Monday, December 2, 2024

अकेली हो?



पति के गुजर जाने के बाद
दिन पहाड़ से लगते हैं
रातें हो जाती है लंबी से भी लंबी
दूर तक नजर नहीं आती
सूरज की कोई किरण
मशीन बन जाता है शरीर
खाने, पीने की कोई पसंद नहीं होती
न होता है जुबान पर कोई स्वाद
रंगों से कोई सरोकार नहीं रहता
न खुशियां बनाती है हिस्सेदार
एक प्रश्न सदा मुँह बायें रहता है खड़ा-
अकेली हो?
सिर हिला देने भर से
उत्तर समझ जाते हैं लोग
खुद को हर जगह फिट दिखाने की कोशिश में
अन्दर ही अन्दर खोखली हो जाती है खुद वो
जो पत्नी कहलाती है उसकी
जो आया और चला गया जीवन से उसके
जिसने दी बाजू की सीट सदा
टेबल पर एक प्याली चाय,
होटल का एक्स्ट्रा बेड और
कार की पिछ्ली सीट
याद दिलाते रहते हैं उसको अकेले होने का ...

6 comments:

Digvijay Agrawal said...

गहन चिंतन
वंदन

Anita said...

अकेलेपन की पीड़ा को व्यक्त करती मार्मिक रचना

सुशील कुमार जोशी said...

यही सत्य है

Onkar said...

मार्मिक रचना

रेखा श्रीवास्तव said...

आज पढ़ी और दर्द को महसूस किया 'अकेली हो' का।

The Incredible India said...

तुमने इस दर्द को बहुत सच्चाई से लिख दिया। मैं पढ़ते-पढ़ते उस खाली कुर्सी और ठंडी चाय को साफ महसूस करने लगा। तुमने दिखाया कि लोग सिर्फ “अकेली हो?” पूछते हैं, पर कोई उस खालीपन की गहराई नहीं समझता। मुझे सबसे ज्यादा वो “एक प्याली चाय” और “पिछली सीट” वाली तस्वीर चुभी, क्योंकि वही रोज़ याद दिलाती है कि कोई साथ नहीं चलता।