Thursday, June 29, 2017

मेल मुलाकात और गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी का गीत

गिरिजा दी से इस बार फिर मुलाकात हुई बंगलौर में ,इस बार रश्मिप्रभा दी के घर हम मिले।ऋता शेखर भी साथ थी, गिरिजा दी और रश्मिप्रभा दी पहली बार एक -दूसरे से मिल रही थी, और फिर जो दिन भर बातों में बीता पता ही नहीं चला शाम के 6 बजे पहली बार घड़ी देखी और फिर देर हो गई,देर हो गई करते करते 7 बज गए ।बहुत आत्मीय रही मुलाकात सबकी,बहुत अच्छा लगा ,खास बात ये की चारों ब्लॉग लिखती हैं।
वहीं ऋता जी ने भी अपनी कुंडलियों का और गिरिजा दी ने अपना गीत संग्रह - "कुछ ठहर ले और मेरी जिंदगी"भेंट दिया , आज उसी संग्रह से एक गीत - "सर्वव्यापक" गाने  का प्रयास किया है आप सब भी सुनियेगा -
(प्लेयर को सक्रिय करें, एक बार में न हो तो पुनः करें)



Wednesday, June 28, 2017

रविशंकर श्रीवास्तव जी के व्यंग्य का पॉडकास्ट


व्यंग्य की जुगलबंदी के अंतर्गत "खेती" विषय पर लिखे गए रविशंकर श्रीवास्तव जी   



के ब्लॉग "छींटे और बौछारें " पर प्रकाशित व्यंग्य -

भारतीय खेती की असली, आखिरी कहानी

यहाँ  सुनिए -



  इसे आप यहां भी सुन सकते हैं -


हास्य-व्यंग्य पॉडकास्ट - जुगलबंदी - खेती


Sunday, June 25, 2017

योगा के योगी

सुबह उठते ही नाक लंबी लंबी साँसे  लेने को व्याकुल हो उठती है ,जीभ फडफडाकर सिंहासन करने को उग्र हो जाती है, गला दहाड़ कर शेर से टक्कर को उद्दत होने लगता है , बाकी शरीर मरता क्या न करता वाली हालत में शवासन से जाग्रत होने पर मजबूर हो जाता है बेचारा, योग की आदत के चलते ...
योग का मतलब प्राणायाम युक्त शारीरिक व्यायाम ज्यादा अच्छा है समझने को , अब समझें प्राणों का आयाम ...
सिर्फ सांसो का आना जाना जीवन नहीं , उसका उछलना,कूदना डूबना,उतराना,चढ़ना, उतरना ,भागना,रूकना जी-वन है, इस हर क्रिया में शरीर को चुस्त दुरुस्त बनाये रखना योग का एक भाग हो सकता है ।
योग का एक मतलब जोड़ भी होता है उस अर्थ में एकाग्रता को केंद्र में रखा जा सकता है कि प्राणवायु के साथ शरीर और मन जुड़कर रहे ,जुड़े रहकर सबको जोड़े रह सकें।
योग व्यंग्य का विषय तो नहीं होना चाहिए पर बना दिया गया ।
पहले योग में सब कुछ त्याज्य की भावना प्रबल थी अब ग्राह्य भावना का जोर है ,जोड़ने के नाम पर सबसे पहले योग में मात्रा जोड़ योग को योगा बना लिया गया, फिर नंगधडंग शरीर को ढँकने के यौगिक वस्त्र अपनाए जाने लगे , दरी की जगह मेट ने ली जिसके गोल गोल रोल ही उठाए जा सकते हैं जो दृष्टिगोचर होते रहें जिससे दूर से ही व्यक्ति यौगिक लगे।
बचपन में जबरन योग शिविर में जो कुछ सीखा वो भी इसलिए कि बाकी लोग वो आसन नहीं कर पा रहे थे पर मन पर असर कर गया।
मुझे याद है जब छठी कक्षा में थी एक योगी आया था स्कूल में अपने योग का प्रदर्शन करने ,हमारी कन्याशाला थी ,सब लड़कियों को एक हॉल में इकठ्ठे किया गया और करीब 2 घंटे तक उसने भिन्न भिन्न क्रियाएं और आसन करके दिखाए थे,जब उसने अपना पेट उघाड़ के आँतड़ियों को मथते हुए दिखाया सब मुँह दबाकर हंसने लगे थे लेकिन उसका तेजोमय चेहरा आज भी उसकी याद दिला देता है,जो आंतरिक तेज से जगमग था शायद....
आज लोग खा पीकर मोटापे से त्रस्त हो रहे हैं और योग बाबाओं की भरमार हो गई, योग भी वस्तु की तरह बाज़ार में आ गया ..और चेहरे को तेजोमय बनाने की यौगिक क्रीम ,तेल उपलब्ध हैं ...शरीर पर असर करने से ज्यादा जेब पर असरकारी हो गया योग और चेहरे का तेज आंतरिक न होकर बाह्य रह गया ....समय और सत्ता परिवर्तन के चलते कालांतर में राजनीति भी सीख लिए योगी...
परिणाम स्वरूप बन गया - यही व्यंग्य का विषय !!!

