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Sunday, March 26, 2017

दिल होता है कितना सुन्दर

वो सुंदरता का मुरीद था,
होता भी क्यूँ न!
मेरा दिल था- उसकी आँखों में ...

दिल होता है,कितना सुन्दर
ये जाना था उसने मुझसे -बातों में ...

कभी जो की भी- बताने की कोशिश
खो गया वो तभी -महकी साँसों में ...

काश!सपने सच हो जाया करते  सदा
जो देखे जाते रहे हैं -शीतल चाँदनी रातों मे...

और मुझे कभी 'था' न कहना पड़ता
उसके लिए इस तरह...
जो तकदीर लिखना होता -अपने हाथों में ...
-अर्चना

Thursday, August 4, 2016

ऋणी हूँ तुम्हारी मैं



जब भी सावन आता है मुझे उसकी याद आती है। ...

बात सन १९९३ जुलाई की है , मेरे पति सुनील के गंभीर एक्सीडेंट की खबर मुझे मिली , वे ऑफिस के कार्य से शिलॉन्ग गए हुए थे ,और मैं बच्चों के साथ रांची में थी। ... एक्सीडेंट के बाद उन्हें गौहाटी न्यूरोलॉजिकल रिसर्च सेंटर में लाया गया था
जब आनन-फानन में मुझे  बच्चों को छोड़ गौहाटी पहुंचाया गया तब मेरे साथ परिवार से सिर्फ एक चचेरे जेठ जी थे वे भी इसलिए कि मेरे पति की ही कंपनी में उच्च पद पर धनबाद में कार्यरत थे व सबसे जल्दी पहुँच सकते थे। ..
पहली बार हवाई जहाज की यात्रा इस तरह करूँगी ,कभी सोचा न था। .:-(
खैर ! ..जब हम गौहाटी पहुंचे तो वहाँ एयरपोर्ट से पहले कंपनी के गेस्ट हाउस में जाना तय हुआ , सामान रखवा कर अस्पताल के लिए जाने लगे तो मुझे एक कार में बैठाकर बताया गया की ये कर आपके ही साथ रहेगी इसकी ड्यूटी चावजी के लिए ही रहेगी आपको लाना-ले जाना या दवाई /ब्लड जिसके लिए भी जरूरत पड़ेगी ये ड्राइवर साथ रहेगा। .. नाम है विजय यादव। ..   यहीं का लोकल है इसे सारे रास्ते पता है। ..

मेरी माँ और भाई ४-५ दिन बाद पहुंचे थे ।

सुनील कोमा में थे और एक महीने पूर्ण कोमा में रहे, अगले एक महीने अनकॉन्शस कह सकते हैं। ..   हम वैसे ही वहाँ से लौटे और करीब साढ़े तीन साल जीवित रहे वे उसी अवस्था में । ...

... और आज मैं विजय को ही याद कर रही हूँ  --- एक अनजान लड़का

एक १९-२० साल का दुबला-पतला बिहारी लड़का  ... दिन-रात मेरे और मेरे परिवार के साथ लगा रहा। ..

हॉस्पिटल ,गेस्ट हाउस से करीब ७ किलोमीटर दूर था। .. हॉस्पिटल में रिसेप्शन काउंटर पर ही  बैठे रहना
पड़ता था क्यों कि आई सी यू में जाना  मना था।  खाने के नाम पर एक गुमटी थी बाहर जहां चाय-बिस्किट मिल जाते थे लेकिन बाद में पता चला कि उसे भी भाई ने एडवांस पैसे दिए थे तभी वो बिस्किट रख पाता था। ... वो भी बहुत गरीब था , हमारा एहसान मानता रहा अंत तक। ....

विजय दिन भर ब्लड लेने या दवाई लाने दौड़ता रहता मेरे परिजन के साथ.

..मैं   देर रात वापस लौटती करीब १२ या १ भी बज जाते। .. फिर सुबह ४ बजे तैयार हो जाती। ... नींद ही कहाँ थी तब आँखों में। .. :-(
बस भगवान की प्रार्थना का ही आसरा था। .  किसी ने बताया गौहाटी में शुक्राचार्य जी का स्थापना किया हुआ ब्रह्मपुत्र के किनारे शुक्रेश्वर महादेव का मंदिर है वहाँ म्रत्युंजय मंत्र का जाप करो ,किसी ने बताया कामाख्या मंदिर में ज्योत जलाओ। .... सब प्रयत्न किये। .और विजय मुझे हर जगह लेकर गया। .कोई मंदिर ,दरगाह न बची होगी उन दो महीनों में। . ... वो कहता दीदी चलो वहाँ चादर भी चढ़ाते हैं। .... वहाँ बहुत से शिवलिंग हैं ,जल चढ़ाएंगे। ... सब ठीक हो जाएगा। ..

तब श्रावण माह चल रहा था ,एक दिन उसने छुट्टी ली। ... हमें लगा उसको थकान हो गई होगी। ... लेकिन अगली सुबह वो जल और प्रसाद लेकर आया हॉस्पिटल में। ..बहुत पूछने पर बोला कर सारी रात कांवड़ लेकर बारिश में चला है , वहाँ कहीं पहाड़ी पर शिवलिंग पर ब्रह्मपुत्र का जल चढ़ाते हैं। ...
मेरे और मेरे परिवार के पास उसका ऋण चुकाने को कुछ शेष नहीं है। ..बस उसकी याद के सिवा। ...

मेरी माँ को हम मामी कहते हैं ,वो भी मामी कहने लगा और भाई को मुन्ना भाई। .... सुबह मेरे बाहर आने से पहले कार लेकर खड़ा रहता और रात मुझे गेस्ट हाउस छोड़कर ही घर जाता। ... फिर घर जाकर खुद खाना बनाकर खाता। .. कितनी  भी कोशिश कर लो वह अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ता। .... खाना भी नहीं खाता कहीं और।

उसकी कार किराए पर ली थी कंपनी ने। ...और वो कार मालिक के यहां ड्राइवरी करता था। ....

एक महीने से ज्यादा ऐसे ही चलता रहा। ..उसका मालिक चाहता था कि  वो आराम नहीं कर पाता इसलिए उसकी जगह किसी और ड्राइवर को भेज देगा लेकिन वो नहीं मानता। ....

अपने बारे में उसने बताया था कि वो जब चौथी कक्षा में था, घर से भाग आया था ट्रेन में बैठकर , क्यों कि मास्टरजी मारते थे। . .. यहां पहुँच गया। ... ऐसे ही कुछ-कुछ काम करते-करते चार-पांच सालों से मालिक के पास टैक्सी चलाता है। ..उल्का वालों (नाम अब याद नहीं) के लिए भी जाना पड़ता है कभी-कभी। .... मुझे आप लोग मेरे घर के लगते हैं। ... बस! इसलिए कहीं जाना नहीं चाहता। ....  एक महीने से भी ज्यादा वो हमारे साथ रहा। ...

लेकिन आखिर उसे मालिक ने सख्ती करके गौहाटी से बाहर भेज ही दिया। .. जब दो महीने बाद हमें वहाँ से शिफ्ट होना था उसे कहीं से खबर लगी। ..उससे एक दिन पहले  मैं और मेरा भाई हॉस्पिटल के बरामदे में व्हील चेअर पर सुनील को बैठाये घुमाने की कोशिश कर रहे थे उसने पीछे  से आकर मेरे हाथ से व्हील चेअर पकड़ ली। ..... अरे तुम ! कहते हुए हम आश्चर्य से उसे देख रहे थे बोला- शिलॉन्ग से चार दिन की ट्रिप लेकर लौट रहा था। .. मेन  रोड पर टैक्सी खड़ी कर दी है। ..साहब  को आधे घंटे में लौटता हूँ कहकर आया हूँ मिलने। ये नहीं बताया कि यहां आया हूँ ....

आप लोग चले जाएंगे। ..... अच्छा नहीं लगेगा। ..जीजाजी भी ठीक नहीं हुए :-( कहते हुए उसकी आँखों में आंसू आ गए थे और मेरी भी। ...

फिर कभी मिलना नहीं होगा। .... मुन्ना भाई को मेरा घर देखने ले जाऊंगा। .... मुन्ना गया उसके साथ। ... माँ ने उसके लिए शर्ट -पेंट का कपड़ा खरीदवाया था,उसे देने को, लेकिन उससे पहले ही उसके मालिक ने उसे हटा दिया था  मेरी कंपनी की ड्यूटी से। .. मुन्ना कपडे भी लेकर गया उसके। ... उसे दिए ,उसके घर जाकर। ...

और आखरी दिन जब हम बम्बई/बॉम्बे .. अब मुम्बई जसलोक में शिफ्ट हो रहे थे ,वो विदा करने नहीं आया। ...

पता भी लिखवाया था बिहार अपने गाँव का। ..अभी वो डायरी भी नहीं मिल रही मुझे, न याद आ रहा है उसके गाँव का नाम  ...

कहा था उसने किसी दिन ट्रक लेकर आपके इधर से निकलूंगा तो आपसे जरूर मिलूंगा। ..मगर वो दिन अब तक नहीं आया। ..
हम लोग गौहाटी के बाद १९९३ से १९९५ तक समय के चक्र में ऐसे फंसे थे की पलट कर देखने का समय ही नहीं मिला। ...इस बीच एक बार उसकी चिट्ठी भी आई थी हाल-चाल पूछे और बताये थे। ....

