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Tuesday, July 24, 2018

बीते हुए लम्हे


आज २४ जुलाई फिर से सामने आ खड़ी हुई है -कुछ याद चित्रों के सहारे 

















Monday, December 4, 2017

यात्रा में क्षणिकाएं

1-

थक चुकी हूँ अब ...
फिर भी मुस्कुराती हूँ,
कि तुम सदा  मुस्कुराओ!
मौन होकर भी
बहुत कुछ कहती हूँ
कि बस! तुम समझ जाओ!
सुनाई नहीं देती
अब कोई भी आहट
किसी हादसे की,कि
चाहे किसी भी धुन में गाओ!
सफर पर हूँ,अकेली,निडर
और अनजान डगर में
एक आस लिए कि
मंजिल पर लेने तुम आओ!
-अर्चना

2-

उम्मीद नहीं थी कि
आँसू बरसकर
कागज पर उकेरे
अक्षरों को बादल में बदल देंगे
अचरज से आँखे फटी रह गई
जब अचानक से अनहोनी घटी!
-अर्चना

3-

कविताएं जन्म लेती है
भावनाओ से
भावनाएं बहती है
मौन के चिंतन से
चिंतन शुरू होता है
एकांत के मिलने से
और एकांत जाने कब
किस कोने में दुबका मिल जाये
नहीं जानता कोई
और अप्रत्याशित रूप से
जन्म ले लेती है
काव्यमय कविता ...👌
-अर्चना

Friday, November 3, 2017

कुछ है,कुछ नहीं

जिंदगी से सवाल कुछ किये, कुछ नहीं
सवालों के जबाब कुछ मिले, कुछ नहीं

मैंने तुमसे कुछ कहा, कुछ नहीं
तुमने मुझे कुछ समझा, कुछ नहीं

दिल का दिल से रिश्ता कुछ है, कुछ नहीं
तुम्हारा मुझसे वास्ता कुछ है, कुछ नहीं

-

Sunday, October 1, 2017

कुछ भी लिखा,ब्लॉग की खातिर ..

मुझे लगता है मेरी आँखें अंदर की तरफ घूम गई है,दूरदृष्टि मेरी रही नहीं ,पास का दिखाई नहीं देता ,शायद अब सब अंदर का देखना पड़  रहा है ,इसी का नतीजा मिल रहा है मुझे कविता के रूप में ,कविता बह निकलती है जब-तब इसी ब्लॉग या फेसबुक पर... 

मेरे जैसे कई लोगों की कवितायेँ बहती हुई दिखती हैं यहां ,उसी से पता चलता है -दिल कितना छोटा सा है ,कभी भी फट सकता है , आसपास की बहती कविताओं से टॉनिक लेना पड़ता है ,लोग आर्ट ऑफ़ लीविंग छोड़ आर्ट ऑफ़ डाईंग सिखा रहे हों जैसे। .. 

भला जानबूझकर मधुमक्खी के छत्ते में कौन हाथ डालेगा और वो भी तब ,जबकि दिख रहा हो की छत्ता बहुत बड़ा है और बहुत सी मधुमक्खियां उस पर बैठी हैं| पर क्या करें मीठा खाने की जिसको आदत पड़ गई हो उसे तो भगवान बचाए। ..और वो भी शहद खाना हो तो हाथ तो डालना ही पड़ेगा ... ठीक वैसे ही जैसे -ब्लॉग बनाया तो पोस्ट भी लिखनी ही पड़ेगी ..
यानि बस अभिव्यक्त होना है... जैसे विरोध होने लगा है ... तू हाँ बोल! मैं ना बोलता हूँ, एक तो सही ही होगा .. करोड़ मिले तो बाँट लेंगे...👍

