न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे, न ही किसी कविता के, और न किसी कहानी या लेख को मै जानती, बस जब भी और जो भी दिल मे आता है, लिख देती हूँ "मेरे मन की"
Wednesday, September 25, 2013
Sunday, September 15, 2013
Saturday, September 7, 2013
शिरोमणि - एक कहानी
नूतन (कहानियाँ ) नामक ब्लॉग से अन्नपूर्णा बाजपेई जी की कहानी पढ़ते-पढ़ते जाने कितने बच्चे आँखों के सामने से गुजर गए ....
शीर्षक - शिरोमणि
आप भी सुनिए --
Sunday, September 1, 2013
.... की औलाद
सरिता नई शिक्षिका के रूप में मेरे स्कूल में आई थी।पति का इस शहर में तबादला होने पर उसने भी पुराना शहर ,पुराना स्कूल छोड़ दिया था। समय बीतते-बीतते हम कब सहेली बन गए ; पता ही नहीं चला ।
कल वो पुराने शहर की अपनी यादें, मेरे साथ ताजा कर रही थी ।
बातों की बातों में उसे अपनी पॉश कॉलोनी के घर की याद आई ,बताने लगी-
बहुत ही अच्छी कॉलोनी थी, सभी अच्छी जगहों पर काम करने वाले लोग थे। हमारे पड़ोस का घर जिन दंपत्ति का था ,वे अपने बच्चों के पास विदेश चले गए थे । एक दिन उसमें एक यंग लड़का किरायेदार बनकर आया, किसी कंपनी में अच्छी नौकरी थी। थोड़े परिचय के बाद कभी - कभी बात हो जाया करती थी लेकिन हम भी जॉब करते थे, तो ज्यादा मिलना नहीं होता था ।
एक महीने के बाद एक लड़की उसके साथ आ गई थी ,हमसे मुलाकात हुई कि पत्नी है , कम उम्र ही थे दोनों कभी -कभी अनबन की आवाजें आ जाया करती थी घर से ... दूर से देखकर हम अपनी बालकनी से मुस्कुरा लिया करते ,लेकिन वो लड़की बात नहीं करती थी कभी...
फ़िर एक दिन पता चला कि वो गर्भ से है ... और वो लड़का टूर पर गया है... ७-८ दिन बीत गए ..इस बीच वो कम ही दिखती बाहर ...दिखती भी तो कुछ अनमनी सी .....
और एक दिन जब मैं स्कूल के लिए निकल रही थी, तो गार्ड को चिल्लाते हुए पाया वो लड़की गेट पर थी और गार्ड से कहासुनी हो रही थी ...बीच-बीच में गालियाँ भी दे रही थी ... कभी सड़क की तरफ़ दौड़ पड़ती .. गार्ड ट्रकों से उसे बचाकर खींच कर वापस लाता ....
उस वक्त तो देर हो रही थी गार्ड से समझा-बुझा कर घर भिजवाकर मैं स्कूल निकल गई ...फोन पर पतिदेव से खबर भी मिल गई थी बीच में कि उनके ऑफ़िस जाने से पहले तक घर में ही थी।
शाम को जब वापस पहूँची तो गार्ड नें बताया कि सड़क पर ही निकली हुई है ,और कुछ दूर तक चली गई है दिखाई नहीं दे रही ... मैं भी घर लौट आई ये सोच कर कि किसी परिचित के पास चली गई हो ...
रात होते ही फ़िर गेट के पास हंगामा हुआ ,गार्ड नें पुलिस को बुला लिया , और पुलिस पकड़कर ले गई ...
गार्ड बता रहा था कि वो साहब तो भाग गए लगते हैं ,फोन भी नहीं उठा रहे थे ..न मेरा न उनकी मेडम का .... और मेडम चिल्लाते हुए कहती भी जा रही थी कि उस औरत को मार डालूंगी - बीबी कहता है अपनी साला .........की औलाद ......
अब मैं सोच रही थी कि जिन्दगी भी कैसी यादों के पन्ने सहेज लेती है, जाने कहाँ - कहाँ से उफ़्फ़! ....
कल वो पुराने शहर की अपनी यादें, मेरे साथ ताजा कर रही थी ।
बातों की बातों में उसे अपनी पॉश कॉलोनी के घर की याद आई ,बताने लगी-
बहुत ही अच्छी कॉलोनी थी, सभी अच्छी जगहों पर काम करने वाले लोग थे। हमारे पड़ोस का घर जिन दंपत्ति का था ,वे अपने बच्चों के पास विदेश चले गए थे । एक दिन उसमें एक यंग लड़का किरायेदार बनकर आया, किसी कंपनी में अच्छी नौकरी थी। थोड़े परिचय के बाद कभी - कभी बात हो जाया करती थी लेकिन हम भी जॉब करते थे, तो ज्यादा मिलना नहीं होता था ।
एक महीने के बाद एक लड़की उसके साथ आ गई थी ,हमसे मुलाकात हुई कि पत्नी है , कम उम्र ही थे दोनों कभी -कभी अनबन की आवाजें आ जाया करती थी घर से ... दूर से देखकर हम अपनी बालकनी से मुस्कुरा लिया करते ,लेकिन वो लड़की बात नहीं करती थी कभी...