हमने कभी उसे खोजने की कोशिश नहीं की। ..जाने कहाँ होगा अब ... आस है कि  कभी मिले। ...

विजय जहां हो खुश और अपने परिवार के साथ सुखी हो। ... 

Saturday, November 7, 2015

रिश्ते बनते हैं निभाने से

आज मन हुआ है उन मुलाकातों को अंकित करने का जो हुई अंतर्जाल की दोस्ती के बाद ...
जब ब्लॉग लिखना शुरू हुआ तो लोगों से परिचय बढ़ने लगा.....बातचीत होने लगी ...बहुत ब्लॉगरों से चैट पर समस्याएँ साझा की और हल निकाले .....पर मुलाक़ात शुरू हुई संजय कुमार चौरसिया जी से जिनकी एक ब्लॉगपोस्ट का पॉडकास्ट बनाया था ....और वे ग्वालियर से इंदौर किसी काम के सिलसिले में आए थे....
कुछ ही दिन बाद स्कूल की ओर से ग्वालियर जाना हुआ,वहाँ वे अपने घर ले गए....पत्नी गार्गी और बच्चों से मिलवाया ...गार्गी ने खूब खिलाया नाश्ता ....ये गार्गी दीपक मशाल की बहन है...

फिर एक दिन ब्लॉगर ताऊ जी के  बेटे ने शाम को दरवाजे पर दस्तक दी.....खुलने पर हाथों में फूलों का गुच्छा और मिठाई लिए संदेसा सुनाया - आपके मित्र समीर लाल जी ने भिजवाया है ....जन्मदिन था उस दिन मेरा......सालों बाद किसी ने फूल भिजवाकर बधाई पहुंचाई थी.....रचना के मार्फ़त जानता है पूरा परिवार मेरा समीर जी को 

ये भी पता चला की ताऊ जी ने इंदौरी स्वाद की खातिर केक न भिजवाकर काजू कतली भेजी थी.....हाँ तो मुलाकात तो भरत से हुई....




फिर एक दिन गिरीश बिल्लोरे जी सपरिवार पधारे.....और साथ आई थी उनकी बुआ जी (मासी जी,भूल रही हूँ) .. बड़ी खुश थी ये जानकर की कम्प्यूटर पर ऐसी दोस्ती भी होती है..उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि पहली बार मिल रहे हैं .


फिर रायपुर यात्रा हुई ....ललित शर्मा जी  के सौंजन्य से ......यहाँ मुलाकात हुई वीर जी ,संजीव जी,अवधिया जी,अशोक जी, स्वराज करूण जी,अनुज और राहुल सिंग जी से राहुल जी के घर बैठकी में......
.

रीवा जाना हुआ तो मिली सादी सी -सीमा सदा 

फिर पटना यात्रा में मिला अनुभवप्रिय 








 फिर आया दीपक मशाल...मेरे घर ....एक पूरा दिन



फिर लखनऊ ट्रिप पर मिले सपत्नीक रवि रतलामी जी....संजय भास्कर से बहुत पहले से बात होती रही थी यहां वो मिलने आया था.....



                                     

गिरिज पंकज जी और रूपचन्द्र शास्त्री जी ने देखते ही पहचान लिया था ... 

यहीं इस्मत जी सबसे घूम घूम मुलाक़ात कर रही थी वे मिली...

..शेफाली पांडे बगल में ही बैठी थी..... बाकि लोग बाद में दोस्त बने ...और फेसबुक पर दोस्ती हुई 
शिखा वार्श्णेय रूस की स्मृतियों में ले गई साथ .... 
वीर जी के साथ शिवम भी आकार मिले ... 

लेकिन उदयवीर जी ने पॉडकास्ट का जिक्र किया और उनकी आवाज में गीत भी सुनाया था ...

और रमा द्विवेदी जी भी मिली -

रविन्द्र प्रभात जी ने तो आयोजन ही रखा था.....गेस्ट हाउस में मिली थी सुनीता शानू जी खाने पर...अविनाश वाचस्पति और फोटोग्राफर की भूमिका में संतोष  त्रिवेदी जी ...

छोटा सा फुर्तीला गोरा चिट्टा लड़का नीरज जाट भी यहीं मिला और सपत्नीक मुकेश सिन्हा भी .... 








 गिरिश पंकज जी और शैलेन्द्र भारतवासी के साथ बाद में फोटो लिया ...

फिर अचानक से मुलाक़ात हुई शिक्षक दिवस के एक संगीत प्रोग्राम में कविता वर्मा जी से ...

                                 

और फ्रेंडशिप डे के दिन उनके घर हो आई ... 



फिर वत्सल के यहां मैसूर गई थी .वहाँ से जाना था राँची.. अकेले.......
प्रवीण पाण्डेय जी और श्रद्धा जी ने जो आवभगत की बंगलौर में हमेशा याद रहेगी मुलाकात .रात रुकना था तो कराओके पर गाने भी गाए..... खूब हँसे.......पृथु और देवला के साथ ....





फिर शैलेश  भारतवासी और उनके दोस्तों क़े साथ रात  सराफा घूमना  ..वही मुहर्रम के दिन वे भी भूल न पाएंगे......और मैं भी.....
अगले ही दिन मुकेश तिवारी जी से मुलाकात हुई...जो इंदौर में ही रहते हैं पता  चला ,लखनऊ में वे भी थे...
फिर अनूप शुक्ल जी से मुलाक़ात हुई अचानक .......
और फिर एक मुलाक़ात हुई भिलाई में वीर जी से वे साथ लाए थे शरद कोकास जी को और संजीव तिवारी जी से भी दूसरी बार मिल रही थी ...और वीर जी से तीसरी बार 
फिर आई बंगलौर..... बॉटनिकल गार्डन में बुलाया शेखर सुमन को...वत्सल लेकर गया मुझे....दो चश्मिशों  के साथ खूब अच्छा लगा 
गिरिजा जी का फोन आया ....उनके घर जाकर मिली....मगर मन न भरा तो फिर एक दिन पूरा उनके साथ बिताया ....आलू की कचोरी खूब स्वादिष्ट बनाती हैं वे

                            

यहाँ से उड़कर गाँधीनगर में  सलिल भैया भाभी से मिल आई हूँ.....

                                       

 और आनन्द  गुणेश्वर से भी गांधीनगर में ही 


अब फिर बंगलौर में हूँ...
.आशीष श्रीवास्तव जी खाना बहुत अच्छा बनाते हैं प्रमाणित कर चुके हैं
रश्मि दी मुलाक़ात का सारांश बता ही चुकी हैं



विवेक रस्तोगी जी को हरी मिर्च की चटनी मैं खिला चुकी हूँ...
एक बात बताना भी जरूरी है यहां ....दिलीप तिवारी मैसूर में था ....तब मैंने उसके ब्लॉग से पॉडकास्ट बनाए थे ....उससे बातचीत में मैंने बताया था कि मेरी भतीजी वैदेही  का जन्मदिन है
और मेरा छोटा  भाई वहीं है.....भाई को नम्बर दिया,उन दोनों ने बात की,और अगले दिन दिलीप जन्मदिन की पार्टी  में परिवार से मिला......मैं नहीं मिली अभी ....
और कोई छूटा तो नहीं ...याद करके एडिट कर लूँगी....और हाँ सबकी लिंक भी तो लगानी  है

देखिए कहा था न किसी को भूली तो नहीं  ..और संध्या जी को ही भूल गई ...जबकि इनसे तो बात से भी पहले मुलाक़ात हुई थी.......और इन्होंने अपने घर ले जाकर खाना भी खिलाया था ......खुद बनाकर .......मेरे पोस्ट लिखने का उद्देश्य भी यही था कि मैं किसी को भूल न जाऊँ....संध्या जी से माफ़ी के साथ उनकी आभारी भी हूँ की उन्होंने याद दिलाया ...मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ....क्यों याद नहीं रहा......खाना खाकर भी भूल गई .....




तो  मान गए न ! अच्छे दिन आ गए मेरे........




Friday, October 30, 2015

मानो या न मानो ,पर ये सच है ,कसम से..

आपको विश्वास हो या न हो पर ये बिलकुल सच है ....ईश्वर से सच्चे मन से मांगो तो मुराद पूरी होती है ,जब तक उसके हाथ में है.....(मुझे लगता है ,कई बार उसके हाथ में भी नाही रहता कुछ )
.कई बार मुझे महसूस हुआ है की वो मेरी सुनता है .....पिछली बार कब सुना था ये फिर कभी बताउंगी पर आज बिलकुल आज की ही बात बताती हूँ.....

