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Wednesday, July 13, 2016

ये बारिशों के दिन। ..

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा  बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की

चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।

Wednesday, February 19, 2014

मेरे मन की (१) - "जिन्दगी"

नमस्कार, कोशिश की है- कुछ नया करने और जीवन में मधुरता घोलने की..... 
सुनियेगा और कैसा लगा बताईयेगा...
 

1)
ज़िन्दगी एक सहेली जो कभी कभी पहेली बन जाती है/ सताती है.. 
जीना दूभर कर देती है फिर भी भाती है/
हर पल जीने का नित नया पाठ पढ़ाती है/ 
ज़िन्दगी के पीछे मैं और मेरे पीछे मौत भागती है/ 
 -मीनाक्षी
गीत- ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय ...
फ़िल्म: आनन्द/ आवाज- मन्नाडे /संगीत:सलिल चौधरी


2)
चलो, कुछ दूर साथ चलें, बैठें, बतियायें, हँसें और जी लें....
जिन्दगी नाम फक’त चंद सांसों का आना जाना तो नहीं...
-समीर लाल ’समीर’
गीत- जिन्दगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सूर्ख फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन ढले यूँ तेरी आवाज़ बुलाती है हमें ..  
फ़िल्म:उमराव जान/गीतकार:शहरयार/आवाज:तलत अजीज/ संगीत: खय्याम
३)
बच रहा था आप सबसे कल तलक सहमा हुआ
अब बड़ा महफूज़ हूँ मैं कब्र में आने के बाद

मौत का अब डर भी यारों हो गया काफूर है
ज़िंदगी की बात ही क्या ज़िंदगी जाने के बाद
-अनुराग.
गीत का मुखडा:
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें
(फिल्म: उमराव जान - संगीत खय्याम)

                                                        
४)
"जिन्दगी" भर हमें बस रुलाते  रहे
वो न आये कभी हम बुलाते रहे.
आँसुओं से लिखी है मेरी दास्ताँ
लोग सुनते रहे हम सुनाते रहे.

-गिरीश पंकज 
मेरी पसंद की  लाइन है... ''मै ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया''

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अगले प्रोग्राम के लिए शब्द है - "पल"
कमेंट में अपनी पंक्तियाँ (सिर्फ़ दो या चार) लिखें व साथ ही लिखें अपनी पसन्द के गीत का मुखड़ा और फ़िल्म का नाम...