फ़िर एक दिन पता चला कि वो गर्भ से है ... और वो लड़का टूर पर गया है... ७-८ दिन बीत गए ..इस बीच वो कम ही दिखती बाहर ...दिखती भी तो कुछ अनमनी सी .....
और एक दिन जब मैं स्कूल के लिए निकल रही थी, तो गार्ड को चिल्लाते हुए पाया वो लड़की गेट पर थी और गार्ड से कहासुनी हो रही थी ...बीच-बीच में गालियाँ भी दे रही थी ... कभी सड़क की तरफ़ दौड़ पड़ती .. गार्ड ट्रकों से उसे बचाकर खींच कर वापस लाता ....
उस वक्त तो देर हो रही थी गार्ड से समझा-बुझा कर घर भिजवाकर मैं स्कूल निकल गई ...फोन पर पतिदेव से खबर भी मिल गई थी बीच में कि उनके ऑफ़िस जाने से पहले तक घर में ही थी।
शाम को जब वापस पहूँची तो गार्ड नें बताया कि सड़क पर ही निकली हुई है ,और कुछ दूर तक चली गई है दिखाई नहीं दे रही ... मैं भी घर लौट आई ये सोच कर कि किसी परिचित के पास चली गई हो ...
रात होते ही फ़िर गेट के पास हंगामा हुआ ,गार्ड नें पुलिस को बुला लिया , और पुलिस पकड़कर ले गई ...
गार्ड बता रहा था कि वो साहब तो भाग गए लगते हैं ,फोन भी नहीं उठा रहे थे ..न मेरा न उनकी मेडम का .... और मेडम चिल्लाते हुए कहती भी जा रही थी कि उस औरत को मार डालूंगी - बीबी कहता है अपनी साला .........की औलाद ......
अब मैं सोच रही थी कि जिन्दगी भी कैसी यादों के पन्ने सहेज लेती है, जाने कहाँ - कहाँ से उफ़्फ़! ....
जगत मिथ्या ...
भला क्यूँ रहे ?
नेह भरा ये मन
यूं ही बेचैन...
नेह बंधन
बिन डोर बाँध ले
सबके मन...
करें जो स्नेह
बिना स्वार्थ सतत
बरसे नेह...
भटके मन
छटपटाए तन
कोई संग ना....
मोह न छूटे
सजे सँवारे देह
जगत मिथ्या ...
नश्वर देह!
साथ कुछ न जाये
फिर भी मोह...
देह का बोझा
ढोए जन्मोजनम
मुक्ति की आस....
छोटा पिंजड़ा
पंछी छ्टपटाए
देह न छूटे...
-अर्चना
नेह भरा ये मन
यूं ही बेचैन...
नेह बंधन
बिन डोर बाँध ले
सबके मन...
करें जो स्नेह
बिना स्वार्थ सतत
बरसे नेह...
भटके मन
छटपटाए तन
कोई संग ना....
मोह न छूटे
सजे सँवारे देह
जगत मिथ्या ...
नश्वर देह!
साथ कुछ न जाये
फिर भी मोह...
देह का बोझा
ढोए जन्मोजनम
मुक्ति की आस....
छोटा पिंजड़ा
पंछी छ्टपटाए
देह न छूटे...
-अर्चना
Sunday, August 25, 2013
अगर हम ठान लें मन में .....
कहाँ तकदीर लिखती है, उजाला सबके हिस्से में,
कहाँ खुशियाँ नज़र आती हैं, अक्सर अपने किस्से में.
मगर मेहनत कड़ी कर लें, खुशी तब मुस्कराती है.
अगर हम ठान लें मन में, सफलता पास आती है...
ये पंक्तियाँ है गिरीश पंकज जी के के गीत की उनके ब्लॉग सद्भावना दर्पण से.....
सुनिये उनके इसी ब्लॉग से ये गीत----(एडिट किया है पद्मसिंह जी ने )
Friday, August 23, 2013
आज फिर गाने लगा है गीत कोई...
"आज फिर गाने लगा है गीत कोई..." राकेश खंडेलवाल जी के ब्लॉग "गीत कलश" से एक गीत --
आभारी हूँ राकेश जी की गीत रिकार्ड करने की अनुमति सदा के लिए दे रखी है उन्होंने .... :-)
आभारी हूँ राकेश जी की गीत रिकार्ड करने की अनुमति सदा के लिए दे रखी है उन्होंने .... :-)
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