Monday, December 4, 2017

यात्रा में क्षणिकाएं

1-

थक चुकी हूँ अब ...
फिर भी मुस्कुराती हूँ,
कि तुम सदा  मुस्कुराओ!
मौन होकर भी
बहुत कुछ कहती हूँ
कि बस! तुम समझ जाओ!
सुनाई नहीं देती
अब कोई भी आहट
किसी हादसे की,कि
चाहे किसी भी धुन में गाओ!
सफर पर हूँ,अकेली,निडर
और अनजान डगर में
एक आस लिए कि
मंजिल पर लेने तुम आओ!
-अर्चना

2-

उम्मीद नहीं थी कि
आँसू बरसकर
कागज पर उकेरे
अक्षरों को बादल में बदल देंगे
अचरज से आँखे फटी रह गई
जब अचानक से अनहोनी घटी!
-अर्चना

3-

कविताएं जन्म लेती है
भावनाओ से
भावनाएं बहती है
मौन के चिंतन से
चिंतन शुरू होता है
एकांत के मिलने से
और एकांत जाने कब
किस कोने में दुबका मिल जाये
नहीं जानता कोई
और अप्रत्याशित रूप से
जन्म ले लेती है
काव्यमय कविता ...👌
-अर्चना

Friday, November 3, 2017

कुछ है,कुछ नहीं

जिंदगी से सवाल कुछ किये, कुछ नहीं
सवालों के जबाब कुछ मिले, कुछ नहीं

मैंने तुमसे कुछ कहा, कुछ नहीं
तुमने मुझे कुछ समझा, कुछ नहीं

दिल का दिल से रिश्ता कुछ है, कुछ नहीं
तुम्हारा मुझसे वास्ता कुछ है, कुछ नहीं

-

Sunday, October 29, 2017

57th जन्मदिन "समरी"

24 की शाम को डिनर हुआ"राजधानी" में ,

फिर 25 को सुबह उठते ही फोन टटोला-मायरा का ऑडियो संदेश था-हैप्पी बड्डे नानी,लव यूऊऊऊ...😊पुच्ची!!फिर स्कूल के लिए रेडी होकर स्टॉप से वीडियो चैट में बधाई दी...👌

"जय श्री कृष्ण"करने के साथ नेहा-वत्सल ने बधाई दी,

फिर माँ को फोन लगाया-मझली भाभी ने उठाया और बधाई देते सबसे पहले बोली-माँ सुबह से याद कर रही हैं,सबको बताया कि आज अर्चना का जन्मदिन है,हमने सोचा कि जरूरी काम निबटा कर आपसे बात करते है,और आपका ही फोन आ गया में देती हूँ सबको फोन और बारी बारी घर मे सबने बधाई संदेश दिया...

माँ ने जीवन का बेस्ट संदेश दिया- "मेरा आज बहुत खुशी का दिन है,आज तेरा जन्म हुआ था",मेरी ढेर सारी शुभकामना!!

  दिन में "वीर जी" ढाई बजे के करीब घर आये,3 घंटे गपशप की,पोहे,सेवैंया की खीर बनाकर खाई,फिर साढ़े 5 बजे "विवेक रस्तोगी" जी के यहाँ गए,वहाँ फिर पोहे और अन्य नाश्ता किया 8 बजे तक खूब गपशप हुई,विवेक जी की पत्नी जी भी शामिल हुई गपशप में,फिर वीर जी ने विदा ली,विवेक जी सपत्नीक मुझे छोड़ने मेरे घर आये,नेहा से मिलकर वापस लौटे,

वत्सल के आने पर नेहा ने बाहर बिरयानी खाने की ईच्छा जताई,हम सब गए ,लेकिन वहाँ मेरे मामा का बेटा-बहू अचानक केक लेकर आए, सरप्राइज़ नेहा के साथ मिलकर प्लान हुआ था....👌

मायरा और बेटी-दामाद को खूब मिस किया ....👌इस बीच सबका इतना स्नेह मिला कि फूली नहीं समां रही अभी तक 😊😊😊😊
बीच-बीच में  परिजनों से फोन पर बधाई मिलती रही...एक सरप्राईज फोन भी मिला "ब्लॉगर प्रियंका गुप्ता जी का ...पहली बार बात हुई फोन पर उनसे....🎂

अब तक संदेश मिल रहे हैं,सोशल मीडिया पर रिटर्न धन्यवाद भी सबको नहीं दे पाई हूँ अभी....
ग्रुप "गाओ गुनगुनाओ शौक से"पर ढेर सारे स्नेहयुक्त संदेशों के साथ 1961 की फिल्मों के गीत गाये गए......

