Thursday, April 27, 2017

गाओ,गुनगुनाओ शौक से


सुर ताल का ज्ञान न होने पर भी जीवन में उमंग भरने वाले गीतों को गुनगुनाने से भला कौन रूक सका है ---

संगीत को उपचार की तरह ले रही हैं ग्रुप की सभी सदस्याएं  और दिन भर तनाव से मुक्त हो आनंदित हो रही हैं। ..प्रयोग सफल रहा है। ..आप भी सुने। . यहां सिर्फ मेरी आवाज में हैं आज -



1-  दैया रे दैया रे -बिछुआ




2- चुन चुन करती आई चिड़िया




3 - आहा रिमझिम के ये प्यारे- प्यारे गीत लिए - झींगुर






4 -  मिठठू मियाँ




5 - कोयलिया






नाव चली, नानी की नाव चली

एक बहुत कठिन गीत जिसमें सांस लेने की गुंजाईश नहीं। ..... गाने का मन था , गा लिया , ...मायरा जब समझेगी खुश  ही होगी -

 लेखक- हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय
 नाव चली-

Tuesday, April 25, 2017

छम -छम नाचे "नानी और मायरा"



कोयल बोले कुहू -कुहू ,मोर बोले पीहू -पीहू 

इधर-उधर की बातें करती चिड़िया बोले चूंचूंचूं 

यदि कोयल बोले पीहू-पीहू और मोर बोले कुहू-कुहू 

तो बोलो बच्चों क्या होगा?,क्या होगा भई क्या होगा ?

बेपेंदे का लोटा तो लुढ़केगा ही लुढ़केगा,

तो इसीलिये ------------

कोयल बोले कुहू -कुहू ,मोर बोले पीहू -पीहू 

इधर-उधर की बातें करती चिड़िया बोले चूंचूंचूं  ..... 



मुर्गा बोले कुकड़ू कूँ ,बोले कबूतर गुटरू गूँ 

दोनों दाना चुगकर खाते,पकड़ों होते-उड़नछू 

यदि मुर्गा बोले गुटरू गूँ और बोले कबूतर कुकड़ू कूँ 

तो बोलो बच्चों क्या होगा?,क्या होगा भई क्या होगा ?

बेपेंदे का लोटा तो लुढ़केगा ही लुढ़केगा,

तो इसीलिये ----------------

मुर्गा बोले कूकडू कूँ ,बोले कबूतर गुटरू गूँ 

दोनों दाना चुगकर खाते, पकड़ों होते-उड़नछू 



बाजे  पायलिया, गाए बाँसुरिया 

छम -छम नाचे "नानी - मायरा"

यदि बाजे पायलिया गाए बाँसुरिया 

ताल पे नाचे काली हिरनिया 

तो बोलो बच्चों क्या होगा?,क्या होगा भई क्या होगा ?

नाच न जाने आँगन टेढ़ा तो होगा ही होगा। ..  

तो इसीलिए ----------------

बोले पायलिया, बाजे बाँसुरिया 

छम -छम नाचे "नानी और मायरा"



Monday, April 24, 2017

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

बचपन की बात है,काका के यहाँ जाती थी तो वे क्लब के स्विमिंग पूल ले जाते तब बहुत डर लगता बाहर से देख देख मन में एक इच्छा ने घर कर लिया कि कभी मौका मिला तो सीखूँगी ...
समय बीता .... वार्डन रहते छुट्टी के दिन होस्टल के बच्चे स्विमिंग करते और मैं बाहर से सिर्फ ड्यूटी देती तैरना न आते हुए भी 
स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर बनी .... जब स्विमिंग टीचर छुट्टी करती तो मेरा अरेजमेंट लग जाता ... और क्लास लेना पड़ती ,डर लगता मगर बाहर से नियंत्रण रखती और बच्चों की क्लास मिस न होती,बच्चे खुश और मै डरी हुई ....

