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Friday, August 23, 2013

आज फिर गाने लगा है गीत कोई...

"आज फिर गाने लगा है गीत कोई..." राकेश खंडेलवाल जी के ब्लॉग "गीत कलश" से एक गीत --

आभारी हूँ राकेश जी की गीत रिकार्ड करने की अनुमति सदा के लिए दे रखी है उन्होंने .... :-)

Thursday, January 24, 2013

खिलें कुछ और..

 राकेश खंडेलवाल जी के ब्लॉग "गीत कलश" से एक रचना---

Wednesday, March 23, 2011

होली की मस्ती रंगों का कमाल....जहां भर की खुशियाँ गीतों का धमाल.....

रंगबिरंगे पर्व पर होली की शुभकामनाओं के साथ कई गीत जगह बना लेते है।
लेकिन मेरे मन को छुआ राकेश खंडेलवाल जी के इस गीत नें----



न बजती बाँसुरी कोई न खनके पांव की पायल
न खेतों में लहरता जै किसी का टेसुआ आँचल्
न  कलियां हैं उमंगों की, औ खाली आज झोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को, आज होली है
हरे नीले गुलाबी कत्थई सब रंग हैं फीके
न मटकी है दही वाली न माखन के कहीं छींके
लपेटे खिन्नियों का आवरण, मिलती निबोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को आज होली है
अलावों पर नहीं भुनते चने के तोतई बूटे
सुनहरे रंग बाली के कहीं खलिहान में छूटे
न ही दरवेश ने कोई कहानी आज बोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को, आज होली है
न गेरू से रंगी पौली, न आटे से पुरा आँगन
पता भी चल नहीं पाया कि कब था आ गया फागुन
न देवर की चुहल है , न ही भाभी की ठिठोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को आज होली है
न कीकर है, न उन पर सूत बांधें उंगलियां कोई
न नौराते के पूजन को किसी ने बालियां बोईं
न अक्षत देहरी बिखरे, न चौखट पर ही रोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को, आज होली है
न ढोलक न मजीरे हैं न तालें हैं मॄदंगों की
न ही दालान से उठती कही भी थाप चंगों की
न रसिये गा रही दिखती कहीं पर कोई टोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को आज होली है
न कालिंदी की लहरें हैं न कुंजों की सघन छाया
सुनाई दे नहीं पाता किसी ने फाग हो गाया
न शिव बूटी किसी ने आज ठंडाई में घोली है
मगर फिर भी दिलासा है ये दिल को आज होली है.

 शुक्रिया राकेश जी का ...
---और राकेश जी का आभार इन दो पंक्तियों के लिए भी ---

यादों की किताब को छूती जब चैती की धूप
तब तब सावन का मिलता भावों को रंग अनूप