Sunday, December 13, 2015

मधुर याद







रात के उन लम्हों की बात बताउँ

जिनमें मौन ही मैं सब बोल गई...



एक-एक उलझन जो मन में थी 

तेरे आगे सुलझाकर कर खोल गई...



झंकॄत हो मन .गया थिरक-थिरक

सिहरन हुई और देह भी डोल गई...



साँसों की सरगम पे ताल मिली जब

मधुयामिनी मन में मधुरस घोल गई..


-अर्चना

4 comments:

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर और भावपूर्ण.

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी....
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 14/12/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर... लिंक की जा रही है...
इस चर्चा में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...


जसवंत लोधी said...

भावुक पंक्तियाँ ' भाव बिभोर करने बाली है । धन्यवाद

Kavita Rawat said...

बहुत सुन्दर ...