एक बार गर्मी की छुट्टियों में स्विमिंग केम्प लगा स्कूल में ,जो कोच थी उनके पिताजी का अचानक देहांत हो गया,,जिम्मेदारी मुझ पर आ गई ,तब तक थोड़ा हाथ पैर चलाना सीख लिया था मैंने..... करीब एक हफ्ते पानी में उतर कर सिर्फ बच्चों को पकड़ पकड़ सिखाया पूल में पानी थोड़ा कम रखवाया और दो हेल्पर पूल साइड खड़े रहते ,बहुत बड़ा रिस्क लिया पर सिखाया ,खुद तब भी ठीक से नहीं आती थी। 😢
कभी सोचा न था अब स्विमिंग सीखूँगी.,...पिछले वर्ष वत्सल के यहां बंगलौर आई तो ये मौका हाथ लगा। 
स्विमिंग सीखना अच्छा लगा . और सीखने की तो कोई उम्र नहीं होती .. पानी पर सोकर रेस्ट किया था तभी पहली बार....




एक बात तो तय है की सीखने की कोई उम्र नहीं होती ,और सीखी हुई कोई चीज या बात कभी बेकार नहीं जाती। ..
अबकी कार चलाना सीखना है। .. :-)

.....




😁

Sunday, April 23, 2017

लाल बत्ती ,लाल रंग - खतरा या ठहराव

लाल बत्ती यानी खतरा। .. बचपन में सबसे पहले लाल बत्ती का मतलब सीखा सड़क पर। ..जब गांव से कभी शहर आते तो चौराहे पर खड़े हो बत्ती को बड़े प्यार से देखते कब हरी हो......... और सड़क पार करते समय , पहले दाएँ देखो फिर बाँए देखो और कर लो सड़क पार।

लाल रंग खतरे का निशान कब से हुआ शायद ही किसी को पता हो मगर ये तो बचाता है खतरे से आगाह करके। ... 

फिर बत्ती को देखा सिनेमा में जब कोई सीन एक्सीडेंट या बीमारी वाला होता तो एम्बूलेंस लालबत्ती घुमाते तेज भागती और सीधे अस्पताल पहुंचकर ही दम लेती ऑपरेशन थियेटर की बत्ती जलती -बुझती दिखाई देती और हम हाथों से कुर्सियों के हत्थे भींच लेते। ..

जब थोड़े बड़े हुए तो कॉलेज में सामना हुआ इस लालबत्ती से - कोई गर्ममिजाज लड़की को देखकर मेरे दोस्त कहते वो देख लालबत्ती आ रही है। .. :-)



तब तक समझ आ गया था की ये लाला रंग ही खतरे की पहचान है , किशोर दा भी सुनाया करते थे -=ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा। ... 

फिर शादी हुई तो लाली इस कदर छाई की जित देखूं तित लाल नज़र आने लगा। ... मांग भरी ,बिंदिया सजाई ,लाल चूनर ,लाल चूड़ियाँ पहनी होंठ लाल किये। ... 

लेकिन लालबत्ती का असल मतलब तब समझा - जब दो महीने तक हर दिन अस्पताल के आई सी यू के बाहर बैठना पड़ा। ... हर पल उस बत्ती पर निगाह ठहरी रहती। ... जो लाल होती। ..अंदर जो शख्स होता उसके साथ जाने कितनी जिंदगियां ठहर जाती। ... लाल रंग लहू का तब समझा जब दौड़ दौड़ कर लोग रक्तदाता को खोजते। ... 

जीवन का अंत होता है , तो हर जगह से लाली गायब हो जाती है। .. कोई भागम भाग नहीं। .सब कुछ ठहर सा जाता है। 

एक बात बचपन से लेकर आजतक कभी समझ नही आई - नेता लाल बत्ती की गाड़ी में सायरन बजाते हुए सदा भागते क्यों रहते हैं। .... क्या उनके लिए लाल बत्ती मतलब भागो भागो भागो। ..पब्लिक से ,पब्लिक के सवालों से। ... :-) क्या उनके लिए ये बचाव का तरीका है ?