Thursday, June 22, 2017

देनेवाला श्री भगवान!


सोते हुए लगा
कल उठूंगी या नहीं
कौन जाने!

भोर में आँख खुली ...
खुद को जागा हुआ
यानि जीवित पाया ...
कल की सुबह,
सुबह का संगीत
याद आया,
घूमना और
दिन की पूजा
खाना,
सब याद आया,
याद आया-
अकेली बत्तख का
झील में तैरना ,
झील की बंधी किनारी के साथ बने
वॉकिंग ट्रेक पर कुत्तों का
आसमान की ओर ताकते
इधर-उधर दौड़ना,
जल कुकड़ों का तैरते -तैरते
पानी पर दौड़कर
अचानक उड़ जाना ,
फिर
पानी में डुबकी लगा
मछली पकड़ना
उस पकड़ी मछली को
चील का आकाश से
अचानक नीचे आ
झपट्टा मार उसके मुंह से छीन लेना
दूसरी चीलों का उसपर
झपटना,और
मछली का ट्रैक पर गिर जाना
और कुत्तों का भोजन बनना....
यानि
दाने-दाने पर खाने वाले का नाम है
और जीवित रखा तो ,
पालना- पालनहारे का काम है ....

Sunday, June 18, 2017

एक साधारण से गली क्रिकेट के प्लेयर की कहानी

रोज मॉर्निंग वॉक पर घूमने जाने पर वे एक फ्लैट की खिड़की से बाहर देखते हुए दिखते हैं शाम को भी वे उसी खिड़की पर बैठे सामने दिख रहे मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों को देखते रहते हैं ....
एक समय था जब वे बहुत अच्छे खिलाड़ी हुआ करते थे ,अपने शहर के ।अपने जवानी के दिनों में बहुत नाम कमाया इस खेल से उन्होंने, कहते हैं कि खूबसूरत तो बला के थे ही स्टाईलिश भी कम न थे, कभी लंबे बाल तो कभी छोटे बाल ,कभी हेट का स्टाईल तो कभी टोपी का स्टाईल बदलते ही लोग दीवाने हो जाते उनके ,खेल तो खैर जो था सो था,क्रिकेट के खेल में चल गए तो चल गए कभी बल्ला बोला तो कभी बॉल बोली लेकिन अगर दोनों न बोले तो लोगों की गालियां तो बोलती ही हैं ....सुनने को जरूर कुछ मिलता है अपने बारे में अच्छाई हो या बुराई अखबारों में जगह पक्की समझो।भले लोकल न्यूज ही क्यों न हो
गावसकर के बाद कपिल और सचिन से होता हुआ ये खेल हर भारतीय पुरुष का अपने गोत्र की तरह चिपका हुआ खेल बन गया ।खुद उसे पता ही नहीं चल पाता कि कब बॉल और बेट उसके हाथ में पकड़ा दिया जाएगा,कब गली के भैया की बॉल दौडदौड कर फेंक कर वापस देने के कारण उसे टीम का मेम्बर  बनने का चांस मिल जाएगा, और माँ -पिता के घिसे-पिटे संस्कारित प्रवचनों से छूटने का इतना आसान मौका मिलेगा हर दिन मैच खेलने के बहाने ....
ये सोचते सोचते कि बस इस बार जिले से आगे स्टेट टीम में चुने गए तो और आगे कभी न कभी  रणजी में तो चुन ही लिए जाएंगे पढ़ाई लिखाई ताक पर रखी रही ,सिलेक्शन न होना था न कभी हुआ ।
घरबार की जिम्मेदारी के चलते उसी मैदान में कोच बन गए ,समर केम्प चलाने लगे ,सोचते बस एक सचिन निकाल दें किसी तरह तो जिंदगी संवर जाए ...और कभी कोई दूसरा सचिन न निकला .....
अब बच्चों के भरोसे हैं, बैठे रहते हैं खिड़की से चिपके..

Monday, June 12, 2017

व्हाट्स एप मैत्री का अंत


व्हाट्स एप पर नए नंबर से Hiii  के बाद एक प्रश्न और आगे दो टेक्स्ट मेसेज तीन फ़ोटो मेसेज और अंत में फिर वही प्रश्न...

टेक्स्ट मेसेज में पहले का अंश -
परखो तो कोई अपना नहीं
समझो तो कोई पराया नहीं
Good morning

दूसरे का अंश -
सुख दुख तो अतिथि हैं
बारी बारी से आएंगे चले जाएंगे
यदि वो नहीं आएंगे तो
हम अनुभव कहां से लाएंगे
Good morning

फ़ोटो मेसेज में पहला -



दूसरे में -
सुबह की राम राम

तीसरे में-
Enjoy your sunday
(अंग्रेजी में ही, चाय के भरे हुए कप पर )
फिर दो बार वही प्रश्न और एक नया प्रश्न

(इतना लिखते लिखते 3 मेसेज और आ गए , चेक किया तो तीन फ़ोटो और थे पहला फिर एक चाय का कप पर इस बार हाथ में पकड़ा और उस पर दो चिड़ियाएँ बैठी थी good morning पकड़े
दूसरा -

 और तीसरे में लिखा हुआ है-
यकीन और दुआ
नज़र नहीं आते
नामुमकिन को
मुमकिन बना देते है
Good morning

इतने में एक और मेसेज
वाक्य टपक पड़ा -
Aap ko nhi karna he mat kar na.....