Thursday, August 17, 2017

भला कर भले मानुष

आजकल जिस एप्प की चर्चा चल रही है, उसके बारे में एक ही विचार आया कि कोई किसी को पीठ पीछे गाली क्यों देना चाहता है ?
अगर व्यक्ति कोई गलत बात कह रहा है, तो उसे जब तक सामने नहीं बताया जाएगा उसमें सुधार संभव नहीं है, पीठ पीछे कही बात जब तक उस तक पहुंचती है तब तक या तो वो व्यक्ति कईयों को नुकसान पहुंचा चुका होता है,या खुद नुकसान उठा चुका होता है ...
ये जरूरी नहीं कि आपको जो बात गलत लगी वो उसके लिए भी गलत हो लेकिन आगाह करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए अगर हमें महसूस हो,एक विचार के हर नकारात्मक पक्ष को सामने लाये जाने पर ही उसकी सकारात्मकता को बढ़ाया जा सकता है ,ऐसा मैं सोचती हूँ।
अनजान बनकर दूसरों का भला करना सबके बस का नहीं 😊ये भी कटु सत्य है।
एक गीत याद आ रहा है ,मालूम नहीं किसका लिखा हुआ है -

भला किसी का कर न सको तो,बुरा किसी का मत करना
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम- काँटे बनकर मत रहना ....

Friday, August 4, 2017

फेसबुक पर धतर-मतर कुछ भी पढ़-पढ़ कर भेजे का बना भुरता

कुछ भी लिख देने को कैसे मन हो जाता है,किसी का भी?
क्या ये वे लोग लिख देते हैं?-जिनके माता-पिता या दादा-दादी ने बचपन में पीछे से हाथ न धरा गोद में बिठाकर, सिर पर हाथ न फेरा,या बहन ने राखी न बाँधी, या भाई ने अपना हिस्सा नहीं बाँटा,या फिर शादी के बाद पत्नी ने ही साथ न निभाया या कि अपना पौरुष कहीं खो आये,या हो सकता है पौरुष खुद ही साथ छोड़ गया उनका ....
या बच्चों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया उम्र के ढलान पर, लुढ़का दिया बे-पेंदे के लोटे की तरह... या हो सकता है अपनी पहचान की तलाश में काँटों भरी गलत राह चुन ली...और दोस्त भी न बना कोई ...

खैर! वे जानें ,उन्हें बीमारी कौनसी है? 😊
लेकिन इलाज तो ये पता है कि -जब तक ऐसे लोग,जो कुछ भी लिख सकते हैं,स्त्री,महिला,नारी या मादा के लिए आदर और सम्मान के एक -दो शब्द न लिखेंगे,जिंदगी के मायने उनको नहीं आएंगे,जीना वे कभी सीख नहीं पाएंगे यहाँ तक कि मौत भी उनकी जल्दी नहीं आएगी ,यहीं पड़े वमन करते,सड़ते रहेंगे .....

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ये था काल्पनिक अध्याय 19 का भावानुवाद जो कृष्ण ने अपनी माताओं,सखियों और प्रेम की दिवानियों को स्वर्ग में चुपके से समझाया ,उनके प्रश्नों की जिज्ञासा में .....अपन भी वहीं थे तब 😊
और अब -
अपनी डॉक्टरी तो इत्ता जानती है,बस!...😊 
और ये डॉक्टरी ऐसी वैसी तैयारी से नहीं मिली,पूरी थीसिस समझी यहीं फेसबुक पर झख मारकर .....☺

Friday, July 21, 2017

याद तुम्हारी

"अगर उसने कुछ सोचा होगा तो
मुझे भी सोचा होगा
हल्के-हल्के हाथों से फिर,
अपनी आँखों को पोंछा भी होगा
देख उँगली पर अटकी बूँद-
एक हल्की सी मुस्कुराती लकीर,
उसके होंठो को छूकर गुज़री होगी
और झटक दिया होगा सिर कि -
ये यादों का लोचा होगा ......."
.-अर्चना चावजी

Tuesday, July 18, 2017

बरसो रे !

भूल गए हैं बादल अब बरसना वहाँ ,
खूब बरसती है आसमान से आग जहाँ....

भागते मेघों का गर्जन भी दब जाता है
काली बदली को पवन जाने कहाँ उड़ा ले जाता है

मोर,पपीहे,कोयल सब अब मौन मौन ही रहते हैं
नदिया ठहरी,झीलें सूखी,झरना भी नहीं गाता है

थिरकती बूँदों के नृत्य कौशल को देखने 
हर बूढ़ा पेड़ व्याकुल नजर आता है...

Monday, July 17, 2017

क्यों लड़ते हैं लोग घरों में ?

