Saturday, November 12, 2011

माय लाईफ़ स्टोरी ...पर मेरी नहीं ..

"मेरी जीवन गाथा" भाग ४
...अचानक मेरी नजरें अपनी बहन पर से हटकर उस व्यक्ति पर टिक गई जो मेरी बहन के पीछे-पीछे ही,
उसी कमरे से बाहर आ रहा था ।वह बहुत लम्बा,सांवला और मेरी नजरों मे आकर्षक युवक था ।उसने सूट पहन रखा था और टाई भी लगा रखी थी। मैं अपने -आपको उस व्यक्ति के आकर्षक व्यक्तित्व को निहारने से नहीं रोक पाई,तभी अचानक मेरी बहन ने मुझे आस्तीन खींचकर झंझोड दिया, और मैं उसके पीछे कॉलेज केंटीन की ओर चल पडी ।
.............उसे हमारे पीछे केंटीन में आता देख पता नहीं क्यूं मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था, और जब मैं अपनी बहन के साथ लंच कर रही थी, तब सबकी नजरें बचाकर मैं उसे बार-बार देख रही थी । लंच के बाद मैं  जल्दी से एक सेंडविच हाथों मे पकड़कर बेग में लगभग ढूंसते हुए तेजी से केंटीन से बाहर निकली। मुझे पहले ही देर हो चुकी थी,जब मैं सिनेमा हॉल पहुंची--मेरे दोस्त फ़िल्म देखने जाने के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे, हम तेजी से अंदर गए और सब फ़टाफ़ट अपनी -अपनी सीट पर बैठ गए। इंटरवल होने पर जब मैं अपने दोस्तों के साथ पॉपकार्न लेने के लिए बाहर निकली, मैनें उसे फ़िर देखा, वो सेंडविच खा रहा था---इस समय वो सादे कपडों में था, आश्चर्य !!! मैं सोचने लगी उसे कपडे बदलने का समय कब मिल गया ??? मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी कि वो सिनेमा हॉल के भीतर था.........मुझे थोडा- बहुत अंदाजा लगा कि उसने मेरी और मेरी बहन की बातें सुन ली होंगी और जान गया होगा कि मैं अपने दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने जाने वाली हूँ , फ़िर ड्रेस चेंज करके अभी इंटरवल के पहले ही यहाँ पहूंचा होगा।मुझे आश्चर्य मिश्रीत खुशी हो रही थी, जब मैंने उसे अपनी ओर आते देखा-----
---नमस्ते
---नमस्ते
---अच्छी फ़िल्म है न ??
---हाँ ,कह सकते हैं,कुछ अनमने मन से मैंने जबाब दिया था।.........उसने मुझसे बातचीत का सिलसिला कुछ ऐसे शुरू किया--जैसे हम एक-दूसरे को बहुत समय से जानते हों।
---"रोशन"उसने हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम बताया ..........................मैनें उससे मुस्कराते हुए हाथ मिलाया...सोच रही थी कि इसे अपना नाम बताउं या नहीं ?
----"आपसे मिलकर अच्छा लगा "काव्या"" ...............
मैं सोच ही रही थी कि इसे मेरा नाम कैसे पता चला कि उसने आगे कहा---मैंने आपकी बहन को आपका नाम लेकर पुकारते हुए सुना था जब आप केंटीन से बाहर जा रही थी।
"ओह".........वह मुझसे बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहता था पर आसपास के सारे लोग सिनेमा हॉल में जाना शुरू हो गए थे क्यों कि इंटरवल खतम होने आया था ।.....क्रमश:.......

भाग - १
भाग - २
भाग - ३

9 comments:

मनोज कुमार said...

मिलते हैं फिर से इस इंटरवल के बाद ...

प्रवीण पाण्डेय said...

एक बार में थोड़ा और अधिक दीजिये।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बहुत अच्छा!!

अनुपमा पाठक said...

क्रम चलता रहे...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

वाणी गीत said...

उत्सुकता बनी हुई है !

Rajesh Kumari said...

stori interesting lag rahi hai aage ka bhaag jaldi bataiye.

मन के - मनके said...

पढते रहेंगे----

चन्दन..... said...

जब भी कहानी कसी निर्णायक मोड पर पन्हुंचने को होती है इंटरवल हो जाता है|
अच्छा अनुवाद हो रहा है|