अब आप पहले प्रश्न जान लें -
पहले बार बार रिपीट होने वाला प्रश्न-
Aap kha se ho

और दूसरा -
Aap moje se friendship karo ge

...और मैनें इस मासूम सी बच्ची की प्रोफ़ाईल फ़ोटो वाले नंबर को ब्लॉक कर दिया... दिमाग का दही बना देने के एवज में .......
बादलों से ढँके एक खूबसूरत रविवार की सुबह - सुबह ...

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

हमने लिखने की कोशिश की खेती पर तो वर्चुअल दुनिया में गुम हो गए ,लिख न पाए हाथ में कलम की जगह गन्ना महसूस होने लगा ...और किसी तरह की सुझाई गई खेती की ही न जा सकी इसके बाद ....

नहीं लिखना आया, नहीं लिख सकी, पिता ही आंखों के सामने आते रहे, सिर्फ खेती को लहलहाते देखा ,पिताजी रोज खेत पर जाते थे जो करीब 12 किलोमीटर दूर था याद नहीं एकड़ में कितनी खेती थी,और वापसी में ताज़ी सब्जियां ,भाजियां लाते उनमें से कई भाजियां तो अब मिलती ही नहीं जो दादी माँ से बनवाती थी ,जब छोटी थी तो जिद्द करती मोटरसाइकिल "राजदूत" पर आगे बैठने की मोटरसाईकिल पर पिताजी आगे बैठा लेते,और हेंडल पकड़ाते पकड़ाते कब चलाना सीखा दिया मुझे पता ही नहीं लगा, नदी में पानी बहुत कम होता तो जब मोटरसाईकिल तेजी से निकालनी पड़ती तो दोनों ओर उड़ते फव्वारें की बौछार में जो मजा आता, अब दुनिया के किसी वॉटरपार्क में नहीं महसूस किया या कराया जा सकता ,जब नदी में थोड़ा ज्यादा पानी होता  तो बैल जोतकर छकड़े पर जाते ,कई बार बैलगाड़ी से बनी हवाई पट्टी के बीच दौड़ लगाती ऊपर उड़ती चिड़िया से रेस लेकर ,रास्ते में बेर की झाड़ियां रोक लेती और चिड़िया से हार जाने का बहाना मिल जाता....
खेत में चारों ओर मेड़- मेड़ हम घूमते कभी उंगली पकड़ ,कभी ऊंची फसल के बीच लुकाछिपी खेलते ,
साथ -साथ कच्ची सब्जियां ककड़ी,भिंडी,गाजर,मूली उखाड़ खाते जाते पानी के लिए एक गन्ना या टमाटर....
आम के बोरे आते खेत से घर , सब मिल चौक में आम चूसते, आपस में कॉम्पिटिशन करते
जब कपास आता तो कमरे में स्टोर बना दिया जाता , छुपा छाई खेलते ,कपास पर कूदते जब दादी डंडा लाती तो कपास के अंदर छुप जाते
मूंगफली आती को दादी नापकर ढेर बनाकर उसको हाथ से फोड़कर उसमें से दाने निकलवाती, कहती इतना ढेर खत्म होने पर खेलने मिलेगा या कोई और लालच देती ...
... बड़ा सा कुआं खुदवाया तो उसमें नीचे उतर कर पूजा करना आज भी याद आता है ,भुटटे,चने गेंहू निकलते तो सारा परिवार दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गांव जाता
घर में गाय भैंस की साज संभाल भी तभी सीखी...
अब कुछ नहीं....
सब बंट गया न वो खेत रहा न घर का चौक...
अब सब कुछ मिसिंग....😢
अपने बच्चों तक को ये अनुभव नहीं करवा पाए तो अब उनके बच्चों को कहानियों में भी शायद ही समझा पाएं
मैं तो सिर्फ शौकिया किसान की बेटी रही ....

गांव में खेत पर जो काम करते थे वो अब तक हैं उनके बच्चे भी वही काम करते हैं अब जो बचा हिस्सा है उस पर काम करते है ......

आज के किसान के बारे में क्या लिखूं -

अखबार शायद ही कोई किसान पढ़े जिसमें उसकी आत्महत्या की खबरें छपती है ,धरने प्रदर्शन चक्का जाम करके न तो फसलें उगाई जा सकती है न पशुधन की साज संभाल ही हो पाती होगी
जिसका बचपन खेती करते हुए बीता हो, जवानी खेती देखते हुए, और बुढापे तक जिसके पास खेती सपने में आने जैसी बचे असल में वही  किसान का दर्द समझ सकता है ,  उपवास करके पेट की भूख को मारा ही जा सकता है,भरा नहीं जा सकता ....

