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Saturday, October 17, 2015

हे भगवान !

इतने पुरस्कार 
आदान-प्रदान 
जान -पहचान
तू मेरा मेहमान 
मैं तेरा मेहमान 
किसकी आन
किसकी शान
झकास जलपान
सब बेईमान
मेहरबान
कदरदान
क्या गीता
क्या कुरआन
गूंगा करे बखान
करो गंगा स्नान
ठुकरा कर सम्मान
कुछ दान
कुछ ध्यान
बनो महान
करो कल्याण
पकड़ो कान
बख्शो जान
हे भगवान !

Sunday, May 3, 2015

मैं सोच रही हूँ ..

वो पडोस में बर्तन,झाडू-पोछा करके रोजी कमाती है , छोटी उम्र की ही है, उसके दो बच्चे हैं , पिछले माह की तनख्वाह मिली तो पति से छुपाकर रखी क्यों कि पति दारू पीता था  बस कुछ काम नहीं करता ... काम पर आई तो पति ने पैसे खोज लिये और इतनी दारू पी कि सोया तो उठा ही नहीं ... :-( ...
.
.
अब भी वो काम पर आती है ... बहुत रोती है... जब पडोसन ने कहा कि रोती क्यों है , वैसे भी तू ही पाल रही थी , कोई मदद तो तुझे थी नहीं उससे उल्टे पीटता ही था ...
तो जबाब मिला - जैसा भी था, घर पर कोई था तो, वो एक अकेला ही पीटता था अब ... इतने लोग घूरा करते हैं उनका क्या ... .... :-(
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दुखद है जीवन .... ..
बहुत दुखद .... :-( ....


आज एक और महिला की याद आ गई ...उससे मुलाकात हुई थी राँची में, चार माह की बच्ची को पीठ पर बाँध कर काम पर आती थी, उससे बड़ी एक लड़की थी करीब चार साल की, साथ आती थी माँ के और उससे बड़ा भाई घर रहता था ...दोनों बड़े बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते थे उसकी प्रिंसिपल मैडम के घर भी उसे काम करना होता था ...सारा काम ..... वे अनुकम्पा नियुक्ति पर इस स्कूल में पदस्थापित थी , सुना कि सर बहुत अच्छे स्वभाव के थे .... बच्चों की फ़ीस थी २०० रूपए और काम करवाती ६०० रूपए का ... फ़ीस नहीं लेती थी वे ... :-(
और वो इस डर से कि कहीं स्कूल से बच्चों को निकाल न दें सारा काम चुपचाप करती रहती ....
.
लेकिन खर्चा चलाने के लिए आस-पास के दो घर और पकड़ लिये थे ,झाडू़,कपड़ा,बर्तन के ..और उससे १२०० कमा रही थी ....
.
दशहरे पर वे घर गई हुई थी सो मेरी मुलाकात नहीं हुई उनसे ...लेकिन अब पता चला है कि उन मैडम का कहना है कि अगर मेरे घर काम करना है तो बाकि लोगों के घर अडोस-पडोस में नहीं करो ...उनक काम छोड़ दो ....
.
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...क्या शिक्षा दी होंगी स्कूल के बच्चों को .... :-(

Friday, February 20, 2015

स्व-चिंतन

इतने रंग है भरे -जीवन में
सब एक -दूसरे से सटे -जीवन में
कब किस रंग का गुब्बारा फूटे
कब कौन किससे रूठे
सबके लिए बैठे मेले में
स्व चिंतन है अकेले में......
- अर्चना

Saturday, January 12, 2013

ओ दुनिया के रखवाले ....सुन!!!..



 जैसे ही ठंड का मौसम आया
लगा खाने -खिलाने का मौसम आया
गाजर का हलवा और
पोहा-जलेबी तो खूब खाई
और मेथी का पराठा भी भाया
पर मूली कभी न भाई !

काकी की कचोरी की दूकान
ठंड ने खूब याद दिलवाई..
इस हफ़्ते ये कड़ाके की ठंड
सबके मुँह में पानी लाई ...