काश वे समझें - लालबत्ती रूकने का सबब है। .... इससे निजात पाकर वे ठहरें। ..और फिर समझें ठहराव वाली जिंदगियां आखिर कितनी ठहर गई हैं कि लाल रंग आँखों में उतर आया। ..

Saturday, April 22, 2017

गर्मी आई गर्मी आई





गर्मी आई गर्मी आई
छुप गया कम्बल
छुपा दी गयी रजाई
रसभरी लीची ,हरे -काले अंगूर,
और रसभरा तरबूज खाओ
केरी-पुदीने का शरबत
और आम का ठंडा रस
कूलर वाले कमरे में
पियो चटखारे ले लेकर
लू भरी दोपहरी को छकाओ
इमली की चटनी
और खीरे का रायता
नानी को पटाकर,
नानी से बनवाओ
दोपहर में नानी की बात मानो
बाहर न निकलो
शाम को नानी को साथ घुमाओ
खुद आईस्क्रीम खाओ
नानी को ठंडी-ठंडी
लस्सी पिलाओ। ..
बस!! ऐसे ही मस्ती में
गर्मी को दूर भगाओ !!!
-अर्चना

Thursday, April 20, 2017

अंगूठा




कभी अंदर 
कभी बाहर 
अंगूठा होता है- हस्ताक्षर 

कभी दर्पण 
कभी अर्पण 
अंगूठे में होता है- समर्पण 

अंगूठा होता है- एकलव्य 
कभी श्रव्य 
कभी द्रव्य 
कभी भव्य 


अंगूठे से बनता है - कोई विशेष 
तो कोई 
रहता है शेष। .. 

अंगूठा करता है-
किसान ,लेखक के कर्म 
समझता है -उनका मर्म 


अंगूठा होता है-
उँगलियों की जान 
हाथों की शान 
कभी अपमान 
कभी सम्मान 

और अब अंगूठा ही है -
आपकी 
मेरी,
सबकी पहचान !


-अर्चना 


Monday, April 17, 2017

मूर्खता की बातें


हर रिश्ते में दो लोग होते हैं,जिसमें से एक- दूसरे को मूर्ख समझता है ।पति-पत्नी, पिता-पुत्र,शिक्षक-विद्यार्थी,फेसबुक के दो आई डी ,जैसे रिश्ते इस बात की पुष्टि करते हुए प्रतीत होते हैं आजकल ...
विवाहित अविवाहितों को और अविवाहित विवाहितों को ....
पशुओं की बात करें तो चूहा आदमी को बिल्ली चूहे को कुत्ता बिल्ली को आदमी कुत्ते को ...
आदमी दोनों श्रेणी में रखने योग्य है वजह उसकी मूर्खता की क्वालिटी के कारण
मूर्ख लोग भी क्वालिटी रखते हैं ,जिसकी मूर्खता को ज्यादा लोग पसंद करते हैं वो हाय प्रोफ़ाइल मूर्ख होता है
हाय प्रोफ़ाइल लोग अपने स्टेटस के अनुसार मूर्खो का चुनाव कर उन्हें मूर्ख साबित करते हैं ,ये हवा में उड़ाकर,जमीन से निकालकर ,पानी की तरह अपने रिश्तों का प्रदर्शन करते हैं और दुनिया में सबसे बेहतर तरीके से मूर्ख बनाये रखते हैं -इण्डिया हो या अमरीका
अब बात करें मूर्खता की ,मूर्खता वो गुण है जो हो तो सही,पर दिखाया न जाए ।अपनी जरूरत के समय इसका भरपूर उपयोग किया जा सकता है, अगर आप खुद को इस गुण से सुशोभित कर पाए तो आपका जीवन धन्य समझें।
इसकी विशेषता होती है कि समझी,सुलझी बात को न समझना और न सुलझने देना
आप कुलपति की कुर्सी पर हों तब भी नहीं
आप जज की कुर्सी पर बैठे हों तब तो बिलकुल भी नहीं ...
मूर्ख बनने के आसान तरीके-
सबसे पहले डिजिटल हो जाएं ,
जियो जियो कहते हुए मरने की आदत डाल ले
दाहिने हाथ में मोबैलास्त्र रखें सोते,उठते, खाते,पीते,यहाँ तक कि.... (छि: लिखने की मनाही है .)
बढ़ो कहते हुए कुनबे का पालन करें
झंडा फहराना सीख लें,झंडे के रंग की चिंता करे बगैर!
अपनी गाड़ियां हाइवे से हटा कर 500 मीटर दूरी बनाए रखते चलाएं।

