Friday, December 13, 2019

अदरक ,तुलसी वाली चाय

बहुत दिनों बाद भोर में 
इस प्रहर नींद खुली 
कारण सिर्फ इतना कि-
दिसंबर कि सर्द-सर्द 
मीठी सी रात का आखरी प्रहर ...
लिहाफ भी ठंडा 
सर्द और कुडकुडा हो चुका है 
प्रेम कविता ऐसे ही प्रहर जन्म लेती है 
सूरज का इंतज़ार-
कुहासे  की चादर में 
पंछियों का कलरव 
ओस के बगीचे में
देखने का मन ,
सुनने का मन -
रोशनदान से कि
चाँद -चांदनी में 
जाने क्या गपशप हुई
और ...
एक अदद चाय कि दरकार ....
बेड-टी ...
....
बालकनी कि दूसरी कुर्सी 
झूल कर- कर रही है आवाज 
कि जैसे कोई उठकर गया है अभी ....
पलकें खोलूं या न खोलूं 
सच है या सपना
सपना हो -तो सच हो...
सच होता है - 
भोर का सपना ...
ठण्ड बढ़ी है...
एक और कड़क चाय कि दरकार है ..
अदरक वाली ...

5 comments:

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

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Prashant Baghel said...

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Anonymous said...

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