मैं तुम्हें भूल चुकी हूँ
मगर नहीं जानती हर बार
तुम्हारी याद क्यों आती है?
वर्षों बीत गए तुम्हें भुलाए हुए
मगर अनजानों के बीच भी
तुम्हारी बात क्यों आती है?
न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
Saturday, July 16, 2011
Sunday, July 10, 2011
एक गज़ल दुबई से...
एक प्रयास किया है ....दिगम्बर नासवा जी की गज़ल को गाने का.....सुनिए...
धीरे धीरे बर्फ पिघलना ठीक नही..................
Tuesday, July 5, 2011
माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले,गले से लगा ले,कि .........
माँ....बच्चे के मन की हर बात को वो पहले से ही जान जाती है ...... माँ के न होने का अहसास ही सिहरन पैदा कर देता है...किसी भी उम्र के हो जाएं अगर माँ है तो बचपन जिंदा रहता है......और प्राकॄतिक आपदाओं मे अपनों को खोना वैसे भी दुखद होता है.....और वो माँ हो तो ..............."सुनामी". मे अपनी माँ को खो चुके बच्चे की भावनाओं को व्यक्त करते हुए समीर लाल "समीर" जी का एक गीत ‘माई’ पढ़ा /सुना ....और खुद महसूस किया-------
(एडिट किया पद्मसिंह जी ने)
(एडिट किया पद्मसिंह जी ने)
Monday, June 27, 2011
"Rooh - music from soul"...एक नया बेंड...
कमाल है !!!
(बैठे हुए बीच में - दिलेश्वर)
ये बच्चे भी कमाल कर देते है ...दिलेश्वर मेरे स्कूल मे कल तक एक शैतान बच्चा था ....और आज....

बाकी साथियों से मिल सकते हैं यहाँ---
आपकी शुभकामनाएं दें , बेहतर भविष्य के लिए...
(बैठे हुए बीच में - दिलेश्वर)
ये बच्चे भी कमाल कर देते है ...दिलेश्वर मेरे स्कूल मे कल तक एक शैतान बच्चा था ....और आज....
आपकी शुभकामनाएं दें , बेहतर भविष्य के लिए...
Thursday, June 23, 2011
जीवन धारा...
जिंदगी का सफ़र ...
जब दर्द नही था सीने में...
ओ माझी रे...
नदिया चले चले रे धारा....
दूर है किनारा ...
जीवन चलने का नाम...
जब दर्द नही था सीने में...
ओ माझी रे...
नदिया चले चले रे धारा....
दूर है किनारा ...
जीवन चलने का नाम...
Saturday, June 18, 2011
दोस्ती...
दोनो बाल-मंदिर में पढ़ने आये थे।
माता-पिता पहली बार स्कूल छोड़ने आये थे,नई जगह नया लालच देकर लाए थे शायद।शुरू में तो सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
दूसरे दिन से स्कूल आना शुरू किया,पास बैठते,साथ टिफ़िन खाते अपनी चीजें खाना,खिलौना सब बांटते।
धीरे-धीरे दोस्ती ने जगह बनाई,और जब एक स्कूल नहीं आता तो दूसरा कुछ नहीं करता , उसका मन न लगता किसी काम में, न पढ़ना,न खेलना.न टिफ़िन खोलना बस अपनी टीचर के बाजू में बैठे रहना...और दरवाजे की ओर ताकते रहना।
.
................निष्कपट दोस्ती ।
साथ-साथ खेलते।एक ही आदत चुप रहने की,बस किसी की मुर्खतापूर्ण बात या मजाक पर आपस मे देखकर मुस्करा देते,जैसे जान गए हों मन की बात ।
क्लास अलग-अलग मगर खेलने का मैदान एक ,यहां भी वही हाल एक्न आए तो दूसरे का मन न लगे, और दोनों रहने पर भले बात न करे,खेले अलग-अलग टीम से पर भरोसा की चिटींग नहीं करेंगे,एक विश्वास की सपोर्ट जरूर मिलेगा दूसरे का ...
.................निस्वार्थ दोस्ती।
अब एक -दूसरे की नजरों के भाव पढ़ना सीख गए ,पस-पास घर ..एक दूसरे के कार्य-कलापों पर दूर से नजर,
देर तक इन्तजार एक नजर देख लेने का...
पहचानी -सी आहट आने पर...एक का खिड़की की झिर्री से झांकना / गैलरी मे आना और दूसरे का उस झिर्री से आती रोशनी को देखना / चाहे कितना भी अंधेरा हो, चेहरा भी नजर न आए....बस गर्दन घुमाने की आदत ...और आंखों का उपर उठना.....
सोने से पहले आखरी बार एक झलक देख लेने का इन्तजार .....