Thursday, June 8, 2017

Sunday, June 4, 2017

हमको भी बनना है - टॉपर


टॉप कभी किया नहीं तो सोचना पड़ेगा , गुड -बेटर- बेस्ट पढ़ा था 9वीं क्लास में शायद , खूब रटा था रे बाबा, ये टॉपर भी बेटर का भाईबंदी होगा ,पर फिर टोपेस्ट कहाँ ,किस मेले में गुम हो गया होगा?खैर! हम हिंदी मीडियम वाले,अंग्रेजी शब्दों को समझने के लिए जात -पात के फंडे को अपनाते हैं ,जैसे बच्चों का चेहरा माँ-बाप से मिलता -जुलता लगता है वैसे अंग्रेजी भी एक फेमेली वाले मिल जाते हैं, और संधि-विच्छेद करके समझें तो टॉप पर ,अब टॉप पर तो एवरेस्ट की चोटी के बारे में पढ़ते समय ही जाना था कि सबसे ऊंचाई पर टॉप होता है जो उस पर चढ़ जाए उसी को टॉपर कहते होंगे , सोचो कोई एवरेस्ट की चोटी अगर नीचे कर लें तो ....भारतीय जुगाड़ियों का कोई भरोसा नहीं ,कुछ भी कर सकते हैं, व्यापम नहीं सुना क्या? 😊 आज तक पता न चल पाया कि टॉप पर था कौन जो इतनों को ऊपर से लटका के छोड़ दिया .... कई तो लटके लटके ऊपर चले गए पर टॉप पर न पहुंच पाए....
टॉप पर संजीवनी बूटी बहुतायत में मिलती होगी शायद तभी इतनी मेहनत से पहुंचने की जुगाड़ में लगे रहते हैं जुगाड़ी....
इन दिनों हमको भी चस्का हो आया है टॉपर बनने का,पकड़ लिए हैं जुगलबंदी की रस्सी ,अभी लटके हुए हैं,अनुभव के साथ  उम्र का लफड़ा न होता तो पहुँच चुके होते अब तक ....टॉप पर, कहलाते - टॉपर ......

Wednesday, May 31, 2017

इक तो सजन मेरे पास नहीं रे - गौतम राजऋषि की कहानी का पॉडकास्ट

गौतम राजऋषि किसी परिचय के मोहताज नहीं। ... 

उनके ब्लॉग -पाल ले एक रोग नादाँ से एक कहानी का पॉडकास्ट बड़ी मेहनत के बाद बना पाई हूँ ,.. तकनीकी जानकारी न के बराबर ही है , जो सीखा यहीं ब्लॉग पर सीखा , ..... गलतियां संभव हैं। .. आशा है उन्हें अनदेखा करेंगे। ... 

 सुनियेगा। .. कहानी बहुत बड़ी है। ..प्रयास किया है हर पात्र को आप महसूस करें ,मैं इसमें कितना सफल हुई ये आपकी प्रतिक्रया ही बताएंगी। .. 

कहानी का समय है ४४मिनट १७ सेकण्ड और 
शीर्षक है - इक तो सजन मेरे पास नहीं रे ...  

(कहानी मासिक हंस के नवंबर 2012 अंक में प्रकाशित  हो चुकी है ) 

(अगर सुन न पा रहे हों -प्लेयर को एक बार सक्रीय करें फिर दुबारा प्ले करें )






Sunday, May 28, 2017

चाहिए मानहानि हर्जाने के हिसाब के लिए योग्य नेताजी


बचपन में दादी से कहानी सुनाने को कहते तो उनकी शुरुआत होती -एक राजा था ,वो बड़ा अच्छा था, उसकी प्रजा भी राजा का बहुत मान करती थी ,और हमारा प्रश्न खड़ा हो जाता - क्या करती थी? दादी कहती - मान, और हमारे पल्ले कुछ न पड़ता तब एक ही चारा बचता या तो राजा की कहानी सुन लो या मान को जान लो,और हम राजा की कहानी चुनते मुंह पर उंगली रखकर ,तो मान कभी समझ नहीं आया ,
उन्हीं दिनों जोशी मास्साब हम सब भाई बहनों को गणित पढ़ाने आया करते थे वे समझाते लाभहानि, हमें लाभ मतलब फायदा और हानि मतलब नुकसान समझ आया तो मान का नुकसान उठाते रहे तो मानहानि वही समझा।
जब थोड़ी बड़ी हुई तो लड़की होने के चलते पहले पिता और फिर पूरे परिवार और समाज के मान के बोझ को कंधें पर टिका पाया पर कभी मान को गिरने न दिया ।

मान की हानि पर हर्जाना भी मिलता है, आज समझ आने लगा ,अखबारों में नेताओं के अड़ी-सड़ी बातों पर मानहानि के दावे ठोकने की खबरें देख -देख कर (पढ़कर समय बर्बाद होगा उसका हर्जाना कौन देगा )सो ...

