Sunday, December 7, 2014

कामायनी (भाग २) आशा

बहुत दिनों से मन था इसे रिकार्ड करने का ...कई प्रयास किए, मगर एक तो मेरी कम पुस्तक पढ़ने  की आदत और दूसरे इतनी बड़ी रचना ,नेट से  स्क्रीन पर देखते-देखते आंखें थक जाती ... .... हर बार अधूरा करके छोड़ देती लगता नहीं हो पायेगा
लेकिन इस बार जब दशहरे पर राँची गई ,तो बाज़ार में उस दूकान को देख मन माना नहीं जहाँ २० साल पहले जाया करती थी बच्चों के लिए कहानियों की किताबें लेने ... वत्सल और नेहा से बताया कि ये वही दूकान है तो हम तीनों अन्दर गए मुझे छोड़ दिया किताबों के स्टैण्ड के पास ...देखते -देखते नज़र पड़ी बोर्ड पर लिखा था - पुराना हिन्दी साहित्य ..... एक काउंटर अलग से था ...ऊपर में ...चढ़कर गई तो कई साहित्यकारों जिनके नाम सुने थे की किताबें नज़र आई , सामने ही थी - जयशंकर प्रसाद जी की "कामायनी"... बस खरीद ली और रिकार्ड किया पहला भाग -चिंता को ...



और आज किया दूसरा भाग आशा.
कैसा हुआ ये तो आप ही सुनकर बता पाएंगे ...और गलतियों के लिए माफ़ भी करेंगे ... सुझाव भी देंगे तो कोशिश करूंगी आगे के भाग को और अच्छे से कर पाउं ....
और प्रोत्साहन मिलेगा तो जल्द से जल्द पूरा करने की भी कोशिश रहेगी मेरी ...आप तो जानते ही हैं-"मायरा" में मन उलझा हुआ है मेरा .....

डाउनलोड करिए या सुनिए यहाँ -


या यहाँ से -

7 comments:

akanksha-asha.blog spot.com said...

बहुत शानदार प्रयास अर्चना जी |आज कल कितावें पढ़ने की तो फुरसत होती नहीं पर रचना सुनाने की चाह अवश्य रहती है |

Rangraj Iyengar said...

अर्चना जी,

रिकॉर्डिंग तो एक दि साफस ुथरी है. और आवाज भी निखरी है. आपकी आज्ञ2 हो तो एक सुझाव देना चाहूँगा... कि अमर कृति कामायनी को पूरे सुर-लय-ताल के साथ आप एक दो बार पूरा पढ़ लें. इससे आपकी भाषा की रिकॉर्डिंग में और प्रवाह आ जाएगा.जिससे यह और निखरेगा.यह मेरी सोच है. माैं वैसे कोई संगीतकार तो नहीं हूँ किंतु देखा है कि भाषा के शब्दों का सही लयृ-तान में उच्चारण के लिए पूर्व पठन बहुत ही सहायक होती है.

अयंगर.
8462021340.
laxmirangam.blogspot.in

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत सुंदर अर्चना जी . आप छायावाद के इस अनूठे महाकाव्य को पढ़ ही नहीं रहीं बल्कि अपनी सुंदर अबज में रिकार्ड भी कर रही हैं . यह कार्य भी आपके अनूठेपन का ही प्रतीक है .श्री रंगराज जी का सुझाव भी उपयोगी है .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत सुंदर अर्चना जी . आप छायावाद के इस अनूठे महाकाव्य को पढ़ ही नहीं रहीं बल्कि अपनी सुंदर अबज में रिकार्ड भी कर रही हैं . यह कार्य भी आपके अनूठेपन का ही प्रतीक है .श्री रंगराज जी का सुझाव भी उपयोगी है .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत सुंदर अर्चना जी . आप छायावाद के इस अनूठे महाकाव्य को पढ़ ही नहीं रहीं बल्कि अपनी सुंदर अबज में रिकार्ड भी कर रही हैं . यह कार्य भी आपके अनूठेपन का ही प्रतीक है .श्री रंगराज जी का सुझाव भी उपयोगी है .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत सुंदर अर्चना जी . आप छायावाद के इस अनूठे महाकाव्य को पढ़ ही नहीं रहीं बल्कि अपनी सुंदर अबज में रिकार्ड भी कर रही हैं . यह कार्य भी आपके अनूठेपन का ही प्रतीक है .श्री रंगराज जी का सुझाव भी उपयोगी है .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

बहुत सुंदर अर्चना जी . आप छायावाद के इस अनूठे महाकाव्य को पढ़ ही नहीं रहीं बल्कि अपनी सुंदर अबज में रिकार्ड भी कर रही हैं . यह कार्य भी आपके अनूठेपन का ही प्रतीक है .श्री रंगराज जी का सुझाव भी उपयोगी है .