Sunday, October 15, 2017

अपना घर

बात उन दिनों की है जब अपनी बेटी आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी, हम होस्टल में रहते थे।
एक दिन उसने स्कूल से लौटकर कहा-
"मम्मी, जब कोई अपने से मिलने आता है ,तो लौटते समय कहता है-हमारे घर आना,और हम तो उन्हें कभी भी कह नहीं सकते कि -आप भी हमारे घर आना।" क्या कभी अपना कोई घर नहीं होगा,हम यहीं रहेंग?(3 साल से हम वहीं थे).......मेरी सारी सहेलियों को चाय बनाना आता है,कुछ तो नाश्ता भी बना लेती हैं अपना,मुझे तो चाय भी बनाना नहीं आता,अपना तो कोई किचन भी नहीं है😢
...और कुछ दिनों बाद मैंने घर लेकर जॉब से इस्तीफा दे दिया ,ये नहीं सोचा कि आगे काम क्या और कौनसा करूँगी,कमाई का जरिया क्या होगा?वो तो स्कूल वालों ने मुझे स्कूल छोड़ने नहीं दिया 😊और हम अपने घर रहने चले आए।
मैंने ठीक किया न !

बच्चों की जो मुस्कान तब देखी थी,आज भी याद है !😊
आज बेटी अपने घर में खुश हैं,ढेर सारी जिम्मेदारियों और "नानी की बेटी "के साथ
अनवरत चलने वाली कहानी का एक टुकड़ा ...

Sunday, October 8, 2017

करवा चौथ

नास्तिक/आस्तिक,
आस्था/अनास्था,
व्रत/उपवास,
चाँद,छलनी...
और करवा चौथ
जिंदा रखने को !

कोई करे,न करे,
उसकी मर्जी!
मगर
फेसबुकी ट्रेंड्स!!! के बीच -
यहाँ मरना भी कौन चाहता है !....😊😊

एक फोटो में पश्चिम में सुबह का चाँद है,तो दूसरी में भले नज़र न आए पर पूरब-और पश्चिम के मध्य बादल की चमक बता रही है कि दूर पूरब में सूरज निकला है...
एक और चित्र में-
इंद्रधनुष बनते-बनते राह गया ...काले बादल नीचे उतर आए हैं...(सारे फ़ोटो आज सुबह के लिए हुए )

Friday, October 6, 2017

फिर तेरी कहानी याद आई

कल वत्सल का जन्मदिन था,वो 32 का हुआ ,शाम की पूजा के समय मेरा दिल भर आया ,जब तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ था मैं 32 की थी ... 😢 ये आंकड़े भी न ! चैन नहीं लेने देते कभी ....
और तो और शरद पूर्णिमा का चाँद भी न दिखा बारिश की वजह से ... सबको साथ ही रोना आ गया हो जैसे ...😢
परेशानियां हरसिंगार की तरह खिल आती हैं ,झर ही जाएंगी...

दिन तो सदा एक से नहीं होते,तुम्हें और मुझे एक से रहना है ..😊
हँसो यार !!

-अनवरत चलने वाली कहानी का एक टुकड़ा

Wednesday, October 4, 2017

एक इंटरव्यू

मिग बज़

हालांकि अब तक भी स्पष्ट नहीं हुआ कि ललित चाहर करना क्या चाहते हैं ब्लॉगर्स के लिए ,लेकिन एकदम से प्रश्न भेज उत्तर पूछे तो मैंने भी दे ही दिए ...आप भी पढ़िए -

MiG Buzz Exclusive's Questions

आपने ब्लॉगिंग कब शुरू किया और ब्लॉगिंग में आप कैसे आए?