सोचती हूं बचपन से अब तक हुए मेरे मान की हानि के हर्जाने का हिसाब लगाने का काम करवा लूँ किसी अच्छे सी ए को खोज कर, बिना पूछे  लड़कियों के काँधे पर घर-परिवार ,समाज ,गांव,तक के मान के रखवाली का जिम्मा जबरन थोपने के लिए …... सी ए से बेहतर कोई नेता ही हायर क्यों न कर लूं हजार नहीं तो सौ नहीं तो दस करोड़ तो मिल ही सकते हैं, क्या ख़याल है ?

Sunday, May 21, 2017

"बिना शीर्ष का -ऑन ड्यूटी"


-साब नमस्ते
-हम्म
-साब जी नमस्ते
-कहा न,हम्म
-जी साबजी
-नाम ?
-मालूम नही
-हें? कहाँ से आया?
-सरसती देस के जुगलबंदी सहर से
-कैसे?
-कलम रस्ते..
-तो,कोई नाम तो होगा न?
-जी मां व्यंग्य बुलाती है
-और बाप?
-नहीं है
-नहीं है? मतलब?
-मतलब इस बार नहीं है
-अबे! बाप तो सबका होता है,हमेशा होता है, तेरा इस बार नहीं हैं,कह रहा है? किसको मूर्ख बनाना चाहता है?सेरोगेसी में भी मां का पता नहीं होता,बाप तो होता ही होता है।
-जी
-फिर?
-मेरा इस बार नहीं है,
-कैसे?
-जुगलबंदी के शहंशाह ने कलम कर दिया सिर ,कहा इस बार बिना सिर के रहो...अपनी दुम के बल पर ....
-पर भला ऐसा क्यों?
- उनका मानना है व्यंगों की जमात के सिर चुनकर लोग उस पर ताज रखते हैं फिर उसका शीर्ष कभी भी, कहीं भी किसी भी तरह इस्तेमाल करने लगते हैं, जबकि मोलभाव पिछलग्गी दुमों का किया धरा होता है👍
-ओह!बात तो सई कही,अब ये बता मेरे पास क्यों आया?
-इस बार भी छपना है,साबजी ! "बिना शीर्षक"
-उससे क्या होगा?
-साबजी दुम के भाव बढ़ेंगे,जुगलबंदी शहर के शहंशाह सरसती देस में नाम कमाएंगे ....
-और ?
-और लोग जान जाएंगे कि व्यंग्य भी "बिना शीर्ष के" जिंदा रहकर यानि छपकर ताज वालों  में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है ।
-शाबास!
-तो हाँ समझूं साबजी
-अरे हाँ, बिंदास जा और फेसबुक वॉल पे ड्यूटी संभाल...."बिना शीर्ष के"
-

Sunday, May 14, 2017

टेलिफोन की याद में

वो काला फोन जिसके डायल में गड्ढे होते थे,उंगली फँसा कर नंबर घुमाना खूब याद आता है,बात करते करते ये एक आवश्यक कार्य हो जाता था कि उस पर जमी धूल झाड़ते चलो ।
जब पहली बार फोन नामक यंत्र का घर आगमन हुआ तो जैसे पंख निकल आये थे हमारे ,खुद को जमीन से थोड़ा ऊपर ही महसूस करते थे।उसे पिताजी के ऑफिस में दाहिने कोने पर सजा दिया गया था एक लंबे तार के साथ जो आये दिन हम बच्चों के पैर पकड़ लेता था, और जब उसकी घंटी बजती ट्रिंग...ट्रिंग... तो हम भाई बहनों में रेस लग जाती कौन पहले उसे उठाएगा ,दौड़ के कई इनाम उसी प्रेक्टिस का नतीजा रहे ।
जितनी खुशी उसके आने से हुई, उतनी ही नफरत उससे तब होती जब दौड़कर पहले पहुंच कर उठाने पर उधर से आवाज आती - जरा अलाने के घर से फलाने को बुला देना , फोन चालू रखकर उनके घर तक दौड़ लगाते वे आते तब तक फोन कट जाता, धीरे धीरे समझ आने लगी बेवकूफी,तब आधे रास्ते से लौटकर कह देते अभी वे घर नहीं,झूठ बोलने की शुरूआत यहीं से हुई  थी ...😊
और जब किसी अपने से दूसरे शहर बात करते तो नंबर बुक करना होता ,कभी कभी तो बिचौलिया जी भूल ही जाते कि किसी को कनेक्ट करने है ।
आज भी तीन अंको का नंबर याद है 163 ,कितना आसान होता था याद रखना ,और अब ये 10 डिजिट ..याद नही रहती रे बाबा और ये मोबाइल ने स्मरणशक्ति का सत्यानाश कर दिया वो अलग, सब खुद ही याद रख लेता है ,किसी को बिना बोले संदेश भेज भेज कर  बदला लिया जा सकता है उसकी रिंगटोन ऐसे बजती है टुई टुई जैसे कोई सुई चुभा रहा हो बीच में , अब दिमाग के साथ हाथ और आंखों पर भी कब्जा जमा लिया इसने ...
कैशलेस आदमी का मोबाईललेस  होना वैसे ही जरूरी हो गया है
मुझे तो चिंता आने वाली पीढ़ी की लगी है ,अनुकूलन के गुण के कारण जब मनुष्यों की प्रजाति की गर्दन एक तरफ से झुकी हुई हो जाएगी .....अंगूठे कोई भी वस्तु को पकड़ने से मना कर देंगे ...
सारे कपड़ों के डिजाईन चेंज होंगे ,लोग कानों से बहरे तो हो ही चुके हैं हेडफोन से ...
खैर! अपडेट रहना भी जरूरी हो गया है सो हमने भी मोबाईल पाल लिया ,लेकिन ये इतने चिकने क्यों आते हैं समझ से परे हैं ,अब तक कोई हाथ से छूट के गिर गया तो किसी को बचाते बचाते भी स्क्रीन चकनाचूर हो गई इस हफ्ते ही ये पहुंचे बीमा स्कीम में नया चेहरा बनवा कर तो  लिख दे रही हूँ ,इनकी याद में ....


