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Wednesday, July 13, 2016

झंक्रॄत मन....


नन्हीं सी बूँदो
तुम जो बरसोगी
धरा खिलेगी..

सावन आया
पिया कहीं न जाना
झूला झूलेंगे..

ओ री बरखा
जो भिगोई चुनरी
फ़िर तपूंगी....

घोर गर्जन
घबराए से पंछी
रूको बदलों...

मैं हूँ उदास
बरसेंगी अँखियाँ
पूरे सावन..

निकली धूप
फ़िर छुपे बादल
फ़िर से चिंता...

छाते के नीचे
फ़ुहारों के बीच में
मैं और तुम...

जलतरंग
टिप टिप टिपिर
झंक्रॄत मन....

-अर्चना 

Friday, June 6, 2014

पुकार...



लम्बे होते हैं
घंटे दोपहर के
नवतपा में

जलती धरा
लू के थपेड़ों संग
मृत- जीवन

आओ बादलों
बरसो रिमझिम
बचा लो तृण

तनिक अब
सूरज ले विश्राम
मिले आराम

जन-जीवन
ले लें चैन की सांस
दो पल रूक

महके धरा
नभ के अमृत से
सौंधी सौंधी सी

खिले कोपलें
करें प्रकृति अब
नव श्रृंगार

चहके पंछी
वन उपवन में
सुबह-शाम

पशु लाचार
न तरसें छांह को
न ही पानी को

आओ बादलों
बरसो रिमझिम
जीवन दे दो....

Sunday, September 1, 2013

जगत मिथ्या ...

भला क्यूँ रहे ?
नेह भरा ये मन
यूं ही बेचैन...

नेह बंधन
बिन डोर बाँध ले
सबके मन...

करें जो स्नेह
बिना स्वार्थ सतत
बरसे नेह...

भटके मन
छटपटाए तन
कोई संग ना....

मोह न छूटे
सजे सँवारे देह
जगत मिथ्या ...

नश्वर देह!
साथ कुछ न जाये
फिर भी मोह...

देह का बोझा
ढोए जन्मोजनम
मुक्ति की आस....

छोटा पिंजड़ा
पंछी छ्टपटाए
देह न छूटे...

-अर्चना

Tuesday, August 13, 2013

पंछी बनूं उड़ती फिरूं.....


जीवन मेरा 
बुलबुल के जैसा 
चुलबुल सा 

गोरैया हूँ मैं 
घर में ही रहती 
बच्चे पालती

कोयल सी मैं 
सब कुछ गा लेती
मधुर बना ...
-अर्चना

Friday, February 8, 2013

स्वागत बसन्त...


स्वागत तेरा
आँगन आँगन में
मेरे बसन्त ...

पीली सरसों
और लाल पलाश
केशरिया मैं...

प्रीत उमगे
उर में साजन के
मैं शरमाउँ...

बसन्त आया
बिछ गई धरा पे
पीली चूनर...

कोयल बोले
आम के पेड पर
मधुर बोली...

पीली सरसों
चमक उठे खेत
महके मन..

मेरी कोयल
कूकती,चहकती
बसन्त संग...


और अब रविन्द्र संगीत--


इन हायकु को हाइगा के रूप मे बदलने के लिए ॠता शेखर‘मधु’ जी का आभार ...

Sunday, September 9, 2012

पलकें और आँसू

(चित्र एक ग्रुप- साहित्यिक मधुशाला की वॉल से लिया है)
वादे के बाद
मेरे जाने के बाद
रोई क्यों तुम?...

रोया ना करो
मोती गिर जाते हैं
चमकीले से...

बूँदों को मिली
पलकोंकी पालकी
मुझे क्या मिला?...

थाम लो मुझे
मेरे आँसू कहते
बरस बीते...

रूको तो साथी
तुम तो मत जाओ
साथ चलेंगे...

मोती की लड़ी
ठहर-ठहर के
आँखों से झड़ी...

किस विध से
मैं नीर नयन का
रोकूँ साजन?...

बिखरे सारे
मोती मेरे मन के
टूटी मनका...

तनहा शाम
फ़िर उदास मन
छलका जाम...

मोती क्यूँ झरे
यूँ पलकों के तले
तुम क्या जानो...

जंग अश्कों से
न जीती जाती कोई
हँस के देखो...
-अर्चना









Wednesday, July 18, 2012

फ़िर आया सावन...



नन्हीं सी बूँदो                 
तुम जो बरसोगी 
धरा खिलेगी..

सावन आया
पिया कहीं न जाना 
झूला झूलेंगे..

छाते के नीचे
फ़ुहारों के बीच में 
तुम और मैं ..

ओ री बरखा
जो भिगोई चुनरी 
फ़िर तपूंगी....

घोर गर्जन
घबराए से पंछी 
रूको बदलों...

मैं हूँ उदास
बरसेंगी अँखियाँ  
पूरे सावन...