मूर्ख न होने के नुकसान उठाने को तैयार रहें ।
आधार नामक चिड़िया को अंगूठे की गिरफ्त में रखने से मूर्खता की क्वालिटी पर फर्क पड़ सकता है।
...
चलो बहुत हुआ मैं कोई मूर्ख पुराण थोड़ी लिख रही हूँ ....
लाईक मारो और चलते बनो. जुगलबंदी में एक से एक अध्याय लिखे जा रहे हैं।इति।

Saturday, April 8, 2017

सेल्फ़ी ,सेल्फ-ही ,सेल-फ्री

सेल्फ़ी
एक शब्द जो न जाने कहाँ से चलकर आया और एक छत्र राज्य करने की अभिलाषा पाले मोबाईल साम्राज्य पर कब्जा कर बैठा ,उसके आगे था मानंव साम्राज्य ,शुरआत में एकान्तवासी लोगों पर इसने आक्रमण किया ,लोग भौंचक से देखते और इसकी गिरफ़्त में आ जाते ,लोग भी इधर -उधर छिपे छिपे इससे हाथ मिलाने लगे जाने किस लालच म,ें फिर जैसे-जैसे मोबाईल साम्राज्य का विस्तार होते गया ये शब्द -समूह में मानव पर आक्रमण करने लगा ।
जब इसे लगने लगा कि जिस गति से लोगों और मोबाईल का साम्राज्य विस्तारित हो रहा है,उसे जीतने के लिए वो अकेला पड़ जाएगा इसने एक चाल चली हाथी की नहीं चीते की चाल और बाज़ की तरह झपट्टा मारकर 'पाऊट' नामक नए जन्मे शब्द को अपने कब्जे में ले लिया, अब इसे एक फायदा हुआ कि जो लोग इधर-उधर छिपे छिपे इसकी गिरफ्त में थे वे पाऊट से दोस्ती के बहाने सामने आने लगे और सेल्फ़ी की बन आई। पाऊट के चक्कर में ज्यादातर स्त्री जगत पर सेल्फ़ी ने कब्ज़ा कर लिया।और स्त्री जगत ने बालजगत और साथीजगत को भी साथ समेट लिया।P0LL
पाऊट ने नए नए और तकनीकी से लैस मोबाईलगणो से मानव  साम्राज्य पर सेल्फ़ी का कब्ज़ा जमवा दिया ,लोग एकांत छोड़ समूह में शिकार होने लगे ।ऐसे समूह में एक मुख्य बात नज़र आती या तो सेल्फ  या पाऊट ग्रसित लोग एक हाथ हवा में उठाये सबसे आगे रहते
इस तरह लोग खुद ही सेल्फ़ी शब्द को 'सेल्फ ही' की गलियों से निकाल सेल-फ्री' तक पहुँचाने का कारण बन गए।कइयों ने तो जान की बाजी भी लगा दी।
अब इस सेल्फ़ी शब्द ने मोबाईलगणों युक्त मानव साम्राज्य पर पूरा कब्ज़ा कर लिया था ,पर लालच आदमी से ही क्या क्या करवा लेता है ये तो बेचारा एक शब्द था एक युग पुरुष को भी धर दबोचा इसने और उसने सेल्फ़ी शब्द को डॉटर, सफाई,और ऐसे न जाने क्या क्या शब्द उपहार में दे दिए....
हम भी उसी युगपुरुष के अधीन हैं ,इसलिए व्यंग की जुगलबंदी लिख रहे हैं सेल्फ ही 'सेल्फ़ी' को बाजू में बिठाए☺