लिखने की शुरुआत हुई 2007 में और ब्लॉग पर पोस्ट करना शुरू किया 2008 से, ब्लॉग शुरू करने की कहानी रोचक है। बच्चे बड़े हुए तो शहर से बाहर चले गए। 12वीं के बाद ही बेटा नोएडा और बेटी पूना। जब वे छुट्टी में घर आते तो लगता एक हफ्ता इतनी जल्दी खत्म हो जाता है। बहुत सी बातें अनकही रह जाती है, तब बेटे ने ये ब्लॉग बनाकर दिया और कहा- अब जो हमसे कहना रह जाता है यहाँ लिख दिया करो। आपकी बातें सारे बच्चों के लिए अच्छी होंगी और बस शुरुआत हो गई.. एक ढाई साल से बंद पड़े डेस्कटॉप से। "मेरे मन की" के अलावा "नानी की बेटी" पर ज्यादा सक्रिय हूँ।

शुरुआत में आपको किस समस्या का सामना करना पड़ा और अब ब्लॉगिंग कैसी चल रही हैं?

टाईप करना भी नहीं आता था। एक उंगली से अक्षर खोज खोज कर लिखती थी शुरूआत में, "बारहा" से हिन्दी में लिखना आसान हुआ। एक-एक चीज सीखते गई। अनजाने,अपरिचित मित्रों से चेटिंग करते-करते पूछ-पूछ कर सब जुड़ते चले गए और अब तो लिखते लिखते पॉडकास्टिंग को अपना लिया। इन दिनों नातिन मायरा के साथ बहुत व्यस्त हूँ सो समय कम मिल पा रहा है। फिर भी ब्लॉगिंग /पॉडकास्ट के लिए समय मिलते ही पोस्ट करती रहती हूं। अपने मन की.. बहुत से लोगों की मदद मिली।

नए ब्लॉगर के सफल ब्लॉगर्स बनने के लिए कुछ टिप्स?

सफल ब्लॉगर किसे कहेंगे? ये थोड़ा स्पष्ट होना चाहिए, जो अपने मन के विचार अभिव्यक्त कर पा रहा है वो, जो उपयोगी जानकारी निशुल्क साझा कर पा रहा है वो, जो ब्लॉग से पैसा कमा पा रहा है वो या जिसकी पहचान बनी ब्लॉग से वो 😊 हाँ नए ब्लॉगर को सतत दूसरे ब्लॉग पढ़ते रहना चाहिए अलग अलग, अपनी रूचि के.. तो खुद के विचार और बेहतर रूप से साझा कर पाएंगे।

भारतीय ब्लॉगर और विदेशी ब्लॉगर के बीच क्या फर्क देखने को मिलता है?

अब तक तो भारतीय ब्लॉगरों को ही पढ़ा, जो देश में हैं या विदेश में.. अपने यहाँ तो भारतीयता ही महत्वपूर्ण है।

मिग बज़ के लिए कुछ सुझाव/ प्रतिक्रिया

ये बिल्कुल नया है, अभी शुरुआत है ब्लॉग पर अच्छा बुरा पढ़कर चर्चा हो तो बहुत लोग लाभान्वित हो सकते हैं।

मेरा हमेशा प्रयास रहता है कुछ नया करने का    
  - अर्चना चावजी


Sunday, October 1, 2017

कुछ भी लिखा,ब्लॉग की खातिर ..

मुझे लगता है मेरी आँखें अंदर की तरफ घूम गई है,दूरदृष्टि मेरी रही नहीं ,पास का दिखाई नहीं देता ,शायद अब सब अंदर का देखना पड़  रहा है ,इसी का नतीजा मिल रहा है मुझे कविता के रूप में ,कविता बह निकलती है जब-तब इसी ब्लॉग या फेसबुक पर... 

मेरे जैसे कई लोगों की कवितायेँ बहती हुई दिखती हैं यहां ,उसी से पता चलता है -दिल कितना छोटा सा है ,कभी भी फट सकता है , आसपास की बहती कविताओं से टॉनिक लेना पड़ता है ,लोग आर्ट ऑफ़ लीविंग छोड़ आर्ट ऑफ़ डाईंग सिखा रहे हों जैसे। .. 

