Tuesday, July 5, 2011

माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले,गले से लगा ले,कि .........

माँ....बच्चे के मन की हर बात को वो पहले से ही जान जाती है ...... माँ के न होने का अहसास ही सिहरन पैदा कर देता है...किसी भी उम्र के हो जाएं अगर माँ है तो बचपन जिंदा रहता है......और प्राकॄतिक आपदाओं मे अपनों को खोना वैसे भी दुखद होता है.....और वो माँ हो तो ..............."सुनामी". मे अपनी माँ को खो चुके बच्चे की  भावनाओं  को व्यक्त करते हुए समीर लाल "समीर" जी का एक गीत ‘माई’ पढ़ा /सुना ....और खुद महसूस किया------- 




(एडिट किया पद्मसिंह जी ने)




16 comments:

Anonymous said...

सिरहन सी दौड़ जाती है शरीर में ये सोच कर की , " यदि दुनिया में माँ और बहन का रिश्ता न होता तो दुनिया का क्या होता "

Anonymous said...

सिरहन सी दौड़ जाती है शरीर में ये सोच कर की , " यदि दुनिया में माँ और बहन का रिश्ता न होता तो दुनिया का क्या होता " विजय पाटिल

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

एक माँ के स्वर ने इस इस कविता को आत्मा प्रदान की है!! मुझे फख्र है कि वो माँ मेरी छोटी बहन है!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत ही प्रेरणादायक गीत!

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा लगा आपके स्वर में सुनना..

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर रचना जिसे अर्चना जी के स्वर ने जीवंत कर दिया..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

समीर जी यह रचना उनके ब्लॉग पर पढ़ी तब भी मन भर आया था ...... आपने भी इस हृदयस्पर्शी रचना को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया ....आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

अभूतपूर्व प्रस्तुति, सुनामी की विपदा से पीड़ित परिवार देख चुके हैं अतः दुख बहने लगता है।

girish pankaj said...

adbhut, preranaaspad rachana.

veerubhai said...

The poem creates generalization (catharsis,emotional release )an experience or feeling of spiritual release and purification brought about by an intense emotional experience . The presentation reverberates in harmony with meaning and melody of presentation .I am sorry ,transliteration is non -operative at this point of time .

संजय @ मो सम कौन ? said...

मार्मिक रचना। सही कहा सलिल जी ने, गीत को आत्मा दे दी है आपकी आवाज ने, असर बढ़ गया है।

दिगम्बर नासवा said...

सच में सुन कर मन भर आता है ...

Stuti Pandey said...

परदेस में रहती हूँ, माँ से दूर...बहुत दूर...कई सालों से दूर...स्कूल के बाद से ही दूर..सच कहूँ तो आपके शब्दों को पढ़ने के बाद पौडकास्ट सुनने की हिम्मत नहीं हुई..और शायद कभी हो भी नहीं पाएगी.

Avinash Chandra said...

मैंने बस पढ़ा, स्तुति जी की ही तरह, सुनने की हिम्मत मेरी भी नहीं हुई।

Udan Tashtari said...

आप सबके स्नेह का आभार. किसी का दिल दुखाया हो तो क्षमाप्रार्थी.

Vishaal Charchchit said...

समीर जी,
एकदम सही कहा है कि किसी भी उम्र के हो जायें
अगर मां है तो बचपन जिंदा रहता है.....