आते ही होंगे सारे साथी,
सहेलियाँ भी खाती-खाती
पर सब याद रखते हैं
मुझे मूली बिलकुल नहीं भाती...

चलो अब जल्दी ही
भीड़ बढ़ जाएगी
इतना खाएँगे-खिलाएँगे कि
पेट में जगह कम पड़ जाएगी ...

मूँग का हलवा और मुंगोड़े
अभी - अभी ही बनाए हैं
बोलो साथ खाने वालों -
आप क्या -क्या लेकर आए हैं?

खाने के साथ सबको
रबड़ी भी दी जाएगी
मगर सिर्फ़ उन्हें -
जिनको दूध-जलेबी नहीं भाएगी ..

सब कुछ मीठा-मीठा तो
अच्छा नहीं लगता
चलो साथ ही बना लेते हैं-
गरम-गरम कढ़ी और बेंगन का भरता...

मेरे खयाल से-
ये तो सबको चलेगा
लेकिन क्या कहेंगे गर किसी ने पूछा -
पीने को क्या मिलेगा?...






सोचती हूँ हम नसीब वाले हैं
जो इतने नाम जानते हैं
उनका क्या जो माँगकर भी
रोटी नहीं पाते हैं..

क्यूँ न हम उनकी
जीवन की नैया मोड़ दें
और उनके लिए रोज न सही
एक दिन का खाना छोड़ दें..


पेट पर कपड़ा कसकर      
काम करते हैं वे सब
याद भी नहीं रखते पिछली बार
क्या खाया था और कब?


 उनके लिये रोटी ही
हर मिठाई है
रबड़ी तो क्या, दूध माँगने पर भी
हमेशा माँ पानी ही लाई है..

क्या पसंद और क्या ना पसंद
ये तो कभी सोचा भी न होगा
कच्चे काँदे और मिर्च को ही
बढ़िया पकवान समझा होगा....

तन ढँकने को कपड़ा भी न मिलता होगा
तो क्या ओढ़ते होंगे कभी नर्म रजाई
ये कैसा ठंड का मौसम आया
कि उनकी जान पर बन आई....




Friday, November 23, 2012

फ़र्क

ये तस्वीर कुछ दिनों पूर्व स्कूल जाते हुए ली थी ,हुआ ये था कि मैं अपने घर से बस स्टॉप तक जाने के लिये निकली थी कि मेरे आगे -आगे ये नज़ारा देखा ...
बेटा बेफ़िक्री से जेब में हाथ डाले स्कूल की बस के स्टॉप तक चल रहा था ,और माँ ने उसका स्कूल बेग उठा रखा था,जबकि लग रहा था कि बेटी का हाथ पकड़ा हुआ है ।

माँ के पैरों की चाल देख कर ही अंदाजा लग रहा था (शायद आपको भी लगे)कि बहुत तनाव है -
-इसे छोड़ना है ...आकर छुटकी को तैयार करना है.....इसके पापा भी उठने वाले होंगे .....चाय बनाना है.... नाश्ता -टिफ़िन....वगैरह वगैरह....कामों का ढेर ...

और मैं छुटकी की चाल देख कर उसके मन के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी --
मम्मा भैया को अकेले जाने दो न! ..... मुझे इत्ती जल्दी क्यों उठा दिया....पापा नहीं छोड़ सकते भैया को.....कल से मैं नहीं आउंगी :-(  ...आप रोज -रोज ऐसे ही बोलती हो ....भैया बड़ा नहीं हुआ अभी ?....मैं कब बड़ी होउंगी....मुझे भी बड़े होकर जल्दी उठना पड़ेगा ?.....

और मुझे ये देखकर अपने बच्चों का छुटपन याद आ रहा था...बेटी तब भी जल्दी उठकर साथ चलती थी मेरे और बेटा देर से उठकर हमसे आगे निकल भागता था...



स्वभावगत ही होता है शायद ऐसा......

Tuesday, March 27, 2012

कैचिंग पॉवर....