मेरा टैब रश्मिप्रभा दी के यहाँ ( 26 अक्तूबर को) उन्हें मायरा के वीडियो दिखाने के बाद बंद पड़ गया ,,बहुत से फोटो वीडियो ,ऑडियो सब उसमें बंद हो कर आराम फरमा रहे थे ..... मैं  लाचार ....एक दिन बहुत कोशिश की , न ,नहीं हुआ कुछ
अगले दिन चारजिंग पर लगा कर छोड़ दिया .... ... शाम वत्सल ने भी चेक कर देखा ....न ....कुछ नहीं ॥:-(

तीसरे दिन वत्सल ने ऑफर दिया - अब नया ले लो इसे हटाकर ..... सब एक में हो जाएगा ... मगर फोन अलग ही रहने दो तो आपको अच्छा रहेगा ..... सारे सेल वाले डील के लिए बाज़ार (साइट) तलाश करके पसंद भी किए सिलेक्ट भी कर लिया ...बस फाईनल ओके ही करना था ...पर आपण ठहरे वही किफ़ायती काम करने वाले .... मन में आया ---नहीं यार बहुत पैसे फालतू खर्च हो जाते हैं ..... चल जाएगा काम ....चल ही रहा है ...... कुछ और काम खोज लूँगी ..... फिर कुछ दिन रूक कर ले लेंगे .....
इस पर पोस्ट भी लिख दी... 



आज हो गई थी 29 अक्तूबर
मैं सुबह  पूजा करने बैठी तो पास ही चार्ज हो रहे टैब पर नज़र पड़ी..... दिल ने कहा- क्या यार -तुझे हुआ क्या है ? , कुछ पता चले तो इलाज हो ..... और सच्चे दिल से भगवान से कहा -इसे ठीक कर दो प्लीज ..... और एक बार ऑन करने के लिए बटन दबाया ====
ये क्या ! चमत्कार ..... चालू हो गया,स्क्रीन पर  lenova चमकने लगा ..... आंखे खुली रह गई ॥एक बार भगवान को देख रही थी ,एक बार टैब को .... ...
पहले पूजा की और फिर  ये फोटो उसी से ली  नई ब्लॉग पोस्ट लिखने को ...  ....

विश्वास और गहरा हुआ -ईश्वर है ,और वो सबके मन की सुनता है ....सुन ली -मेरे मन की 

Sunday, October 18, 2015

विश्वास की कोंपल

आज तक ऐसा नही हुआ ... वो अपना हेलमेट ऑफिस में भूल आया ... और ये बात उसे आधे रास्ते आकर याद आई ..... अब ? क्या करे ? ट्रेफिक में वापिस जाए, और अब तक ट्रेफिक सिपाही की जो नज़र न पड़ी , वो उस पर पड़  गई तो ....नहीं ,नहीं ...माँ चिंता करेगी घर  पर ....... वैसे ही लेट  निकला था आज वापसी में ....तो .....
उफ़्फ़! ऐसा कैसे हो गया सोचते हुए भी ये तय कर लिया था की घर ही चला जाए ,कल ऑफिस से ले लेगा हेलमेट .....
मगर कल जाएगा कैसे ......? ओह ॥यार शिट!....... बिना हेलमेट के तो नहीं ही जा पाऊँगा ......कल बस से चला जाऊंगा ......

उधेड़बुन में ही घर पहुँच कर माँ से सीधे बोला ----आज मेरे साथ चोट हो गई ..... और हेलेमेट भूल आने की बात बताई ...30 का हो गया है पर पता नहीं आज भी उसे लगता है माँ के पास उसकी सारी चोटों का मलहम होता है ........
"तू अब तक बड़ा नहीं हुआ  ".... माँ की झिड़की में भी प्यार ही नज़र आया उसे ....
खैर दूसरे दिन की सुबह हुई .... तय करके सोया था की बस से जाना है तो एक घंटा जल्दी निकला जाएगा ...मगर बहुत दिनों बाद माँ आई है , ... टिफिन बनाने के लिए हड़बड़ी न हो तो ये याद भी नहीं दिलाया कि जल्दी निकलना है .....वैसे भी  खूब सारी बची बातें माँ से बातें करते-करते उसकी यादों से खुरचन  निकालता है वो ...जिसमें उसका बचपन और पिता का स्नेह दबा रह गया है कहीं ...
खुद ही सोचा बस से नहीं तो कैब ही ले लेगा ...थोड़े पैसे लग जाएंगे मगर कौन बार-बार खुद के लिए लेता हू ,,,,,
कैब बुक करने लगा ...... माँ ने बात सुनी तो याद आया कि अरे! बस से जाना था .....तुरंत माँ को कह दिया कोई बात नहीं ॥पहुँच जाऊंगा

शहर से थोड़ी अलग, एक तरफ घर होने से कैब जल्दी मिलती नहीं और कोई साधन तो खैर ही समझो कि कभी मिला हो ......  पर आज तो बहुत अनोखा अनुभव हुआ ...मोबाईल एप्प पर गूगल में कैब घर के पास ही दिखा रहा था , फोन मिलाया तो ड्राईवर बोला -सर, मैं दूर हूँ .... उधर नहीं आयेगा ...
- अरे! कैसे नहीं आयेगा, तुम्हें तो मेरे अपार्टमेंट के नीचे ही दिखा रहा है ?
- नहीं सर ,कुछ गड़बड़ होगा, मैं तो...... नहीं आ सकता
थोड़ी बहस के बाद  फोन काट दिया उसने ....बड़बड़ाते हुए - आजकल बहुत स्मार्ट समझते हैं लोग .खुद को ...साफ झूठ बोल रहा है .... दूसरी देखता हू
अब माँ के माथे पर भी चिंता कि लकीरें दिखने लगी थी ......वापस हेलमेट हाथ में लेकर आयेगा बस से ..... भूल मत जाना फिर .... रास्ते में न छूट जाए ....
....हाँ ,हाँ कहते तुरंत बोला-.... मैं निकलता हूँ नीचे से ही कुछ मिल जाएगा ॥आगे जाकर कैब मिल जाएगी ....और टिफिन हाथ में उठाए निकला गया ....

आधे घंटे में ही ऑफिस पहुँच कर फोन आ गया - मैं पहुँच गया .....
-अभी पहुंचा ? कैब मिल गई थी ?... माँ थी दूसरी ओर तो सवाल भी साथ ही थे ....-
हाँ ,हाँ ,पहले थोड़ी दूर तक लिफ्ट ले ली थी ....फिर सड़क से कैब .... फिर भी आधे घंटे में पहुँच गया ....रखता हूं
..
दिन खतम करती रही माँ ...कभी अंदर कभी बाहर .... कभी पार्किंग तक ..... जानती थी आना भी तो बस से ही है उसे तो देर हो ही जाएगी .....

आया ...... हेलमेट जगह पर रखा ॥कपड़े बदले ...और इधर माँ के सवाल तैयार - - टिफिन कितने बजे खाया ? .... भरता कैसा बना था बैंगन का? और करेले की सब्जी में नमक ज्यादा तो नहीं लगा ..... उपवास चल रहे हैं न! तो चख नहीं सकती ......

अब वो फ्रेश होकर माँ के सामने मुसकुराते हुए खड़ा था ...
नज़र मिलते ही माँ ने पूछा - क्या हुआ ?
- नहीं ..कुछ नहीं ......पर .आज तो बहुत बड़ी चोट हो गई मेरे साथ ...
- अरे! ,अब क्या हुआ ? मिटींग थी न आज भी ...
- हाँ, वो तो सब ठीक रही .... मगर मैं  जिस कैब में गया था न!, आज मेरा टिफिन उसमें ही छूट गया ....
- हैं ???? ... क्या करता है तू? ....... कहाँ ध्यान रहता है?.... मोबाईल पर बात करते हुए निकल लिया होगा उतर कर ... अब ?
- कोई नहीं ........ बात हो गई मेरी .......
-किससे?
- मुसकुराते हुए - लंच टाईम में खोजने लगा अपना टिफिन ..... मिल ही नहीं रहा था और याद ही नहीं आ रहा था कहाँ रख दिया
होगा
-फिर ?
- याद आया ... फोन किया कैब वाले को ...... उठाते ही बोला - सर , आपका टिफिन छूट गया न !... हां कहा मैंने ..... आगे बोला - मैं आते रहता हू उस तरफ ..... आपको फोन करूंगा  ...... , मैंने कहा ठीक है ... मगर खाना खा लेना ,उसमें करेले की सब्जी और बैगन का भरता है ..... वो बोला-  मैंने तो अपना खा लिया सर .....
-फिर ?
- फिर मैंने उसको कह दिया की -देखना.....! किसी और को खिला देना .... उसने हाँ बोला ... बस !
-फिर ?.... तूने खाया या नहीं ?
- खा लिया न, वहीं ऑफिस में ...
- अब गया टिफिन .... दूसरा लेना होगा ...वो कोई लाकर थोड़ी देगा... ... उसे क्या पड़ी है ......
- नहीं मेरी माँ .... मुझे विश्वास है, वो लाएगा
- भला क्यों/
- इसलिए की मैंने उसके साथ जैसा व्यवहार किया उस पर मुझे विश्वास है ....
-क्या किया था?
- जब मैंने बुक करने के लिए फोन किया था ,तब उसने कहा था मैं नाश्ता कर रहा हूँ सर , आता हूँ .....मैंने ठीक कहा ॥और खुद ही उस तक पहुँच गया .... तब वो नाश्ता कर रहा था ...... बोला सर ...... बस !...दो मिनट रूकेंगे क्या ? .... मैंने उसे कहा--- हाँ आराम से ... ........हमारे यहाँ खाना खाने के लिए/के समय  किसी को टोका नहीं जाता .... आदमी काम करता ही किसलिए है फिर .....
... और मैंने इंतजार किया ...... वो खुश हो गया ..... मुझे भी अच्छा लगा था.....

