Tuesday, August 13, 2013

पंछी बनूं उड़ती फिरूं.....


जीवन मेरा 
बुलबुल के जैसा 
चुलबुल सा 

गोरैया हूँ मैं 
घर में ही रहती 
बच्चे पालती

कोयल सी मैं 
सब कुछ गा लेती
मधुर बना ...
-अर्चना

7 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

वाह बहुत ही शानदार, तीनों ही हाइकू बिल्कुल थैमेटिक लग रहे हैं.

रामराम.

अनुपमा पाठक said...

बुलबुल, गौरय्या एवं कोयल!
वाह!

अरुन शर्मा अनन्त said...

आपकी यह रचना कल बुधवार (14-08-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर सरल परिचय..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल बृहस्पतिवार (15-08-2013) को "जाग उठो हिन्दुस्तानी" (चर्चा मंच-अंकः1238) पर भी होगा!
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत खूब..

शिवनाथ कुमार said...

पंछी का जीवन सबसे सुन्दर ...