दिन की शुरूआत सामान्य, कभी-कभी पूरा दिन सामान्य....बस शाम का इन्तजार....
सब मन के भीतर---बातें मुलाकातें....
...............रोमांचक दोस्ती......।.
दोनों अलग-अलग अपने-अपने घरों मे ..............न साथ ,न बात, न मुलाकात न ही कोई इन्तजार..
सुखद,खुशहाल जिंदगी..............
..............समर्पित दोस्ती.......।
और अब अपने काम/जिम्मेदारी पूरी करते -करते जीवन का अधिकतम पड़ाव खतम करने के बाद ....
फ़िर वही दोस्ती.....कहीं किताबें,कहीं लेखन,कहीं पठन ,कहीं संवाद.........फ़िर से वही ....
................भावनात्मक दोस्ती ............।
एक गीत ..इस दोस्ती के भी नाम
माता-पिता पहली बार स्कूल छोड़ने आये थे,नई जगह नया लालच देकर लाए थे शायद।शुरू में तो सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
दूसरे दिन से स्कूल आना शुरू किया,पास बैठते,साथ टिफ़िन खाते अपनी चीजें खाना,खिलौना सब बांटते।
धीरे-धीरे दोस्ती ने जगह बनाई,और जब एक स्कूल नहीं आता तो दूसरा कुछ नहीं करता , उसका मन न लगता किसी काम में, न पढ़ना,न खेलना.न टिफ़िन खोलना बस अपनी टीचर के बाजू में बैठे रहना...और दरवाजे की ओर ताकते रहना।
.
................निष्कपट दोस्ती ।
साथ-साथ खेलते।एक ही आदत चुप रहने की,बस किसी की मुर्खतापूर्ण बात या मजाक पर आपस मे देखकर मुस्करा देते,जैसे जान गए हों मन की बात ।
क्लास अलग-अलग मगर खेलने का मैदान एक ,यहां भी वही हाल एक्न आए तो दूसरे का मन न लगे, और दोनों रहने पर भले बात न करे,खेले अलग-अलग टीम से पर भरोसा की चिटींग नहीं करेंगे,एक विश्वास की सपोर्ट जरूर मिलेगा दूसरे का ...
.................निस्वार्थ दोस्ती।
अब एक -दूसरे की नजरों के भाव पढ़ना सीख गए ,पस-पास घर ..एक दूसरे के कार्य-कलापों पर दूर से नजर,
देर तक इन्तजार एक नजर देख लेने का...
पहचानी -सी आहट आने पर...एक का खिड़की की झिर्री से झांकना / गैलरी मे आना और दूसरे का उस झिर्री से आती रोशनी को देखना / चाहे कितना भी अंधेरा हो, चेहरा भी नजर न आए....बस गर्दन घुमाने की आदत ...और आंखों का उपर उठना.....
सोने से पहले आखरी बार एक झलक देख लेने का इन्तजार .....
दिन की शुरूआत सामान्य, कभी-कभी पूरा दिन सामान्य....बस शाम का इन्तजार....
सब मन के भीतर---बातें मुलाकातें....
...............रोमांचक दोस्ती......।.
दोनों अलग-अलग अपने-अपने घरों मे ..............न साथ ,न बात, न मुलाकात न ही कोई इन्तजार..
सुखद,खुशहाल जिंदगी..............
..............समर्पित दोस्ती.......।
और अब अपने काम/जिम्मेदारी पूरी करते -करते जीवन का अधिकतम पड़ाव खतम करने के बाद ....
फ़िर वही दोस्ती.....कहीं किताबें,कहीं लेखन,कहीं पठन ,कहीं संवाद.........फ़िर से वही ....
................भावनात्मक दोस्ती ............।
एक गीत ..इस दोस्ती के भी नाम
Thursday, June 16, 2011
इसे कहते है ब्लॉग्गिंग ...
कुछ दिनों पूर्व एक गीत सुनवाया था आपको,--गेट वेल सून
और उसके बाद मौके को भुनाया था -- जिन खोजा तिन पाईयां
तबियत ठीक नहीं थी (मेरी और कंप्यूटर दोनों की )
अब इसका पॉडकास्ट बना नहीं पा रही थी ...ध्यान आया 'गेट वेल सून' वाला गिफ्ट..............ये ब्लॉग्गिंग किस काम की ....
..........सही पहचाना था समीर जी ने ...
प्रवीन जी का शुक्रिया जो पॉडकास्ट यहाँ लगाने का अधिकार दिया मुझे ..
जी हां पाती वाली रचना और वो आवाज थी पद्मसिंह जी की...
इनकी एक रचना यहाँ भी सुन सकते है ----इनके ब्लॉग 'ढिबरी 'पर
अब आप ये बताइए की इनकी आवाज में और गीत सुनना चाहेंगे या नहीं ?.....
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