Saturday, December 20, 2008

टुकडों में बँटी मैं

बचपन में मैं बँटी हुई थी- शायद दादा- दादी,माँ ,पिता और रिश्तेदारों में।
किशोरावस्था में बँटी हुई थी -दादा- दादी, माँ , पिता और दोस्तों ,खेलो में।
जब यौवन में रखा कदम ,उम्र के इस मोड़ पर भी पाया बँटी हुई -माँ- पिता और सपनों में।
पत्नी बनी और बँटी- २ माँ ,२ पिता और तुममे
माँ बनी तो फ़िर बँटी- तुममे और बच्चों में।
बच्चे बड़े हुए तो मेरे ही टुकड़े हुए।
मुझे पता है अब फ़िर बँटूंगी- दादी- नानी बनकर।
फ़िर एक दिन मेरे सारे टुकड़े इकठ्ठे होंगे।
और " मैं एक हो जाऊँगी अंत में।"

-अर्चना 

3 comments:

Nilu said...
This comment has been removed by the author.
Nilu said...

Namaste aunty, till date i admired u as a great sports teacher... but now i have also started admiring you as a good writer...
keep writing..
All the best..
Nilesh

Archana said...

Thankx Nilesh,
will try to give my best.