उसके घर का आने -जाने का रास्ता घर के पिछले हिस्से से होकर है ,मेरे और उसके ,दोनों घर के बीच में सामान्य अन्तर है .. बातचीत, नोक-झोंक ...सब सुनाई देता है ...
कामकाजी बहू है ..... सास और बहू दोनों ताने देने में मास्टर हैं ....

- खा-खा कर मोटी हो रही है
-इनके लिए हड्डी तोड़ते रहो तब भी चैन नहीं पड़ेगा
- काम पे क्या जाती है  ,इनके पर निकल आए हैं..
- जा बेटा ,साबुन से हाथ धोना ... तेरे लिए मैं लेकर आई हूँ  साबुन ...
....
....

"कान पक गए" .....मुहावरा पक्के से समझ आ गया है ..... :-(

हर छुट्टी के दिन पूरा दिन ... खराब हो जाता है ...
और तो और त्यौहार भी नहीं बचते ....
.
....

...क्यों लड़ते हैं लोग ...घरों में .....

Wednesday, July 5, 2017

नो हिन्दी इन #हिन्दी_ब्लॉगिंग

OH! my God!
I'm alone
want to call you
but ,
not working my phone
I 'm looking
on your tip- tip string....
and listining your tring..tring
what a lovely.. musical sound ..
with that ,
I feel you...
all around.....

-Archana

Monday, November 21, 2016

जानते हैं फिर भी



जानते हैं-

कल्पना के घोड़े दौड़ाने को सात समंदर तो क्या सात आसमान भी कम है 
जीत तो सिर्फ उसी की होती है जो- 

वास्तविकता के धरातल पर उन्हें उतारने का भी 
माद्दा रखते हैं।


मौसमों की उठा-पटक तो लगी रहनी है सदा दुनिया में 
बात उस मौसम की ही होती है जो -

 इस दुनिया की तासीर बदलने का माद्दा रखते हैं। 


सुख-दुःख,ज़रा -व्याधि ,जनम-मरण सबके साथ जुड़ा है 
आनंद की लहरों पर नौकायन तो वही कर सकते हैं जो -


 जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।


फिर भी - 

पता नही कभी-कभी मन में कौन आ बसता है-
 कि मन मनों भारी लगता है-

वरना तो हम सूरज को भी हाथों में उठाने का माद्दा रखते हैं 

Friday, November 18, 2016

गाँव छोड़ शहर मे गरीब

शहर में बैठकर 
गाँव के हालात पर तरस खाता हूँ 
जब फसल लहलहाती है 
तो जाकर कटवा लाता हूँ 

माँ- बाबूजी का क्या है,
रहे,रहे न रहे  
किसी भी दिन निकल पड़े 
कोरे कागजों पर ही
अँगूठा लगवा लाता हूँ 

जब बनाते हैं
मालिक के बच्चे 
अपने प्रोजेक्ट
उनके स्कूलों में 
उसी बहाने
याद कर लेता हूँ 
समय-समय पर 
मक्के और बाजरे के भुट्टे ,
आम कच्चे ,
खेत की पगडंडी ,
कुँए  की मुंडेर ,
घरों के बाहर -उपलों के ढेर 

अब तो एक टी.वी. भी लगवा आया हूँ बैठक में 
माँ -बाबूजी से चलफिर हो नहीं पाती 
अपनी जमीन है वहाँ 
घर पर भी कोई चाहिए 
उनके खर्चे-पानी भी निकल जाते हैं 
मालिक भी साल में पिकनिक मना आते हैं 
,
देश में सुधार की बहुत जरूरत है 
अपन करें भी तो क्या?
सरकार भी कुछ करती नहीं 
क्या कहा- पढों ? ? ?,अरे यार!
पढने-लिखने के चक्कर में कौन माथा खपाए 
अपने को तो ऐसा चाहिए कि-
काम भी न करें ,और पैसे कमाएं 


भले किसी काले धन वाले के गुलाम बन जाएं। .. 