भला जानबूझकर मधुमक्खी के छत्ते में कौन हाथ डालेगा और वो भी तब ,जबकि दिख रहा हो की छत्ता बहुत बड़ा है और बहुत सी मधुमक्खियां उस पर बैठी हैं| पर क्या करें मीठा खाने की जिसको आदत पड़ गई हो उसे तो भगवान बचाए। ..और वो भी शहद खाना हो तो हाथ तो डालना ही पड़ेगा ... ठीक वैसे ही जैसे -ब्लॉग बनाया तो पोस्ट भी लिखनी ही पड़ेगी ..
यानि बस अभिव्यक्त होना है... जैसे विरोध होने लगा है ... तू हाँ बोल! मैं ना बोलता हूँ, एक तो सही ही होगा .. करोड़ मिले तो बाँट लेंगे...👍

पुरानी टी शर्ट


याद आई बात कोई अपने दरमियानी मुझे
मुस्कुराते लब हैं तो,आँखों में पानी किसलिए।

जल रही है आग बरसों से मिलन की आस में
फिर भला सावन में,इसको बुझानी किसलिए।

Saturday, September 23, 2017

सुनो,समझो,करो!-एक संदेश बच्चों के लिए

जहाँ तक मैंने बालमन को समझा है,वो बड़ों को देखकर ज्यादा और जल्दी सीखता है,वही करने की कोशिश करता है,अगर अपने वाकये,कहानियां,किस्से बताएं जाएं तो वो खुद को उस जगह रखकर सोचने लगता है,उन्हें  ये कहने के बदले- कि ऐसा मत करो ,वैसा मत करो ,अगर कहें कि करके देखना पड़ेगा,नुकसान होगा कि फायदा तो वे अपने तर्क से समझने की कोशिश करेंगे ,तब बस उनके सवालों की बारिश झेलना पड़ेगी हमें 😊👍
आजकल के माहौल को देखते हुए ....
मेरी एक कविता सभी बच्चों के लिए-

मिला कदम से कदम ,
समय की पुकार सुन।
निडर रहकर सामना करने,
हिम्मत की तलवार चुन।
छल-कपट को छोड़कर,
बुद्धि को बना हथियार ।
स्वाभिमान से हो विजयी,
चाहे लक्ष्य हो कितना दुश्वार।

-अर्चना
(चित्र में अनूप शुक्ल जी की पुस्तक के साथ "मायरा")

Tuesday, September 12, 2017

टुकड़ा-टुकड़ा कहानी

1-
"रूको,तुम्हारे जूते में अब भी मेरा पैर नहीं आता ..... हाथ में ले लेने दो .....
.
चलना तो है ही पीछे-पीछे ...शुरू से ही पीछे जो रह गई हूं..... :-("
.
.
. ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...:-(
2-
चलो खींच दो न अब वो ऊपर से अटकी चुनरी....... उचक-उचक थक चुकी ....
दूसरे रंग मैच भी तो नहीं करते इस चणिया चोली से .....
फ़िर कहोगे - ऐसे ही बैठी हो तब से ...?... :-P
.
. ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...:-(

3-
जानबूझ कर इतना ऊपर चढे बैठे हो ....
पहले तो कह्ते थे - समन्दर की गहराई में देखो ... कितने रंग छुपे हैं , और अब न जाने क्यों ,बादलों के पीछे छुपा इन्द्र धनुष ही भाने लगा है तुम्हें ......
जानते हो! कि मुझे मुड़कर देखने की आदत है ... सो लगे चिढाने .... ... आखिर धूप चश्में पर तरस भी तो नहीं खाती .......
ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

4-
आज संडे तो नहीं है पर छुट्टी जरूर है .... और पहली चाय की बारी तुम्हारी है .....
.
.
. ये कभी भूलते क्यों नहीं तुम ..... और मुझे खाना बनाने में देर हो जाती है ....
उफ़्फ़! ...

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

5-
...ये खिड़की बन्द नहीं हो रही ... रात भर आवाज करेगी ....
-तुमने कारपेंटर को बुलाया नहीं ?
-नहीं, लगा था कर लूंगी बन्द ...पर नहीं पता था , जो काम मैंने किये नहीं वो मुझसे वाकई नहीं होंगे .....
... अब रात भर चांद दिखते रहेगा झिर्री से ....

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...
6-
बाथरूम के नल से टपकते पानी की बूंद रह-रह कर डरा देती है रात को .... कपड़ा ढूंसना चाहा तो वो पेंचकस नहीं मिला , हरे हत्थे वाला ...
पता नहीं कहां रख दिया मैंने ...उसका डिब्बा तो कब से इधर -उधर हो गया ...
एक अकेला वो बचा था ... वो भी ....:-(
और ये काम भी तो तुम्हारा ही था न ....
गिनूंगी बूंदे ...

