पति के गुजर जाने के बाद
दिन पहाड़ से लगते हैं
रातें हो जाती है लंबी से भी लंबी
दूर तक नजर नहीं आती
सूरज की कोई किरण
मशीन बन जाता है शरीर
खाने, पीने की कोई पसंद नहीं होती
न होता है जुबान पर कोई स्वाद
रंगों से कोई सरोकार नहीं रहता
न खुशियां बनाती है हिस्सेदार
एक प्रश्न सदा मुँह बायें रहता है खड़ा-
अकेली हो?
सिर हिला देने भर से
उत्तर समझ जाते हैं लोग
खुद को हर जगह फिट दिखाने की कोशिश में
अन्दर ही अन्दर खोखली हो जाती है खुद वो
जो पत्नी कहलाती है उसकी
जो आया और चला गया जीवन से उसके
जिसने दी बाजू की सीट सदा
टेबल पर एक प्याली चाय,
होटल का एक्स्ट्रा बेड और
कार की पिछ्ली सीट
याद दिलाते रहते हैं उसको अकेले होने का ...
रातें हो जाती है लंबी से भी लंबी
दूर तक नजर नहीं आती
सूरज की कोई किरण
मशीन बन जाता है शरीर
खाने, पीने की कोई पसंद नहीं होती
न होता है जुबान पर कोई स्वाद
रंगों से कोई सरोकार नहीं रहता
न खुशियां बनाती है हिस्सेदार
एक प्रश्न सदा मुँह बायें रहता है खड़ा-
अकेली हो?
सिर हिला देने भर से
उत्तर समझ जाते हैं लोग
खुद को हर जगह फिट दिखाने की कोशिश में
अन्दर ही अन्दर खोखली हो जाती है खुद वो
जो पत्नी कहलाती है उसकी
जो आया और चला गया जीवन से उसके
जिसने दी बाजू की सीट सदा
टेबल पर एक प्याली चाय,
होटल का एक्स्ट्रा बेड और
कार की पिछ्ली सीट
याद दिलाते रहते हैं उसको अकेले होने का ...
6 comments:
गहन चिंतन
वंदन
अकेलेपन की पीड़ा को व्यक्त करती मार्मिक रचना
यही सत्य है
मार्मिक रचना
आज पढ़ी और दर्द को महसूस किया 'अकेली हो' का।
तुमने इस दर्द को बहुत सच्चाई से लिख दिया। मैं पढ़ते-पढ़ते उस खाली कुर्सी और ठंडी चाय को साफ महसूस करने लगा। तुमने दिखाया कि लोग सिर्फ “अकेली हो?” पूछते हैं, पर कोई उस खालीपन की गहराई नहीं समझता। मुझे सबसे ज्यादा वो “एक प्याली चाय” और “पिछली सीट” वाली तस्वीर चुभी, क्योंकि वही रोज़ याद दिलाती है कि कोई साथ नहीं चलता।
Post a Comment