Wednesday, November 16, 2016

लेकिन जिंदगी न मिलेगी दोबारा

हँस ले ,गा ले, जश्न मना ले ,
थोड़ा प्यार दामन से बिखरा दे ,
मरना तो जन्म से तय है ,याद रख ,
मौत के इंतज़ार में तू यारा
दुखी रहकर तो हर पल तू मर सकता है,
लेकिन जिंदगी न मिलेगी दोबारा।
- अर्चना 

Sunday, November 13, 2016

सबसे बड़ा रुपैया


न मुन्ना न ! आज नहीं 
कल ले लेंगे 
नया खिलौना
ये वाला अच्छा नहीं
कहकर बच्चे को समझाना
बिटिया से कहना कि -

बस वो जो तीसरी लाईट दिख रही है न! 
उस तक पैदल चल

वहां से रिक्शा में बैठना
परेशानियों की कड़के की धूप में 

तलाशते हुए छईयाँ 
एक लाचार माँ ही बता सकती है, 

क्या होता है -
सबसे बड़ा रुपैया 

Saturday, November 12, 2016

ये जिन्दगी...

चलते-चलते ,चलते ही जाना है ,जाने कितनी दूर तलक
कि सांसों के घोड़ों पर सवार हो सफ़र पर निकल पड़ी ये जिन्दगी...

बदलते -बदलते आखिर कितना बदल गए हम
कि अपने जमाने से कोसों आगे निकल गयी ये जिन्दगी...

मिटाते-मिटाते भी नामोंनिशां न मिटा पाएंगे वे मेरा
क्यों कि कमेंट-कमेंट बन नेट पर विचरती है ये जिन्दगी ...

जाते-जाते अनगिनत दुआएं देकर जाने की ख्वाहिश है मेरी
कि खुदा के घर में भी दुआओं के सहारे बसर कर लेगी ये जिन्दगी...

Thursday, October 20, 2016

ईमान से हम मन की बात लिखते हैं

मिल गया था उन्हें , तो लौटा भी रहे हैं
आप अच्छा नहीं कहते ये अलग बात है। 

भुखमरी में भी अच्छे दिन हुआ करते हैं
आप अच्छा नहीं कहते ये अलग बात हैं। 

ईमान से हम मन की बात लिखते हैं
आप अच्छा नहीं कहते ये अलग बात है। 

हमको भी लोग, खूब पढ़ा करते हैं
आप अच्छा नहीं कहते,ये अलग बात है। 
-अर्चना

Friday, October 7, 2016

उम्मीद की एक किरण

फटने न देना कभी मन में छाए घने बादलों को,
वरना सबके साथ खुद का वजूद भी नजर नहीं आएगा ...

तबाही फैलाने को नहीं है ये मन तुम्हारा,

उम्मीद रखो रिश्ते का रेगिस्तान भी हरा नजर आएगा...



कुछ बातें फ़िर भी सदा अनकही ही रहेंगी
मौन हों जब कलम तो अश्रु भर आंखे कहेंगी....


अर्थ अश्रुओं का न समझा पाई है कभी लकीरें
उम्मीद की एक किरण बदल देती है तकदीरें........
-अर्चना

Saturday, July 23, 2016

आदत -सी पड़ गई है ..

शाख किसी दरख़्त की 

यदि झुक जाए थोड़ी भी 



दम भर सुस्ता लूँ 

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शाम होते ही 

यादें हो जाती है हाज़िर 



दस्तक देने को 

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शाम आती ही क्यूँ है 

यदि तुम्हें साथ नहीं लाती तो 



दवा या दुआ ... आदत -सी पड़ गई है ... 


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शामिल कर लो मुझे भी 

यदि अपनी दुआओं में तुम 



दम निकले,और जी लूँ मर कर  ... 

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-अर्चना

Wednesday, July 13, 2016

ये बारिशों के दिन। ..

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा  बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की

चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।

Sunday, April 3, 2016

समय


1)
समय तुम बलवान
पर बल का मत करो गुमान 
.
.
.
उसके घर देर है अंधेर नहीं........
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2)

वक्त आता है दबे पाँव
चला जाता है दबे पाँव
.
.
.
हमें धप्पा-धप्पी नहीं खेलनी .....फुट!!!!!!!

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3)
हवा ,पानी और आग
धुआँ ,जलन और राख़


समय -समय की है बात !.........
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-अर्चना