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

7-
याद है ! एक बार तुम्हारे दोस्त ने कहा था-
-
भाभी जी आपने बदल दिया हमारे दोस्त को , एक बार आप बोल देंगी तभी शुरू करेगा फ़िर ..
- अबे यार चुप !... कहकर चुप करा दिया था तुमने उसे
- क्या बन्द किया मैंने ? मैं तो कुछ भी नहीं कहती ...
-हाँ , तभी तो.... आपको पता है ये नॉन्वेज खाता भी था और बनाता भी था ....
-नहीं तो.....
-क्यों बताया नहीं तूने? ... फ़िर वो तो चला गया ...
और मैं बहुत गुस्सा हुई थी , .... बात नहीं की थी तुमसे, चुपचाप खाना बनाया और मुझे भूख नहीं कहकर सोने चल दी थी.....
तब तुमने बताया था कि अपनी सगाई तय होने के समय तुम्हें पता चला था कि मेरा परिवार शुद्ध शाकाहारी है , और उस दिन से तुमने खाना छोड़ दिया था ...वरना शादी नहीं हो पाती अपनी ...
.....
.... तब मैं सोचती थी क्या फ़र्क पड़ जाता शादी नहीं होती तो ......
...
..
.. अब समझी ....... हां बहुत फ़र्क पड़ता ..... :-(

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

8-
-- इनसे मिलो ये हैं बनर्जी ,साथ ही रहते थे हम पहले एक रूम में
-नमस्ते
-नमस्ते भाभी जी , सुना है आपने लॉ किया है?
- जी
-तो प्रेक्टिस नहीं करेंगी आप ?
- जी, अभी तो एक्ज़ाम ही दी है , और यहाँ आ गई... आगे सोचेंगे जैसा भी होगा
- आप तो फ़िलहाल यहीं कंपनी की स्कूल में अप्लाई कर दीजिये, हिन्दी भी अच्छी है आपकी..
- जी नहीं, मुझे टीचर नहीं बनना..
-क्यों?
- किसी के अन्डर में काम करना पसन्द नहीं,मतलब वही पुराना सा तय सिलेबस सिखाओ ,
जो खुद से सिखाना चाहूं वो सिखा पाउं तो हो सकता है... कभी बन भी जाउं .... :-)

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

9-
एक बात फ़िर याद हो आई आज,
जब तुमने कहा था-
-सुनों याद है न कल बिटिया के एडमिशन के लिए जाना है
-हाँ याद है, पर मम्मी-पापा को क्या पूछेंगे , मैं तो हिन्दी में ही जबाब दूंगी अंग्रेजी में देना हो तो आप बोलना
-लेकिन अगर इसी बात पर एडमिशन नहीं हुआ तो ?
- ऐसा हो सकता है?
-हाँ हो सकता है,
- तब देखी जाएगी ,मैं बात कर लूंगी पर आप न बोलना फ़िर
- ओके
.....
.....
और इसके बाद आठ दिन का समय मांग लिया था मैंने प्रिसिपल मैडम से ... और पूरे हफ़्ते मेरे अंग्रेजी में बोले बिना आपने मेरी बात का जबाब नहीं दिया था ...खूब हँसे थे उस पूरे हफ़्ते हम 
और आठ दिन बाद बिटिया का एडमिशन हो गया था .....
...
...
लेकिन उसके बाद कभी अंग्रेजी बोली नही गई मुझसे .....

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

Saturday, August 19, 2017

विश्व फोटोग्राफी दिवस विशेष

पिछले दिनों इंदौर ने प्रथम स्थान हासिल किया स्वच्छ शहर प्रतियोगिता में ,हम गौरवान्वित हुए।अभी बहुत काम होना है,इसे बनाये रखना आसान नहीं ,लोगों में स्वच्छता की आदत लगाये रखना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण है सफाईकर्मियों का अपने कार्य के प्रति समर्पण...
ये तस्वीर आज सुबह करीब 7 बजे की है - विश्व फोटोग्राफी दिवस की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी ...आप भी देखिए-