Saturday, April 1, 2017

आ लगा किनारा

मेरे गाँव की नदी
सूख गई मेरे देखते-देखते
जाती थी माँ जहाँ-
कपडे का गट्ठर सिर पर रख
कपडे धोने
और बताया करती थी हमें-
बुआ के साथ की गपशप और किस्से

मैंने देखा था नदी को
गणगौर पर्व में और
संजा पर्व में -
जब विदा करती थी उसे
गले लगा -उसी नदी में

मेरी बेटी सिर्फ जानती है
कि मैं विदा किया करती थी
गणगौर और संजा

लेकिन उसकी बेटी?
अपनी "मायरा"?
सुनेगी कहानियों में-
गणगौर,संजा,नदी और नानी के किस्से!!!

Friday, March 31, 2017

सृष्टि की रचना और चित्र वैचित्र्य

दो रचनाएं पढ़ी फेसबुक पर पहली वाणी गीत जी की सृष्टि की रचना ...और दूसरी आशीष राय जी की चित्र वैचित्र्य ...
और सहज टिप्पणियां हुई -

ईश्वर ने जब रचा होगा ये संसार
मन रहा होगा उसका निर्विकार
साकार किये जब उसने स्त्री और पुरुष
आया न होगा कोई विषम विचार
न मुग्ध हुआ ,न खिन्न हुआ,पर
किया उसने सुन्दरतम विस्तार...

रचकर ये संसार सिखाया
उसने हमको कर्म
न कोई है - अपना पराया
समझा न कोई मर्म
वाणी का आशीष न देकर
अगर वह रह जाता जो मौन
चित्र वैचित्र्य इतना सुन्दर
हमको दिखलाता फिर कौन ?....

Sunday, March 26, 2017

दिल होता है कितना सुन्दर

वो सुंदरता का मुरीद था,
होता भी क्यूँ न!
मेरा दिल था- उसकी आँखों में ...

दिल होता है,कितना सुन्दर
ये जाना था उसने मुझसे -बातों में ...

कभी जो की भी- बताने की कोशिश
खो गया वो तभी -महकी साँसों में ...

काश!सपने सच हो जाया करते  सदा
जो देखे जाते रहे हैं -शीतल चाँदनी रातों मे...

और मुझे कभी 'था' न कहना पड़ता
उसके लिए इस तरह...
जो तकदीर लिखना होता -अपने हाथों में ...
-अर्चना

बाल कविता

मास्टरजी ने बच्चों को बुलाया
कक्षा में ये फरमान सुनाया
कल सबको विद्यालय अनिवार्य है आना
साथ में अपने एक हास्य कविता भी लाना
सुन कर मास्टरजी का ये फरमान
बबलू बाबा हो गए हैरान
चिंता से उनका सर भन्नाया
घर जा माँ को मास्टरजी का फरमान सुनाया
बोले - माँ कल जरूर से स्कूल जाना है
और साथ में हास्य कविता को भी ले जाना है
अब हो गई माँ परेशान
जानकर ये बहुत हुई हैरान!
कविता तो मिली ढेर सारी
सूरज ,फूलों,जानवरों वाली
कहीं बन्दर था कहीं था भालू
कहीं कद्दू और कहीं था आलू
तुकबंदी थी,भाष्य नहीं था
कविता मिली पर हास्य नहीं था,
तब माँ ने किया तकनीकी इस्तेमाल
फेसबुक पर स्टेटस ठेला और मंगवाया लिंकित ज्ञान
अब दोनों बैठे टकटकी लगाए
टिपण्णी ताकते,कि कोई कविता-
कविता में  हास्य लेकर आए
तभी मिला ये अद्भुत ज्ञान कि

अपनों संग जब समय बिताओ
हास्य से खुद सराबोर हो जाओ
अब बबलू से फूटी हास्य की झड़ी है
और हास्य कविता बबलू के मुंहबाएँ खड़ी है ...







