे तो मर जाउंगा
आकर पास जरा मेरी तरफ़ देख
मिलकर बना लें हम कोई लेख
मिलन की खुशबू से
भीगो दें हम अपनी सविता
और शायद फ़िर हमारे प्यार से
जन्म ले कोई कविता ...

Friday, September 10, 2010