Saturday, March 2, 2013

तेरी बिंदिया रे.... चुरा ली है मेरी निंदिया रे ....

एक पोस्ट समीर लाल जी की उनके ब्लॉग "उड़नतश्तरी" से . .. कई दिन ....बल्कि साल कहूँ तो भी ठीक होगा से पढ़ रही हूँ ,महीना पंद्रह दिन में याद आती रही है,कई बार कोशिश की रिकार्ड करने की पर मेरी आवाज में कभी अच्छी नहीं लगी मुझे , पोस्ट ही ऐसी है कि पुरूष स्वर में ही अच्छी लगेगी हमेशा ऐसा ही लगा और फिर बनी ये पोस्ट --


और ये रूप भी बिंदिया का --


दासी फिल्म से एक गीत - गायक -मन्नाडे
बिन्दिया जागाए हो रामा निंदिया न आए ....

9 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत आभार आपका...और ज्यादा आपके भईया जिन्होंने आपकी बात रख कर मेरी लेखनी का वज़न बढ़ा दिया...

alka sarwat said...

सच में बिंदिया का तो जवाब ही नहीं है.

Rajendra Kumar said...

बहुत ही सुन्दर गीत.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर मधुर प्रस्तुति!

प्रवीण पाण्डेय said...

आईपैड में सुन नहीं पा रहे हैं, घर जाकर सुनते हैं।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बहनों की जिद को टालना मेरे लिए बड़ा मुश्किल होता है. ऐसे में समीर जी की पोस्ट के लिए तुम्हारा कहना तो टाल भी नहीं सकता था. ज़रा और फुर्सत से किया होता तो और भी बेहतर कर सकता था.

vikram7 said...

Ati madhur

ज्योति खरे said...

वाह क्या गीत है बधाई

मनोज भारती said...

वाह !!! बिंदिया के बहाने पुराने जमाने की कितनी सारी खासियतों को गिना दिया...सलिल जी के मधुर वाचन ने इसे कल्पना से उठा कर आँखों के सम्मुख खड़ा कर दिया ...