Saturday, March 25, 2017

मन के पंछी कहीं दूर चल

तुम आशा विश्वास हमारे
तुम धरती आकाश हमारे...गीत बजने लगा है विविध भारती पर ....
है तो प्रार्थना ही पर मैं चली गई अतीत में ,मन भारी हो गया,सूरज की लाली दिखाई देने लगी है अब ..अरे!ये क्या सूरज से पहले तुम उग आए आसमान में!
-मैं जानता था,इस गीत के बजते ही तुम्हारे हृदय की सितार के तार झनझना उठेंगे और मैं चल पड़ा  उन्हें सुनने ...ये क्या? तुम्हारी आँखों में नमी तो नहीं ,मन का बोझ महसूस हो गया था मुझे ...

- ह्म्म्म!मैंने कोशिश की ...पर....
पर आजकल आँसू बहुत जल्दी आने लगे हैं ....
आपके इतना कहने पर भी...

-मन हल्का हो जाता है.. रो लिया करो... मत रोको आँसुओं को...
-आते हैं और रूक जाते हैं ...
लगता है खूब जोर से चिल्लाउं ... और एक दर्द में सब खतम ... सच्ची
थक गई हूं ...
.डर है ...आगे क्या होगा का
-तो चिल्लाओ.. अकेले में ख़ूब ज़ोर से.. यह थेरेपी का हिस्सा है... जो घुटकर रोते हैं वो बहुत तकलीफ़ पाते हैं.. चीख़कर रोने से मन हलका होता है..
-मगर मुझे ये सौभाग्य अभी तक नहीं मिला कि ये थेरेपी आजमाऊँ ....पहली और आखरी बार तभी ली थी ,जब तुम बादलों के पार.....
....
ओह!!!।ये क्या? रे!सूरज !आंसू पोछकर हथेलियाँ  सरकाई नहीं कि नेपथ्य में धकेल दिया उन्हें ?
बस आवाज ही सुनाई दी -मायरा कैसी है?
..........
............
गीत खत्म हुआ, अगला गीत ....पंछी बनूँ उड़ती फिरूं मस्त गगन में ...
आज मैं आजाद हूँ .......

अनवरत लिखी जा रही प्रवाहमान कहानी का टुकड़ा ...

Tuesday, March 21, 2017

उधार लेने वाले..


आज बहुत दिनों बाद हम बहनें साथ बैठ गप्पे लगा रही हैं,बात बात में बात चल पड़ी है कुछ लोगों की ,जिन्होंने हमसे उधार लिया मगर चुकाया नहीं,यहाँ तक कि खुद से तो वापस दिया या देने की बात भी नहीं करते बल्कि हमारे वापस माँगने पर भी ये उत्तर दिया या देते हैं कि -अभी नहीं हो पा रहा,परेशानी चल रही है बहुत...
खूब हँस रहे हैं हम ऐसे लोगों को याद करके, भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि उन लोगों को परेशानी से बाहर निकाले ...
एक सीख भी याद आ रही है -भूखे मरते मर जाना,पर कभी मांग कर नहीं खाना ।
ये माँगने की आदत एक बार लगी तो आदमी बेशरम हो जाता है,कई लोग अपनी जरूरतों की प्राथमिकता ही तय नहीं कर पाते, वरना भगवान ने किसी को कोई कमी नहीं रखी,अपने पास जितनी बड़ी चादर हो ,पैर उतने ही फैलाने चाहिए...
कई लोग तो ऐसे हैं,जिन पर दया आई और मुश्किल वक्त में उन्हें पैसे से मदद की लेकिन अच्छे वक्त में वे ही भूल चुके कि उधार लौटाना भी है।
हर रात सोने से पहले याद कीजिये किसी का कुछ उधार चुकाना तो नहीं है,अगर मन ना में जबाब दे तभी चैन से सोइये वरना अपना एक हितैषी खो देंगे आप ...👍

