Tuesday, November 16, 2010

तारों भरे कटोरे से ....दो घूँट चाँदनी....



सुनिये---- एक गीत       
आज फ़िर  राकेश खंडेलवाल जी का...
दो घूँट चाँदनी-----



 मिसफ़िट-सीधीबात पर सुनिये एक व्यंग रचना
 और यहाँ कर्मनाशा की एक पोस्ट----

Sunday, November 14, 2010

उफ़्फ़... ये पिद्दे और इनकी अदाएं......बाल दिवस पर विशेष

 आज मन था मेरे गाये बच्चों के गीत सुनवाने का ,पर किसी कारण से अभी नहीं सुनवा पा रही हूँ ,शायद शाम तक .....तब तक रविवार बिताइये इनके साथ----

 बच्चे मन के सच्चे----

 रेलगाड़ी रेलगाड़ी---

 मुन्ना बड़ा प्यारा----

 चुन-चुन करती--
 

लकड़ी की काठी--


 म्याँऊ-म्याँऊ------


 नानी तेरी मोरनी(नया)---



ईचक दाना----


काबुली वाला आया---

चंदामामा दूर के ---


मैने कहा फ़ूलों से ---


रे मामा रे मामा रे-----

चंदा है तू----


है ना बोलो बोलो----


 बोल मेरे मुन्ने----


कुछ और याद आ रहे थे --अभी नही मिल पाये ---
तीतर के दो आगे तीतर .....
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे....
और-और-और-------

Thursday, November 11, 2010

माँ कैसी होती है ???



पहले सुबह उठकर
सपने बुनती थी
अब सपने सोचकर ही
रोज सोती है
माँ ऐसी ही होती है।
पहले खोई रहती थी
सपनों में
अब सपनों के
खोने से डरती है
माँ ऐसी ही होती है  ....   



Tuesday, November 9, 2010

आत्मग्लानि........क्षमा याचना...

बहुत कोशिश करती हूँ पर हर दिवाली मे उसका चेहरा जैसे आँखो के सामने से हटने का नाम नहीं लेता....बात करीब १९/२०  साल पहले की है ...राँची में रहते थे हम....काली पूजा देखने गई थी ये पहला मौका था ,पति और दोनों बच्चे साथ थे , बेटे का हाथ पिता ने थाम रखा था, और मेरी बेटी गोदी में थी मेरे । हम बड़ी उत्सुकता से एक के बाद एक पंडाल देखते  जा रहे थे ।बहुत भीड़ थी, पास से एक ट्रक गुजर रहा था ड्राइवर और क्लीनर के बीच में बैठे देखा था उसे ....७-८ साल, करीब मेरे बेटे की उम्र का बच्चा था...बदन पर सिर्फ़ एक नेकर...और जो कुछ मैने देखा उसे आज तक किसी को बता नहीं पाई थी सिर्फ़ इसलिये कि मेरे बच्चे इस घटना को जानकर डर न जायें.(एक बार जिक्र भी किया है--कुछ अधूरा -सा ---- संजय अनेजा जी की पोस्ट को पढ़कर उनके ब्लॉग पर  )(आभार संजय जी का इसे पढ़ते ही याद दिलाया उन्होने ) .किसी फ़िल्म के दॄश्य जैसा था वो दॄश्य...(अमिताभ जी की कोई फ़िल्म थी )...बच्चे के दोनों हाथ बंधे हुए थे और उसके मुंह और सिर पर बारी-बारी शराब उंडेल रहे थे वे दोनों.और बच्चा पता नहीं कबसे उनके चंगुल में था..शराब मुंह मे न जा पाने के कारण बैचैन था..बार -बार खड़ा होता फ़िर वहीं सिट पर गिरता और वे दोनों हँसते ....अब भी याद आती है उसकी ,सोचती हूँ पता नहीं किसका बच्चा होगा वो........अब कहाँ होगा?...होगा भी या नहीं ?.....और होगा तो किस हाल में?....और मैं उस समय मूक क्यों बनी रही ???ये सवाल मुझे सोने नहीं देते .....हर साल वो याद आता है और मैं अपने -आपको कटघरे में पाती हूँ....काश मैं उसके लिए कुछ कर पाती ...

Friday, November 5, 2010

शुभ-दीपावली

हर नए दिन में एक नई आस हो ,हर आशीर्वाद का साया आपके साथ हो
कोई दुःख आपको छू न सके ,बस मुस्कुराहट ही मुस्कुराहट आपके पास हो ...
दीपावली की शुभकामनाए ..









Tuesday, November 2, 2010

हाड़ी रानी --रचना की आवाज में

आज सुनिए रचना की आवाज में मन्नाडे द्वारा फ़िल्म "नई उमर की नई फ़सल " के लिए गाई गई एक कविता जिसे हमने पहली बार सुना और देखा ज्ञान दर्पण  पर जिसे रतनसिंह शेखावत जी ने प्रस्तुत किया था। विस्तॄत रूप से कविता पढिये व विडियो देखिये ब्लॉग  ज्ञान दर्पण पर..




 हम सहॄदय आभारी है शेखावत जी के ---इस रचना से रूबरू करवाने के लिए..