अब ...माँ की बारी थी मुस्कुराने की ...... विश्वास का जो बीज सीख के साथ बोया था ...... उसमें कोंपलें फूट आई थी ......

...........................................

आपको क्या लगता है ? टिफिन वापस मिलेगा .... :-) 

Monday, August 10, 2015

वो लड़की !

मैं ये मानती हूँ कि -"अगर आपके मन में अच्छा काम करने की भावना है तो ईश्वर उसे करने का मौका देता है" .....
१०/८/१५
आज स्कूल से लौटते वक्त 3:30 बजे बैंक में काम होने से रास्ते में बस से उतर गई......काम निपटाने के बाद वहाँ से साधन न होने से करीब आधा किलोमीटर स्टॉप तक पैदल आई......
बस को पीछे से ही आना था.....मगर तब तक मिली नहीं...सोचा अगले स्टॉप तक पैदल ही चल लूँ.......
चौराहा क्रास करते हुए एक 10-11साल की बच्ची ने भी दौड़कर मेरी आड़ लेते हुए रोड क्रास कर ली ......वो मेरे बराबर चलने लगी....
स्टॉप पर बस नहीं दिखी और मौसम में ठंडक थी तो रुकने से अच्छा पैदल चलना लगा....बिना इंतजार किए चलती रही ....
मेरी नज़र बगल में पड़ी तो वो बच्ची मेरे पास ही चलती दिखी ......मैंने उससे पूछा ...कहाँ जा रही हो?
बोली -माँ के पास
-माँ कहाँ है?
-साड़ी की दूकान में काम करती है
-अच्छा!,स्कूल जाती हो?
-हाँ ,
-कौनसी कक्षा में हो?
-छठी
-नाम क्या है?
-हर्षिता
उसके हाथ में गुच्छे में चाबियां थी..... मुझे लगा रोज़ स्कूल से आकर माँ के पास चली जाती होगी,मैंने सहज ही पूछा रोज़ जाती हो?या आज माँ को आने में देर हो गई?
बोली माँ 9 बजे आएगी,आज ही से काम पर गई है......
अच्छा! कहते हुए मैं चलती रही....एक दो बार उससे नज़रें मिली तो मुस्कुरा दी......
कुछ आगे चलने पर उसके चहरे पर घबराहट दिखी .....नज़र मिलते ही उसने पूछा यहाँ बालमंदिर कहाँ है?
मैंने कहा-इधर तो कोई बालमंदिर नहीं है? क्यों?
घबरा कर बोली-उसके सामने साड़ी की दूकान में काम करने गई है माँ आज ...तिलकनगर में
-अरे! क्या नाम है साड़ी की दूकान का?
नहीं मालुम! कहते हुए उसकी आँखों में आँसू आ गए .... रुक गई मैं
मैंने सर पर हाथ फेरते हुए पूछा-माँ के पास फोन है?
-हाँ
-नंबर?
-नहीं मालुम!
-माँ का नाम ?
-बबीता ... अब रोने लगी थी वो ....

ओह! .....अब मुझे समझ आ गया कि रास्ता भूल गई....
सूझ नहीं रहा था क्या करूँ.... उसे चौराहे से घर पता था......काम करने  गाँव से कुछ दिन पहले ही आया है परिवार इस शहर में .......
मैंने कहा- घर से क्यों निकल आई?जबाब मिला ..चौराहे पर घर है ,मुझे अकेले डर लग रहा था.
अब तक मैं भी थक चुकी थी ..उसे वापस चौराहे तक छोड़ना उचित नहीं लगा मुझे......और जब माँ -पिता  9 बजे तक ही पहुचेंगे तब तक और डरेगी ...सोचकर मैंने कहा- मेरेे घर चलो....गाड़ी लेकर वापस तुम्हारे घर तक छोड़ दूँगी...
अनजाने विश्वास के साथ वो मेरे साथ चलने लगी....
घर आकर उसे खाने के लिए पूछा ,मना कर दिया उसने ..केला दिया खाने को ..खा लिया उसने ...
एक्टिवा ली और चल पड़ी उसे लेकर ..... मुझे ध्यान आ रहा था कि तिलक नगर में शायद बालमंदिर मिल जाए ...
कुछ दूर जाने पर तिलकनगर बाल मंदिर नाम से ही बोर्ड दिख गया ..उसे दिखाया और पूछा ये स्कूल है? यहाँ पढ़ती हो ...
उसने हाँ में सिर हिलाया ..मैंने सोचा चोकीदार से पूछा जाए ..और अन्दर गई ...चौकीदार पहचान गया बोला ..आज मां लेकर आई थी इसे .... तभी स्कूल छूटा था सारी शिक्षिकाएं घर के लिए निकल रही थी ,एक शिक्षिका की ओर इशारा करते हुए चौकीदार ने कहा उन मेडम से पूछ लीजिए ...मैंने बात कि ,पता चला हाँ आज ही एडमिशन के लिए माँ इसे लेकर आई थी ...पर फ़ीस के पैसे न होने से फ़ार्म लेकर ही गई ..भरकर वापस नहीं दिया .....
तो कोई संपर्क सूत्र हाथ नहीं लगा मुझे .....
कुछ और प्रयास करते हुए उस रास्ते की कुछ साड़ी की दूकाने दिखाती रही कि शायद पहचान जाए ...पर नहीं ....
अन्त में यही तय किया कि जिस चौराहे पर मिली वहाँ तक ले जाकर घर छोड़ दूँ और आस-पडो़स में बता दूँ कि ध्यान रखे .... मैं वापस मुड़कर चली ...तभी एक गली को पार करते हुए वो चिल्लाई....- ये रही दूकान !
मैं दूकान के सामने आकर रूकी ..गाड़ी से उतर कर वो सीधे माँ के पास भागी ....

बाद में मैंने अन्दर जाकर माँ से बताया सारा घटना क्रम ...उसकी आँखों में नमीं उतर आई ... मेरी तरफ़ कॄतज्ञता और बेटी की तरफ शिकायत भरी नजरों से देखते हुए उसने कहा -आपने बहुत अच्छा किया ...मैंने उसे डाँट भी लगाई कि बेटी को अब तक तुम्हारा फोन नम्बर भी याद नहीं और दूकान का नाम भी तुमने लिखकर दिया .... और वो घर नहीं रहना चाहती ,तो साथ लेकर आओ ... सेठ से अनुमति लेकर ...और स्कूल भेजने में क्या परेशानी है ? पिताजी क्या करते हैं  इसके ?..... एक साथ सब कुछ पूछ -बोल दिया मैंने....
आजू-बाजू के ग्राहक भी देख सुन रहे थे ...

- वो भी काम करते हैं ...नहीं करते ..... कुछ भी समझ लीजिए आप ..... मैं अपनी बेटी को स्कूल भेजना चाहती हूँ ,और पास में ही भेजना चाहती हूँ ताकि वो मेरे पास ही रहे ...वैसे २ साल की थी तब से अकेले ही छोड़कर काम पर जाती हूँ ...पर ये जगह नईं है अभी शायद इसलिए डर गई मैडम जी ......
.......
- स्कूल की फ़ीस ?
- है तो ८००० पर किस्त में देना है ३५०० अभी ..मेरे पास नहीं है बताया तो उन्होंने कहा १००० तो अभी करना ही पड़ेंगे ...बाकि बाद में करते रहना ...
मैंने कहा- अभी मेरे पास पैसे नहीं है ...अपना फोन नम्बर दो ...मैं शाम तक वापस आकर १००० दे दूँगी ...तुम कल से स्कूल भेजो ,और अपने साथ ही रखे इसे .....

......
९ बजे तक समय था उसका ..मैं जब गई तो ८:३० बज रहे थे ....लेकिन वो निकल चुकी थी .... दूकान वाले ने भी साथ में बेटी होने से ८:१० पर ही छुट्टी दे दी थी उसे .......उसने बताया -आठ दिन से काम के लिए चक्कर लगा रही थी ..शुरू से ही पूछा कि बेटी का रहने का इन्तजाम क्या ? .... कर  लो ...स्कूल भी उसने ही बताया लेकिन महिला ने सिर्फ़ ये कहा कि हो गया एडमिशन .....  उसे कुछ परिचय पत्र भी लाने को कहा था तो आज कहा कि लाना भूल गई .....
आज ही पहला दिन था .... कुछ भी कह पाना ,विश्वास करना मुश्किल है ....

 बहुत बार फोन ट्राय किया ,नहीं उठाया उसने ... दूकान वाले को ११०० रूपए देकर कह आई हूँ कि कल आए तो उसे दे दे और पहले बेटी को स्कूल भेजे .....
दूकान वाले ने कार्ड दिया है .... कल सब कुछ ठीक हो बस ! .....