Thursday, August 17, 2017

भला कर भले मानुष

आजकल जिस एप्प की चर्चा चल रही है, उसके बारे में एक ही विचार आया कि कोई किसी को पीठ पीछे गाली क्यों देना चाहता है ?
अगर व्यक्ति कोई गलत बात कह रहा है, तो उसे जब तक सामने नहीं बताया जाएगा उसमें सुधार संभव नहीं है, पीठ पीछे कही बात जब तक उस तक पहुंचती है तब तक या तो वो व्यक्ति कईयों को नुकसान पहुंचा चुका होता है,या खुद नुकसान उठा चुका होता है ...
ये जरूरी नहीं कि आपको जो बात गलत लगी वो उसके लिए भी गलत हो लेकिन आगाह करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए अगर हमें महसूस हो,एक विचार के हर नकारात्मक पक्ष को सामने लाये जाने पर ही उसकी सकारात्मकता को बढ़ाया जा सकता है ,ऐसा मैं सोचती हूँ।
अनजान बनकर दूसरों का भला करना सबके बस का नहीं 😊ये भी कटु सत्य है।
एक गीत याद आ रहा है ,मालूम नहीं किसका लिखा हुआ है -

भला किसी का कर न सको तो,बुरा किसी का मत करना
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम- काँटे बनकर मत रहना ....

Sunday, August 13, 2017

छेड़छाड़ का चरमानंद

छेड़छाड़ शब्द भ्रष्टाचार मोहल्ले की गड़बड़ की बिरादरी का है,मतलब इधर-उधर की गली में रहने वाला कह सकते हैं, प्रथमदृष्टया पढ़ने पर लड़के द्वारा लड़की को छेड़ना ही दिमाग में आता है क्योंकि सबसे ज्यादा प्रचलन यानि प्रचार इसी के द्वारा हुआ,परंतु परेशान करने से ज्यादा हेरफेर होती है क्या इस शब्द से... जाँच का विषय हो सकता है ...
हेरफेर को समझें जाँच से -यदि कोई व्यक्ति अपनी जाँच किसी पैथोलॉजी में करवाता है और उसके दिए नमूने से छेड़छाड़ हो गई तो समझो अच्छा खासा व्यक्ति भी केंसर का बीमार घोषित हो सकता है ये तो हुई सिर्फ डॉक्टरी पेशे की बात यदि वकालात का पेशा हो तो फाइलों के साथ छेड़छाड़ भले आदमी को सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है,यदि शिक्षा जगत की बात हो तो आप बिना पढ़े कई डिग्रियों के स्वामी बन सकते हैं सिर्फ छेड़छाड़ करवा के अपनी उत्तरपुस्तिकाओं में ....😊
आजकल और आगे बढ़ गया है साइंस -आप डी एन ए रिपोर्ट तक से छेड़छाड़ करवा कर किसी के पुत्र साबित हो सकते हैं या जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं ...
आजकल लेखन में छेड़छाड़ भी चरम पर देखने को मिलती है,किसी के लिखे की पंक्तियों में छेड़छाड़ कर खुद को लेखक साबित करने लगे हैं लोग और तो और अब हाथ का लिखा तो इतिहास की गर्त में समाने लगा है, कॉपी पेस्ट के जमाने में छेड़छाड़ को आसान राह मिल गई तो चरम के भी चरमानंद को प्राप्त करने की होड़ मची है ...

Friday, August 4, 2017

फेसबुक पर धतर-मतर कुछ भी पढ़-पढ़ कर भेजे का बना भुरता

कुछ भी लिख देने को कैसे मन हो जाता है,किसी का भी?
क्या ये वे लोग लिख देते हैं?-जिनके माता-पिता या दादा-दादी ने बचपन में पीछे से हाथ न धरा गोद में बिठाकर, सिर पर हाथ न फेरा,या बहन ने राखी न बाँधी, या भाई ने अपना हिस्सा नहीं बाँटा,या फिर शादी के बाद पत्नी ने ही साथ न निभाया या कि अपना पौरुष कहीं खो आये,या हो सकता है पौरुष खुद ही साथ छोड़ गया उनका ....
या बच्चों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया उम्र के ढलान पर, लुढ़का दिया बे-पेंदे के लोटे की तरह... या हो सकता है अपनी पहचान की तलाश में काँटों भरी गलत राह चुन ली...और दोस्त भी न बना कोई ...

खैर! वे जानें ,उन्हें बीमारी कौनसी है? 😊
लेकिन इलाज तो ये पता है कि -जब तक ऐसे लोग,जो कुछ भी लिख सकते हैं,स्त्री,महिला,नारी या मादा के लिए आदर और सम्मान के एक -दो शब्द न लिखेंगे,जिंदगी के मायने उनको नहीं आएंगे,जीना वे कभी सीख नहीं पाएंगे यहाँ तक कि मौत भी उनकी जल्दी नहीं आएगी ,यहीं पड़े वमन करते,सड़ते रहेंगे .....

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ये था काल्पनिक अध्याय 19 का भावानुवाद जो कृष्ण ने अपनी माताओं,सखियों और प्रेम की दिवानियों को स्वर्ग में चुपके से समझाया ,उनके प्रश्नों की जिज्ञासा में .....अपन भी वहीं थे तब 😊
और अब -
अपनी डॉक्टरी तो इत्ता जानती है,बस!...😊 
और ये डॉक्टरी ऐसी वैसी तैयारी से नहीं मिली,पूरी थीसिस समझी यहीं फेसबुक पर झख मारकर .....☺

Wednesday, August 2, 2017

जीवटता की मिसाल - आशालता जी

पिछले कई दिनों से ब्लॉग लेखिकाओं से मुलाकात के योग बनते रहे...
मैं टुकड़ा टुकड़ा बँटी रही इंदौर ,बंगलौर और खरगोन के बीच...
इससे पहले जब इंदौर में थी तब एक दिन अचानक आशालता जी का फोन आया कि मैं हॉस्पिटल में हूँ,पैर में रॉड लगी हैं, आपकी याद आई तो फोन मिला लिया, उन्हें ब्लॉगर के तौर पर जानती थी, फिर तभी तय किया कि हॉस्पिटल जाकर मिला जाए, संभव हुआ ,खोजते हुए पहुँच ही गई थी,बेटे और अपने श्रीमान जी के साथ परिचय करवाया,हालांकि उससे पहले भी एक बार उनके घर ऐसे ही न्यौता था उन्होंने और मैं पहुंच गई थी तब भी...
खैर जैसे ही मुझे देखा उनके चेहरे पर रौनक आ गई, जितना समय रुक सकती थी रुकी उनके पास वे बतियाते रही थीं - लेखन अपनी पढ़ाई अपने परिवार,माता,पिता सबके बारे में......

4-5 महीने पहले फिर एक दिन फोन आया कि मैं फिर हॉस्पिटल में हूँ,लेकिन तब चाहकर भी मिलना नहीं हो पाया था ..वे उज्जैन चली गई थीं,फिर एक दिन दामाद जी के साथ आधे रास्ते तक उज्जैन के लिए निकली भी लेकिन अचानक केंसल हुआ और हम रास्ते से ही वापस लौट आए ।
फिर मैं बंगलौर चली गई....इस बीच आशा जी का स्वास्थ्य और खराब हुआ, पेरेलिसिस अटैक आया ,मुझे बेहद अफसोस हुआ कि उनसे मिल न पाई, लेकिन इस बीच व्हाट्सअप ग्रुप बनाया " गाओ गुनगुनाओ शौक से"उसमें संगीता अस्थाना जी के आग्रह पर साधना वैद जी जुड़ी ..और मुझे पता चला कि वे आशा जी की सगी बहन हैं ।उनके हालचाल मिलते रहे । इस बार जब इंदौर आने का प्लान बना तो आशा जी से मिलना प्राथमिकता में था और आज वो संयोग बना.... आज मैं ,पल्लवी,मायरा और नीलेश - आशाजी से मिले उनके घर जाकर, वे इतनी खुश हुई कि मेरे पास बताने को शब्द नहीं,पहले की ही तरह हर विषय पर बात की,कैसे शादी के बाद पढ़ाई जारी रखी बिस्तर से उठ तो नहीं सकती थी,लेकिन मजबूत  ईच्छाशक्ति की मालकिन फिर उसी जोश से मिली ,मुझे उनकी प्रकाशित पुस्तक भेंट की, लेखन अब भी जारी है,मायरा ने भी भरपूर मनोरंजन किया उनका..कविताएं और श्लोक सुनाए डांस दिखाया,.....बहुत अच्छा लगा एक दिन ऐसे बीतना...👍ढाई साल से बिस्तर पर स्वास्थ्य से लड़ाई करती हुई आशालता जी के साथ थोड़ा सा वक्त बिताना.
ईश्वर से प्रार्थना है वे और जल्दी स्वस्थ हों और लेखन जारी रखें !