पल = लड़की ..................कनिष्क = लड़का ..........



कनिष्क और पल, के.जी. टू में पढ़ते हैं,और मेरे साथ स्कूल बस में जाते हैं,स्टॉप पर कभी मैं पहले आती हूँ ,कभी बस।
कुछ दिनों से बस पहले आ जाती है, तो इनकी प्रतिक्रिया---

पहले दिन -
पल- मैम आप लेट आए..
मैं- ह्म्म..(कनिष्क मुस्कुरा देता है)..

दूसरा दिन -
पल- मैम आप लेट आए..
मैं- सॉरी..( कनिष्क मुस्कुरा देता है)..

तीसरे दिन -
पल- मैम आज आप फ़िर लेट...
मैं- (कान पकड़कर) सॉरी बाबा ....कल से नहीं आउंगी....(कनिष्क के चेहरे पर मुस्कुराहट छा जाती है)...

चौथे दिन -
पल- मेSSSम !! आज फ़िर....
मैं- (ड्राईवर भैया से)-  भैया कल से मेरे लिए रूकना नहीं,मुझे छोड़ देना.....(पल मुस्कुरा देती है ,कनिष्क उसे देखता है)

पाँचवे दिन -(इस बार मैं जल्दी आई)...
पल- मैम आप रोज़ लेट आते हो....
मैं- नहीं..आज तो मैं पहले से खड़ी थी,बस ही लेट आई....
पल- नहींSSSS...
मैं- (ड्राईवर भैया से)- भैया, मैं  पहले आ गई थी न!,मैंने फोन किया था न?
भैया- हाँ ...
कनिष्क-(जो अब तक कभी नहीं बोला था) - ये तो ऐसे ही बकवास करती है,अंट-शंट बकती है,मैंने देखा था आपको, आप पहले से खड़े थे ......



Monday, January 24, 2011

काश...

वत्स भीष्म ,
काश तुम अपनी प्रतिज्ञा तोड़ देते
तो क्या हमें
तुम जैसे -दो चार या ज्यादा
शूरवीर,बलवान,धैर्यशील,गुणवान
वीर और न मिलते?
कितना अच्छा होता यदि तुम
ये प्रतिज्ञा न करते
और बदले में इसके
इसे लेने को
दुर्योधन को प्रेरित करते
ये तुमने अच्छा नहीं किया
तुम तो एक बार बस
बाणों पर सो गए
और इतनी अन्दर तक
बाणों की नोकों को
हमें चुभो गए
आज तक हम
इस पीड़ा को भोग रहें है
और अब भी कही
दाउद और ड़ोंन जन्म ले रहें है.............


Saturday, January 22, 2011

समझ

अच्छाई में पाप नहीं,
तुम अच्छाई से नहीं डरो,
हो भला सभी का जिससे,
सदा काम तुम वही करो |


एक -----(बीप) से प्रेरणा --

आगे बढ़ते रहो कि "जहां" तुम्हारा है ,
रत्न गढ़ते रहो कि "जहां" तुम्हारा है,
तन और मन की हो जुगलबंदी ऐसी --
कि हर कोई तुमसे पूछे  -- " "जहां" तुम्हारा है" ?




-

Friday, January 21, 2011

पाठ याद नहीं हुआ...

लम्बा लेख या लम्बी कहानी पढ़ने से हमेशा से परहेज रहा है मुझे,खुद भी ज्यादा लम्बा लिख नहीं पाती....अगर लिखा भी होगा तो वही जिसे किसी को पढ़वाना नहीं चाहती।

"गीता" भी नहीं पढ़ी... बस पढ़ा तो "गीता-सार".....जिसे समझने में "अर्जुन की आँख और मछली" की कहानी याद आई,और युधिष्ठिर की भी--जिसमें वे कहते रहे पाठ याद नहीं  हुआ।.....

Sunday, November 21, 2010

आओ लिखो--- बढ़िया...लाजवाब....खूबसूरत ....पंक्तियाँ....(हा हा हा..)

पैसा कमाएं और खूब कमाएं............