११/८/१५
कल लिखा था ..... और आज सुबह से दिमाग में वो लड़की ही थी ...स्कूल जाते हुए बस स्टॉप से ही फिर फोन ट्राय किया दो-तीन बार में उठा लिया बबीता ने फोन .... मैंने कहा- तुम आज जाओगी न! अपनी बेटी को स्कूल जरूर भेजना ,मैं पैसे दे आई हूँ दूकान पर ...
हाँ, कहा उसने...साथ ही ये - बहुत-बहुत धन्यवाद आपका मैडम .....
स्कूल से छूटते ही ...दूकान फोन किया - जबाब मिला -- जी ,मैंडम आई थी वो अभी १०००/-- दिये हैं १००/- बाकि है.... स्कूल में एडमिशन करा दिया है उसने बेटी का ....
मन कहता है -ईश्वर उसकी देखभाल करना ......जाने क्यों इतना करीब लगी मुझे वो ..

Wednesday, July 29, 2015

सॉरी पापा ! ...दोषी कौन ?सजा किसको?

कुछ दिन पहले ही ये लिखा था फ़ेसबुक पर-

इस बार उसे माँ छोड़ने आई स्कूल...और स्कूल में हिदायत दे गई कि- अगर उसके पापा स्कूल में आएं तो मिलने देना ,मगर साथ नहीं ले जाने देना ..... कारण कि वे अलग हो गए हैं और दो बच्चों में से छोटा वे ले गए और बड़ा मेरे पास है .....
.
.
जैसे कोई वस्तुएं हो और बँटवारा कर लिया मुर्खों ने .... frown emoticon
दो बच्चे हैं और दोनों लड़के .....
आगे कुछ सोच पाना ही मुश्किल है .....
.
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इन १७ सालों मे बहुत कडुए अनुभव हुए जिनमें मिठास भरते -भरते जीने की उम्मीद बनी रही ...
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अभी दो दिन पहले ही एक बच्चे का एडमिशन हुआ के. जी. वन में .... बेटे को पिताजी छोड़ने आए थे वो लगातार रोए जा रहा था .....बड़ी आँखें बाहर को निकली सी .... दाँत बेतरतीब और सामान्य  से बड़े आकार के चेहरे  से ही पहचाना जा सकने वाला -  मेंटली चेलेन्ज्ड  ....
..स्कूल का पहला दिन था उसका ..मैंने धीरे से उसे गोदी से उतारा और रोते हुए ही उसे उसकी क्लास तक ले जाकर छोड़ दिया ....२ मिनट बाद ही वो चुप हो गया था अपने साथी बच्चों को देखकर .....
१५ मिनट बाद उसकी टीचर ने आकर बताया -मैडम ! आईए देखिए तो सही ....इसे तो पेन्सिल पकड़ना भी नहीं आ रही .... क्लास में 4 चल रहा है ,इससे पूछा कि बेटा आपको आता है ? तो जबाब दे रहा है -नही आता यार!
टीचर परेशान हो गई थी !
मैंने पेंसिल को हाथ में लेकर पकड़ना बताया और उसे समझाया कि बड़ों को ऐसे नहीं बोलते ....
बच्चे ने तुरन्त कहा-सॉरी ! .... अब नहीं बोलूंगा !
आज के माहौल में बच्चे जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं ,तब जबकि माता-पिता ध्यान न दे रहे हों ...वरना तो पढ़े-लिखे माता-पिता के बच्चे बोलचाल में इस तरह कम ही बोलते हैं .....
मुझे लगा समझ गया है ,धीरे-धीरे सीख जाएगा ..

मुझे फिर बुलाया गया अबकि शिकायत थी-

करीब एक घंटे के बाद से बच्चे ने सू-सू जाने के लिए कहा ....एक बार अनुमति मिलने पर ...हर २-३ मिनट में जाने को कहने लगा ....
एक- दो बार जाने दिया गया फिर थोड़ी देर के लिए मना किया ....
लेकिन अबकि तो हैरान होने वाली बात थी वो ये कि ---
 -बच्चा अपनी नेकर क्लास में ही उतार दे रहा था .... और कहता सू-सू आ रही है ....करीब हर ५ मिनट में .... टीचर भी परेशान हो गई...  बच्चा क्लास के बाकि बच्चों से बड़ा लग रहा था और उसकी इस हरकत पर सारे बच्चे उसे देखने लगते ....
मैंने उसे मना किया ...नेकर पहनवाई , कहा बच्चे चिढ़ाएंगे ...आपको शेम-शेम कहेंगे ...
ओह! कहते हुए बच्चे ने फिर कान पकड़ते हुए सॉरी कहा ....

लेकिन मेरे क्लास से बाहर आते ही फिर वही हरकत की ........मैंने  उसे अबकि डाँटा .... थोड़ा डरा ...अबकि रूक गया ....   इसी तरह पूरा स्कूल टाईम खतम होने आया ....पढ़ाई तो हुई ही नहीं .....छुट्टी हो गई.....


 ... जब प्रिंसिपल मेम को उस बच्चे के बारे में बताया तो पता चला कि ये वही अलग हुए माता-पिता का छोटा बेटा है, जो पिता के पास है ......

. इस तरह गुजरे  उस बच्चे के स्कूल के पहले दिन के बारे में   सोच -सोच मन व्यथित हो गया ....
आज दूसरा दिन था ----
आज मन में उस बच्चे के बारे में सोच ही रही थी कि उसकी टीचर ने आकर बताया कि उसकी आँख में खुद से ही पेन्सिल लग गई जो वो बेग से निकाल ही रहा था .....

दीदी ने पानी से साफ़ भी कर दिया ...रूमाल से फ़ूँक से सेक भी दिया पर आँख नहीं खोल रहा था .... मैंने उसे देखा ....तब तक रोने लगा .... मैंने सवाल किया -ऐसे कैसे लग गई बेटा धीरे से निकालनी चाहिए न! ... जबाब मिला-
क्या बताउँ ! अर्चना मेम..... ! ....
मेरी कोशिश उसे बातॊं मे लगाकर आँख खुलवाकर देखने की थी ....जबाब सुनकर अनायास हँसी आ गई .... कहा- अरे वाह! आपको मेरा नाम मालूम है ?  
-हाँ
-किसने बताया ?
-क्लास टीचर का नाम लेकर बोला ---बहुत जल रहा है मेम...
- अच्छा! ठीक हो जाएगा अभी ,,,आप तो आज नई ड्रेस पहने हो ,नए जूते भी ....किसने तैयार किया ?
- हँसी आ गई उसके चेहरे पर ....बताया -दादू और पापा ने.....
-और दादी
-मेरी दादी फोटो में है ....दादू पूजा करते हैं रोज .....
(मन भर आया मेरा उसकी मासूमियत पर )....

चोट ज्यादा नहीं थी पर पलक खोल नहीं रहा था ,लगातार हाथ से आँंख ढँके रहा ....
...उसका रोना बढ़ता गया ....कल की घटना भी उसके पिता को बतानी थी ... जानना था कि बच्चे ने ऐसा क्यों किया होगा ......
उन्हें भी समझाना था कि उसे घर पर समझाए ....ये सोचकर पिता को बुलवा लिया ....डायरी देते हुए टीचर ने जन्मतिथि दिखाते हुए बताया- छ: साल का है मेम....
यानि उम्र में बड़ा

पिता के आने तक देखभाल का जिम्मा मेरा था ...उसे लिटाकर धीरे से पीठ पर हाथ फ़ेरा .... बोला- मेम मेरी मम्मी को भी एक मिसकॉल दे दो ..... अवाक थी! ...क्या कहती ..उसे समझाने को कहा -बेटा आपके पापा रास्ते में ही हैं ...आ ही रहे हैं ,मेरे पास आपकी मम्मी का नम्बर नहीं है ..क्यों करना है मम्मी को फोन ?
- मम्मी भोपाल गई है ....

-मेरा मन भर आया ....कहा- पापा  से लेकर लगा दूँगी फोन ....आपकी मम्मी को....
जबकि जानती थी उसकी मम्मी यहीं है और उसका भाई इसी स्कूल में पढ़ रहा है ..... :-( ...

दुखी कर दिया ऐसे माता-पिता ने उसको .....


थोड़ी देर में ही पिता आ गए ....उनसे सब बताया .... पता चला कि बच्चा स्कूल ही नहीं गया ...कारण पूछने पर बताया माँ ने भेजा ही नहीं ..... ध्यान ही नहीं दिया आपसी ....... आगे रोकते हुए मैंने कहा
खैर ये आपकी निजी परेशानी है ...जो भी कारण रहा हो ....

बच्चा अपनी उम्र से बढ़ रहा है...बातचीत जैसे बड़ों की सुनता है ,करने लगा है , ...किसी से भी हाथ बढ़ाकर हैलो कहना ...अपना नाम बताना .....अपनी गलती पर सॉरी कहना ..सब जानता है ..... सब कुछ जल्दी सीखने की ललक भी है उसमें.....

पर जिस बात ने मुझे पोस्ट लिखने पर मजबूर किया वो ये कि- जब पिता घर लेकर जाने लगे तो ....रास्ते में बोला सॉरी पापा ! ....
जब मैंने उसे कहा -पापा को क्यों सॉरी कह रहे हो ? ...बोला - मेरे लिए उन्हें आना पड़ा न ! ....
और मेरे रोंगटे खड़े हो गए ..... आँसू रूके नहीं मेरे ......

