Sunday, May 3, 2015

मैं सोच रही हूँ ..

वो पडोस में बर्तन,झाडू-पोछा करके रोजी कमाती है , छोटी उम्र की ही है, उसके दो बच्चे हैं , पिछले माह की तनख्वाह मिली तो पति से छुपाकर रखी क्यों कि पति दारू पीता था  बस कुछ काम नहीं करता ... काम पर आई तो पति ने पैसे खोज लिये और इतनी दारू पी कि सोया तो उठा ही नहीं ... :-( ...
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अब भी वो काम पर आती है ... बहुत रोती है... जब पडोसन ने कहा कि रोती क्यों है , वैसे भी तू ही पाल रही थी , कोई मदद तो तुझे थी नहीं उससे उल्टे पीटता ही था ...
तो जबाब मिला - जैसा भी था, घर पर कोई था तो, वो एक अकेला ही पीटता था अब ... इतने लोग घूरा करते हैं उनका क्या ... .... :-(
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दुखद है जीवन .... ..
बहुत दुखद .... :-( ....


आज एक और महिला की याद आ गई ...उससे मुलाकात हुई थी राँची में, चार माह की बच्ची को पीठ पर बाँध कर काम पर आती थी, उससे बड़ी एक लड़की थी करीब चार साल की, साथ आती थी माँ के और उससे बड़ा भाई घर रहता था ...दोनों बड़े बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते थे उसकी प्रिंसिपल मैडम के घर भी उसे काम करना होता था ...सारा काम ..... वे अनुकम्पा नियुक्ति पर इस स्कूल में पदस्थापित थी , सुना कि सर बहुत अच्छे स्वभाव के थे .... बच्चों की फ़ीस थी २०० रूपए और काम करवाती ६०० रूपए का ... फ़ीस नहीं लेती थी वे ... :-(
और वो इस डर से कि कहीं स्कूल से बच्चों को निकाल न दें सारा काम चुपचाप करती रहती ....
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लेकिन खर्चा चलाने के लिए आस-पास के दो घर और पकड़ लिये थे ,झाडू़,कपड़ा,बर्तन के ..और उससे १२०० कमा रही थी ....
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दशहरे पर वे घर गई हुई थी सो मेरी मुलाकात नहीं हुई उनसे ...लेकिन अब पता चला है कि उन मैडम का कहना है कि अगर मेरे घर काम करना है तो बाकि लोगों के घर अडोस-पडोस में नहीं करो ...उनक काम छोड़ दो ....
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...क्या शिक्षा दी होंगी स्कूल के बच्चों को .... :-(

2 comments:

dj said...

न जाने कुछ लोग इतने भावनाशून्य इतने संवेदनहीन कैसे होते हैं। दुःखद है।

dr.mahendrag said...

ईर्ष्या ,जलन पद की गुमानियत , व पैसे का दर्प इंसान को इंसान समझने की खसूसियत को भी खो देता है ,ऐसे लोग कभी भी नहीं सुधर सकते