Thursday, March 9, 2017

उड़ो कि सारा गगन तुम्हारा है ...

महिलाओं को आगे लाने की बात हो तो घर से शुरुआत करनी चाहिए ,सबसे जरूरी है उनकी शिक्षा व रुचि ...
जैसा कि सब जानते हैं परिवार में जितने लोग होते हैं आपसी सूझबूझ और तालमेल के साथ रहें तो प्रेम बना रहता है,तालमेल का यहाँ मतलब है अपनी -अपनी जिम्मेदारी और समय संयोजन के साथ आपसी सहयोग होना।
जिस तरह से पीढ़ी दर पीढ़ी सामाजिक परिवर्तन होते हैं  उन्हें स्वीकार करना और परिवार में सामंजस्य बनाए रखना जितना बुजुर्गों के लिए जरूरी है, उतना ही नई पीढ़ी के लिए भी अपने संस्कारों और सीख को अगली पीढ़ी तक उसी रूप में पहुंचाना जरूरी है ।

व्यक्ति अपने अनुभवों से ही सीखता है,और अगर हम ये कहते हैं(जो कि सुनते आए हैं) कि - बड़ों की बात सुनना चाहिए तो उसका सीधा अर्थ यही होता है कि उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए।
अब महिलाओं की बात करते हैं -परिवार में महिलाएं ही वो नींव होती हैं जो भारतीय परंपरा के अनुसार संस्कारों का वहन कर उन्हें एक परिवार से दूसरे परिवार और एक समाज से दूसरे समाज तक विस्तार देती हैं,

हो सकता है ,अगर आप बेटी के अभिभावक हैं तो ये आपकी जिम्मेदारी बनी रहती है कि आपके परिवार की सारी अच्छाइयों का ही प्रसार हो और शायद महिलाओं में अनुशासन के पालन का गुण इसी का नतीजा हो ...मगर ये आपकी जिम्मेदारी है कि आपके घर में संस्कारों की खेती होती रहे तो जो बेटे घर में रहें वे उसे सींचते रहें ....

समय बदलता है महिलाएं उन क्षेत्रों में भी अपना रास्ता खोज खुद आगे बढ़ने लगी हैं,जिनमें जाने से वे वंचित रही हैं ,यानि रोक तो कोई नहीं है,कहीं नहीं है ...

अब मैं अपनी पीढ़ी की ही बात कहूँ तो गोबर के उपले बनाने,भैंस का दूध दुहने,आँगन लीपने,अरहर-मूंग की दाल घर में बनाने और उनके शेष बचे चूरे से पापड़-अचार- कुरळई-वड़ी बनाकर सुखाने तक से लेकर साईकिल -मोटर साईकिल और कंप्यूटर चलाने तक सब करने लगे हैं हम और हर जगह घर के पुरुषों का समान सहयोग रहा ,सदा बढ़ावा ही मिला ...