ये आपकी जरूरत और हक है,

मगर ...कभी भी कमाया पैसा --व्यर्थ न गंवाएं.....


राह दिखाएं और खूब दिखाएं...........

ये आपकी जिम्मेदारी और कर्तव्य है ,

पर कभी भी किसी को --गुमराह न करें......


हाथ थामें और साथ चलें..........

ये आपका फैसला और शौक है ,

पर कभी भी किसी को --मझधार मे  न छोड़े..........

Saturday, July 10, 2010

संगठन मे शक्ति-----------------एक कहानी ----------(सबके लिए )..............................मेरी आवाज में ....................

आज एक कहानी----------------------------------- सुनिए और समझिए ----------------------------------जो मैने हिन्दी की पाठ्य पुस्तक से पढी.....लेखक ---डॉ, रनवीर सक्सेना ------



Tuesday, June 29, 2010

मित्र के साथ मुकदमा............................... जीत गई मै !!...............................(पक्का पता नही है )..........

माननीय जज साहब ,
मुझ पर एक मित्र ----"ब्लॉग  लिखने का "ज्ञान" उन्होंने ही दिया है," और फ़िर हमारा तो स्वभाव ही ऐसा है कि किसी का आभार व्यक्त करना हो तो ऐसे करें कि अगला किसी का भला करे तो सोच समझ करे ना कि मन किया और कर दिया किसी को भी प्रेरित ।" (हर बार एक नया सम्बोधन देते हैं मुझे ---हिन्दी कमजोर है ---उनकी )--------का आरोप है कि मैं दूसरों की पोस्ट का पॉडकास्ट करती हूँ....................अब मैं ये तो पहले ही बता चुकी हूँ कि  -----"न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे .....न ही किसी कविता के .....और न किसी कहानी या लेख को मैं जानती ....बस जब भी और जो भी दिल में आता है .......लिख देती हूँ "मेरे मन की" -----"
भला अब आप ही बताएं-- मुझे तो ज्ञान आप-पास से ही ढूँढ्ना पडेगा न !......और मैं समझदार हूँ ( गवाह है मेरे पास )................
मैं इस आरोप से इंकार करती हूँ..............मैं सिर्फ़ उसी पोस्ट का पॉड्कास्ट बनाती हूँ....जो अच्छी हो या जिसे लोगों को जानना /सुनना/या पढना चाहिए ....(मेरी समझ से).............चाहे वो मेरी हो या दूसरों की ..............( गानों की बात नहीं कर रही ....वो तो झेलना ही पडेंगे आखिर मूड भी तो कोई चीज है ? बनाना तो पडता ही है न !)...........
मैंने अब तक जो पॉड्कास्ट किए है ..उसमे से कुछ सबूत प्रस्तुत है ......

सखिया आवा उडि़ चलीं..’

एक लघुकथा........

....एक गीत

कुछ कहने से बेहतर होगा.................सुनना..........

रक्तदान, देहदान  महादान ...
बाल-उद्यान

आवाज
भोपाल त्रासदी
इनको सबने अच्छा ही बताया है ...........
आगे मैं यह कहना चाहती हूँ कि ------"क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कहाँ ,किसने ,क्या कहा के बजाय  ये बताएं कि आज कहाँ,किसने क्या अच्छा कहा !!!.."................................मैं पूछती हूँ कि लोग बुरी बातों का जिक्र
करते ही क्यूं है ?......................करेंगे ही नहीं तो वो फ़ैलेगी ही नहीं....................
इसे उदाहरण से समझ लें----------जब कोई एक बच्चा मेरे पास शिकायत करता है कि -फ़लां बच्चे ने मुझे गाली दी, अब सब गालीयां सबने सुनी थोडी रहती है ...पहले तो डिसाइड करना पडता है कि गाली है कि नहीं?.........इसमें बहुत समय खराब हो जाता है ...................इसलिए मैं तो शिकायत करने वाले बच्चे को ही एक चांटा डांटती हूँ (हाँ अब लगा नहीं सकते ..)कि -तुमने सुना ही क्यों?......और सुना तो तुम लिख कर दे दो ----क्या बोला ............मैं देखती  हूँ क्या कर सकती हूँ.................अगर गाली हुई तो उसे बुलाएंगे ..........वरना ...............


गानों के लिए भी सबूत हैं मेरे पास  --- क्यों गाती हूँ इस बात के भी सबूत हैं मेरे पास (सबूतों को बेह्तर करने केलिए गवाहों को वक्त दिया है ---....उचित समय पर उनकी अनुमति लेकर प्रस्तुत किया जा सकेगा ) ..........
वैसे तो कई तारीखों पर बहस करके समझौता कर लिया है मैने...........अब वे मेरे मित्र  ही हैं . (पता बता पाने मे मैं असमर्थ हूँ------क्योंकि उनका कहना है कि एक बार किसी ने उनका पता दिया था तो सही पता होने के बाद भी गलत लोग आ पहूँचे थे .)....... ..........
फ़िर भी आप चाहें तो  ---------------भविष्य में ऐसे सबूत भी दे पाने की कोशीश करूंगी कि हमारा समझौता हो चुका है........समझौता होने की खुशी मे मित्र को एक गीत भेंट देना चाहती हूँ . ..................

 

और एक संदेश भी :----



...बस अब और मुझे कुछ नहीं कहना .!!!................

Monday, June 28, 2010

अब क्या करूँ ?.............................................बाँट दूँ ?????

मैं ईश्वर को अपनी परेशानी दे देती हूँ.........कह देती हूँ------उसने ही भेजा है ..........तो उसे ही बताना है कि ----आज क्या करना है ?.........क्योंकि उसे ही पता है कि उसने क्यों भेजा है.............जो भी अच्छा काम करवाना हो करवा ले .................
आज मुझे क्या करना है मैं ये नही सोचती .............क्योंकि मुझे पता थोडे ही रहता है कि मैं किस वक्त तक .रहूँगी !!!.........................जब भी समस्या आती है -----पूछ लेती हूँ अब क्या करूँ ? आगे बता ................बस ..........

Saturday, April 24, 2010

आप भी जानिए.............अपने आप को.....................

जबसे ब्लोग बनाया कुछ न कुछ नया सीखा है मैने ...........यहाँ आकर ही पता चला ......कि मै क्या -क्या कर सकती हूँ..........पहले कुछ लिखना सीखा .......फ़िर चित्र लगाना.........फ़िर गाना रिकार्ड.............. करना ........फ़िर पोड्कास्ट..........कराओके......... और अब कहानी का पोडकास्ट...........


आज मै इस पोस्ट के माध्यम से दो लोगों का आभार मानना चाहती हूँ------पहले तो आदरणीय गिरीश जी का जिन्होने मुझे इस काबिल समझा.....................और अपने ब्लोग पर जगह दी......
.

दूसरे आदरणीय अनुराग शर्मा जी (स्मार्ट इंडियन) का जिन्होने मुझे ये मौका दिया .....आज आवाज पर मेरी आवाज मे सुनना न भूलें सुदर्शन जी की कहानी ------------" साईकिल की सवारी ".........
....धन्यवाद

Thursday, April 22, 2010

सोचो जरा ......................

( चित्र गूगल से साभार )


ईश्वर न होता तो क्या होता ?
धरती न होती, आसमां न होता ।

माँ न होती तो क्या होता ?
शायद मैं न होती, तू न होता ।

हम न होते , तो क्या होता ?
कर्म न होता ,धर्म न होता ।

धर्म न होता तो क्या होता?
तू-तू ,मै-मै न होती ,झगडा न होता ।

झगडा न होता तो क्या होता ?
हम न बंटते , और प्यार होता ।

और जरा सोचो .............


प्यार होता----- तो क्या होता ???
मिल के रहते , और गम न होता ।




Tuesday, April 20, 2010

फ़ितरत इन्सान की -------इन्सान खुद बनाता है ...................

इस पोस्ट को पढने से पहले पढें-------------इसे...
( क्योंकि इसके बाद ही मै ये सोच पाई हूँ )---



हर कोई बस अपनी ही किस्मत बदलना चाहता है ,
सिर्फ़ अपना घर ही बसाता है भले दूसरों का उजड जाए ,

छोटी-सी चादर भी अगर सबसे बाँट ले कोई ,
तो क्या मजाल किसी की कि कोई भूख
से मर जाए ।

गर काटा न होता किसी ने बेवजह पेडों को अब तक,
हरी होती वसुन्धरा-
पानी के लिए कोई न लड पाए ।

बुरा सोचने से किसी का- भला कब हुआ है आज तक ?,
गर अच्छा सोचें जो इन्सां-
तो सबका भला न हो जाए ?


ठान ले जो धनिया अपनी बेटी को पढाना ,
बेटी के साथ ही उसकी-
सारा गाँव भी पढ जाए ।

ख्ह्वाहिश है मेरी- राह के पत्त्थर हटाने की ,
इस उम्मीद में कि मेरे बाद कोई ठोकर न खा जाए............


फ़ितरत इन्सान की -------इन्सान खुद बनाता है ........
सब सकारात्मक सोचें- तो शायद ये दुनिया बदल जाए.........

Thursday, April 8, 2010

उसका खजाना ....



इसे आप संस्मरण कह लीजिए या कोई कहानी पर है ये आपबीती ................मेरे लिए इस घटना के मायने अलग है ..........ये वो घटना है ,जिससे मेरे सोचने का तरीका बदला है ...............
बात उन दिनों की है जब मै और मेरी बेटी नागपूर गए थे ..............और ट्रेन में हबीबगंज के पास हमारा एक बेग चोरी हो गया था ...................बहुत घबरा गई थी मै ................ऐसा पहली बार हुआ था ,हमारे साथ परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं था | बेग के साथ ही, मेरे पास जो थोड़े बहुत सोने के आभूषण थे, सब चोरी चले गए थे |दिमाग में
अजीब -अजीब से विचार आ रहे थे एक क्षण में ही सारी बुरी घटनाए जो अब तक घटी थी ,एक-एक कर याद आ गई थी , आंसू निकल पड़े थे मेरे............ ................बहुत समय लगा था इससे उबरने में ...................









जब इन्दोर वापस आए तो एक दिन स्कूल जाते समय बस की खिड़की से बाहर देख रही थी ............रास्ता तो वही रोज का रहता था ,..............पर एक आदत -सी पड़ चुकी थी कि--------जहां -जहां मंदिर ,मस्जिद, गिरजाघर पड़ते है वहाँ सर झुका देना ..................जो परिचित दिखाई पड़ जाए तो मुसकराकर नमस्ते करना ............... हर चौराहों पर सफाई करने वाले द्वारा बनाई रंगोली देखना .........और ......ये तुलना भी करना कि बस जल्दी आई है या काम जल्दी ख़तम कर दिया है ..................सड़क के किनारों पर रोज सोने वालो कों देखना कि वे उठे या नहीं,( मन में तो ये रहता है कि वे सकुशल है या नहीं ,दिखाई नहीं पड़े तो चिंता हो जाती है कि कहा रह गए होंगे......मन कों समझाना पड़ता है कि शायद जगह बदल ली होगी ).................रास्ते में पन्नी बीनने वाले बच्चों और औरतो के जत्थे भी दिखाई देते है ...............
.......और उस दिन भी ..........गुजरते हुए कूड़े के ढेर पर एक पन्नी बीनने वाली महिला कों बैठे देखा ,......उसकी गोदी में २-३ माह का एक बच्चा था ................ वो महिला अपने बच्चे कों दूध पिलाने के लिए कूड़े के ढेर पर ही बैठ गई थी .............और बच्चा भी सबसे बेखबर हो ममत्व का आनंद ले रहा था .........पर जिस दृष्य ने मुझे झिंझोरा था-------- वो ये कि उस महिला ने एक हाथ से अपना पन्नी भरा बोरा कसकर पकड़ा था , साथ के बाकी लोग पन्नी बीन रहे थे ,शायद उसे लग रहा था कि बच्चे कों दूध पिलाने के चक्कर में कोई उसके पन्नी के बोरे से पन्नी चुरा लेगा और उसके चहरे पर इतनी देर पन्नी न बीन पाने का तनाव भी साफ़ दिखाई दे रहा था ..................और मै ................मेरे दिमाग में से वो सूटकेस चोरी वाली बात जा ही नहीं रही थी ......................मै उसका शोक मना रही थी ....................तभी एक विचार आया -----------मेरे पास वो सूटकेस था और इसके पास , ...............इसके पास शायद ये पन्नी का बोरा ...................मुझे उसके चले जाने का दुःख है और इसे इसके चले जाने का वही डर है उसकी परिस्थिति में उसके पास पन्नी का बोरा ही उसका सोना था, ................बस सोने कि तुलना का ख्याल आते ही मेरे होठो पर मुस्कराहट छा गई ..............सोचा मै उस खजाने के लिए रो रही हू और ये इसके लिए खजाने के बराबर है ..................मुझसे कई गुना बड़ा है इसका खजाना ............................... .........
...............

(सभी चित्र गूगल से साभार )

Wednesday, December 23, 2009

एक विनम्र निवेदन

चूँकि मै शिक्षा जगत से जुडी हूँ इसलिए ये बात कह रही हूँ----------कॄपया ध्यान दें--------
मेरे सामने हमेशा एक गम्भीर समस्या आई है शायद इसका सामना आप लोगों को भी करना पडता हो, इसलिए इस बात की ओर सबका ध्यान दिलाना चाहती हूँ---------

" हम अंग्रेजी स्कूलों में पढते हैं ,
इसलिए रोज जाने क्या-क्या नये शब्द गढते हैं ।
अंग्रेजी कुछ इस तरह बोलते हैं ---
और करते हैं भूल ,
जैसे--
यू नो--- जिस लडके ने कल डांस किया था---ही वाज सोSSS कूSSSल !!!
या फ़िर-----
कल जिस लडकी ने गाना गाया था ----शी वाज हाऊ ब्यूटीफ़ूSSSल !!!
ये तो थी पहली समस्या ...........
अब दूसरी की ओर बढते हैं,
और समस्या नम्बर दो की पायदान चढते हैं----
बिहारी, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, हरियाणवी,
आदि भाषाएं हम सुनते हैं ,
और चूँकि मध्य-प्रदेश के वासी हैं, तो
इस भाषा में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देने के लिए --
हिन्दी को ही चुनते हैं ,
और अन्त में ---तीसरी समस्या के रूप में आती है ,साऊथ की बारी --
और ये समस्या पहली दोनो समस्याओं से भी है भारी ,
वहाँ की भाषाएँ बहुत मधुर ,मीठी और सुरीली है ,
क्योंकि वे हमारी जड यानि संस्कॄत से जुडी हुई हैं ,
वहाँ के लोग जो भाषाएँ बोलते है ---
वो हमारे ऊपर से जाती है ,
और हमारी भाषा ,
उनके उपर से जाती है ,
जब हम आपस में मिलते है तो---
खडे रहते हैं दोनो आमने -सामने मुस्कुराते हुए ,
और एक दूसरे की बात समझ गये-- ये जताते हुए ,
तो आओ इन समस्याओं का हल निकालें,
हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है---ये सबको दिखा दें,
हम सब कहीं भी रहें ,कैसे भी बोलें--पर
अन्याय, अत्याचार , और आतंकवाद से निपटने के इरादे से आगे आएँ ---
और जब भी मौका मिले ---राष्ट्रगीत ऊँचे परन्तु समवेत स्वर में गाएँ ---
इन तीनों समस्याओं को दूर करने का यही है एक उपाय ,ऐसी मुझे आशा है ---
क्योंकि आखिर "हिन्दी हमारी मातॄभाषा है ! ! ! ! !"