बच्चा कभी स्कूल गया ही नहीं ...इसी वजह से पेन्सिल ठीक पकड़ नहीं पाया और लिखने की कोशिश में चोट लगा बैठा ......
.घरेलू परेशानी का असर उसकी शक्ल -सूरत पर..दिमाग पर बुरी तरह पड़ा है उम्र में बढ़ा ....समझ में नहीं ..... लेकिन माता-पिता शायद उससे भी कम समझ वाले हैं ....
पंद्रह दिन बाद स्कूल से छुट्टी लेने वाली हूँ .... तब तक जितना प्यार दे सकूँ देने की कोशिश करूँगी.... ईश्वर उसकी मदद करे इसी प्रार्थना के साथ ....

Sunday, July 19, 2015

पूर्वाभासी सपना

जब भी जुलाई का महीना आता है तारीखें सामने आती है और उनसे जुडी घटनाएं भी ..सबसे पहले सुनिल का जन्मदिन 13 को फिर 20 को पल्लवी का ....कितना सुखद संयोग बेटी और पिता का जन्मदिन जुलाई में और माँ और बेटे का अक्तूबर में.......
खुशी के साथ ही ये महीना दुःख भी ले आता है .....सब कुछ आँखों के सामने आ जाता है बिलकुल किसी फ़िल्म की कहानी की तरह ......
बाकि सब तो समय के साथ स्वीकार कर लिया ....लेकिन एक बात मुझे आज भी अचंभित करती है.....

ये तब की बात है 1993 के जुलाई माह से कुछ पहले की शायद 1 महीने पहले से कई बार एक सपना आता जिसमें मुझे लगता की मैं नीचे की और सीढियाँ उतर रही हूँ..सीढ़ियों पर पानी बहते  जा रहा है,फिसलन है,बहुत भीड़ है बहुत लोग धक्का देते हुए उतर रहे हैं....मेरे साथ बच्चे हैं मैं उनको सम्भालते हुए उतरती  जा रही हूँ ..और बहुत  नीचे एक मंदिर है जहाँ दर्शन होते है ...सुनिल  पर गुस्सा भी करती जाती हूँ कि आप तो नीचे नहीं उतरे ऊपर से हाथ जोड़ दिए मुझे दोनों बच्चों को लेकर उतरना कितना कठिन हो रहा है ......भगवान कौनसे हैं ये दिखने से पहले सपना टूट जाता और मैं याद करती तो लगता बड़वानी के गणेश मंदिर जैसा जो कुँए के पास था....और आधे कुँए में उतरकर दर्शन करते थे ....सोचती ये तो वही मंदिर है जो भाभी के घर वाला है ...ननिहाल जाने पर बचपन से देखते रही हूँ...
लगता देखा हुआ है इसलिए सपने में दिखता होगा ...

लेकिन जब सुनील के शिलाँग के पास  24 जुलाई को हुए  एक्सीडेंट की खबर 25 जुलाई को रांची में  मिली और बच्चों को छोड़  गौहाटी जाना पड़ा ....तब सुनिल 2 महीने कोमा में थे ...कोई चारा नहीं था सिवा प्रार्थना के ...वहाँ किसी ने बताया  कामाख्या मंदिर में जाओ.....तो मैं पहली बार गई उनके  लिए प्रार्थना करने ..जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया ....हूबहू सपने वाली जगह लगी...और जब माताजी का दर्शन किया तो लगा  मुझे सपने में यही बहता पानी ....दिखता था .....2 महीने में बहुत बार गई....हर बार सपना सच्चा ही साबित हुआ ...बिलकुल वही मंदिर .....और एक बात कि उसके बाद कभी वो सपना नहीं देखा ....

उनको  तो बचाकर लौटा नहीं पाई मैं ...लेकिन उसी शक्ति ने ...साहस भरा यहाँ तक आने का ....
हर जुलाई में ये घटना ताज़ी होकर याद आ जाती है ...

क्या ये पूर्वाभास था ?छठी इंद्रीय द्वारा ......

Tuesday, March 31, 2015

अजीब दास्ताँ है ये .......................................कहाँ शुरू कहाँ ख़तम .........ये मंजिले है कौनसी .........न वो समझ सके न हम ...........


* नोट :- पोस्ट को पाँच साल हो जाएंगे ६ अप्रेल २०१५ को ... थोड़े परिवर्तन के साथ फिर से पोस्ट किया है ... ....

फ़्लैश बेक.... 

एक छोटी बच्ची ,करीब ४-५ साल उम्र की ........सुन्दर सा फ़्रॉक पह्ने हुए .......सुबह टिफिन लेकर ताँगे में बालमंदिर जाना......... साथियों के साथ खेलना , टिफिन खाना , नाचना ,कविता - कहानी सुनाना , शाम तक घर आना हाथ-मुहं धो कर माँ से चोटियाँ बनवाना --- रंग-बिरंगी रिबन लगवाना...... फिर खेलना ,.......वापस आकर दादा-दादी के साथ शाम के दिए लगाते समय प्रार्थना बोलना .......सब बड़ो कों प्रणाम करना फिर साथ में खाना खाना और सोते समय दादी से कहानी सुनने के बदले में उन्हें पहले पहाड़े और उलटी गिनती सुनाना .............यही दिनचर्या

फिर ........१०-१२ वर्ष की किशोरी .............स्कर्ट -ब्लाउज पहनावा हुआ ..................पढ़ने के अलावा स्कूल के अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेना ..................सहेलियो के साथ खेलते समय छोटे भाई-बहनों कों भी सँभालते रहना यही दिनचर्या ..........

अब थोड़ी बड़ी ......उम्र १४-१६ वर्ष .................पढाई में ज्यादा मन नहीं लगता .............खेलना ज्यादा पसंद खासकर लड़को वाले खेल .............और हम उम्र लड़को के साथ खेलना......माँ नाराज रहती .............घर के काम में ज्यादा मन नहीं लगता ..............स्कूल में किसी भी खेल में चयन हो जाने पर कहते ------सर ,हम नहीं खेल सकते आपको घर पर पूछने के लिए आना पड़ेगा ........और सर----- सच में आकर पिताजी से आज्ञा ले लेते पिताजी को तभी पता चलता कि मैं क्या -क्या और कैसे खेलती हूँ ...............वे आश्चर्य करते और खुश होकर प्रेक्टिस करने की अनुमति दे देते ..............लड़कों के साथ खेल का अभ्यास करते......... पर बातें सिर्फ काम की ..........दोस्ती अच्छी रहती ...............यही दिनचर्या .........

फिर ........१७-२२ वर्ष की उम्र ..............कॉलेज जाना ........यहाँ फिर पहनावा बदल गया था ,अब स्कर्ट छूट गया उनकी जगह लम्बे .............पैर ढंकने वाले कपड़ो ने ले ली .............सलवार -कमीज सिर्फ मुस्लिमों का पहनावा माना जाता था ...........परिवार थोडा फारवर्ड माना जाता था.........तब "बेलबोटम "चले थे उसे लम्बी कुर्ती के साथ पहनते थे ...........यहाँ खेलना करीब-करीब बंद हो गया .............पढाई करनी पडी ........मैदानी खेलो की जगह टेबल-टेनिस और बेडमिन्टन ने ले ली ..............सिर्फ परिचित लड़कों से ही बात करने की अनुमति ...........यानि जिनके परिवार को हमारा परिवार जानता हो ................अनजाने दोस्तों को दूर से ही नमस्कार और सिर्फ सहेलियों की दुनिया ................खुद तो किसी को पसंद कर ही नहीं सकते थे, सिर्फ दिल में ही रखना होता था, कोई अच्छा भी लगे तो जाहीर नहीं किया जा सकता था ......(खुद ही झिझक होती थी) ......और कोई अपने को पसंद करे तो दूर रहकर एक आह ...............की---- हाए! .........बात भी नहीं कर सकते ......(जाने किस डर के मारे!)..............पढाई के अलावा घरेलू कामकाज भी करना और लड़कियों के काम.................सिलाई-कढाई की क्लास लगाना .........एक नियमित दिनचर्या .............मन की पसंद पर लगाम ...............

२३ वर्ष होते-होते शादी ......अब जिंदगी का दूसरा पहलू ....


.............लड़की से महिला ..............पति-----परिवार की पसंद का , लेकिन खुद इसके लिए तैयार होने से -----पति की पसंद को अपनी पसंद बना लिया ..........दोनों ही को कोई परेशानी नहीं हुई ..........भाषा , विचार , रीती-रिवाज सबके ऊपर समझदारी हावी हो गई। .................सजना,संवरना , साड़ी , चुडीयाँ , बिंदी का साइज , सब -कुछ बदलते रहा .....कभी अपनी पसंद ----कभी उनकी ................दोनों की पसंद ............सब_कुछ रंग-बिरंगा ................लड़की की  पसंद का भी ख्याल होने लगा ...........दिन बहुत खुबसूरत लगने लगे..........घर से दूर होकर भी घर ज्यादा याद नहीं आता ..............अगले ३-४ साल में दो प्यारे बच्चों के मम्मी -पापा हो गए  .............अपनी परेशानियों ,गुस्से झगड़े के बीच,बच्चों की खुशियाँ , उनका प्यार हावी हो गया ..................उनकी देखरेख ----उनका ख़याल.................. , उनका स्कूल , कपड़े, खाने ..................पति की पसंद हटकर बच्चों पर आ गई ..............जीवन का सबसे सुखद समय बीत रहा था............व्यस्त दिनचर्या ................... , ......... .... ................. ........ ........... ............... ..............             

