Monday, August 1, 2011

इस बार "यूनिवर्सल मदर" गर्भनाल पत्रिका में ...जुलाई 2011 -अंक- 56 ,पेज -12

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गर्भनाल पत्रिका जुलाई अंक


युनिवर्सल मदर ... 
आज पूजा  बहुत उदास थी । "पूजा"मेरी हमउम्र सहेली एवं स्कूल में मेरी सहकर्मी। हम करीब -करीब सभी बातें एक दूसरे से बांटते हैं,और उम्र के इस पडाव पर आकर इतना अनुभव तो हो ही चुका है कि किसी को उदास या दुखी  देखकर उसके  चेहरे के हावभाव  और बोलचाल से पहचान लूँ कि कोई परेशानी है और बस चल पडती हूँ उसकी मदद करनेपर इस बार पूजा ने जो बताया उसने मुझे भी दुखी कर दिया. मैं सोचने को विवश हो गई कि आज बच्चों को हम स्कूल, परिवार और समाज में किस तरह विकसित कर रहे हैं? क्या यही देश के भावी कर्णधार है. आखिर ऐसी मानसिकता बच्चों में कहाँ से विकसित हो रही है और इसका असली जिम्मेदार कौन है?
मुलतः बच्चे तो वो कोमल पौधा हैं कि उन्हें जैसा विकसित करेंगे, वो वैसे ही बढ़ चलेंगे. तब उनके इस तरह के विकास का जिम्मेदार कौन है? कौन उनकी मनसिकता को रुग्ण किये दे रहा है?
खैर!!! मुझे यह सब सोचने के लिए विवश करने के पीछे और आज पूजा  के चेहरे पर छाई उदासी की असल वजह वो कहानी है, जो पूजा ने अपनी आपबीती मुझे सुनाई. 
पूजा बताने लगी - इस बार जब मैं मम्मी के यहाँ गई तो बेटा साथ नहीं था, अकेले जाना पडा था मुझे,रात भर का सफ़र था,थोडा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। बेटा बस पर छोड़्ने आया था तो सहयात्री से कह गया ----माँ अकेले जा रही है ---ख्याल रखना ।
......पूजा इतने सालों से स्कूल और घर दोनों ही जगह बच्चों के साथ काम कर रही है कि बस माँ के दायरे में ही बंध गई है, उसके सहकर्मी उसके मित्र बन गए हैं,किसी भी उम्र के हों , वो ये दो रिश्तों से कभी बाहर निकल नहीं पाई उसे अपने बारे में भी  कुछ सोचने का वक्त ही नहीं मिला या शायद उसने अपने आपको इसी दायरे में बन्द कर लिया था। फ़िर भी मै जानती हूँ कि वो इन दो रिश्तों में ही बहुत खुश है ।
हाँ तो उसने जो बताया --------साथ में जो सहयात्री मिला वो उसके बेटे की उम्र का एक बच्चा था ।चूंकि पूजा ने हमेशा ही माँ का किरदार ओढा तो हर बच्चा उसे अपना लगता है यहाँ तक कि स्कूल से बाहर जाने के बाद बच्चे उसे मेडम के बजाय मम्मी कहना ज्यादा पसंद करते हैं,वो है भी ऐसी कि  बच्चों के साथ बच्चों की उम्र की हो जाती है । नर्सरी से लेकेर बारहवीं के बच्चों के बीच पिछले बारह वर्षो से घिरी है वो और स्वभाव भी ऐसा कि किसी अजनबी पर भीजरूरत से ज्यादा ही विश्वास कर लेती है। मैं उसे रोकती हूँ पर जाने किस मिट्टी की बनी है वो------------बस एक यही काम नहीं होता उससे जहाँ दुख देखा नहीं कि लगी उसे पकडने-------सारे दुख दुसरों से छीन कर अपने पास ही रखना चाहती है ।
उस सहयात्री बच्चे से बातचीत शुरू हुई................ आपसी परिचय,घर-बारनौकरीकैरियर में आगे की योजना  ............आम बच्चों से जैसे बात की जाती है उस तरह सारी बातें कर ली उसने और बच्चा भी बेटा बनकर सब कुछ बताता रहा-------गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते ढेर सारा प्यार न्यौछावर कर दिया अपने इस नए बेटे पर ..
फिर कुछ दिनों बाद एक मेल मिला उसे --हेलो कैसी है आप ?देखिये मैंने आपको ढूंढ लिया ,पहचानामै आपको बस में मिला था ...उस दिन आपका नंबर लेना भूल गया था,प्लीज आपका फोन नम्बर मुझे मेल क़र दीजियेगा और हाँ सच्चे दोस्त कभी नहीं बिछड़ते ..आप मेरी दोस्त बनेंगी ?
पूजा ने पढ़कर जबाब दे दिया था --हां ,क्यों नहीं ,मै ठीक हूँ ,और मै आपकी दोस्त ही हूँ |
फिर कुछ दिन बाद अगले मेल  में   -- हाय, कैसी है आप आपने अपना नंबर नहीं दिया,मैंने दो बार माँगा |
पूजा के ये पूछने पर कि फ़ोन पर बात क्यों करना चाहते होक्या कोई परेशानी है ? उसका जबाब मिला कि मै आपसे बात करके आपके गम दूर करना चाहता हूँ |और हंसी आ गयी पूजा कोउसने बच्चे को बताया कि उसे खुद को व्यस्त रखना आता है और वो कभी दुखी नहीं रहती
आज उसे फिर एक मेल मिला था --मै तो बात करके तुम्हारे अन्दर की औरत को जगाने का प्रयास क़रना चाह  रहा था ,जो कि कही गुम हो गई है पूजा, आई लव यू!!
पूजा ने पढ़ा तो सन्न रह गई और बस यही पूजा कि उदासी का कारण बन गया था कि कहाँ तो वो युनिवर्सल मदर का ख़िताब पा चुकी थी और कहाँ ये बच्चा......
और मै निशब्द हो उसे सुन रही थी ---------
कौन जिम्मेदार है बच्चो की ऐसी रुग्ण मानसिकता का .....
उनके माता-पिता या संस्कार या फिर यह समाज या कुछ और........ 
 

11 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

BAHUT BAHUT BADHAI

रश्मि प्रभा... said...

bahut bahut badhaai aur shubhkamnayen... behtareen rachna

वन्दना said...

येकहानी गर्भनाल मे पढी थी बेहद सही सोच का परिचायक है………बहुत बहुत बधाई।

संजय भास्कर said...

बहुत बहुत बहुत बहुत बधाई !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

सम्बन्धों का एक नया ही पक्ष प्रस्तुत करती है यह कहानी।

vidhya said...

BAHUT BADHAI

कविता रावत said...

bahut badiya prastuti
haardik shubhkamnayen!

abhi said...

हे भगवान.!!! क्या कहूँ मैं और अब?

Anonymous said...

I am shaken to core after reading this.

But this is a reflection of changing mores of the society.

And I fear for my daughter.

So, Tragic. How a society can fall in 20 years or less.

अरुण चन्द्र रॉय said...

सुन्दर कथा और प्रकाशन के लिए बधाई.. आपकी भाषा सहज है... सरल है...