Friday, December 16, 2011

प्रीत ....

तुम छलना नही छोड़ सकते
तो क्यों मैं छोड़ दूँ अपनी प्रीत  ....

तुम चाहे जग को जीत लो..
पर मैं जाउंगी तुमको जीत...

15 comments:

ktheLeo said...

सुन्दर हैं दोनों क्षणिकायें, वाह!

संजय भास्कर said...

वाह, क्या बात है...बेहतरीन लिखा है... !

प्रवीण पाण्डेय said...

कैसे अपनी राह छोड़ दूँ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

रश्मि प्रभा... said...

is bhaw me bahut nishchalta hai...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सच्चे अर्थों में इसे कहते हैं "मेरे मन की".. जब, जो, जैसा मन में आया!! बहुत सुन्दर!!

Kailash Sharma said...

बहुत सुंदर..

Rakesh Kumar said...

अरे वाह! अर्चना जी,
आपका संकल्प तो कमाल का है.

प्रीत की रीत निराली हैं जी.

Atul Shrivastava said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

Point said...

सुन्दर रचना ...

सदा said...

बहुत खूब ।

उपेन्द्र नाथ said...

उम्मीद कभी टूटे नहीं... आपकी इस छोटी सी रचना हर उम्मीद को जिन्दा रख सकेगी. बेहतरीन प्रस्तुति.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

क्या बात है... बहुत खूब...
सादर..

गिरीश"मुकुल" said...

बेशक़
प्रभावी बात कह दी

वन्दना said...

यही तो होती है सच्ची प्रीत