Friday, May 12, 2017

ब्लॉग एक कली दो पत्तियाँ से एक पॉडकास्ट

आज ब्लॉग बुलेटिन की लिंक्स पढ़ते हुए जा पहुंची दीपिका रानी के ब्लॉग -

एक कली दो पत्तियाँ पर

सुनिए इनके ब्लॉग से पढ़ी गई दो रचनाएं  मेरी आवाज में -- पसंद आये तो उनके ब्लॉग पर जाकर सराहें






Tuesday, May 9, 2017

चार शब्दों का खेल

एक गेम खेलते हैं - चार शब्द दे रही हूँ -

४ या ६  लाईन लिखनी है जिसमें ये चारों शब्द आने चाहिए -- शब्द हैं - 


घोड़ा/ मूंछ / सपना /फूल 

एक सदस्य ३ एंट्री दे सकता है। ..  


पिछले सप्ताह ये खेल ग्रुप- " गाओ गुनगुनाओ शौक से" में खेला गया और नतीजा आपके सामने है - और इसमें से कुछ को बाकायदा धुन बनाकर सस्वर  गाया भी गया -




 रश्मिप्रभा-
१.

घोड़े की मूंछ नहीं है
लेकिन उसका एक सपना है
फूल भरी वादियों में जाके उसको दौड़ना है

२.

घोड़े ने देखा सपना
पूंछ में लगाके फूल
घोड़े ने देखा सपना
जाऊँगा सिंड्रेला के पास
उसको दूँगा फूल
फिर कैसे जाएगी वो भूल

३.

घोड़े ने ऐंठी मूंछ
और देखा एक सपना
फूलों के गांव से आया कोई अपना
आया कोई अपना
सुंदर सलोना सपना


अर्चना -

१.

घोड़े पर चढ़ आया सवार
नाम था उसका फूलकुमार
घोड़े  ने जब फटकारी पूँछ
गिरा सवार और  कट गई मूंछ
पास न था कोई उसका अपना
देखा था उसने दिन में सपना


अबे! ओ मूँछों वाले
देखी है अपनी मूँछ
मुझे तो लगती है
ये घोड़े की पूँछ
कह भी मत बैठना
"यू आर सो कूल"
सपने में भी लाया फूल
तो चाटेगा यहाँ धूल ...


सपने में देखा एक राजकुमार
मूँछें थी काली और घोड़े पे सवार
आंखों ही आँखों में उससे हो गया प्यार
फ़िर पहनाया उसने मुझको फूलों का हार


शिखा-

१.

घोड़े की जो पूंछ न हो
मर्द की जो मूंछ न हो
सपने में जो फूल न हो
तो....ये जीना भी कोई जीना है लल्लू।



तुझमें मुझमें है फर्क बड़ा
तू घोड़ा है मैं आलसी मौड़ा हूँ
तू फूल सी पूंछ दबा के दौड़ता है
मैं मूंछ लगा के सपना देखता हूँ। 😁😁




जो आदमी की पूंछ होती
वो भी फूल लगाता
मूंछ वाला देखे यह सपना
काश वो भी घोड़ा बन जाता।


रागिनी मिश्रा 

मूंछ होगी तो पटा लूंगी 😘
पूंछ होगी तो कटा दूंगी 😂
सपना है मेरा ऐसा 🤗
तुझपे हर फूल लुटा दूंगी 🍥



बनकर घोड़ा दौडूं सरपट
विद्यालय को पहुंचूं झटपट
पर घोड़े की मूंछ नहीं है
फिर मेरे भी तो पूंछ नहीं है
सिर पर मेरे फूल लगे हैं
देखो कितना कूल लगे है
बन्दर जैसा चेहरा अपना
हाय दइया... ये कैसा सपना?



