Thursday, September 18, 2014

कलाकारी

न जाने कितनी चीजें सीखी लड़की होने के कारण ...
ये दो फ्रेम शादी के बाद मेरे साथ ही ससुराल आई थी ....मैं तो इधर-उधर होती रही ...मगर ये आज भी उसी जगह टंगी हैं जहाँ नवम्बर 1984 में मैंने टांगी थी ......
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जब भी  यहाँ आती हूँ .... बहुत कुछ याद दिलाती हैं .......

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बढ़िया कलाकारी।

घनश्याम मौर्य said...

बढि़या। यह कपड़े पर बनाई गई है या टिन पर उकेरी गई है ?

Archana said...

वेलवेट के कागज पर फेविकोल से चिपकाया