ये आज की नहीं बरसों पुरानी बात है
चली आ रही है,
घटित हो रही है
बरसों से मेरे साथ
शायद मेरे ही साथ...
जैसे कि जब मैं खेलना चाहती थी
काम करती थी,
जब मैं पढ़ना चाहती थी, झाड़ू लगाती थी
जब मैं खाना चाहती थी
उपवास करती थी
जब कुछ कहना चाहती थी
चुप रहती थी
सिर्फ खुली आंखों से सपने देखती थी
जब मैं सोना चाहती थी।
आज भी कुछ बदला नहीं मेरे साथ
घूमना चाहती हूं पहिए की तरह
पर लट्टू बन गई हूं
या कि बना दी गई हूं।
लिखना चाहती हूं
पर कलम घिसने की बजाय
उंगलियां ठोक रही हूं
जैसे कि सितार बजा रही हूं।
गाना चाहती हूं,नाचना चाहती हूं
पर उड़ने लगी हूं
वो भी आंखें मूंदकर।
जवान रहना चाहती हूं
मगर बूढ़ी हो गई हूं,
या कि कर दी गई हूं।
कौन है? जो ये कर रहा है
मेरे साथ ,
मुझसे मिलकर
या मुझमें मिलकर
लगता हैं हंसना चाहूंगी तो
अबकि रो पडूंगी
अट्टहास करना चाहूंगी तब
खिलखिलाऊंगी ,
और जब जीना चाहूंगी
मर जाऊंगी।
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