दैय्या रे दैय्या रे चुभ गयी उनकी मुछवा 🤓
लाओ रे  लाओ कोई लगाओ ऊपे फुलवा 😁
आके वो चढ़ गया जैसे चढि गये घोड़वा 😂

हाय हाय रे मर गयी कोई उखाड़े ऊकी पुंछवा ☺
चुभ गयी निगोड़ी मुछवा मुछवा 
लाओ रे लाओ रे कोई बिछाओ ऊपे फुलवा


वन्दना अवस्थी दूबे 



फूलों के बीच घूमते,
सपना देख रहा था घोड़ा,
काश उग सकें उसकी भी
मूंछें अब थोड़ा-थोड़ा



घोड़ा आया दौड़ के, अपनी पूंछ दबाय,
खड़ा है दूल्हा कब से अपनी मूंछ खुजाय
फूल सी दुल्हन बैठी है, नैनों में ख़्वाब सजाय!



घोड़े की पूंछ
दूल्हे की मूंछ
फूल हैं सच्चे
सपना है झूँठ


 उषा किरण 



राजकुमार की मूँछ हो या हो घोड़े की पूँछ।                    
रजनीगंधा के फूल हों या अपने देस की धूल                          
 सपना तो फिर सपना है। चाहें किसी से पूँछ
                           


मूँछों की लड़ाई
हमको ना भाई
घोड़े सी दुलत्ती
क्यूँ तुमने लगाई
मान सपना सा भूल
दे दो उसको फूल



घोड़े के मूँछ
फूलों की पूँछ
 सपनों की महिमा
 हम से ना पूँछ


गिरिजा कुलश्रेष्ठ 

 १

मैंने एक सपना देखा .
घोड़ा यों अपना देखा .
उसकी उग आई थीं मूँछ ,
पर गायब थी उसकी पूँछ ।।    


मेरा घोड़ा बड़ा निगोड़ा .
पूँछ उठाकर जब भी दौड़ा .
खुद को समझे राजकुमार,
पहनादो फूलों का हार .
सपने देखे बड़े बड़े .
सो लेता है खड़े खड़े .



पूले सी मूँछ हो ,
लम्बी सी पूँछ हो .
ऐसा एक घोड़ा हो .
नखरैला थोड़ा हो .
फूलों का बँगला हो .
पूरा ये सपना हो ।



पूजा अनिल 

१)

घोड़ा दौड़ा
मूंछ था मोड़ा
फूल पे फिसला
सपने में पगला

२)

फूल रंगीला
घोड़ा नीला
मूँछ को खोजे
सपना हठीला

३)

किसका घोड़ा
सरपट दौड़ा ?
कैसा सपना
तुमने देखा ?
मोर की पूँछ ?
दादा की मूँछ ?
बाग़ का फूल ?
गुलाब का शूल?
सब गये भूल !
हम गये भूल!


 संध्या शर्मा



घोड़ा शोभे न पूँछ बिना
धणी शोभे न मूँछ बिना
सपना नही अपनों बिना
बाग़ न सोहे फ़ूल बिना



घोड़ा आया बाग़ में
फूल कोई खिला गया
सपनों की गली थी
मूँछ वाला जगा गया



ए सनम जिसने ये शानदार सी मूँछ दी है
उसी मालिक ने ही तो घोड़े को पूँछ दी है
चाहे बिखरे हो कितने फ़ूल घोड़ा दौड़ेगा
सपने में भी ये मूँछवाला साथ न छोड़ेगा



शीतल माहेश्वरी 



घोडा करना चाहता था
फूल सी राजकुमारी से शादी
मगर क्या करे वो बेचारा
मूंछ ने कर दी उसके सपनो की बर्बादी



घोड़ा बना सपना
पूंछ उसकी नींद
मूंछ सी काली रात में
कर रहे दोनों तक धिना धिन
इतने में चली होले से हवा
फूल सा महका समा हसीन



ऋताशेखर 



बाबा जी ने मूंछ उमेठी
घोडा ने फटकारी पूँछ
दूर देश में खड़ा था माली
उसने खूब खिलाये फूल
सपनो में देखो जब सपनी
सारी बातें लगती अपनी



शोभना चौरे 



पूंछ हिलाता आया घोड़ा
उसपे बैठा
मूंछो वाला राजकुमार
राजकुमारी के सपने
हुए साकार
दोनों ने
एक दूसरे
को पहनाए फूलो के हार


वाणी गीत 


घोड़ा चढ़ के आया जो
सपने में आया वो
मूँछ तो थी उसकी काली
पर फूल लाया गुलाबी

Sunday, May 7, 2017

निंदक नियर रखने को करें -कड़ी निंदा

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय 
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय... 

जन्म हुआ तबसे सुनते आये हैं। ... अब रच बस गया है भारतीयों के मन में। ... अब निंदकों को नियर रखना हो तो निंदा तो करते रहना पड़ेगी वरना निंदक मिलेंगे कहाँ से। .. सबको अपनी कुटी की फिकर करने का हक़ तो है ही। ....तो भाईयों ,बहनों, मितरों कुछ भी कहा जाए , मुख्य बात निंदा करने की रहती है और जब कड़ी निंदा हो तो फिर तो सोने पे सुहागा।  ....  

