Thursday, November 7, 2013

शान्ति दूत ...

                      (ये फोटो मैसूर के कारंजी लेक की है - वत्सल नें ली थी,मेरे साथ घूमते हुए पिछले वर्ष ) ...

इसे देखकर मन में बहुत से विचार आते हैं ------पर शब्द नहीं उनके लिए .....

 कि सफ़ेद पर लिखूँ या काले पर
उजले पर लिखूँ या मैले पर
लिखूँ क्रंदन पर 
या दोनों के बन्धन पर
बुरके में ढँके हुए तन पर
या कपोत के स्वच्छंद मन पर
लिख दूँ दोनों की आँखों के भावों पर
या इनके अनदेखे घावों पर
क्यों दोनों को बन्धन में जकड़ लिया
क्यों इनको अपनों ने पकड़ लिया
क्यों मौन रहे ये कुछ न कहे
और क्यों मेरी आँखों से नीर बहे .....

10 comments:

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : उर्जा के वैकल्पिक स्रोत : कितने कारगर
नई पोस्ट : कुछ भी पास नहीं है

Udan Tashtari said...

अच्छी है

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

Bediyaan, bandhan ya qaid... Dikhai dene wale burqe ki hi ho, zaroori nahin.. Kai bar khuli saree ya kameez me dikhne wali azadi ke bandhan bhi dikhai nahin dete..
Maine khud kai baar socha hai ki hamne na jane kaise aur kyon is burqe ko ghulami ka pratik maan liya jabaki ye lajja ki nishani bhi ho sakta hai.. Jaise GHOONGHAT.
Rachna me vyakt saamya prabhavshali hai aur Vatsal ki timing laajawab..!

Archana said...

बुरके में ढँके हुए तन पर ...
को लज्जा में ढँके हुए तन पर ...
ठीक रहेगा ...

HARSHVARDHAN said...

सुन्दर रचना।।

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एशेज की कहानी

Ramakant Singh said...

ऊहापोह

Digamber Naswa said...

मन के भाव हैं .. शब्दों से तो उतारते है हैं ...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हम्‍म.

Onkar said...

वाह, बहुत खूब

astha weld care said...

bhut sundar rachna ki hai