..........७-८ साल तक बीता समय अब सपना -सा लगता है ..............फिर जिंदगी ने पलटा खाया .................पति का एक दुर्घटना में निधन हो गया .....................अब सबके होते हुए भी एकदम अकेली ................पहनावा एकबार फिर बदल गया ..............परम्परानुसार........... रंग जीवन के साथ ही कपड़ों से भी गायब हो गए बिंदी , चूड़ी ........सब गायब ...........यहाँ तक कि पूजा करते समय जब कंकू चढाते है, तो सर पर लगाने के लिए बरबस हाथ चला जाता ...............(आदत - सी पड़ गई थी )............... तो पूजा करने को मन ही नहीं करता ...........कहीं तो समय बिताना पड़ता तो नाम-स्मरण से ही ....................सबसे ज्यादा समस्या हुई दिनचर्या के बदल जाने की ................पति के साथ रहते हुए नाश्ता , खाना समय पर करना होता था .............................अब कभी भी बनाओ .................और शाम को ऑफिस से लौटने का समय तो काटे नहीं कटता था ................(खाना बनाने का तो आज भी मन नहीं करता ).........पहले पैसों के हिसाब-किताब कि कोई चिंता नहीं होती थी ...............सो मालूम भी नहीं था-----और आता भी नहीं था ..............सब धीरे-धीरे सीखना पड़ा ................जल्दी ही बच्चों के भविष्य कि चिंता हुई और कमाई की खातिर घर से पहली बार काम करने बाहर निकली ................बच्चों के लिए सब-कुछ भुला दिया ..........अब बच्चों का ग्रेजुएशन पूरा हो चुका है ....................आगे पढाई करना है ,पर दोनों समय और परिस्थितियों से जूझकर बड़े हुए हैं, इसलिए आगे पढ़ने का अभी टाल दिया है, (जानती है माँ ).............काम की तलाश में लगे रहते हैं ..............माँ की ज्यादा से ज्यादा मदद करना चाहते हैं, ...................माँ को  उन पर गर्व होता है, अब बच्चों के खुश रहने से खुशी होती है ...

.............आगे पता नहीं जिंदगी कहाँ ले जाएगी ..................पर साथ में तीनों खुश है ...............माँ .चाहती है ---दोनों कों वो सब मिले जो वो चाहते हैं ................बस कभी-कभी डर लगता है कि हमेशा अकेले निर्णय लेना पड़ा......... (हालांकि परिवार ने हमेशा साथ दिया पर अंतिम निर्णय तो उसका ही रहता रहा ).............सलाह करने के लिए "वो" साथ नहीं है ...................ये भी लगते रहता है, कि वो होते तो शायद और बेहतर होता !...... .............. .............. ........ .......

Wednesday, December 3, 2014

विदा कहना और करना आसान नहीं ...

2/12/1996 से....... 2/12/2014....... अब तक
18 साल......

पर उस दिन को ,उस पल को
भूलना आसान नही,

भुलाना भी क्यों?
और कैसे?
जबकि
अंतिम सांस की आहट
और खड़खड़ाहट
गूंजती है अब भी
कानों में
और ये आँखे बंद
होकर भी नहीं होती
विदा कहना
और करना
आसान नहीं....
.
वचनबद्ध हूँ...
रहूँगी सदा.....

महसूसती हूँ
आज भी
अंतिम स्पर्श
.....
और

सुनाई देती है चीख
अंतिम मौन की....

रात भर का साथ
और निर्जीव देह
एक नहीं दो
.
बस!
दिखाई देता है
जीवन यात्रा
का पूर्णविराम....
जहाँ लिखा था-
ॐ नमो नारायणाय......
.
.
वक्त के साथ
सफर जारी है मेरा

ॐ शांति शांति शांति......

Monday, August 11, 2014

मांग के तो देखिए- दिल हाजिर करने वाले लोग अब भी हैं .....

इस बार रक्षाबंधन के दिन सोमालीपुरम घूमने गए। (इंदौर के पास एक पार्क)
बच्चों ,माँ और भाई-भाभीयों के साथ और बच्चे बने रहे दिन भर ....
कुछ मेंबर जल्दी पहुँच गए थे
हम पीछे रह गए थे, हमें उन्होंने सूचना दी कि आज अखबार में कूपन छपे हैं जिसे साथ लाने पर 10% छूट हर एक्टिविटी पर मिल रही है पेपर साथ ले आना ।चूँकि हम घर से निकल चुके थे और उस वक्त कोई पेपरवाला भी नज़र नहीं आने वाला था(११ बज चुके थे)..
एक जगह एक दूकान में एक व्यक्ति पेपर पढ़ते हुए दिखाई दिया
बस! फिर क्या था ...निलेश फटाफट गए माँगने ।
- भैया पेपर दिखाएंगे
-हाँ क्यों नहीं, क्या आया है?
-एक विज्ञापन देखते हुए ... ये पेपर रख लूं?
-अरे भैया !अभी तो पढ़ा भी नहीं है !
-प्लीज भैया फेमेली के साथ सोमानीपुरम ........छूट है पता चला ...दे दीजिये!
- अच्छा!! ....ले जाईये .... :-)
.. ...
ऐसे तीन लोगों से पेपर लिए ,और उन्होंने खुशी-खुशी दिए भी ....
खुशी  देनेवाला काम .... छोटा या बड़ा नहीं होता ,और मांग के तो देखिए ...दिल हाजिर करने वाले लोग अब भी हैं ...
.....
परिवार के जो लोग यहाँ नहीं थे उन्हें "मिस" भी बहुत किया ।...

Wednesday, July 9, 2014

एक याद स्नेहिल मुस्कान की ...

"उत्पला बोरडोलाई" ...........एक ऐसा चेहरा जो आज भी याद आता है मुझे .......
बात है 1993 जुलाई की ......
मेरे पति सुनील के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर गौहाटी के जिस अस्पताल में मुझे ले जाया गया था उस अस्पताल पर रिसेप्शन काउंटर पर छोटे कद की एक दुबली पतली हल्के सांवली सी हंसमुख लड़की ......हाँ यही पहचान याद है मुझे
मैं माँ और भाई के साथ वेटिंग स्पेस में बैठी रहती ....
और जब अपने दिमाग को शांत करने की कोशिश करती तो बस एक यही चेहरा था जिस पर नज़र रूकती थी और नज़र मिलते ही वो मुस्कुराती इस आशा में कि मैं भी मुस्कुराउंगी.....पर मैं असफल रहती .....पूरे दो महीने गुजारे थे  उसे देखते हुए ....
और इतने दिन में कुछ बेहतर हो गयी थी मैं ......मुस्कुराने लगी थी .....
शायद हर दिन ज़िंदा और मुर्दा लोगों को देखते-देखते एक यही बात समझ पाई थी कि मुस्कान वाकई कीमती है हर किसी को नसीब नहीं !!!
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घर शिफ्ट किया तो कल ये शो पीस सामने आया और साथ लाया उत्पला की याद .....
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अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वापस आते समय "बेस्ट ऑफ़ लक" कहते -कहते उसकी आँखों में आँसू भी देखे थे मैंने .....और उसने एक पेकेट थमा दिया मना करने पर कहा- मेरी याद रहेगी !....
भरी-भरी आँखों से विदा ली थी मैंने उससे और अस्पताल के स्टॉफ से ....
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कई दिनों बाद जब वक्त मिला और पेकेट खोला तो ये शो पीस देखा .....मन ही मन थैंक्स कहा और सजा लिया अपने घर में .... मुझे लगता है जैसे मेरे दोनों बच्चे ऐसे ही मेरी ओर ताकते रहते थे और हैं .....

जितने भी घर बदले इसे सजाए/संभाले  रखती हूँ ...

उत्पला आज कहाँ है नहीं जानती पर जहाँ कही भी हों वही मुस्कराहट बिखेर रही होंगी मैं उससे यही कहना चाहती हूँ ,जिन बच्चों के बारे में उनसे बताया था कि घर पर छोड़ कर आई हूँ ,आज बड़े हो गए हैं और उन्हें भी मैंने तुम्हारी तरह मुस्कुराना सीखा दिया है ........
मुझे विश्वास है वे भी तुम्हारी तरह मुस्कान बिखेरेंगे हर हाल में ........

Saturday, March 29, 2014

मरासिम......रिश्तों की अनोखी शाम .....