हर भारतीय का भाई-चारा बनाये रखने का जन्मजात स्वभाव होता है , यहां की मिलनसारिता के किस्से इतिहास के पन्नों को भरते आये हैं। ... देश आजाद होने से पहले भी और बाद में भी। ... 
मुफ्त में जो मिले लपक लेने में भारतीयों का नाम गिनीज बूक में होना चाहिए। .... इसलिए जहां  बिना -साबुन और पानी के सिर्फ निर्मल करने की बात हो तो बाबा के साबुन को भी कोई  न पूछे। .... 


हर व्यक्ति अलग-अलग निंदा करे ये शोभा नहीं देता और कारण तो ये है की देश की आधी आबादी से भी ज्यादा रोटी-पानी के जुगाड़ में निंदा करने का समय ही नहीं निकाल पाती  ,इसलिए समूह में एक चुने हुए सदस्य द्वारा निंदा का प्रचलन हो गया   है अब। .. 

सुई बराबर भी मौका मिले तो निंदा करने झपट पड़ते हैं लोग। ... जो अपने अपने समूह से चुने गए हैं। ...

इस बार ब्लॉगरी समूह की जुगलबंदी में कड़ी निंदा की जानी है। ...सो इस मौके का फ़ायदा कौन न उठाएंगे। ... 
मैं भी कर देती हूँ कड़ी निंदा। .. कड़क चाय से भी कड़ी - मेरे निंदनीय लोग मेरे आस-पास रहें और मेरी कुटी के आँगन की शोभा ... डे तो क्या नाईट में भी मेरे सुभाव को निर्मल रखे। ...


Saturday, May 6, 2017

स्वच्छता अभियान - इंदौर पहला स्थान















बधाई सारे इंदौरियों  को। .. 


 अपने लिए गर्व का पल जुटा लिया उन्होंने ,सच में बहुत मेहनत की इंदौरियों ने , अपनी आदतों में बदलाव लाना इतना आसान भी नहीं होता। ...

 इंदौर खाना-पसंद लोगों का शहर ... जहां खाने के इतने शौकीन लोग हैं कि हर गली के बाहर पोहा-जलेबी और और पानीपूरी के ठेले आपको मिल जाएंगे ..., जहां आप २४ घंटे में किसी भी समय भूख लगे तो इंदौर के दिल राजबाड़ा की तरफ निकल सकते हैं , ये तय है की आपको भूखे नहीं रहना पडेगा। .
कल तक अखबार के टुकड़े , दोने , डिस्पोज़ल प्लास्टिक की पन्नी। .सब कुछ सड़क पर उड़ा दिया जाता था। .







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लेकिन जैसे ही सफाई अभियान की घोषणा हुई। .. चमत्कार से काम नहीं हुआ कि सारे के सारे इंदौर वासी एक हो गए। ...बच्चे से लेकर बूढ़े तक सब पर एक ही धुन सवार हो गई ---- क्लीन इंदौर -ग्रीन इंदौर। .. 




इसके लिए नगरनिगम ने सराहनीय प्रयास किये। ... सबसे आकर्षक नै नवेली कचरा गाड़ियों का गीत गाते हुए सुबह-दोपहर-शाम सड़को पर घूमना लगता है..


कैलाश खेर और शान के गाये गीत बच्चे -बच्चे की जुबान पर चढ़ गए-



 -- अब हमने मन में ठाना है। ... इंदौर को स्वच्छ बनाना है। .. गाते हुए "मायरा" भी दौड़ पड़ती है घर के अंदर। .- नानी कचरा गाडी आ गई। ...जल्दी चलो। ..चली जायेगी 










 ये कुछ वीडियो जुटाए हैं मैंने सोशल साईट यूं ट्यूब से। ....जो बताते हैं कितना उत्साह है इंदौर वासियों में। . 

ये सच है की मिलकर प्रयास किये जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है - अस अभियान को इतने जोर-शोर से चलाये जाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री की मैं आभारी हूँ। .. हो तो बहुत पहले ही सकता था ,मगर पहल करना अपने आप में महत्वपूर्ण है 

सहयोग करते हुए मैंने इंदौर वासियों को देखा है - जब वे कचरा गाड़ी के सफाई कर्मचारियों को ठंडा पानी पिलाते हैं या खाना देते हैं खाने के समय। ... सारे सफाई कर्मचारियों का बर्ताव तारीफे-काबिल रहा है अब तक। ... बुजुर्गों से ,बच्चों से लेकर खुद ही कचरा गाड़ी में डालते हैं। ... 

.. और अंत में एक विशेष बात जो सराहनीय है -
इन कचरागाडियों की महिला ड्राईवर।जिन्हें इस काम पर रखा गया। ... उनका आत्मविश्वास देखते ही बनाता है जब वे ये मिनी गाड़ियां चलाती है 

एक प्रयास आप भी करें आपके अपने शहर को साफ़ रखने के लिए। ... 

अपनी भावी पीढ़ी को एक नया देश सौंपेंगे हम इसी आशा के साथ सभी को शुभकामनाएं 

विस्तृत जानकारी यहां है -