Saturday, December 8, 2012

खुशनुमा मौसम...

                                               

फ़िर सुहाना मौसम आया है
हर ओर बहुत खूबसूरत नजारा है
खुश्बू से मैं जान पाई हूँ
इस मौसम को महसूस पाई हूँ
तुम्हारा साथ था तो खिड़की के बाहर दिख जाता था
या सारा मौसम खुशबू समेत बाँहों मे सिमट आता था
अब उस खिड़की में झीना परदा पड़ा है
कुछ दिखता भी है तो बस धुंधला सा है
ये धुंधलाहट आँखों में है या बाहर
कौन बतायेगा मुझे
क्या आओगे फ़िर
या मुझे आना होगा
कोई राह तो सूझे...

11 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:)

अरुन शर्मा "अनंत" said...

हेमंत ऋतु पर सजी सुन्दर रचना
अरुन शर्मा
www.arunsblog.in

देवेन्द्र पाण्डेय said...

दे जाता है कुछ गम
यह खुशनुमा मौसम!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-12-2012) के चर्चा मंच-१०८८ (आइए कुछ बातें करें!) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

Amrita Tanmay said...

सुन्दर लिखा है..

प्रवीण पाण्डेय said...

स्मृतियों का तार न छेड़े,
सपनों का संसार न छेड़े।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

ये मौसम जितने खुशनुमा होते हैं उतनी ही तकलीफ भी दे जाते हैं.. बहुत खूबसूरती से बयान किया है तुमने!! जीती रहो!!

Anupama Tripathi said...

सुंदर रचना अर्चना जी ...

Ramakant Singh said...

निःशब्द करती भावनाएं

Akash Mishra said...

झीने पर्दे के उस पार का खुशनुमा मौसम | बहुत सुंदर लिखा है | ऐसी रचना जिसके गर्भ में एक हलकी सी कसक या कहूँ तो ख्वाहिश छिपी हुई है |

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर रचना ... मौसम खुशनुमा रहे