यूं ही फेसबुक पर स्टेटस ,स्टेटस घूमते हुए इस पेज को देखा......"रक्त अर्चना" नाम ने ही रोक लिया फिर आगे पढ़ा, तो ये समझ आया की ये ग्रुप दान देने वालों का है जो वक्त जरूरत पर खून देते हैं .......
मैं कई दिनों से ए-निगेटिव ब्लड डोनर की तलाश में थी,इस पेज पर मेसेज लिखा की क्या मुझे मदद मिल सकती है.....5-10 मिनट में रिप्लाय में एक फोन नंबर के साथ मेसेज मिला -इस नंबर पर रिक्वायरमेंट शेअर कर दीजिए ....
मैंने नाम पूछा रिप्लाय देने वाले का ,जबाब मिला -सचिन जायसवाल
और समय मिलते ही मैंने उन्हें फोन किया-
-हैलो,मैं अर्चना,सुबह आपसे फेसबुक पर चेट हुई थी
-जी,जी मेडम, आपको मिल जाएगा ब्लड, कब चाहिए....
......
......
....
और सारी जानकारी के बाद मैंने थैंक्स कहकर फोन रखना चाहा,तुरंत सुनाई दिया-मेम आप आज शाम को फ्री हैं एक घंटा?
-हाँ,कहिए....-
वो....हम लोग एक थियेटर ग्रुप"अनवरत" से भी जुड़े है,और आज शाम एक नाटक का मंचन करने वाले है,आप आएंगी तो बहुत अच्छा लगेगा ,और आपसे मिलना भी हो जाएगा...
-ठीक है,मैं कोशिश करूंगी.....लेकिन पास वास कैसे और कहाँ से मिलेगा?
-मेम, आप आ जाईयेगा,वो मैं अरेंज कर दूंगा.....
.
.
.
दिन बीता .......सोचती रही ....और जाना तय किया ...ये पहला मौका था जब कोई प्ले देखने जा रही थी.....
...पहुँच कर फोन किया -मैं अर्चना ....यहाँ पहुँच गयी हूँ मेन गेट पर ....
-ओके मेम आप रूकिये मैं आता हूँ लेने .....
और दो मिनट में ही एक ठिगने कद का नौजवान मेरे सामने था चश्मा लगाए.....(जाने क्यों चश्में वाले बच्चों की शक्ल वत्सल सी लगती है मुझे हमेशा)...:P
...आप अर्चना जी
-ह्म्म्म!
-आईये.....दीदी एक पास देना ......
और एंट्री पास मेरे हाथ में था .....तभी मुझे मिलवाया "रक्त अर्चना"के कर्ता-धर्ता उज्जवल लाड से......दुबला पतला सफ़ेद कुर्ते पायजामें में पर आँखों में गज़ब की चमक लिए युवा.......
नमस्कार व सामान्य बातचीत के बाद मैं अन्दर हॉल में दाखिल हुई......काफी सीट भरते जा रही थी लोग आ रहे थे ....मैंने कोने की सीट ली....
बस फिर अतिथी सत्कार के साथ नाटक की लेखिका बिशना चौहान जी से परिचय करवाया गया और 5मिनट में ही नाटक शुरू......
पात्रो नें पूरे समय बांधे रखा .....
नाटक था -"मरासिम" यानी रिश्ता .......
तीन लड़कियों की कहानी थी,किर्ती,सहज और  मानसी....... अपनों के द्वारा अपनाए न जाने के कारण होस्टल में भेज दी गयी थीं ।एक की माँ ने पिता के देहांत के बाद दूसरी शादी कर ली तो दूसरे के पिता ने..तीसरी के माता-पिता न होने पर दादा ने मजबूरी में क्योंकि चाचा चाची .......

और वे यहीं रिश्तेदार बन गयी........

समय बीता सब अपने फील्ड में आगे बढ़कर अलग हो गयी .......आज आपस में सालों बाद एक दूसरे से मिलती है और अपनी अपनी कहानी साझा करती है.....
तीनों के जीवन में पुरूष पात्रों का परिचय होता है और  तीनों अलग अलग तरह से धोखे का शिकार होकर एकाकी रह जाती हैं..... एक गर्भवती है
......
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समाज से सवाल पूछा जाता है -दोषी कौन? क्या बच्चे को जन्म दे या न दे?
बहुत सशक्त प्रस्तुति रही ....सहज का अभिनय करने वाली अभिनेत्री दीक्षा की संवाद अदायगी काबिले तारीफ़ रही,और अविनाश का पात्र  जीवंत हुआ दर्पण के अभिनय से...नितेश उपाध्याय ने हर पात्र पर पकड़ बनाए रखी, सूत्रधार का प्रयोग दर्शक को पात्रों से जोड़े रखने में कामयाब रहा ..पार्श्व गीत का चयन प्रभावी था
एक मनचले पात्र के किरदार की एंट्री पर गाया गया - तेरी नज़र ...मजेदार लगा
गायक को बधाई!!!!

हर एक कलाकार का अभिनन्दन! एक यादगार शाम संजोने के लिए ....और जिस तरह से पहली ही मुलाकात ने दिल में घर कर लिया ....कोई शक नहीं कि सफ़र सुहाना न होगा.......

शुभकामनाएं.........

Thursday, January 2, 2014

सुबह-सुबह...

सुबह-सुबह गिरती है जब ओस
भीग जाता है मन
देखकर अलसाते फूल
उनींदी आँखों से दिखाता है सूरज
एक सपनीला नज़ारा
धुंध में छिपा लगता है
प्रकृति का कण-कण प्यारा
सिहरन देती चलती है
मॉर्निंग वॉक करती ठंडी हवा
उम्र कई साल पीछे जा
हो जाती है नटखट- जवां
अलाव से उठता धुंआ
रगड़ती हथेलियां
गर्माता खून
और दुबके परिंदे देख मन भरता है उड़ान
और लांघता है लम्बा पुल
यादों का
पार होते ही गलियारा दूसरी ओर दिखता है फिर एक पुराना
सपनीला नजारा
फिर गिरती है ओस
इस बार कोर से
उनींदी आँखों की
भीग जाता है मन
सुबह-सुबह ..

Sunday, June 9, 2013

ननिहाल ,मामाजी और पीपल मामा

गर्मी की छुट्टियाँ आए और ननिहाल न जाएँ सम्भव नहीं होता ...हाँ बचपन खूब सजा होता है नानी के घर की यादों से ,फिर हम बड़े होते जाते हैं,स्कूल-कॉलेज और अपने कार्यों में व्यस्त होने लगते हैं, और ननिहाल जाना सिर्फ़ उत्सव, त्योहारों शादी-ब्याह तक सिमट जाता है ,और जब घर की लड़की हो तो वो और भी दूर अपने घर में व्यस्त हो जाती है उसका अपना तो ननिहाल पीछे छूट जाता है ,बहुत पीछे....

ये है ननिहाल के आँगन का पीपल का पेड़... मेरे मामाजी से लेकर उनके पोते इसी की छ्त्रछाया में पले-बड़े हुए और आज भी इसकी हवा तरोताजा रखती है उन्हें...,बचपन से लेकर अब तक इनकी छाया में सुकून की नींद लेते हैं हम ...जब भी मौका मिलता है......मामाजी ने बताया कि ये पीपल भी उसी घर का लड़का है ,इसके जनेऊ भी किये हैं .और तो और...सुनने में आया है ,जिनकी दो शादी होगी ऐसा बता देते हैं पंडित * तो उन लड़कियों की इनसे शादी भी की गई है ...












 बूढ़े हो गए पीपल मामा भी अब ....

और ये रहे बड़े मामाजी श्री सुदामा शंकर सराफ़,फ़ुटबॉल के खेल के शौकीन....अभी पैर में फ़्रैक्चर हुआ है, तो बैठे हैं पलंग पर....


जब मैंने एक फोटो लिया तो बैठक में लगा अपना एक फोटो मंगवाया और दिखाया....

इस फोटो के बारे में पूछने पर बताया कि अपने बेटे के यहाँ इन्दौर गये कान के इलाज के लिए ,तो घूमते -घूमते राजवाड़ा पहुँच गये ,वहाँ एक बहुत फ़ेमस फोटोग्राफ़र की दूकान देखी तो मन हुआ कि एक फोटो खिंचवाई जाए... तब दाढ़ी बढ़ी हुई थी ...फोटोग्राफ़र ने कहा आ जाईये.... मामाजी बोले - बढ़िया आनी चाहिए कोट टाई के साथ ... फोटोग्राफ़र ने कहा कि पहन लिजीए कोट ... मामाजी बोले मेरे पास नहीं है कोट -टाई, तब फोटोग्राफ़र मुस्कूराया और अपने पास के कोट और टाई पहनाकर फोटो निकाला ,और जब फोटो उसने भी देखा तो खुश हो गया बोला -वाह क्या पोज दिया है .... गज़्ज़ब!..
केप तो उनकी अपनी हैं, हमेशा लगाए रखते हैं...


शीला मामी के साथ ..दोनों शिक्षक रहे ,अब रिटायर हैं... शादी की पचासवीं सालगिरह पर बहुत शुभकामनाएँ मामा-मामी को ....
और इस फोटो में मम्मी के साथ मामी-मामाजी उनकी चारों पुत्रियाँ (चारों शिक्षिकाएँ हैं ) साथ हैं- उनकी भाभी भी राईट साइड कार्नर में.....

 मामाजी ने मुझे उपहार में दी अपने संकलन से---


और आज ही नासिक से पहुँची हूँ इन्दौर .. यहाँ छोटी मौसी भी आई हुई हैं ...और जन्मदिन है आज उनका सत्तरवाँ तो लगे हाथ बधाई शशि मासी को भी ---

शुभकामनाएँ हम सबकी ओर से ....(फोटो अभी लिया स्पेशल जन्मदिन की बधाई देने को ).. :-)