हम जितने आगे बढ़े उतना पीछे भी रहे, लेकिन आज की पीढ़ी सिर्फ आगे बढ़ना चाहने लगी और अनुभवों की फिक्स डिपॉजिट का उपयोग करना छूट गया।

अब बताती हूँ मेरे अनुभव की बात - मैं खुद साईंस लेकर ग्रेजुएट हुई,लेकिन उस समय खेल में रूचि होने से फाईनल परिणाम अच्छा नहीं रहा और आगे रेग्युलर एडमिशन नहीं मिल पाया और लड़की होने और खेल सुविधाओं ,कोचिंग के अभाव में  ज्यादा आगे तक खेल भी नहीं पाई,खैर आगे लॉ किया,मगर सोच वही रही कि घर ही रहना है, और जब मुसीबत सर पर आई तो लड़ते-भिड़ते यहाँ तक पहुँच आ पहुंची,सार ये कि सब बिना प्लानिंग के .... लेकिन पूरे परिवार ने सबक लिया और अब घर में लड़कियां आत्मनिर्भर हैं ।

चलते चलते बता दूं कि मेरी बहू बिहार से है, और शादी के बाद पी एच डी पूरी करने के लिए चार साल होस्टल में रहना था तो ये बेटे और परिवार के सहयोग से  सम्भव हो पाया ...अब अपने जॉब में है ..
और बेटी जो पहले से ही जॉब कर रही थी,उसके ससुराल में कोई  महिला सदस्य जॉब नहीं करती थी  फिर भी शादी के बाद जॉब जारी रखा था और एक अनहोनी घटने पर जब सास - ससुर का साथ छूटा तो सारी जिम्मेदारी बेटी- दामाद पर आने पर उसने जॉब से छुट्टी ली और अब मायरा की देखभाल के साथ आगे की है पढ़ाई कर रही है ....
यानि सहयोग से सब सम्भव है, मगर आगे महिलाओं को आना होगा और महिलाएं ही आगे बढ़ाएगी तो महिलाओं के लिए कोई रोक नहीं उड़ने को विशाल गगन है ।

मुझे ख़ुशी है कि मेरा परिवार और मैं - हम ये कर पाए...

Thursday, March 2, 2017

मेरी सहयात्री

कल लौट रही थी बड़ोदा से ,रात भर का सफर था ,करीब 3 बजे ,मध्यरात्रि में 10 मिनिट का ब्रेक दिया गया यात्रियों को ...
जब मैं वापस बस में चढ़ी तो केबिन में बैठी मुस्लिम महिला अपने दाहिने पैर की सलवार घुटने और जाँघ की जगह से पकड़ कर अधनंगे पैर को छुपाने की कोशिश कर रही थी ,
हालाँकि मेरी नज़र नहीं पड़ी थी,तभी वो बोली -कुत्ते ने पकड़ लिया , सारी सलवार फाड़ दी,
मैंने घबराते हुए पूछा - अभी?क्योंकि वे भी नीचे उतरी थी ।
वे बोली- नहीं सूरत में ही बस में चढ़ने से पहले कुत्ता लपक लिया ,वो तो अच्छा हुआ काट नहीं पाया ,सिर्फ सलवार फटी, पर ऐसी फटी कि शर्म आ रही है ,नीचे भी नहीं उतरती पर टॉयलेट जाना भी मजबूरी थी तकलीफ हो रही थी,गठान बांधकर किसी तरह हो आई
मैंने उन्हें कहा -मेरे पास सेफ्टी पिन है आप उसे लगा लीजिये और बड़ी-बड़ी 2 पिनें दी
पिन लगाते हुए वे बोली - "माफ़ कर दीजियेगा अब आप और मैं कभी शायद ही मिलें,मैं आपको वापस न कर पाऊँगी।"
और उनकी यह कृतज्ञता मेरे लिए अनुकरणीय हो गई ।

न मैंने उनका नाम जाना न उन्होंने मेरा ,लेकिन स्त्री का दर्द ही स्त्री जान जाए और बाँट ले ,ये क्या कम है ?

हाँ ,ये तो अंत में पता चला कि वे सूरत से कपड़ों की खरीदारी कर लौटी थी बेचने के लिए ,जब कपड़ों के गट्ठर बस से उतरवाते देखा यानि अकेले सफर करती रही हैं और हर कठिनाई का सामना करने को तैयार ।