Sunday, November 6, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

जीवन में जाने क्या- क्या करना बाकी रहता है ...जो चाहते हैं वो तो होता नहीं, और न चाहते हुए भी बहुत कु्छ हो जाता है ।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है ....एक किताब (जिसके कवर पॄष्ठ का डिजा़ईन वत्सल ने बनाया है, अंग्रेजी में है) देखने के लिए हाथ में आई ...


कुछ नया करनें की धुन और वत्सल की जिद्द के कारण..उसका अनुवाद अपने शब्दों में करना शुरू किया .....पता नहीं अनुवाद हुआ या नहीं ....पर एक नया काम तो जरूर हो गया ....:-)


आज ट्रायल के तौर पर पहला भाग छाप रही हूँ यहाँ .....अच्छा लगा (और मन हुआ तो).....आगे भी मिल सकेगा पढ़ने को .....
इस पुस्तक को अंग्रेजी में लिखा है--ARTI HONRAO ने..जिनके बारे में आप यहाँ जान सकते हैं --
१--Lafz 




"मेरी जीवन गाथा"..भाग १

मै हर दिन को अपने तरीके से जीने मे विश्वास रखती थी,जब तक कि मेरे रास्ते में ऐसी परिस्थियां पैदा न हो गई जिनमें मुझे ऐसे कठोर निर्णय लेना पडे।...कुछ निर्णय अपनी जीवन धारा को अलग ही राह पर ले जाते हैं..मैने जो निर्णय लिया उसने भी मेरे जीवन को एक नई दिशा दी......हालांकि मेरे जीवन में भी आम लोगों की तरह उतार -चढाव आते रहे फ़िर भी कह सकती हूँ.......उतार ही उतार ज्यादा आए ....मैने अपने जीवन में स्थिरता बहुत समय बाद पाई ..........या मै कह सकती हूँ कि देर से ही सही पर मेरे जीवन में भी स्थिरता आई तो सही ..........
मै अपनी जीवन धारा को  तब स्थिर कर पाई..जब शांतनु मेरे जीवन में आया ......शांतनु मेरे जीवन में बरखा की उस पहली बूँद की तरह आया जो सालों से बंजड पडी,फ़टी धरती पर कई दिनों के इंतजार के बाद गिरी हो ,और उस धरती की सौंधी महक --जो मेरे अंतर में समाई और जिसने मुझे अपने जिंदा होने का अहसास कराया । ..जैसे किसी प्यासे के कानों ने झरने की आवाज सुनी हो या ....लम्बे समय तक मीलों चलने के बाद या.....सालों अंधेरे में चलने के बाद ..........किसी को उजाले की एक किरण दिखाई दी हो..........दूसरे शब्दों में मै कह सकती हूँ---कि शांतनु ने मुझमें जीवीत रहने की आशा का संचार किया ..........
..........शांतनु मेरे पति का दोस्त था, मैं यहाँ बताना चाहती हूँ ---कि था शब्द का प्रयोग मैंने इसलिए किया क्यों कि शांतनु ने जो कुछ भी मेरे पति के साथ किया था ,,उसके बाद मेरे पति ने उसे अपना दोस्त मानने से इंकार कर दिया था .....उन्हें गलत फ़हमी थी कि जो कुछ भी हुआ वो सब शांतनु ने ही किया था .मेरे पति के अनुसार शांतनु ही हमारी शादी के टूटने का कारण था ......फ़िर भी यदि कोई मुझे से पूछे--तो मै कहना चाहूँगी कि रोशन अपने बचाव के लिए ये कारण बताता है, जबकि वो स्वयं अपनी पत्नी को सुखी नही रख पाया और उसके मनोभावों को समझ ही नही पाया .......क्रमश:

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

वत्सल को ढेरों बधाईयाँ, सुन्दर पुस्तक।

मनोज कुमार said...

पहले भाग के इस अनुवाद और कथानक ने जकड़ लिया है। आगे के भागों की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।

संगीता पुरी said...

अगली कडी का इंतजार है ..

अनुपमा पाठक said...

पढ़ते रहेंगे इस पुस्तक को आपके अनुवाद के माध्यम से...!
keep posting!

संजय @ मो सम कौन ? said...

अगली कड़ी\कडि़यों की प्रतीक्षा रहेगी।
वत्सल और आपके प्रयास के लिये शुभकामनायें।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

वत्सल की इस कला-प्रतिभा से अनजान नहीं हूँ मैं... बल्कि मैंने उसकी अनगिनत ऐसी कलाकृतियाँ देखी हैं... मुझे क्रमशः वाली कहानियों से परहेज है... यही कारन है कि अपनी कई दोस्तों की कई अच्छी कहानियां छोट गयी हैं मुझसे...
यह पढ़ा और बहुत पसंद आया..लगता ही नहीं कि अनुवाद है!! कैरी ऑन!!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वत्सल को बधाई! कहानी भी रोचक लगी।

संजय कुमार चौरसिया said...

वत्सल को ढेरों बधाईयाँ,

Archana said...

शुक्रिया आप सभी का ....

चन्दन..... said...

पूरा पढ़ने कि इच्छा हो रही है
अनुवाद कि तरह नही लग रहा है|
जारी रखिये