Thursday, March 26, 2015

दो अति लघु कथा


 अलक (:))......3

वो आज फिर पन्नी उठाए घूम रहा था...स्कूल की यूनिफॉर्म पहने......
मुझे देखते ही बोल पड़ा ......जा रहा था स्कूल, मगर रात बहुत चढ़ा के आया बाबा......माँ को बहुत पीटा....अब दोपहर तक सोया पड़ा रहेगा........माँ के पैर में दर्द है और आज काम पे नहीं जा पाएगी.....
एक टैम खाना भी तो डालनाइच् पड़ेगा न पेट में.......
और मैं मांगे पैसे की नहीं खाऊंगा रोटी........
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बाय कहा मैंने ...कल फिर मिलेगा...
नई सुबह तो होगी ही......

अलक (:))......4

अरे ओ चिन्दी.... इधर तो आ......
जोर जोर से आवाज लगा रहे थे....अस्पताल के वार्ड में उसको.....और चिन्दी है कि ये उड़ी और वो उड़ी फिर रही थी हर मरीज के बिस्तर के पास.....सॉकेट में मच्छर भगाने की टिक्की डालने को....
पुनम्मा नर्स के साथ ये काम करने में बहुत खुश हो जाती है वो.......
घूड़े के ढेर पर चिथड़ों में  लिपटी मिली थी 3 साल पहले.....तब से यही नाम पड़ गया.......चिन्दी....पुनम्मा की पूँछ......चिन्दी

1 comment:

Kavita Rawat said...


एक कटु सत्य जो हमारे अक्स पास दिखते हुए भी सबकी नज़रों से दूर रहते हैं ...मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ..