न गज़ल के बारे में कुछ पता है मुझे---,न ही किसी कविता के---,और न किसी कहानी या लेख को मै जानती---,बस जब भी और जो भी दिल मे आता है---,लिख देती हूँ "मेरे मन की"-----
दोनो बाल-मंदिर में पढ़ने आये थे।
माता-पिता पहली बार स्कूल छोड़ने आये थे,नई जगह नया लालच देकर लाए थे शायद।शुरू में तो सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
दूसरे दिन से स्कूल आना शुरू किया,पास बैठते,साथ टिफ़िन खाते अपनी चीजें खाना,खिलौना सब बांटते।
धीरे-धीरे दोस्ती ने जगह बनाई,और जब एक स्कूल नहीं आता तो दूसरा कुछ नहीं करता , उसका मन न लगता किसी काम में, न पढ़ना,न खेलना.न टिफ़िन खोलना बस अपनी टीचर के बाजू में बैठे रहना...और दरवाजे की ओर ताकते रहना।
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................निष्कपट दोस्ती ।
साथ-साथ खेलते।एक ही आदत चुप रहने की,बस किसी की मुर्खतापूर्ण बात या मजाक पर आपस मे देखकर मुस्करा देते,जैसे जान गए हों मन की बात ।
क्लास अलग-अलग मगर खेलने का मैदान एक ,यहां भी वही हाल एक्न आए तो दूसरे का मन न लगे, और दोनों रहने पर भले बात न करे,खेले अलग-अलग टीम से पर भरोसा की चिटींग नहीं करेंगे,एक विश्वास की सपोर्ट जरूर मिलेगा दूसरे का ...
.................निस्वार्थ दोस्ती।
अब एक -दूसरे की नजरों के भाव पढ़ना सीख गए ,पस-पास घर ..एक दूसरे के कार्य-कलापों पर दूर से नजर,
देर तक इन्तजार एक नजर देख लेने का...
पहचानी -सी आहट आने पर...एक का खिड़की की झिर्री से झांकना / गैलरी मे आना और दूसरे का उस झिर्री से आती रोशनी को देखना / चाहे कितना भी अंधेरा हो, चेहरा भी नजर न आए....बस गर्दन घुमाने की आदत ...और आंखों का उपर उठना.....
सोने से पहले आखरी बार एक झलक देख लेने का इन्तजार .....
दिन की शुरूआत सामान्य, कभी-कभी पूरा दिन सामान्य....बस शाम का इन्तजार....
सब मन के भीतर---बातें मुलाकातें....
...............रोमांचक दोस्ती......।.
दोनों अलग-अलग अपने-अपने घरों मे ..............न साथ ,न बात, न मुलाकात न ही कोई इन्तजार..
सुखद,खुशहाल जिंदगी..............
..............समर्पित दोस्ती.......।
और अब अपने काम/जिम्मेदारी पूरी करते -करते जीवन का अधिकतम पड़ाव खतम करने के बाद ....
फ़िर वही दोस्ती.....कहीं किताबें,कहीं लेखन,कहीं पठन ,कहीं संवाद.........फ़िर से वही ....
थोड़ा-बहुत नही ढेर सारा उगलने लगी ,
कहाँ से मुझको लिखना आया ?,
साहित्य का ज्ञान कहाँ से पाया ?,
बहुत सोचा मगर समझ में नही आया !
फिर लगा साहित्य है?,या कुछ और ?
पर कुछ और होगा तो क्या ?????????????????
फिर भी कुछ हाथ नही लगा ,
बहुत सर खपाया ,
और इसी उधेड़बुन में अपना पेन उठाया ,कागज पर रखा
अरे ये क्या ?वो चलने लगा ,
पता नही कैसे ?
रुकने का नाम ही नही ले रहा था ,
और तभी दिमाग की घंटी बजी !!!!!!!!!!
ऐसा ही कुछ हुआ होगा ,
दिमाग में ही कोई कीडा कुलबुलाया होगा ,
जाने कब से दबा हुआ था पेन ,
कागज देखते ही बाहर निकलने को छटपटाया होगा ,
पेन कागज पर गिरा होगा ,
और कागज स्याही से भर गया होगा ,
पढ़े -लिखे लोगो ने समझा होगा ,
और समझदारों ने ही कहा होगा -------------- मैलिखने लगी ,थोड़ाबहुतनहीढेरसाराउगलनेलगी !!!!!!!!!!!!!!
कल जिस आवाज को आपने सुना उनके और उस गीत के रचनाकार के बारे में बताने वाली थी आज ...
फिर सोचा मौके को भुना लू ...क्या पता उन्हें सुनने के बाद कोई ये सुनना भी पसंद करे या नहीं .....तो आज सुनिए वही गीत मेरी आवाज में ( एडिट उन्ही ने करके दिया है ).....
और हां ----कल की पोस्ट की टिप्पणियों से ज्ञात हुआ की पद्मसिंह जी और अनुराग शर्मा जी ....भी गाते है तो अब पॉडकास्ट की उनकी बारी रहेगी वे तैयार रहे ............हा हा हा ..........